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वेवेल योजना, कैबिनेट मिशन, माउंटबेटन योजना एवं भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 – संपूर्ण विश्लेषणात्मक अध्ययन एवं नोट्स

🔥 आधुनिक भारत का इतिहास • मास्टर अध्ययन श्रृंखला (अध्याय 11 – महा-समापन)

वेवेल योजना, कैबिनेट मिशन, 3 जून योजना से लेकर 15 अगस्त 1947 की आजादी एवं 565 रियासतों का एकीकरण

1945 से 1947 का कालखंड भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास का सर्वाधिक नाटकीय, युगांतरकारी और निर्णायक दौर था। द्वितीय विश्व युद्ध के समापन के साथ ही ब्रिटिश राज का सूर्य अस्त होने लगा था। आजाद हिंद फौज (INA) के लाल किला मुकदमों ने पूरे देश में राष्ट्रव्यापी आक्रोश भड़काया, तो फरवरी 1946 के शाही नौसेना विद्रोह (RIN Mutiny) ने ब्रिटिश हुकूमत को यह अहसास करा दिया कि वे अब भारतीय सेना के बल पर भारत पर शासन नहीं कर सकते। इसके बाद वेवेल योजना व शिमला सम्मेलन (1945), ब्रिटिश कैबिनेट मिशन (1946) द्वारा अखंड भारतीय संघ का प्रस्ताव, मुस्लिम लीग का रक्तरंजित ‘प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस’ (16 अगस्त 1946), पंडित नेहरू के नेतृत्व में अंतरिम सरकार (2 सितंबर 1946), संविधान सभा की प्रथम बैठक (9 दिसंबर 1946) और नेहरू का अमर ‘उद्देश्य प्रस्ताव’, ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली की घोषणा (फरवरी 1947), लॉर्ड माउंटबेटन की 3 जून योजना, रेडक्लिफ सीमा रेखा, और अंततः भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के तहत 15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि को ‘नियति से साक्षात्कार’ (Tryst with Destiny) के साथ भारत का उदय हुआ। इसके तुरंत बाद लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल और वी.पी. मेनन के अदम्य नेतृत्व में 565 देशी रियासतों का ऐतिहासिक एकीकरण हुआ। यह आलेख सिविल सेवा परीक्षाओं (UPSC व State PCS) के लिए इस संपूर्ण दौर का संपूर्ण प्रामाणिक अध्ययन प्रस्तुत करता है।

📚 आधुनिक भारत का इतिहास: श्रृंखला अनुक्रमणिका व संपूर्ण नेविगेशन हब

➡️ अगला विशेष अध्याय (अध्याय 12): ब्रिटिश शासन की आर्थिक नीतियां, भू-राजस्व व्यवस्था (स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी, महालवाड़ी), धन की निकासी व अकाल
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📖 अध्याय 9: भारत शासन अधिनियम 1935, 1937 के प्रांतीय चुनाव एवं त्रिपुरी संकट
📖 अध्याय 8: सविनय अवज्ञा आंदोलन, दांडी मार्च, गोलमेज सम्मेलन व पूना पैक्ट (1930–1934)
📖 अध्याय 7: स्वराज पार्टी, क्रांतिकारी आंदोलन (HRA/HSRA) व साइमन कमीशन (1922–1929)
📖 अध्याय 5: गांधीवादी युग: चंपारण, रॉलेट, जलियांवाला बाग व असहयोग आंदोलन (1915–1922)

💡 विशेष रियासती एकीकरण अध्ययन (Recommended Study): 1947 के भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम की धारा 7(1)(b) द्वारा ब्रिटिश सर्वोच्चता की समाप्ति (Lapse of Paramountcy) के उपरांत 565+ देशी रियासतों (जूनागढ़, हैदराबाद, कश्मीर सहित) के ऐतिहासिक एकीकरण, सरदार पटेल-वी.पी. मेनन की कूटनीति, बटलर समिति व प्रजामंडल आंदोलनों के विस्तृत अध्ययन हेतु अवश्य पढ़ें: 👉 ब्रिटिश क्राउन एवं देशी रियासतें (Princely States) तथा 1947–1950 एकीकरण (अध्याय 15 नोट्स)

Table of Contents

1. युद्धोपरांत परिस्थितियां एवं वेवेल योजना (14 जून 1945)

मई 1945 में यूरोप में नाजी जर्मनी के आत्मसमर्पण के साथ ही द्वितीय विश्व युद्ध अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका था। ब्रिटिश सरकार पर अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय जनमत का भारी दबाव था कि वह भारत के संवैधानिक गतिरोध को हल करे। इसके अतिरिक्त ब्रिटेन में जुलाई 1945 में आम चुनाव होने वाले थे, जिसे ध्यान में रखते हुए तत्कालीन विंस्टन चर्चिल की रूढ़िवादी गठबंधन सरकार ने भारतीय राजनीतिक गतिरोध को समाप्त करने का दिखावा करने का निर्णय लिया।

ब्रिटिश भारत के तत्कालीन वायसराय फील्ड मार्शल लॉर्ड वेवेल (Lord Wavell) मार्च 1945 में विचार-विमर्श हेतु लंदन गए। वहां से लौटने के बाद उन्होंने 14 जून 1945 को आकाशवाणी पर एक महत्वपूर्ण संवैधानिक योजना प्रस्तुत की, जिसे ‘वेवेल योजना’ (Wavell Plan) कहा जाता है।

📌 वेवेल योजना के मुख्य प्रावधान:

  • कार्यकारिणी परिषद का भारतीयकरण: वायसराय और सैन्य कमांडर-इन-चीफ (मुख्य सेनापति) को छोड़कर कार्यकारिणी परिषद के सभी सदस्य भारतीय होंगे। रक्षा विभाग कमांडर-इन-चीफ के अधीन ही रहेगा।
  • सवर्ण हिन्दू-मुस्लिम समता (Parity): परिषद में ‘सवर्ण हिन्दुओं’ (Caste Hindus) और मुसलमानों का प्रतिनिधित्व समान अनुपात में होगा।
  • विदेश मामलों का हस्तांतरण: विदेश मामलों (External Affairs) का विभाग पहली बार एक भारतीय सदस्य को सौंपा जाएगा।
  • वायसराय का वीटो अधिकार: वायसराय का वीटो पावर (निषेधाधिकार) समाप्त नहीं होगा, किंतु आश्वासन दिया गया कि इसका प्रयोग अकारण या सामान्य प्रशासनिक कार्यों में नहीं किया जाएगा।
  • युद्धोपरांत स्वतंत्र संविधान: द्वितीय विश्व युद्ध की अंतिम समाप्ति के बाद भारतीय स्वयं अपना नया संविधान बनाएंगे।
  • सर्वदलीय सम्मेलन: इस योजना पर विचार करने और परिषद के सदस्यों की सूची तैयार करने हेतु शिमला में सर्वदलीय सम्मेलन बुलाया जाएगा।

