आधुनिक भारत में शिक्षा एवं प्रेस का विकास (1781–1947): नीतियां, प्रमुख आयोग, ऐतिहासिक समाचार-पत्र एवं औपनिवेशिक प्रतिबंध
ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में आधुनिक शिक्षा और प्रिंटिंग प्रेस का विकास औपनिवेशिक हितों और भारतीय राष्ट्रीय चेतना के बीच एक अनवरत द्वंद्व की गाथा है। जहां एक ओर ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने प्रशासनिक तंत्र को सस्ते क्लर्क (‘बाबू’) उपलब्ध कराने और साम्राज्यवादी विस्तार को वैचारिक वैधता देने हेतु 1813 के चार्टर एक्ट, लॉर्ड मैकाले के स्मरण-पत्र (1835), और अधोमुखी निस्यंदन सिद्धांत (Downward Filtration Theory) को अपनाया, वहीं दूसरी ओर चार्ल्स वुड्स के 1854 के घोषणापत्र (मैग्नाकार्टा), हंटर आयोग (1882), रैले आयोग (1902), सैडलर आयोग (1917) और गांधीजी की वर्धा योजना (1937) ने भारतीय शैक्षिक परिदृश्य को नई दिशा दी। समानांतर रूप से, 1780 में जेम्स ऑगस्टस हिक्की के ‘बंगाल गजट’ से शुरू हुई पत्रकारिता ने भारतीय जनमानस में स्वतंत्रता की लौ जलाई, जिसे कुचलने हेतु अंग्रेजों ने 1823 का एडम्स नियम, 1878 का कुख्यात वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट (गैगिंग एक्ट), और 1910 का प्रेस अधिनियम लागू किया। यह आलेख UPSC Civil Services, UPPSC, BPSC, MPPSC, HPSC एवं अन्य State PCS हेतु इस संपूर्ण विषय का सबसे विस्तृत, प्रामाणिक व शोधपरक विश्लेषणात्मक संकलन प्रस्तुत करता है।
📚 आधुनिक भारत का इतिहास: श्रृंखला अनुक्रमणिका व संपूर्ण नेविगेशन हब
➡️ अगला विशेष अध्याय (अध्याय 14): ब्रिटिश प्रशासनिक, न्यायिक, पुलिस एवं सिविल सेवाओं का विकास तथा संवैधानिक सुधार (1773–1947)
📖 अध्याय 12: ब्रिटिश शासन की आर्थिक नीतियां: स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी, महालवाड़ी व धन की निकासी (Drain of Wealth)
📖 अध्याय 11: वेवेल योजना, कैबिनेट मिशन, माउंटबेटन योजना एवं 1947 स्वतंत्रता अधिनियम
📖 अध्याय 10: भारत छोड़ो आंदोलन (1942), अगस्त प्रस्ताव, क्रिप्स मिशन एवं आजाद हिंद फौज (INA)
📖 अध्याय 9: भारत शासन अधिनियम 1935, 1937 के प्रांतीय चुनाव एवं त्रिपुरी संकट
📖 अध्याय 8: सविनय अवज्ञा आंदोलन, दांडी मार्च, गोलमेज सम्मेलन व पूना पैक्ट (1930–1934)
📖 अध्याय 7: स्वराज पार्टी, क्रांतिकारी आंदोलन (HRA/HSRA) व साइमन कमीशन (1922–1929)
📖 अध्याय 5: गांधीवादी युग: चंपारण, रॉलेट, जलियांवाला बाग व असहयोग आंदोलन (1915–1922)
1. ब्रिटिश कालीन शिक्षा का विकास: प्रारंभिक चरण (1781–1835)
ईस्ट इंडिया कंपनी का आरंभिक दृष्टिकोण भारतीय शिक्षा के प्रति पूर्णतः उदासीनता (Policy of Indifference) का था। कंपनी का एकमात्र लक्ष्य व्यापारिक मुनाफा कमाना था। आरंभ में जो भी प्रयास हुए, उनका उद्देश्य भारतीय कानूनों, परंपराओं और भाषाओं को समझकर प्रशासन को सुगम बनाना तथा कंपनी के न्यायालयों हेतु काजी, मुफ्ती और पंडित तैयार करना था।
आरंभिक प्राच्यवादी संस्थान (Early Orientalist Institutions):
- कलकत्ता मदरसा (1781): गवर्नर-जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने मुस्लिम कानून, अरबी और फारसी भाषा के अध्ययन हेतु इसकी स्थापना की। यह ब्रिटिश सरकार द्वारा स्थापित पहला शैक्षणिक संस्थान था।
- एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल (1784): सर विलियम जोन्स द्वारा कलकत्ता में स्थापित। इसका उद्देश्य प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति और पांडुलिपियों का अध्ययन एवं अंग्रेजी में अनुवाद करना था। चार्ल्स विल्किंस ने 1785 में ‘भगवद्गीता’ और 1787 में ‘हितोपदेश’ का प्रथम अंग्रेजी अनुवाद किया। 1789 में जोन्स ने कालिदास कृत ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’ का अनुवाद किया।
- बनारस संस्कृत कॉलेज (1791): ब्रिटिश रेजिडेंट जोनाथन डंकन के प्रयासों से हिंदू धर्मशास्त्रों, दर्शन और कानूनों के अध्ययन हेतु इसकी स्थापना हुई।
- फोर्ट विलियम कॉलेज (1800): लॉर्ड वेलेजली ने कंपनी के नव-नियुक्त असैनिक अधिकारियों (Civil Servants) को भारतीय भाषाओं, रीति-रिवाजों और प्रशासनिक नियमों में प्रशिक्षित करने हेतु कलकत्ता में स्थापित किया। हालांकि 1802 में कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के आदेश पर इसे बंद कर दिया गया और लंदन में हेलेबरी कॉलेज (1806) की स्थापना की गई।