2. ऐतिहासिक शिमला सम्मेलन (25 जून – 14 जुलाई 1945)

वेवेल योजना पर विचार-विमर्श करने और वायसराय परिषद के भारतीय सदस्यों के चयन हेतु शिमला में 25 जून 1945 से 14 जुलाई 1945 तक ऐतिहासिक शिमला सम्मेलन (Shimla Conference) आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में वायसराय लॉर्ड वेवेल ने भारत के 21 प्रमुख राजनीतिक नेताओं को आमंत्रित किया।

सम्मेलन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम आजाद ने किया। महात्मा गांधी शिमला में उपस्थित थे, किंतु वे कांग्रेस के प्राथमिक सदस्य नहीं थे, इसलिए वे बैठकों में सीधे उपस्थित नहीं हुए, यद्यपि कांग्रेस कार्यसमिति उनसे लगातार परामर्श करती रही।

शिमला सम्मेलन के गतिरोध व विफलता का मूल कारण:

सम्मेलन में मुख्य टकराव कार्यकारिणी परिषद में मुस्लिम सदस्यों के नामांकन को लेकर हुआ:

  • जिन्ना का अड़ियल रुख: मोहम्मद अली जिन्ना ने हठधर्मिता दिखाई कि वायसराय परिषद में शामिल होने वाले सभी 5 मुस्लिम सदस्यों का नामांकन केवल और केवल मुस्लिम लीग ही करेगी। इसके अतिरिक्त जिन्ना ने मांग की कि किसी भी सांप्रदायिक प्रश्न पर मुस्लिम सदस्यों को दो-तिहाई वीटो का अधिकार होना चाहिए।
  • कांग्रेस का राष्ट्रीय रुख: कांग्रेस ने जिन्ना की इस मांग को सिरे से खारिज कर दिया। कांग्रेस स्वयं को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय दल मानती थी, जिसमें हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी शामिल थे। यदि कांग्रेस मुस्लिम लीग की यह मांग स्वीकार कर लेती, तो वह स्वयं को केवल एक “सवर्ण हिन्दू संगठन” मानने के समान होता। कांग्रेस ने अपने कोटे से मौलाना अबुल कलाम आजाद का नाम प्रस्तावित किया।
  • पंजाब के यूनियनिस्टों की मांग: पंजाब के प्रधानमंत्री मलिक खिजर हयात खान तिवाना ने मांग की कि मुस्लिम कोटे में से एक सीट पंजाब की गैर-लीगी ‘यूनियनिस्ट पार्टी’ के मुस्लिम प्रतिनिधि को दी जाए, जिसे जिन्ना ने बर्दाश्त नहीं किया।

वायसराय लॉर्ड वेवेल ने जिन्ना के अड़ियल रुख के आगे घुटने टेक दिए और 14 जुलाई 1945 को शिमला सम्मेलन को विफल घोषित कर दिया। इतिहासकारों के अनुसार, वेवेल की यह सबसे बड़ी कूटनीतिक भूल थी, क्योंकि उन्होंने मुस्लिम लीग को वस्तुतः एक ‘अघोषित वीटो पावर’ सौंप दिया, जिससे जिन्ना का हौसला बढ़ गया कि वे जब चाहें किसी भी संवैधानिक प्रगति को रोक सकते हैं।

3. 1945-46 के आम चुनाव: परिणाम एवं सांप्रदायिक ध्रुवीकरण

जुलाई 1945 में ब्रिटेन के आम चुनावों में विंस्टन चर्चिल की पराजय हुई और क्लेमेंट एटली (Clement Attlee) के नेतृत्व में लेबर पार्टी (श्रमिक दल) की सरकार बनी। भारत सचिव का पद लॉर्ड पैथिक लॉरेंस को सौंपा गया। एटली सरकार ने अगस्त 1945 में घोषणा की कि भारत में केंद्रीय और प्रांतीय विधानसभाओं के चुनाव कराए जाएंगे ताकि वास्तविक जन-समर्थन का आकलन किया जा सके।

चुनाव क्षेत्रकांग्रेस का प्रदर्शनमुस्लिम लीग का प्रदर्शनऐतिहासिक निष्कर्ष
केंद्रीय विधानसभा (1945)सामान्य सीटों पर 91.3% मत; 102 में से 57 सीटें जीतीं।सभी 30 आरक्षित मुस्लिम सीटें जीतीं (86.6% मुस्लिम मत)।देश का पूर्ण राजनीतिक ध्रुवीकरण स्पष्ट हुआ।
प्रांतीय विधानसभाएं (1946)कुल 1,585 सीटों में से 923 सीटें जीतीं। 8 प्रांतों में सरकार बनाई।कुल 492 मुस्लिम सीटों में से 429 सीटें जीतीं। केवल बंगाल व सिंध में सरकार।मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में लीग का निर्विवाद वर्चस्व सिद्ध हुआ।

प्रांतीय सरकारों का गठन (1946):

  • कांग्रेस शासित 8 प्रांत: मद्रास, बंबई, संयुक्त प्रांत (UP), बिहार, मध्य प्रांत (CP), उड़ीसा, असम (गोपीनाथ बोरदोलोई के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत), और मुस्लिम बहुल उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) में डॉ. खान साहब व खान अब्दुल गफ्फार खान के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी।
  • मुस्लिम लीग शासित प्रांत: बंगाल (हुसैन शहीद सुहरावर्दी के नेतृत्व में) और सिंध में यूरोपीय सदस्यों के समर्थन से लीग सरकार बनी।
  • पंजाब में त्रिशंकु विधानसभा: मुस्लिम लीग सबसे बड़ी पार्टी (75 सीटें) बनी, किंतु सरकार नहीं बना सकी। वहां यूनियनिस्ट पार्टी के मलिक खिजर हयात खान तिवाना के नेतृत्व में कांग्रेस और अकाली दल के समर्थन से गैर-लीगी गठबंधन सरकार बनी।

4. आजाद हिंद फौज (INA) के लाल किला मुकदमे (नवंबर 1945)

द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद ब्रिटिश सेना ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज के लगभग 20,000 सैनिकों और अधिकारियों को युद्धबंदी बना लिया। ब्रिटिश सरकार ने औपनिवेशिक घमंड में यह निर्णय लिया कि INA के शीर्ष अधिकारियों पर दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले (Red Fort) में राजद्रोह और ब्रिटिश सम्राट के विरुद्ध युद्ध छेड़ने (Waging War against the King) का सार्वजनिक कोर्ट-मार्शल मुकदमा चलाया जाए।