- कलकत्ता हिंदू कॉलेज (1817): राजा राममोहन राय, डेविड हेयर और सर एडवर्ड हाइड ईस्ट के संयुक्त प्रयासों से स्थापित हुआ। यह भारतीयों को पाश्चात्य विज्ञान, मानविकी और अंग्रेजी भाषा की उच्च शिक्षा देने वाला पहला धर्मनिरपेक्ष निजी कॉलेज था।
📌 1813 का चार्टर अधिनियम (धारा 43): राज्य के दायित्व की शुरुआत
1813 के चार्टर एक्ट की धारा 43 में पहली बार यह वैधानिक प्रावधान किया गया कि ईस्ट इंडिया कंपनी प्रतिवर्ष कम से कम ₹1 लाख की राशि भारत में साहित्य के पुनरुद्धार तथा भारतीयों में आधुनिक विज्ञान के ज्ञान के प्रसार हेतु व्यय करेगी। इसके अतिरिक्त ईसाई मिशनरियों को भारत में धर्म प्रचार और स्कूल खोलने की कानूनी अनुमति दी गई। यद्यपि यह राशि बहुत कम थी, किंतु इसने पहली बार शिक्षा को ‘राज्य के आधिकारिक दायित्व’ के रूप में मान्यता दी।
आंग्ल-प्राच्य विवाद (The Anglicist-Orientalist Controversy):
1813 के अधिनियम में उल्लिखित ₹1 लाख की राशि को कैसे और किस माध्यम से खर्च किया जाए, इस पर 1823 में गठित ‘लोक शिक्षा की सामान्य समिति’ (General Committee of Public Instruction) के 10 सदस्य दो विरोधी गुटों में बंट गए:
- प्राच्यविद् गुट (Orientalists): इसका नेतृत्व समिति के सचिव एच. टी. प्रिंसेप और एच. एच. विल्सन कर रहे थे। इनका तर्क था कि भारतीय समाज में स्थिरता बनाए रखने के लिए पारंपरिक संस्कृत, अरबी व फारसी साहित्य तथा दर्शन को प्रोत्साहन दिया जाए और शिक्षा का माध्यम देशी भाषाएं हों।
- आंग्लविद् गुट (Anglicists): इसका नेतृत्व चार्ल्स ट्रेवेलियन और बेंटिक के समर्थक कर रहे थे। इनका मानना था कि भारत में पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान का प्रसार केवल और केवल अंग्रेजी भाषा के माध्यम से ही किया जाना चाहिए।
2. मैकाले का स्मरण-पत्र (1835) एवं अधोमुखी निस्यंदन सिद्धांत
जब आंग्ल-प्राच्य विवाद में गतिरोध पैदा हो गया, तब 1834 में गवर्नर-जनरल की कार्यकारिणी परिषद के पहले विधि सदस्य बनकर भारत आए लॉर्ड थॉमस बेबिंगटन मैकाले (Lord Macaulay) को लोक शिक्षा समिति का अध्यक्ष बनाया गया। मैकाले ने 2 फरवरी 1835 को अपना बहुचर्चित स्मरण-पत्र (Macaulay’s Minute) प्रस्तुत किया।
💬 मैकाले का कुख्यात कथन एवं औपनिवेशिक दर्शन:
“एक अच्छे यूरोपीय पुस्तकालय की केवल एक अलमारी का तख्ता समूचे भारत और अरब के संपूर्ण देशी साहित्य से अधिक मूल्यवान है।” (A single shelf of a good European library was worth the whole native literature of India and Arabia.)
मैकाले का उद्देश्य एक ऐसा भारतीय वर्ग तैयार करना था जो: “रक्त और रंग से भारतीय हो, लेकिन अपनी पसंद, विचारों, नैतिकता और बुद्धि में अंग्रेज हो” (A class of persons Indian in blood and colour, but English in tastes, in opinions, in morals and in intellect)। यह वर्ग ब्रिटिश राज और आम जनता के बीच प्रशासनिक मध्यस्थ (बाबू) का काम करे।
गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक ने 7 मार्च 1835 को मैकाले के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और घोषणा की कि सरकार के सभी उपलब्ध वित्तीय संसाधन केवल अंग्रेजी माध्यम से यूरोपीय साहित्य एवं विज्ञान के शिक्षण पर ही व्यय किए जाएंगे। इसके बाद 1844 में लॉर्ड हार्डिंग प्रथम ने घोषणा की कि सरकारी नौकरियों में अंग्रेजी शिक्षित व्यक्तियों को प्राथमिकता दी जाएगी।
अधोमुखी निस्यंदन सिद्धांत (Downward Filtration Theory):
कंपनी के पास पूरे भारत की विशाल जनता को शिक्षित करने के लिए न तो संसाधन थे और न ही राजनीतिक इच्छाशक्ति। अतः अंग्रेजों ने ‘ट्रिकल डाउन’ या ‘अधोमुखी निस्यंदन सिद्धांत’ को आधिकारिक नीति बनाया।
इस सिद्धांत का मूल विचार यह था कि शिक्षा समाज के केवल उच्च और उच्च-मध्यम वर्ग के मुट्ठी भर लोगों को दी जाए। जब ये संभ्रांत लोग अंग्रेजी शिक्षा ग्रहण कर लेंगे, तो उनसे छन-छनकर (Filter होकर) ज्ञान की बूंदें धीरे-धीरे नीचे आम जनमानस तक पहुंचेंगी। इस नीति के कारण जनशिक्षा (Mass Education) पूरी तरह उपेक्षित रही और देश में 90% से अधिक आबादी घोर निरक्षरता के अंधकार में धकेल दी गई।
3. चार्ल्स वुड्स का डिस्पैच 1854: भारतीय शिक्षा का मैग्नाकार्टा
1853 के चार्टर एक्ट के नवीनीकरण के समय ब्रिटिश संसद ने भारतीय शिक्षा की व्यापक समीक्षा की। बोर्ड ऑफ कंट्रोल के अध्यक्ष सर चार्ल्स वुड ने 19 जुलाई 1854 को 100 अनुच्छेदों का एक विस्तृत नीतिगत दस्तावेज भेजा, जिसे ‘वुड्स डिस्पैच’ (Wood’s Despatch) कहा जाता है। इसे भारत में अंग्रेजी शिक्षा का ‘मैग्नाकार्टा’ (Magna Carta of English Education in India) माना जाता है।
📌 वुड्स डिस्पैच (1854) के क्रांतिकारी प्रावधान:
- निस्यंदन सिद्धांत की अस्वीकृति: वुड्स डिस्पैच ने मैकाले के ‘डाउनवर्ड फिल्ट्रेशन थ्योरी’ को आधिकारिक रूप से खारिज कर दिया और घोषणा की कि जनसाधारण तक शिक्षा पहुंचाना सरकार का पवित्र कर्तव्य है।
- त्रिस्तरीय भाषा माध्यम: इसने प्राथमिक स्तर पर देशी भाषाओं (Vernaculars), माध्यमिक/हाईस्कूल स्तर पर एंग्लो-वर्नाक्युलर (द्विभाषी) और उच्च/विश्वविद्यालय स्तर पर अंग्रेजी को माध्यम बनाने की स्पष्ट संस्तुति की।
- तीन प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालयों की स्थापना: लंदन विश्वविद्यालय के मॉडल पर कलकत्ता, बंबई और मद्रास में विश्वविद्यालयों की स्थापना की सिफारिश की गई। (तदनुसार 1857 में इन तीनों विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई)।
- लोक शिक्षा विभाग (DPI): पांचों प्रांतों (बंगाल, बॉम्बे, मद्रास, पंजाब, उत्तर-पश्चिम प्रांत) में एक ‘लोक शिक्षा निदेशक’ (Director of Public Instruction – DPI) के अधीन अलग शिक्षा विभाग स्थापित करने का निर्देश दिया गया।
- सहायता अनुदान प्रणाली (Grants-in-Aid): निजी एवं धर्मार्थ प्रयासों तथा मिशनरियों द्वारा संचालित स्कूलों को प्रोत्साहित करने हेतु सरकारी अनुदान प्रणाली लागू की गई।
- व्यावसायिक एवं महिला शिक्षा: शिक्षकों के प्रशिक्षण हेतु सामान्य स्कूलों (Normal Schools), तकनीकी संस्थानों तथा महिला शिक्षा (Female Education) को विशेष सरकारी संरक्षण देने की वकालत की गई।
- धर्मनिरपेक्ष शिक्षा (Secular Education): सरकारी शिक्षण संस्थानों में दी जाने वाली शिक्षा पूर्णतः धर्मनिरपेक्ष होनी चाहिए।
4. प्रमुख ब्रिटिश शिक्षा आयोग एवं नीतियां (1882–1944)
1854 के बाद भारत में शिक्षा के प्रसार और गुणवत्ता की समीक्षा हेतु ब्रिटिश सरकार ने समय-समय पर महत्वपूर्ण आयोगों और समितियों का गठन किया:
A. हंटर शिक्षा आयोग (Hunter Education Commission, 1882)
नियुक्ति: वायसराय लॉर्ड रिपन ने 1854 के वुड्स डिस्पैच की प्रगति और प्राथमिक शिक्षा की स्थिति की जांच हेतु सर विलियम विल्सन हंटर की अध्यक्षता में प्रथम भारतीय शिक्षा आयोग गठित किया।
- प्राथमिक शिक्षा पर विशेष बल: आयोग ने सिफारिश की कि प्राथमिक शिक्षा का प्रसार आम जनता की भाषा (मातृभाषा) में हो और यह जीवनोपयोगी विषयों पर केंद्रित हो।
- स्थानीय निकायों को हस्तांतरण: लॉर्ड रिपन के स्थानीय स्वशासन प्रस्तावों के अनुरूप, प्राथमिक शिक्षा का प्रशासनिक एवं वित्तीय प्रबंधन नवगठित नगरपालिकाओं (Municipalities) और जिला परिषदों (District Boards) को सौंपने का निर्देश दिया गया।
- माध्यमिक शिक्षा के दो प्रभाग: माध्यमिक शिक्षा को दो धाराओं में बांटा जाए—एक विश्वविद्यालय प्रवेश हेतु साहित्यिक शिक्षा, और दूसरी व्यावहारिक एवं व्यावसायिक जीवन हेतु तकनीकी/व्यापारिक शिक्षा।
- महिला शिक्षा का विस्तार: प्रेसीडेंसी नगरों से बाहर ग्रामीण क्षेत्रों में बालिकाओं की शिक्षा हेतु विशेष निधि और निरीक्षण व्यवस्था की जाए।
- परिणाम: इसके बाद पंजाब विश्वविद्यालय (1882) और इलाहाबाद विश्वविद्यालय (1887) की स्थापना हुई।
B. सर थॉमस रैले आयोग एवं भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम (1904)
पृष्ठभूमि: वायसराय लॉर्ड कर्जन शिक्षा को साम्राज्यवादी नियंत्रण का माध्यम बनाना चाहता था। सितंबर 1901 में उसने शिमला में एक गुप्त शिक्षा सम्मेलन आयोजित किया जिसमें किसी भारतीय को नहीं बुलाया गया। 1902 में उसने सर थॉमस रैले की अध्यक्षता में विश्वविद्यालय आयोग गठित किया। भारतीय जनमत के भारी विरोध के बाद दो भारतीय सदस्य—सैयद हुसैन बिलग्रामी और न्यायमूर्ति गुरुदास बनर्जी—शामिल किए गए।
- भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम (1904) के प्रावधान:
- विश्वविद्यालयों का दायित्व केवल परीक्षा लेना नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष शिक्षण एवं उच्च शोध (Research) का संवर्धन करना होगा।
- सीनेट के फेलो (सदस्यों) की संख्या न्यूनतम 50 और अधिकतम 100 सीमित कर दी गई तथा उनका कार्यकाल आजीवन से घटाकर 5 वर्ष कर दिया गया। अधिकांश सदस्य सरकार द्वारा मनोनीत होने थे।
- सरकार को सीनेट द्वारा बनाए गए नियमों को अस्वीकार या संशोधित करने का वीटो अधिकार दिया गया।
- निजी कॉलेजों के संबंधन (Affiliation) की शर्तें अत्यधिक कठोर कर दी गईं और सरकारी निरीक्षण अनिवार्य किया गया।