प्रथम संयुक्त मुकदमा (नवंबर 1945): ब्रिटिश सेना ने जानबूझकर एक हिन्दू, एक सिख और एक मुस्लिम अधिकारी को एक साथ अभियुक्त बनाया:

  1. कर्नल प्रेम कुमार सहगल (Prem Kumar Sahgal) – हिन्दू
  2. कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों (Gurbaksh Singh Dhillon) – सिख
  3. मेजर जनरल शाहनवाज खान (Shahnawaz Khan) – मुस्लिम

अंग्रेजों का उद्देश्य तीनों को देशद्रोही सिद्ध कर भारतीयों को भयभीत करना था, किंतु इसका परिणाम पूर्णतः विपरीत हुआ। इस मुकदमे ने संपूर्ण भारत में अभूतपूर्व सांप्रदायिक एकता और राष्ट्रभक्ति का ज्वालामुखी भड़का दिया। देशभर की गलियों और रैलियों में नारा गूंज उठा: “लाल किले से आई आवाज — सहगल, ढिल्लों, शाहनवाज! लाल किले को तोड़ दो, आजाद हिंद फौज को छोड़ दो!”

INA बचाव समिति (INA Defence Committee):

कांग्रेस कार्यसमिति ने तुरंत बंदियों के कानूनी बचाव हेतु एक शीर्ष विधिक समिति गठित की:

  • मुख्य अधिवक्ता: वरिष्ठ वकील भूलाभाई देसाई (Bhulabhai Desai) ने बचाव पक्ष का शानदार नेतृत्व किया। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय कानून (International Law) के आधार पर अकाट्य तर्क दिया कि ‘आरज़ी हुकूमत-ए-आज़ाद हिंद’ एक संप्रभु अनंतिम सरकार थी, जिसे कई देशों ने मान्यता दी थी। अतः अपने देश की स्वाधीनता हेतु लड़ा गया युद्ध अंतरराष्ट्रीय विधि के अनुसार वैध युद्ध (Lawful Belligerency) था, न कि सामान्य आपराधिक राजद्रोह।
  • 25 वर्षों बाद नेहरू का वकालती चोगा: पंडित जवाहरलाल नेहरू ने असहयोग आंदोलन (1920) के बाद वकालत छोड़ दी थी, किंतु इस ऐतिहासिक मुकदमे हेतु 25 वर्षों बाद पुनः वकील का काला चोगा पहनकर लाल किले की अदालत में प्रवेश किया।
  • अन्य प्रमुख विधिवेत्ता: सर तेज बहादुर सप्रू, डॉ. कैलाश नाथ काटजू, आसफ अली और बख्शी टेकचंद ने भी पैरवी की।

कमांडर-इन-चीफ द्वारा सजा माफी: यद्यपि सैन्य अदालत ने तीनों अधिकारियों को दोषी ठहराकर आजीवन कारावास की सजा सुनाई, किंतु भारतीय सेना, नौसेना और आम जनता में भड़कते विद्रोह के भय से ब्रिटिश कमांडर-इन-चीफ सर क्लाउड ऑचिनलेक (Sir Claude Auchinleck) ने अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए तीनों की सजा तुरंत माफ कर दी और उन्हें रिहा कर दिया।

5. शाही नौसेना विद्रोह (RIN Mutiny – 18-23 फरवरी 1946)

18 फरवरी 1946 को बंबई बंदरगाह पर शाही भारतीय नौसेना (Royal Indian Navy – RIN) के सिग्नल प्रशिक्षण जहाज ‘एच.एम.आई.एस. तलवार’ (HMIS Talwar) के 1,100 नौसैनिकों (Ratings) ने खुली हड़ताल कर दी। यह आधुनिक भारत के इतिहास का वह मोड़ था जिसने ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत में अंतिम कील ठोक दी।

विद्रोह के कारण एवं प्रमुख घटनाक्रम:

  • तात्कालिक कारण: निकृष्ट व अखाद्य भोजन, अमानवीय जीवन दशाएं और ब्रिटिश कमांडर आर्थर किंग द्वारा भारतीय नाविकों के प्रति नस्लवादी गालियां देना।
  • बी.सी. दत्त की गिरफ्तारी: जहाज की दीवारों पर ‘Quit India’ और ‘जय हिंद’ लिखने के आरोप में नौसैनिक बी.सी. दत्त को गिरफ्तार किया गया, जिससे आक्रोश भड़क उठा।
  • नौसेना केंद्रीय हड़ताल समिति (NCSC): नाविकों ने सिग्नलमैन एम.एस. खान (M.S. Khan) को अध्यक्ष और मदन सिंह को उपाध्यक्ष चुना।
  • तीन ध्वजों का ऐतिहासिक संगम: विद्रोही नाविकों ने जहाजों से ब्रिटिश ‘यूनियन जैक’ उतार फेंका और मस्तूलों पर कांग्रेस का तिरंगा, मुस्लिम लीग का हरा झंडा और कम्युनिस्ट पार्टी का लाल झंडा एक साथ बांधकर फहरा दिया।
  • विद्रोह का विस्तार: यह विद्रोह कराची, मद्रास, कलकत्ता, विशाखापत्तनम और कोचीन तक फैल गया। 78 जहाजों और 20 तटवर्ती प्रतिष्ठानों के 20,000 नौसैनिक इसमें शामिल हो गए। कराची में ‘HMIS हिंदुस्तान’ ने तोपखाना मुकाबला किया।
  • बंबई के मजदूरों का समर्थन: 22-23 फरवरी को बंबई के 3 लाख कपड़ा मिल मजदूरों ने हड़ताल की। ब्रिटिश सेना की बर्बर गोलीबारी में 250 से अधिक नागरिक शहीद हुए।

सरदार पटेल की मध्यस्थता व आत्मसमर्पण: विद्रोही नाविकों को तोपखाने से उड़ा देने की ब्रिटिश एडमिरल गॉडफ्रे की धमकी के बीच सरदार वल्लभभाई पटेल (और जिन्ना) ने 23 फरवरी 1946 को नाविकों से वार्ता की और उन्हें शांतिपूर्ण आत्मसमर्पण के लिए राजी किया। नाविकों ने अपने अंतिम ऐतिहासिक संदेश में कहा: “हम ब्रिटेन के आगे नहीं, बल्कि अपने राष्ट्र और अपनी जनता के चरणों में आत्मसमर्पण कर रहे हैं।”

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6. ब्रिटिश कैबिनेट मिशन (24 मार्च 1946) एवं 16 मई की योजना

नौसेना विद्रोह और भारतीय सेना में व्यापक असंतोष को देखकर ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने 19 फरवरी 1946 को ब्रिटिश संसद में घोषणा की कि ब्रिटिश सरकार तीन कैबिनेट मंत्रियों का एक उच्च-स्तरीय मिशन भारत भेज रही है। 24 मार्च 1946 को कैबिनेट मिशन नई दिल्ली पहुंचा।

कैबिनेट मिशन के तीन सदस्य:

  1. लॉर्ड पैथिक लॉरेंस (Lord Pethick-Lawrence) – भारत सचिव (मिशन के अध्यक्ष)
  2. सर स्टेफोर्ड क्रिप्स (Sir Stafford Cripps) – व्यापार बोर्ड के अध्यक्ष
  3. ए.वी. अलेक्जेंडर (A.V. Alexander) – नौसेना प्रमुख (First Lord of Admiralty)

भारतीय नेताओं (कांग्रेस और लीग) के बीच शिमला में आयोजित दूसरे त्रिपक्षीय सम्मेलन (मई 1946) में भी कोई आम सहमति न बन पाने के बाद, मिशन ने 16 मई 1946 को अपनी स्वयमेव योजना (Cabinet Mission Plan) सार्वजनिक रूप से घोषित की।

📌 16 मई 1946 की कैबिनेट मिशन योजना के मुख्य प्रावधान:

  • संप्रभु पाकिस्तान की मांग अस्वीकृत: मिशन ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि एक स्वतंत्र पाकिस्तान का निर्माण प्रशासनिक, आर्थिक, भौगोलिक और सैन्य दृष्टि से अव्यवहारिक है और इससे अल्पसंख्यक समस्या का कोई हल नहीं निकलेगा।
  • त्रि-स्तरीय भारतीय संघ (Union of India): ब्रिटिश भारत और देशी रियासतों को मिलाकर एक ढीला-ढाला भारतीय संघ (Loose Federation) बनेगा।
  • सीमित केंद्र (Three Union Subjects): केंद्रीय सरकार के पास केवल तीन विषय होंगे: 1. विदेश मामले (External Affairs), 2. रक्षा (Defence), और 3. संचार (Communications)। इसके लिए आवश्यक कर जुटाने की सीमित शक्ति भी केंद्र के पास होगी।
  • अवशिष्ट शक्तियां (Residuary Powers): केंद्रीय सूची के अलावा अन्य सभी शक्तियां और विभाग प्रांतों (Provinces) में निहित होंगे।
  • देशी रियासतों की सर्वोच्चता (Paramountcy): ब्रिटिश ताज की सर्वोच्च सत्ता समाप्त हो जाएगी और रियासतें स्वतंत्र रूप से संघ में शामिल होने का निर्णय लेंगी।
  • अंतरिम सरकार: संविधान निर्माण की अवधि के दौरान सभी प्रमुख दलों के सहयोग से 14 सदस्यीय अंतरिम राष्ट्रीय सरकार स्थापित होगी।

7. प्रांतों का त्रिविध समूहीकरण (Grouping: खंड क, ख, ग)

कैबिनेट मिशन योजना का सबसे जटिल और विवादास्पद भाग प्रांतों का समूहीकरण (Grouping of Provinces) था। ब्रिटिश भारत के 11 प्रांतों को तीन भौगोलिक और जनसांख्यिकीय वर्गों में बांटा गया:

समूह / खंडशामिल प्रांतधार्मिक / सामाजिक स्वरूप
खंड ‘क’ (Section A)मद्रास, बंबई, संयुक्त प्रांत (UP), बिहार, मध्य प्रांत (CP) एवं उड़ीसा (6 प्रांत)हिन्दू बहुल क्षेत्र (गैर-मुस्लिम बहुसंख्यक)
खंड ‘ख’ (Section B)पंजाब, उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) एवं सिंध (3 प्रांत)उत्तर-पश्चिम मुस्लिम बहुल क्षेत्र
खंड ‘ग’ (Section C)बंगाल एवं असम (2 प्रांत)उत्तर-पूर्व क्षेत्र (बंगाल मुस्लिम बहुल, असम गैर-मुस्लिम बहुल)

असम और NWFP का विवाद: असम के मुख्यमंत्री गोपीनाथ बोरदोलोई और कांग्रेस ने खंड ‘ग’ में असम को बंगाल के साथ जबरन जोड़े जाने का कड़ा विरोध किया। असम गैर-मुस्लिम बहुल था, और उसे डर था कि बंगाल के विशाल मुस्लिम बहुमत के आगे उसका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। इसी प्रकार NWFP में कांग्रेस की सरकार थी और वह खंड ‘ख’ में पंजाब के प्रभुत्व में नहीं आना चाहता था।

8. संविधान सभा की विस्तृत संरचना (389 सदस्य)

कैबिनेट मिशन योजना के अनुसार अविभाजित भारत के लिए कुल 389 सदस्यों वाली संविधान सभा की रूपरेखा बनाई गई:

  • ब्रिटिश प्रांतों से: 292 सदस्य
  • देशी रियासतों से: 93 सदस्य (शासकों द्वारा नामांकित)
  • मुख्य आयुक्त प्रांतों से: 4 सदस्य (दिल्ली, अजमेर-मेरवाड़ा, कूर्ग, ब्रिटिश बलूचिस्तान)
  • प्रतिनिधित्व का अनुपात: प्रति 10 लाख जनसंख्या पर लगभग 1 सीट।
  • चुनाव पद्धति: 1946 में निर्वाचित प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा एकल संक्रमणीय मत से आनुपातिक प्रतिनिधित्व (अप्रत्यक्ष निर्वाचन)।
  • तीन समुदाय: सीटें केवल तीन वर्गों में विभाजित थीं: 1. सामान्य, 2. मुस्लिम, 3. सिख (केवल पंजाब में)।

जुलाई 1946 के चुनाव परिणाम: 296 ब्रिटिश प्रांतीय सीटों में से कांग्रेस ने 208 सीटें और मुस्लिम लीग ने 73 सीटें जीतीं। स्वतंत्र और छोटे दलों को 15 सीटें मिलीं। संविधान सभा में 15 महिला सदस्य (सरोजिनी नायडू, राजकुमारी अमृत कौर, हंसा मेहता, सुचेता कृपलानी, विजयलक्ष्मी पंडित आदि) निर्वाचित हुईं।

9. नेहरू की 10 जुलाई 1946 की प्रेस वार्ता एवं लीग का विद्रोह

मुस्लिम लीग ने 6 जून 1946 को कैबिनेट मिशन योजना को स्वीकार कर लिया था क्योंकि वह मानती थी कि खंड ‘ख’ और ‘ग’ के अनिवार्य समूहीकरण में पाकिस्तान का बीज मौजूद है। कांग्रेस ने भी 25 जून को दीर्घकालिक संविधान सभा योजना स्वीकार कर ली थी।