- राष्ट्रवादी प्रतिक्रिया: गोपाल कृष्ण गोखले ने इस कानून को “पीछे की ओर ले जाने वाला प्रतिगामी कदम” कहा। राष्ट्रवादियों ने महसूस किया कि कर्जन उच्च शिक्षा का स्तर सुधारने के बहाने विश्वविद्यालयों में उभरते राष्ट्रवाद का गला घोंटना चाहता था।
- राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन (1906): 1905 के स्वदेशी आंदोलन के दौरान ब्रिटिश शिक्षा के बहिष्कार के प्रत्युत्तर में सतीश चंद्र मुखर्जी ने ‘डॉन सोसाइटी’ बनाई और 15 अगस्त 1906 को ‘राष्ट्रीय शिक्षा परिषद’ (National Council of Education) की स्थापना की गई। बंगाल नेशनल कॉलेज की स्थापना हुई जिसके प्रथम प्राचार्य अरविंद घोष बने।
C. सैडलर विश्वविद्यालय आयोग (Saddler Commission, 1917–19)
नियुक्ति: लीड्स विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. माइकल सैडलर की अध्यक्षता में कलकत्ता विश्वविद्यालय की समस्याओं और प्रशासनिक बोझ की जांच हेतु गठित। आयोग में दो प्रसिद्ध भारतीय सदस्य डॉ. आशुतोष मुखर्जी और डॉ. जियाउद्दीन अहमद शामिल थे।
- माध्यमिक शिक्षा की बुनियाद: आयोग का ऐतिहासिक निष्कर्ष था कि “यदि विश्वविद्यालयी शिक्षा में सुधार करना है, तो पहले माध्यमिक शिक्षा में आमूलचूल सुधार करना अनिवार्य है।”
- 12 वर्षीय स्कूली पाठ्यक्रम: स्कूली शिक्षा 12 वर्ष की हो। इंटरमीडिएट (11वीं व 12वीं) को विश्वविद्यालय से अलग कर स्वायत्त ‘माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक शिक्षा बोर्ड’ (Board of Secondary and Intermediate Education) स्थापित किए जाएं।
- त्रिवर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम: इंटरमीडिएट के बाद त्रिवर्षीय स्नातक (3-Year Degree) पाठ्यक्रम शुरू किया जाए तथा ऑनर्स और पास कोर्स अलग किए जाएं।
- आवासीय व एकात्मक विश्वविद्यालय: संबद्ध करने वाले ढीले-ढाले विश्वविद्यालयों की जगह शिक्षण-सह-आवासीय (Unitary, Teaching and Residential) विश्वविद्यालयों को प्राथमिकता दी जाए।
- परिणाम स्वरूप नए विश्वविद्यालय: सैडलर आयोग की सिफारिशों पर पटना (1917), बनारस (1916), अलीगढ़ (1920), ढाका (1921), लखनऊ (1921), उस्मानिया (1918) और दिल्ली (1922) विश्वविद्यालयों का तीव्र विकास हुआ। 1919 के भारत शासन अधिनियम द्वारा शिक्षा को ‘हस्तांतरित विषय’ (Transferred Subject) बनाकर भारतीय मंत्रियों को सौंप दिया गया।
D. हर्टोग समिति, वर्धा योजना एवं सार्जेंट योजना (1929–1944)
- हर्टोग समिति (Hartog Committee, 1929): साइमन कमीशन की सहायक समिति के रूप में सर फिलिप हर्टोग की अध्यक्षता में गठित। इसने प्राथमिक शिक्षा में ‘अपव्यय’ (Wastage – कक्षा पूरी किए बिना स्कूल छोड़ना) और ‘अवरोधन’ (Stagnation – एक ही कक्षा में बार-बार फेल होना) की गंभीर समस्या को उजागर किया। इसने स्कूलों की संख्या बढ़ाने के बजाय केवल गुणवत्तापूर्ण संस्थाओं को ही मान्यता देने की संस्तुति की।
- वर्धा शिक्षा योजना / बेसिक शिक्षा / नई तालीम (1937):
- अक्तूबर 1937 में महात्मा गांधी ने अपने पत्र ‘हरिजन’ में लेख लिखकर वर्धा में अखिल भारतीय राष्ट्रीय शिक्षा सम्मेलन आयोजित किया।
- जामिया मिलिया इस्लामिया के कुलपति डॉ. जाकिर हुसैन की अध्यक्षता में समिति ने इसकी विस्तृत रिपोर्ट तैयार की।
- मूल सिद्धांत: 7 से 14 वर्ष तक के बालकों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा मातृभाषा में दी जाए। शिक्षा का केंद्र कोई उत्पादक हस्तशिल्प (Craft-centered Learning) जैसे कताई-बुनाई, बढ़ईगिरी या कृषि हो, ताकि विद्यार्थी स्वावलंबी बन सकें और स्कूल अपने खर्च का हिस्सा स्वयं निकाल सकें।
- सार्जेंट शिक्षा योजना (Sargent Plan, 1944):
- भारत सरकार के शैक्षिक सलाहकार सर जॉन सार्जेंट ने केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड (CABE) के तहत ‘युद्धोत्तर भारत में शैक्षिक विकास’ पर ऐतिहासिक रिपोर्ट दी।
- लक्ष्य: आगामी 40 वर्षों में भारत में ब्रिटेन के स्तर की सार्वभौमिक साक्षरता और शैक्षिक ढांचा विकसित करना। (बाद में 1948 में बी. जी. खेर समिति ने इस समय-सीमा को घटाकर 16 वर्ष करने की संस्तुति की)।
- प्रावधान: 3 से 6 वर्ष तक पूर्व-प्राथमिक शिक्षा, 6 से 14 वर्ष तक निःशुल्क व अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा, और विश्वविद्यालय अनुदान समिति (UGC) का गठन।
📊 ब्रिटिश कालीन प्रमुख शिक्षा आयोगों का कालक्रम व त्वरित तुलनात्मक चार्ट