किंतु 10 जुलाई 1946 को बंबई में नवनिर्वाचित कांग्रेस अध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू ने एक प्रसिद्ध प्रेस वार्ता में कहा: “कांग्रेस केवल संविधान सभा में जाने के लिए सहमत हुई है और वह किसी भी पूर्व-निर्धारित व्यवस्था से बंधी नहीं है। संविधान सभा पूर्ण संप्रभु होगी और प्रांतों के समूहीकरण (Grouping) की योजना संभवतः कभी लागू ही नहीं होगी, क्योंकि असम या NWFP जैसे प्रांत समूहों में शामिल होने से इनकार कर सकते हैं।”

नेहरू के इस बयान से जिन्ना भड़क उठे। जिन्ना ने आरोप लगाया कि कांग्रेस अपनी हिंदू बहुसंख्या के दम पर योजना को तोड़-मरोड़ देगी। परिणामस्वरूप 29 जुलाई 1946 को मुस्लिम लीग ने कैबिनेट मिशन योजना की अपनी स्वीकृति वापस ले ली और पाकिस्तान की प्राप्ति हेतु असंवैधानिक हिंसक मार्ग पर उतरने का निर्णय लिया।

10. ‘प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस’ (16 अगस्त 1946) व नोआखली हिंसा

29 जुलाई 1946 के बंबई प्रस्ताव में मुस्लिम लीग ने ऐलान किया कि वह 16 अगस्त 1946 को ‘प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस’ (Direct Action Day) मनाएगी। जिन्ना ने खुली धमकी दी: “आज तक हमने केवल संवैधानिक तरीके अपनाए थे, लेकिन आज हमने भी पिस्तौल तैयार कर ली है… हम या तो विभाजित भारत लेकर रहेंगे या फिर भारत को नष्ट कर देंगे।”

द ग्रेट कलकत्ता किलिंग्स (The Great Calcutta Killings): 16 अगस्त 1946 को कलकत्ता में मुस्लिम लीग की प्रांतीय सरकार (प्रीमियर हुसैन शहीद सुहरावर्दी) के संरक्षण में भीषण सांप्रदायिक हिंसा, नरसंहार और आगजनी शुरू हुई। 72 घंटों के भीतर 5,000 से अधिक लोग मारे गए और 15,000 घायल हुए। गवर्नर बरोस मूकदर्शक बने रहे।

नोआखली और टिपेरा दंगे (अक्टूबर 1946): कलकत्ता के बाद हिंसा पूर्वी बंगाल के नोआखली और टिपेरा जिलों में फैली, जहां अल्पसंख्यक हिन्दू समुदाय पर भीषण अत्याचार, कत्लेआम और जबरन धर्म परिवर्तन हुआ। इसकी प्रतिहिंसा में बिहार और मेरठ (गढ़मुक्तेश्वर) में दंगे भड़क उठे।

गांधीजी का ‘वन-मैन बाउंड्री फोर्स’ मिशन: 77 वर्षीय महात्मा गांधी नवंबर 1946 से मार्च 1947 तक नोआखली के गांव-गांव नंगे पांव घूमे और रवींद्रनाथ टैगोर का गीत “एकला चलो रे” गाते हुए सांप्रदायिक सद्भाव की अलख जगाई। बाद में लॉर्ड माउंटबेटन ने गांधीजी की इस भूमिका को ‘वन-मैन बाउंड्री फोर्स’ (One-Man Boundary Force) की संज्ञा दी।

11. अंतरिम राष्ट्रीय सरकार का गठन (2 सितंबर 1946) एवं प्रशासनिक गतिरोध

वायसराय लॉर्ड वेवेल के आमंत्रण पर 2 सितंबर 1946 को पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में भारत की पहली ‘अंतरिम राष्ट्रीय सरकार’ ने शपथ ग्रहण की। पंडित नेहरू कार्यकारिणी परिषद के ‘उपाध्यक्ष’ (Vice-President) बने और वायसराय पदेन अध्यक्ष रहे।

प्रारंभिक मंत्रिमंडल (2 सितंबर 1946):

  • पं. जवाहरलाल नेहरू: उपाध्यक्ष, विदेश एवं राष्ट्रमंडल मामले
  • सरदार वल्लभभाई पटेल: गृह, सूचना एवं प्रसारण
  • डॉ. राजेंद्र प्रसाद: खाद्य एवं कृषि
  • सरदार बलदेव सिंह: रक्षा
  • बाबू जगजीवन राम: श्रम
  • सी. राजगोपालाचारी: शिक्षा एवं कला
  • डॉ. जॉन मथाई: उद्योग एवं नागरिक आपूर्ति
  • आसफ अली: रेलवे एवं परिवहन
  • सी.एच. भाभा: कार्य, खान एवं ऊर्जा

मुस्लिम लीग का प्रवेश (26 अक्टूबर 1946) एवं गतिरोध: वेवेल के मान-मनौव्वल के बाद 26 अक्टूबर 1946 को मुस्लिम लीग के 5 सदस्य सरकार में शामिल हुए: लियाकत अली खान (वित्त), आई.आई. चुंदरीगर (वाणिज्य), अब्दुर रब निश्तार (डाक व वायु), गजनफर अली खान (स्वास्थ्य), और जोगेंद्र नाथ मंडल (विधि)। लीग सरकार में सहयोग करने नहीं बल्कि अंदर से सरकार को पंगु बनाने के लिए आई थी।

वित्त मंत्री लियाकत अली खान ने पटेल और नेहरू के मंत्रालयों के प्रत्येक खर्च, फाइल और नियुक्ति पर अड़ंगा लगा दिया। फरवरी 1947 में लियाकत अली ने ‘गरीबों का बजट’ पेश कर व्यापारियों पर 25% भारी कर थोपा, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था ठप होने लगी। इस गतिरोध ने पटेल और नेहरू को यह समझा दिया कि लीग के साथ शासन चलाना असंभव है और विभाजन ही एकमात्र रास्ता है।

12. संविधान सभा की प्रथम बैठक (9 दिसंबर 1946) व उद्देश्य प्रस्ताव

9 दिसंबर 1946 को नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन हॉल (संसद भवन का सेंट्रल हॉल) में संविधान सभा की प्रथम ऐतिहासिक बैठक हुई। मुस्लिम लीग ने इसका पूर्ण बहिष्कार किया, अतः केवल 207 सदस्यों ने भाग लिया।

  • अस्थायी अध्यक्ष: फ्रांसीसी परंपरा के आधार पर वरिष्ठतम सदस्य डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा को 9 दिसंबर को अस्थायी अध्यक्ष बनाया गया।
  • स्थायी अध्यक्ष: 11 दिसंबर 1946 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद को निर्विरोध स्थायी अध्यक्ष निर्वाचित किया गया। एच.सी. मुखर्जी उपाध्यक्ष बने और सर बी.एन. राव संवैधानिक सलाहकार नियुक्त हुए।
  • ऐतिहासिक उद्देश्य प्रस्ताव (13 दिसंबर 1946): पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संविधान के दार्शनिक आधार और लक्ष्यों को रेखांकित करने वाला युगांतरकारी ‘उद्देश्य प्रस्ताव’ (Objectives Resolution) प्रस्तुत किया। इसे 22 जनवरी 1947 को सर्वसम्मति से पारित किया गया। यही उद्देश्य प्रस्ताव आगे चलकर भारतीय संविधान की प्रस्तावना (Preamble) बना।

13. एटली की घोषणा (20 फरवरी 1947) एवं लॉर्ड माउंटबेटन का आगमन

भारत में गहराते गृहयुद्ध और अंतरिम सरकार के पतन को देखते हुए ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने 20 फरवरी 1947 को ब्रिटिश संसद में ऐतिहासिक घोषणा की:

  • निश्चित समयसीमा: ब्रिटिश सरकार 30 जून 1948 तक भारतीयों को सत्ता सौंपकर भारत से पूरी तरह हट जाएगी।
  • नए वायसराय की नियुक्ति: लॉर्ड वेवेल को वापस बुलाकर शाही घराने के एडमिरल लॉर्ड लुईस माउंटबेटन (Lord Louis Mountbatten) को 34वां और अंतिम वायसराय नियुक्त किया गया।

लॉर्ड माउंटबेटन ने 24 मार्च 1947 को वायसराय पद की शपथ ली। प्रारंभ में उनके स्टाफ ने ‘डिकी बर्ड प्लान’ (Plan Balkan) तैयार किया, जिसमें सत्ता प्रांतों और रियासतों को अलग-अलग सौंपने का प्रस्ताव था। मई 1947 में शिमला में जब नेहरू ने इस योजना को देखा तो भड़क उठे और कहा कि यह भारत के 50 टुकड़े कर देगा। माउंटबेटन ने इस योजना को तुरंत रद्द किया और नई योजना बनाई।

14. माउंटबेटन योजना (3 जून 1947 योजना) एवं विभाजन की अनिवार्यता

3 जून 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन ने अपनी आधिकारिक योजना (3 June Plan / Mountbatten Plan) की घोषणा की, जिसे कांग्रेस, मुस्लिम लीग और सिख नेताओं ने स्वीकार कर लिया।

📌 माउंटबेटन योजना (3 जून 1947) के मुख्य बिंदु:

  • दो डोमिनियनों का सृजन: भारत और पाकिस्तान दो स्वतंत्र अधिराज्य (Dominions) बनेंगे।
  • पंजाब और बंगाल का विभाजन: दोनों प्रांतों की विधानसभाओं के मुस्लिम बहुल व गैर-मुस्लिम बहुल सदस्य अलग-अलग बैठक करेंगे। यदि कोई भी वर्ग विभाजन चाहेगा तो प्रांत का बंटवारा होगा।
  • जनमत संग्रह (Referendum): उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) और असम के मुस्लिम बहुल सिलहट जिले में जनता द्वारा जनमत संग्रह कराया जाएगा।
  • सिंध विधानसभा: सिंध की प्रांतीय विधानसभा मतदान करके अपना भविष्य तय करेगी।
  • शीघ्र सत्ता हस्तांतरण: जून 1948 की जगह सत्ता हस्तांतरण की तिथि को 10 महीने पहले लाकर 15 अगस्त 1947 निर्धारित किया गया।
  • सीमा आयोग: सीमाओं के निर्धारण हेतु एक निष्पक्ष सीमा आयोग गठित होगा।

14-15 जून 1947 को दिल्ली में कांग्रेस महासमिति (AICC) ने गोविंद वल्लभ पंत द्वारा प्रस्तुत विभाजन प्रस्ताव को 157 के मुकाबले 29 मतों से पारित किया। पुरुषोत्तम दास टंडन, डॉ. राम मनोहर लोहिया और मौलाना हिफ्जुर रहमान ने इसका कड़ा विरोध किया था। सीमांत गांधी (खान अब्दुल गफ्फार खान) ने व्यथित होकर कहा: “कांग्रेस ने हमें भेड़ियों के आगे फेंक दिया है।”

15. भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 (18 जुलाई 1947)

माउंटबेटन योजना के आधार पर ब्रिटिश संसद में 4 जुलाई 1947 को विधेयक पेश हुआ और रिकॉर्ड गति से पारित होकर 18 जुलाई 1947 को ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज षष्ठम की शाही स्वीकृति (Royal Assent) प्राप्त कर ‘भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947’ (Indian Independence Act 1947) बना।

अधिनियम के प्रमुख प्रावधान:

  • 15 अगस्त 1947 से दो अधिराज्य: भारत और पाकिस्तान दो पूर्ण संप्रभु अधिराज्य (Dominions) बनेंगे।
  • वायसराय व भारत सचिव पद समाप्त: वायसराय और 1858 से चले आ रहे भारत सचिव (Secretary of State for India) का पद समाप्त कर दिया गया। दोनों देशों में केवल संवैधानिक गवर्नर-जनरल होंगे।
  • संविधान सभाओं को पूर्ण संप्रभुता: दोनों देशों की संविधान सभाएं अपने-अपने देश का संविधान बनाएंगी और तब तक वे केंद्रीय संसद के रूप में कार्य करेंगी।
  • 1935 के अधिनियम के तहत शासन: जब तक नया संविधान नहीं बन जाता, तब तक दोनों देशों का शासन भारत शासन अधिनियम 1935 के तहत (आवश्यक संशोधनों के साथ) चलेगा।
  • देशी रियासतों पर ब्रिटिश सर्वोच्चता समाप्त: 565 रियासतों को भारत या पाकिस्तान में से किसी एक में शामिल होने की स्वतंत्रता दी गई।

16. रेडक्लिफ सीमा आयोग एवं 14-15 अगस्त: ‘नियति से साक्षात्कार’

पंजाब और बंगाल के सीमांकन हेतु ब्रिटिश बैरिस्टर सर सिरिल रेडक्लिफ (Sir Cyril Radcliffe) की अध्यक्षता में दो सीमा आयोग गठित किए गए। रेडक्लिफ रेखा 13 अगस्त को तैयार हो चुकी थी, किंतु स्वतंत्रता दिवस के जश्न में खलल न पड़े, इसलिए इसे 17 अगस्त 1947 को सार्वजनिक किया गया। इसके परिणामस्वरूप लाखों लोगों को सीमा पार पलायन करना पड़ा और 10 लाख से अधिक निर्दोष लोग भीषण सांप्रदायिक दंगों में मारे गए।