| आयोग / समिति | वर्ष | तत्कालीन वायसराय / सरकार | अध्यक्ष / सूत्रधार | मुख्य सिफारिश एवं प्रभाव |
|---|---|---|---|---|
| चार्टर अधिनियम (धारा 43) | 1813 | लॉर्ड मिंटो प्रथम / हेस्टिंग्स | ब्रिटिश संसद | शिक्षा हेतु वार्षिक ₹1 लाख का प्रथम बजट, ईसाई मिशनरियों को छूट। |
| मैकाले का स्मरण-पत्र | 1835 | लॉर्ड विलियम बेंटिक | लॉर्ड मैकाले | अंग्रेजी आधिकारिक माध्यम स्वीकृत; अधोमुखी निस्यंदन सिद्धांत। |
| वुड्स डिस्पैच (मैग्नाकार्टा) | 1854 | लॉर्ड डलहौजी | सर चार्ल्स वुड | निस्यंदन रद्द, DPI की स्थापना, सहायता अनुदान, 3 प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय (1857)। |
| हंटर शिक्षा आयोग | 1882 | लॉर्ड रिपन | सर विलियम हंटर | प्राथमिक शिक्षा का स्थानीय निकायों (नगरपालिका/जिला बोर्ड) को हस्तांतरण। |
| रैले आयोग व विश्वविद्यालय एक्ट | 1902/04 | लॉर्ड कर्जन | सर थॉमस रैले | विश्वविद्यालयों पर कठोर सरकारी नियंत्रण; राष्ट्रीय शिक्षा परिषद (1906) का जन्म। |
| सैडलर विश्वविद्यालय आयोग | 1917 | लॉर्ड चेम्सफोर्ड | डॉ. माइकल सैडलर | 12 वर्षीय स्कूली शिक्षा, इंटरमीडिएट बोर्ड, 3-वर्षीय डिग्री पाठ्यक्रम। |
| हर्टोग समिति | 1929 | लॉर्ड इरविन | सर फिलिप हर्टोग | प्राथमिक शिक्षा में ‘अपव्यय’ और ‘अवरोधन’ पर नियंत्रण; गुणात्मक सुधार। |
| वर्धा शिक्षा योजना (बेसिक शिक्षा) | 1937 | प्रांतीय कांग्रेसी सरकारें | महात्मा गांधी / डॉ. जाकिर हुसैन | 7-14 वर्ष निःशुल्क मातृभाषा शिक्षा; हस्तशिल्प केंद्रित स्वावलंबी ‘नई तालीम’। |
| सार्जेंट शिक्षा योजना | 1944 | लॉर्ड वेवेल | सर जॉन सार्जेंट | 40 वर्षों में ब्रिटेन के समान सार्वभौमिक शिक्षा का लक्ष्य (खेर समिति: 16 वर्ष)। |
5. भारत में प्रिंटिंग प्रेस का उद्भव एवं ब्रिटिश सेंसरशिप नीतियां (1780–1857)
भारत में मुद्रणालय (Printing Press) की शुरुआत 16वीं शताब्दी में 1556 ई. में पुर्तगाली जेसुइट पादरियों द्वारा गोवा में की गई थी। ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपना पहला प्रिंटिंग प्रेस 1684 में बंबई में स्थापित किया, किंतु लगभग एक सदी तक कोई समाचार-पत्र प्रकाशित नहीं हुआ।
भारत के आरंभिक समाचार-पत्र:
- द बंगाल गजट (1780): 29 जनवरी 1780 को जेम्स ऑगस्टस हिक्की (James Augustus Hicky) ने कलकत्ता से ‘द बंगाल गजट’ (The Calcutta General Advertiser) निकाला। यह भारत का पहला समाचार-पत्र था। हिक्की ने वारेन हेस्टिंग्स और मुख्य न्यायाधीश एलिजा इम्पे के भ्रष्टाचार की तीखी आलोचना की, जिसके परिणामस्वरूप 1782 में उसका प्रेस जब्त कर लिया गया।
- गंगाधर भट्टाचार्य का बंगाल गजट (1816): किसी भारतीय द्वारा अंग्रेजी में प्रकाशित पहला समाचार पत्र था, जो राजा राममोहन राय के विचारों से प्रेरित था।
- दिग्दर्शन एवं समाचार दर्पण (1818): श्रीरामपुर के बैपटिस्ट मिशनरियों (जे. सी. मार्शमैन) द्वारा बंगाली भाषा में प्रकाशित ‘दिग्दर्शन’ प्रथम मासिक पत्रिका थी और ‘समाचार दर्पण’ प्रथम बंगाली साप्ताहिक समाचार पत्र था।
- उदंत मार्तंड (1826): 30 मई 1826 को कलकत्ता से पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने हिंदी का प्रथम साप्ताहिक पत्र ‘उदंत मार्तंड’ (Udant Martand) प्रकाशित किया। इसी उपलक्ष्य में प्रतिवर्ष 30 मई को ‘हिंदी पत्रकारिता दिवस’ मनाया जाता है।
प्रेस पर प्रारंभिक ब्रिटिश दमनकारी कानून:
- वेलेजली का सेंसरशिप अधिनियम (Censorship of Press Act, 1799): नेपोलियन के भारत आक्रमण के भय से लॉर्ड वेलेजली ने पहली बार प्रेस पर कठोर पूर्व-सेंसरशिप (Pre-censorship) थोपी। अखबार पर मुद्रक, संपादक और स्वामी का नाम छापना अनिवार्य था तथा सरकारी सचिव से पास कराए बिना कुछ भी छापना वर्जित था। 1818 में लॉर्ड हेस्टिंग्स ने इस पूर्व-सेंसरशिप को समाप्त कर दिया।
- जॉन एडम्स का लाइसेंसिंग विनियमन (Licensing Regulations, 1823): कार्यवाहक गवर्नर-जनरल जॉन एडम्स ने नियम बनाया कि बिना सरकारी लाइसेंस के कोई भी प्रिंटिंग प्रेस नहीं चलाया जा सकता। इस कानून का मुख्य शिकार राजा राममोहन राय का फारसी साप्ताहिक ‘मिरात-उल-अखबार’ बना। राममोहन राय ने विरोध स्वरूप इसका प्रकाशन बंद कर दिया।
- चार्ल्स मेटकाफ का प्रेस अधिनियम (1835 – भारतीय प्रेस का मुक्तिदाता): 1835-36 में कार्यवाहक गवर्नर-जनरल सर चार्ल्स मेटकाफ ने विधि सदस्य मैकाले की सहायता से 1823 के कुख्यात कानून को रद्द कर दिया। उसने मुद्रकों को केवल प्रकाशन स्थल की सामान्य घोषणा करने का नियम बनाकर पूर्ण स्वतंत्रता दी। इसी कारण मेटकाफ को ‘भारतीय प्रेस का मुक्तिदाता’ (Liberator of Indian Press) कहा जाता है।