14-15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि:
नई दिल्ली के संसद भवन के सेंट्रल हॉल में 14-15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि को स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपना विश्व प्रसिद्ध भाषण ‘नियति से साक्षात्कार’ (Tryst with Destiny) दिया:

“वर्षों पहले हमने नियति से एक वादा किया था, और अब वह समय आ गया है जब हम अपने वादे को पूरा करेंगे… जब मध्यरात्रि के 12 बजेंगे और पूरी दुनिया सो रही होगी, तब भारत जीवन और स्वतंत्रता के नए प्रभात में जागेगा…”

लॉर्ड माउंटबेटन स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर-जनरल बने और मोहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान के प्रथम गवर्नर-जनरल बने। 15 अगस्त 1947 को लाल किले की प्राचीर पर पहली बार स्वतंत्र भारत का तिरंगा फहराया गया।

17. 565 देशी रियासतों का ऐतिहासिक एकीकरण (सरदार पटेल व वी.पी. मेनन)

15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता के समय भारत के सम्मुख सबसे विकराल चुनौती 565 बिखरी हुई देशी रियासतों (Princely States) का भविष्य था, जो भारत के कुल क्षेत्रफल का 48% और आबादी का 28% थीं। यदि ये रियासतें अलग रहतीं, तो भारत कई छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट जाता।

अंतरिम सरकार ने 27 जून 1947 को ‘रियासती मंत्रालय’ (States Department) की स्थापना की, जिसका प्रभार लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल को सौंपा गया और वरिष्ठ नौकरशाह वी.पी. मेनन इसके प्रशासनिक सचिव बने।

पटेल की कूटनीति: विलय पत्र (Instrument of Accession) एवं प्रिवी पर्स:

सरदार पटेल ने दूरदर्शिता और कूटनीति का परिचय देते हुए नरेशों को समझाया कि वे केवल तीन विषय — रक्षा, विदेश मामले और संचार — भारत संघ को सौंपें, जबकि आंतरिक मामलों में उनकी स्वायत्तता सुरक्षित रहेगी। इसके बदले नरेशों को कर-मुक्त वार्षिक पेंशन दी गई जिसे ‘प्रिवी पर्स’ (Privy Purse) कहा गया। 15 अगस्त 1947 तक 562 रियासतें भारत संघ में शामिल हो चुकी थीं।

तीन समस्याग्रस्त रियासतों का ऐतिहासिक विलय:

1. जूनागढ़ (काठियावाड़, गुजरात):

जूनागढ़ का मुस्लिम नवाब महाबत खान हिंदू बहुल जनता की इच्छा के विरुद्ध पाकिस्तान में विलय कर बैठा। जनता ने श्यामलदास गांधी के नेतृत्व में ‘आरज़ी हुकूमत’ बनाई और विद्रोह कर दिया। नवाब कराची भाग गया। फरवरी 1948 में कराए गए जनमत संग्रह (Plebiscite) में 99% से अधिक जनता ने भारत के पक्ष में मतदान किया और जूनागढ़ का भारत में विलय हुआ।

2. हैदराबाद (ऑपरेशन पोलो):

हैदराबाद के निजाम मीर उस्मान अली खान ने स्वतंत्र रहने की घोषणा की और कासिम रिजवी के नेतृत्व वाले सांप्रदायिक लठैतों ‘रजाकारों’ (Razakars) ने हिंदू जनता पर भीषण अत्याचार किए। सरदार पटेल ने इसे ‘भारत के पेट में कैंसर’ कहा। 13 से 18 सितंबर 1948 को मेजर जनरल जे.एन. चौधरी के नेतृत्व में ‘ऑपरेशन पोलो’ (Operation Polo – पुलिस कार्रवाई) चलाया गया। निजाम ने आत्मसमर्पण किया और हैदराबाद भारत संघ का अभिन्न अंग बन गया।

3. जम्मू और कश्मीर:

महाराजा हरि सिंह ने प्रारंभ में भारत और पाकिस्तान दोनों के साथ ‘यथास्थिति समझौता’ (Standstill Agreement) किया। 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तानी सेना समर्थित कबाइलियों ने कश्मीर पर आक्रमण कर दिया। श्रीनगर खतरे में पड़ने पर महाराजा ने भारत से सैन्य मदद मांगी और 26 अक्टूबर 1947 को विलय पत्र (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर किए। भारतीय सेना ने तुरंत हवाई मार्ग से पहुंचकर हमलावरों को खदेड़ा।

सरदार वल्लभभाई पटेल के इस अप्रतिम योगदान के कारण उन्हें ‘भारत का बिस्मार्क’ (Bismarck of India) और ‘लौह पुरुष’ कहा जाता है, जिन्होंने आधुनिक अखंड भारत की भौगोलिक और राजनीतिक रूपरेखा तैयार की।

18. कालक्रमानुसार संपूर्ण घटनाक्रम सारणी (Timeline 1945–1947)

तिथि / वर्षऐतिहासिक घटनामहत्वपूर्ण विवरण एवं परीक्षा हेतु सार
14 जून 1945वेवेल योजना की घोषणावायसराय कार्यकारिणी परिषद में सवर्ण हिन्दू-मुस्लिम समता का प्रस्ताव।
25 जून – 14 जुलाई 1945शिमला सम्मेलनमौलाना आजाद का नेतृत्व; जिन्ना के वीटो के कारण सम्मेलन विफल।
नवंबर 1945INA लाल किला मुकदमासहगल, ढिल्लों, शाहनवाज; भूलाभाई देसाई की पैरवी; सजा माफ।
18-23 फरवरी 1946शाही नौसेना विद्रोह (RIN Mutiny)HMIS तलवार पर हड़ताल; ब्रिटिश सत्ता के अंत की शुरुआत।
24 मार्च 1946कैबिनेट मिशन का भारत आगमनपैथिक लॉरेंस, क्रिप्स, अलेक्जेंडर; नई दिल्ली में वार्ता प्रारंभ।
16 मई 1946कैबिनेट मिशन योजना की घोषणापाकिस्तान अस्वीकृत; त्रि-स्तरीय संघ व समूहीकरण (खंड क, ख, ग)।
16 अगस्त 1946प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवसमुस्लिम लीग द्वारा कलकत्ता नरसंहार व नोआखली हिंसा।
2 सितंबर 1946अंतरिम सरकार का गठनपंडित नेहरू के नेतृत्व में सरकार का गठन (26 अक्टूबर को लीग का प्रवेश)।
9 दिसंबर 1946संविधान सभा की प्रथम बैठकअस्थायी अध्यक्ष डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा; 13 दिसंबर को उद्देश्य प्रस्ताव।
20 फरवरी 1947एटली की घोषणा30 जून 1948 तक सत्ता छोड़ने की समयसीमा; माउंटबेटन वायसराय नियुक्त।
3 जून 1947माउंटबेटन योजनाभारत-पाकिस्तान विभाजन व 15 अगस्त 1947 को सत्ता हस्तांतरण का निर्णय।
18 जुलाई 1947भारतीय स्वतंत्रता अधिनियमब्रिटिश सम्राट की शाही स्वीकृति; दो स्वतंत्र डोमिनियनों का वैधानिक सृजन।
15 अगस्त 1947स्वतंत्र भारत का उदय‘नियति से साक्षात्कार’; दो सदी पुराने ब्रिटिश औपनिवेशिक राज का अंत।
1947 – 1948565 देशी रियासतों का विलयसरदार पटेल व वी.पी. मेनन का लौह नेतृत्व; जूनागढ़, हैदराबाद व कश्मीर।