- लाइसेंसिंग अधिनियम (1857): 1857 के महाविद्रोह के समय लॉर्ड कैनिंग ने आपातकालीन शक्तियों का उपयोग कर 1 वर्ष हेतु पुनः लाइसेंसिंग प्रणाली थोप दी।
- प्रेस एवं पुस्तक पंजीकरण अधिनियम (1867): इसने मेटकाफ एक्ट का स्थान लिया। यह दमनकारी न होकर विनियामक (Regulatory) था। इसके तहत प्रत्येक मुद्रित पुस्तक व पत्र पर मुद्रक, प्रकाशक और स्थान का नाम लिखना तथा एक प्रति स्थानीय सरकार को जमा करना अनिवार्य बनाया गया।
6. वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट 1878 (गैगिंग एक्ट) एवं राष्ट्रवादी पत्रकारिता का संघर्ष
1876-78 में जब भारत भीषण अकाल और भुखमरी की चपेट में था, तब वायसराय लॉर्ड लिटन ने दिल्ली में भव्य दरबार आयोजित कर अकूत धन बहाया और द्वितीय आंग्ल-अफगान युद्ध छेड़ दिया। भारतीय भाषाई समाचार-पत्रों ने लिटन की इस संवेदनहीनता की तीखी भर्त्सना की। बौखलाए लिटन ने भाषाई प्रेस का गला घोंटने हेतु मार्च 1878 में ‘वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट’ (Vernacular Press Act, Act IX of 1878) पारित किया।
🛑 वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट 1878 के दमनकारी लक्षण (गैगिंग एक्ट):
- घोर नस्लीय भेदभाव: यह कानून केवल भारतीय भाषाओं (देशी प्रेस) पर लागू होता था; अंग्रेजी भाषा के एंग्लो-इंडियन पत्रों पर यह लागू नहीं था। इसीलिए इसे ‘मुंह बंद करने वाला कानून’ (Gagging Act) कहा गया।
- असीमित मजिस्ट्रेट शक्तियां: जिला मजिस्ट्रेट को अधिकार था कि वह किसी भी प्रकाशक से सुरक्षा जमानत राशि मांग सकता था और सरकार विरोधी लेख छापने पर प्रेस और संपत्ति जब्त कर सकता था।
- न्यायिक अपील पर पूर्ण रोक: मजिस्ट्रेट का निर्णय अंतिम था। उसके विरुद्ध किसी भी सिविल न्यायालय या हाईकोर्ट में अपील करने का कोई अधिकार नहीं था।
वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट से जुड़ी ऐतिहासिक घटनाएं:
- अमृत बाजार पत्रिका का रातों-रात कायापलट: शिशिर कुमार घोष और मोतीलाल घोष द्वारा संपादित ‘अमृत बाजार पत्रिका’ (बंगाली) को पकड़ने हेतु यह कानून विशेष रूप से बनाया गया था। किंतु कानून से बचने के लिए यह अखबार 21 मार्च 1878 को रातों-रात पूरी तरह अंग्रेजी भाषा के समाचार-पत्र में बदल गया!
- सोम प्रकाश पर पहली कार्रवाई: ईश्वरचंद्र विद्यासागर और द्वारकानाथ विद्याभूषण के प्रसिद्ध पत्र ‘सोम प्रकाश’ पर सबसे पहले इस कानून के तहत मुकदमा चला और जमानत राशि मांगी गई। इसके अतिरिक्त ‘सुलभ समाचार’, ‘ढाका प्रकाश’ और ‘भारत मिहिर’ पर भी शिकंजा कसा गया।
- लॉर्ड रिपन द्वारा निरसन (1882): 1880 में जब उदारवादी लॉर्ड रिपन वायसराय बना, तो उसने भारतीय जनमत का सम्मान करते हुए जनवरी 1882 में वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट को पूरी तरह रद्द कर दिया और भाषाई प्रेस को स्वतंत्रता वापस लौटाई।
7. राष्ट्रवादी पत्रकारिता के प्रमुख नायक एवं 20वीं सदी के प्रेस कानून
पत्रकारिता के अमर सेनानी:
- सुरेंद्रनाथ बनर्जी (जेल जाने वाले प्रथम पत्रकार, 1883): अपने अंग्रेजी पत्र ‘द बंगाली’ (The Bengalee) में कलकत्ता हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश के पक्षपातपूर्ण रवैये की आलोचना करने पर 1883 में उन्हें 2 माह का कारावास हुआ। वे पत्रकारिता के दायित्व हेतु जेल जाने वाले प्रथम भारतीय बने।
- बाल गंगाधर तिलक (लोकमान्य): 1881 में पुणे से ‘केसरी’ (मराठी) और ‘मराठा’ (अंग्रेजी) का संपादन शुरू किया। 1897 में प्लेग कमिश्नर रैंड की हत्या के बाद केसरी में लेख लिखने पर उन पर आईपीसी की धारा 124A (राजद्रोह) के तहत मुकदमा चलाया गया और 18 माह का कठोर कारावास दिया गया। झुकने से इनकार करने पर जनता ने उन्हें ‘लोकमान्य’ की उपाधि दी। 1908 में मुजफ्फरपुर बम कांड के समर्थन में लेख लिखने पर उन्हें पुनः 6 वर्ष के देश निकाले की सजा देकर बर्मा की मांडले जेल भेजा गया, जहां उन्होंने कालजयी ग्रंथ ‘गीता रहस्य’ लिखा।
- जी. सुब्रह्मण्यम अय्यर: दक्षिण भारत में राष्ट्रवाद के अग्रदूत। उन्होंने 1878 में अंग्रेजी में ‘द हिंदू’ (The Hindu) और 1882 में तमिल का प्रथम दैनिक ‘स्वदेशमित्रन’ (Swadesamitran) स्थापित किया।
- गणेश शंकर विद्यार्थी: 1913 में कानपुर से क्रांतिकारी पत्र ‘प्रताप’ निकाला। इन्होंने राजस्थान के बिजोलिया किसान आंदोलन और अवध के किसान आंदोलनों को राष्ट्रीय पहचान दिलाई।