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UPSC एवं State PCS प्रारंभिक व मुख्य परीक्षा हेतु आधुनिक भारत के इतिहास के सभी अध्यायों के संपूर्ण विश्लेषणात्मक नोट्स नीचे दिए गए लिंक्स से पढ़ें:

अध्याय 11: कैबिनेट मिशन, माउंटबेटन योजना, स्वतंत्रता 1947 व रियासतों का विलय (वर्तमान आलेख)

21. विगत वर्षों के UPSC एवं State PCS मुख्य परीक्षा हेतु मॉडल विश्लेषणात्मक प्रश्न

प्रश्न 1: “कैबिनेट मिशन योजना अविभाजित भारत को एकजुट रखने का अंतिम गंभीर ब्रिटिश प्रयास था, किंतु इसके अंतर्विरोधों और राजनीतिक अविश्वास ने विभाजन को अपरिहार्य बना दिया।” समीक्षा कीजिए। (UPSC Mains 250 शब्द)

उत्तर संरचना प्रारूप: 1. भूमिका में 16 मई 1946 की कैबिनेट मिशन योजना द्वारा संप्रभु पाकिस्तान को अस्वीकार करने और त्रि-स्तरीय ढीले संघ के प्रस्ताव का उल्लेख करें। 2. मुख्य भाग में समूहीकरण (Grouping: खंड क, ख, ग) के अंतर्विरोधों, असम व NWFP की आपत्तियों और 10 जुलाई 1946 को नेहरू के बंबई वक्तव्य तथा लीग द्वारा 29 जुलाई को स्वीकृति वापस लेने का विश्लेषण करें। 3. 16 अगस्त के ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ और सांप्रदायिक गृहयुद्ध की चर्चा करें। 4. निष्कर्ष में बताएं कि कैसे अंततः इस विफलता ने 3 जून योजना और विभाजन का मार्ग प्रशस्त किया।

प्रश्न 2: 565 देशी रियासतों के भारत संघ में एकीकरण में सरदार वल्लभभाई पटेल और वी.पी. मेनन की भूमिका तथा कूटनीतिक रणनीतियों का मूल्यांकन कीजिए। (State PCS Mains 200 शब्द)

उत्तर संरचना प्रारूप: 1. रियासती मंत्रालय की स्थापना और भारत के बाल्कनीकरण के खतरे का परिचय दें। 2. विलय पत्र (Instrument of Accession) के तीन विषयों (रक्षा, विदेश, संचार) और प्रिवी पर्स के आकर्षण की व्याख्या करें। 3. जूनागढ़ (जनमत संग्रह), हैदराबाद (‘ऑपरेशन पोलो’) और कश्मीर (विलय पत्र) के विशेष मामलों का विश्लेषण करें। 4. ‘भारत के बिस्मार्क’ के रूप में पटेल के अदम्य नेतृत्व का निष्कर्ष प्रस्तुत करें।

22. अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQ)

प्र. 1. कैबिनेट मिशन भारत कब आया था और इसके तीन सदस्य कौन थे?

उत्तर: ब्रिटिश कैबिनेट मिशन 24 मार्च 1946 को नई दिल्ली पहुंचा। इसके तीन सदस्य ब्रिटिश मंत्रिमंडल के वरिष्ठ मंत्री थे: 1. लॉर्ड पैथिक लॉरेंस (भारत सचिव एवं मिशन के अध्यक्ष), 2. सर स्टेफोर्ड क्रिप्स (व्यापार बोर्ड के अध्यक्ष), और 3. ए.वी. अलेक्जेंडर (नौसेना प्रमुख)।

प्र. 2. माउंटबेटन योजना (3 जून 1947 योजना) क्या थी?

उत्तर: 3 जून 1947 को भारत के अंतिम वायसराय लॉर्ड लुईस माउंटबेटन द्वारा घोषित योजना के तहत भारत को दो स्वतंत्र अधिराज्यों — भारत और पाकिस्तान — में विभाजित करने का निर्णय लिया गया। इसके तहत पंजाब और बंगाल का बंटवारा किया गया और सत्ता हस्तांतरण की तिथि 15 अगस्त 1947 तय की गई।

प्र. 3. शाही नौसेना विद्रोह (RIN Mutiny) कब हुआ था और इसका जहाज कौन-सा था?

उत्तर: शाही नौसेना विद्रोह 18 फरवरी 1946 को बंबई में स्थित सिग्नल प्रशिक्षण पोत ‘एच.एम.आई.एस. तलवार’ (HMIS Talwar) के नाविकों द्वारा नस्लीय अपमान और निकृष्ट भोजन के विरोध में प्रारंभ हुआ था। नाविकों ने एम.एस. खान की अध्यक्षता में हड़ताल समिति बनाई और जहाजों पर तिरंगा, हरा और लाल झंडा फहराया।

प्र. 4. सरदार पटेल ने हैदराबाद का भारत में विलय किस सैन्य अभियान द्वारा कराया था?

उत्तर: 13 से 18 सितंबर 1948 को हैदराबाद के निजाम और रजाकारों के अत्याचारों को समाप्त करने हेतु चलाए गए भारतीय सैन्य अभियान का कोडनेम ‘ऑपरेशन पोलो’ (Operation Polo – पुलिस कार्रवाई) था, जिसके बाद निजाम ने आत्मसमर्पण कर दिया।

प्र. 5. संविधान सभा की प्रथम बैठक कब हुई और उद्देश्य प्रस्ताव किसने पेश किया था?

उत्तर: संविधान सभा की प्रथम बैठक 9 दिसंबर 1946 को नई दिल्ली में हुई जिसके अस्थायी अध्यक्ष डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा थे। 11 दिसंबर को डॉ. राजेंद्र प्रसाद स्थायी अध्यक्ष बने। 13 दिसंबर 1946 को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ऐतिहासिक ‘उद्देश्य प्रस्ताव’ पेश किया जिसे 22 जनवरी 1947 को सर्वसम्मति से पारित किया गया और जो संविधान की प्रस्तावना बना।


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