20वीं सदी के ब्रिटिश दमनकारी प्रेस कानून:
- समाचार पत्र (अपराध उद्दीपन) अधिनियम (1908): स्वदेशी व क्रांतिकारी आंदोलन को दबाने हेतु मजिस्ट्रेट को हिंसा भड़काने वाले किसी भी पत्र की संपत्ति व प्रिंटिंग प्रेस जब्त करने का अधिकार दिया गया। ‘युगांतर’, ‘संध्या’ और ‘वंदे मातरम’ इसके निशाने पर रहे।
- भारतीय प्रेस अधिनियम (1910): इसने वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट 1878 के सबसे क्रूर प्रावधानों को पुनर्जीवित किया। मुद्रकों से ₹500 से ₹2000 तक की भारी जमानत राशि मांगी जाती थी और आपत्तिजनक सामग्री पर जमानत व प्रेस दोनों जब्त कर लिए जाते थे।
- तेज बहादुर सप्रू समिति (1921): सर तेज बहादुर सप्रू की अध्यक्षता में गठित प्रेस कानून समिति की सिफारिश पर ब्रिटिश सरकार ने 1908 और 1910 के दोनों दमनकारी कानूनों को निरस्त किया।
- भारतीय प्रेस (आपातकालीन शक्तियां) अधिनियम (1931): सविनय अवज्ञा आंदोलन के बुलेटिनों और राष्ट्रीय प्रचार को रोकने हेतु प्रांतीय सरकारों को प्रेस पर पूर्ण सेंसरशिप और जब्ती के व्यापक अधिकार दिए गए। द्वितीय विश्व युद्ध (1939) के समय ‘भारत रक्षा नियम’ (Defence of India Rules) के तहत प्रेस पर पूर्ण तानाशाही नियंत्रण लागू रहा।
📰 स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख समाचार-पत्र, पत्रिकाएं एवं उनके संपादक/संस्थापक
| समाचार-पत्र / पत्रिका | वर्ष | भाषा व स्थान | संपादक / संस्थापक | विशेष ऐतिहासिक संदर्भ |
|---|---|---|---|---|
| बंगाल गजट | 1780 | अंग्रेजी (कलकत्ता) | जेम्स ऑगस्टस हिक्की | भारत का प्रथम समाचार-पत्र। |
| संवाद कौमुदी | 1821 | बंगाली (कलकत्ता) | राजा राममोहन राय | सती प्रथा के उन्मूलन हेतु जनमत निर्माण। |
| मिरात-उल-अखबार | 1822 | फारसी (कलकत्ता) | राजा राममोहन राय | प्रथम फारसी पत्र; 1823 के नियम के विरोध में बंद। |
| उदंत मार्तंड | 1826 | हिंदी (कलकत्ता) | पं. जुगल किशोर शुक्ल | हिंदी का प्रथम साप्ताहिक समाचार-पत्र (30 मई)। |
| रास्त गोफ्तार | 1851 | गुजराती (बंबई) | दादाभाई नौरोजी | पारसी समाज सुधार आंदोलन का मुखपत्र। |
| सोम प्रकाश | 1858 | बंगाली (कलकत्ता) | ईश्वरचंद्र विद्यासागर / द्वारकानाथ | नील कृषकों का समर्थन; 1878 एक्ट का प्रथम शिकार। |
| अमृत बाजार पत्रिका | 1868 | बंगाली / अंग्रेजी (कलकत्ता) | शिशिर कुमार घोष व मोतीलाल घोष | 1878 में रातों-रात अंग्रेजी पत्र में परिवर्तित। |
| तहजीब-उल-अखलाक | 1870 | उर्दू (अलीगढ़) | सर सैयद अहमद खान | मुस्लिम समाज में आधुनिक शिक्षा व वैज्ञानिक सोच का प्रसार। |
| द हिंदू | 1878 | अंग्रेजी (मद्रास) | जी. सुब्रह्मण्यम अय्यर व वीरराघवाचार्य | दक्षिण भारत में राष्ट्रवादी पत्रकारिता का आधार स्तंभ। |
| द बंगाली | 1879 | अंग्रेजी (कलकत्ता) | सुरेंद्रनाथ बनर्जी | 1883 में बनर्जी पत्रकारिता हेतु जेल जाने वाले प्रथम भारतीय। |
| केसरी व मराठा | 1881 | केसरी (मराठी), मराठा (अंग्रेजी) | बाल गंगाधर तिलक व आगरकर | उग्र राष्ट्रवाद, शिवाजी/गणेश उत्सव, तिलक को ‘लोकमान्य’ बनाया। |
| द ट्रिब्यून | 1881 | अंग्रेजी (लाहौर) | सरदार दयाल सिंह मजीठिया | पंजाब में राष्ट्रीय आंदोलन का प्रमुख दैनिक। |
| युगांतर व संध्या | 1906 | बंगाली (कलकत्ता) | बारींद्र घोष / भूपेंद्रनाथ दत्त / ब्रह्मबांधव | क्रांतिकारी राष्ट्रवाद और सशस्त्र प्रतिरोध का आह्वान। |
| द इंडियन सोशियोलॉजिस्ट | 1905 | अंग्रेजी (लंदन/पेरिस) | श्यामजी कृष्ण वर्मा | इंडिया हाउस (लंदन) से क्रांतिकारी विचारों का प्रचार। |
| द लीडर व अभ्युदय | 1907/09 | लीडर (अंग्रेजी), अभ्युदय (हिंदी) | पं. मदन मोहन मालवीय | उदारवादी राष्ट्रवाद एवं हिंदू महासभा के विचार। |
| अल-हिलाल व अल-बलाग | 1912/15 | उर्दू (कलकत्ता) | मौलाना अबुल कलाम आजाद | मुस्लिम समुदाय को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ने का आह्वान। |
| कॉमरेड व हमदर्द | 1911/13 | कॉमरेड (अंग्रेजी), हमदर्द (उर्दू) | मौलाना मुहम्मद अली जौहर | खिलाफत आंदोलन और हिंदू-मुस्लिम एकता का मंच। |
| प्रताप | 1913 | हिंदी (कानपुर) | गणेश शंकर विद्यार्थी | क्रांतिकारियों व बिजोलिया किसान आंदोलन का निर्भीक समर्थक। |
| गदर | 1913 | उर्दू, गुरुमुखी (सैन फ्रांसिस्को) | लाला हरदयाल व गदर पार्टी | ‘अंग्रेजी राज का कच्चा चिट्ठा’; सशस्त्र क्रांति का आह्वान। |
| न्यू इंडिया व कॉमनवील | 1914 | अंग्रेजी (मद्रास) | एनी बेसेंट | होमरूल लीग आंदोलन का मुख्य प्रचार माध्यम। |
| इंडिपेंडेंट | 1919 | अंग्रेजी (इलाहाबाद) | पं. मोतीलाल नेहरू | असहयोग आंदोलन और स्वराज पार्टी की नीतियों का प्रचार। |
| यंग इंडिया व नवजीवन | 1919 | यंग इंडिया (अंग्रेजी), नवजीवन (गुजराती) | महात्मा गांधी | सत्याग्रह, अहिंसा, खादी व असहयोग आंदोलन का वैचारिक आधार। |
| मूकनायक व बहिष्कृत भारत | 1920/27 | मराठी (बंबई) | डॉ. बी. आर. अंबेडकर | दलितों, शोषितों व वंचितों के अधिकारों हेतु महा-जागरण। |
| हरिजन (बंधु व सेवक) | 1933 | अंग्रेजी, गुजराती, हिंदी (पुणे) | महात्मा गांधी | अस्पृश्यता निवारण, हरिजन सेवक संघ व सामाजिक समरसता। |
| नेशनल हेराल्ड | 1938 | अंग्रेजी (लखनऊ) | पं. जवाहरलाल नेहरू | कांग्रेस के लोकतांत्रिक समाजवादी विचारों का मुख्य मंच। |
8. मुख्य परीक्षा (Mains) हेतु विश्लेषणात्मक मूल्यांकन
प्रश्न: “ब्रिटिश शिक्षा नीति का मुख्य उद्देश्य साम्राज्यवादी हितों की पूर्ति करना था, परंतु इसने अनजाने में भारतीय राष्ट्रवाद के बीजारोपण में उत्प्रेरक का कार्य किया।” समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
उत्तर का मुख्य ढांचा:
- साम्राज्यवादी उद्देश्य: ब्रिटेन से महंगे अंग्रेज कर्मचारियों को भारत लाना आर्थिक रूप से असंभव था, अतः न्यूनतम वेतन पर काम करने वाले क्लर्क तैयार करना मुख्य लक्ष्य था। इसके अतिरिक्त पाश्चात्य शिक्षा द्वारा भारतीयों में ब्रिटिश शासन के प्रति सांस्कृतिक हीनता और मानसिक दासता पैदा करना लक्ष्य था।
- अनपेक्षित राष्ट्रीय परिणाम:
- साझा संपर्क भाषा (Lingua Franca): भारत में बहुभाषी विविधता थी। अंग्रेजी भाषा ने उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम के शिक्षित भारतीयों को एक मंच पर लाकर अखिल भारतीय संवाद स्थापित कराया।
- आधुनिक लोकतांत्रिक चेतना: मिल्टन, रूसो, थॉमस पेन, जॉन स्टुअर्ट मिल और बर्क को पढ़कर भारतीयों ने स्वतंत्रता, समानता, मानवाधिकार, राष्ट्रवाद और संसदीय लोकतंत्र के सिद्धांत सीखे।
- ब्रिटिश पाखंड का पर्दाफाश: जब भारतीयों ने देखा कि ब्रिटेन अपने देश में लोकतंत्र की बात करता है किंतु भारत में क्रूर उपनिवेशवाद चलाता है, तो उन्होंने अंग्रेजों के ही तर्कों से ब्रिटिश शासन की वैधता को चुनौती दी।
- प्रेस का जन्म व जागरण: इसी आधुनिक शिक्षित वर्ग ने प्रिंटिंग प्रेस का उपयोग कर विदेशी शासन के आर्थिक दोहन और राजनीतिक अत्याचारों को जन-जन तक पहुंचाया।
- निष्कर्ष: अंग्रेजों ने जिस लाठी को अपने साम्राज्य की सुरक्षा हेतु गढ़ा था, आधुनिक शिक्षित भारतीयों और राष्ट्रवादी प्रेस ने उसी लाठी को ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ें उखाड़ने वाले अस्त्र में बदल दिया।
9. अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQ)
Q1. भारतीय शिक्षा का ‘मैग्नाकार्टा’ किसे कहा जाता है और क्यों?
19 जुलाई 1854 के चार्ल्स वुड्स के डिस्पैच (Wood’s Despatch) को भारतीय शिक्षा का मैग्नाकार्टा कहा जाता है क्योंकि इसने भारत में प्राथमिक स्तर से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक की एक सुव्यवस्थित, व्यापक और धर्मनिरपेक्ष शिक्षा प्रणाली की नींव रखी तथा मैकाले के अधोमुखी निस्यंदन सिद्धांत को त्यागकर जनशिक्षा का मार्ग प्रशस्त किया।
Q2. ‘भारतीय प्रेस का मुक्तिदाता’ किसे और क्यों कहा जाता है?
1835-36 के कार्यवाहक गवर्नर-जनरल सर चार्ल्स मेटकाफ (Charles Metcalfe) को ‘भारतीय प्रेस का मुक्तिदाता’ कहा जाता है क्योंकि उन्होंने 1823 के जॉन एडम्स द्वारा लगाए गए कठोर लाइसेंसिंग प्रतिबंधों को निरस्त कर ‘प्रेस एक्ट 1835’ पारित किया, जिसने भारतीय और आंग्ल दोनों समाचार-पत्रों को पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की।
Q3. वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट 1878 को ‘गैगिंग एक्ट’ क्यों कहा गया और कौन सा पत्र रातों-रात अंग्रेजी में बदल गया?
लॉर्ड लिटन के वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट को ‘गैगिंग एक्ट’ (मुंह बंद करने वाला कानून) इसलिए कहा गया क्योंकि यह अत्यंत भेदभावपूर्ण था और केवल भारतीय भाषाओं के पत्रों पर लागू होता था जबकि अंग्रेजी पत्रों को छूट थी। इस कानून की कार्रवाई से बचने के लिए शिशिर कुमार घोष की ‘अमृत बाजार पत्रिका’ (Amrita Bazar Patrika) 21 मार्च 1878 को रातों-रात बंगाली से अंग्रेजी अखबार में परिवर्तित हो गई थी।



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