Govt Exam Hindi Notes

सविनय अवज्ञा आंदोलन दांडी मार्च नमक सत्याग्रह नोट्स

सविनय अवज्ञा आंदोलन, दांडी मार्च, गोलमेज सम्मेलन व पूना पैक्ट (1930–1934) – संपूर्ण विश्लेषणात्मक अध्ययन एवं नोट्स

🔥 आधुनिक भारत का इतिहास • मास्टर अध्ययन श्रृंखला (अध्याय 8)

नमक की एक चुटकी से साम्राज्य की नींव हिलाने वाला ऐतिहासिक महा-आंदोलन

1929 के ऐतिहासिक लाहौर अधिवेशन में ‘पूर्ण स्वराज’ का संकल्प लेने के बाद महात्मा गांधी के नेतृत्व में 1930 में प्रारंभ हुआ सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का सर्वाधिक व्यापक, सुगठित और जन-आधारित सत्याग्रह था। 12 मार्च 1930 के ऐतिहासिक दांडी मार्च से लेकर 1934 में आंदोलन की औपचारिक समाप्ति तक के इस कालखंड ने ब्रिटिश हुकूमत को यह स्पष्ट संदेश दे दिया कि अब भारत पर उनकी इच्छा के विरुद्ध शासन करना असंभव है। यह अध्याय गांधीजी की 11 सूत्रीय मांगों, दांडी मार्च, धरासना सत्याग्रह, पश्चिमोत्तर में ‘लाल कुर्ती’ आंदोलन, तीनों गोलमेज सम्मेलनों, गांधी-इरविन समझौते, कराची अधिवेशन के मूल अधिकारों के प्रस्ताव, कम्यूनल अवॉर्ड तथा ऐतिहासिक पूना पैक्ट का गहन व प्रामाणिक विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है।

📚 आधुनिक भारत का इतिहास: श्रृंखला अनुक्रमणिका व अंतर्संबंधित कड़ियां

⬅️ पिछला अध्याय (अध्याय 7): स्वराज पार्टी, क्रांतिकारी आंदोलन (भगत सिंह) व साइमन कमीशन (1922–1929)
➡️ अगला अध्याय (अध्याय 9): भारत शासन अधिनियम 1935, 1937 के प्रांतीय चुनाव एवं त्रिपुरी संकट
➡️ अध्याय 10: भारत छोड़ो आंदोलन (1942), क्रिप्स मिशन एवं आजाद हिंद फौज (INA)
➡️ अध्याय 11 (महा-समापन): कैबिनेट मिशन, माउंटबेटन योजना एवं भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947

Table of Contents

1. आंदोलन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं गांधीजी की 11 सूत्रीय मांगें

दिसंबर 1929 में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में ‘पूर्ण स्वराज’ का लक्ष्य घोषित किए जाने और 26 जनवरी 1930 को पूरे देश में प्रथम स्वाधीनता दिवस मनाए जाने के बाद पूरे राष्ट्र में अभूतपूर्व उत्साह की लहर थी। कांग्रेस कार्यसमिति ने महात्मा गांधी को अपनी इच्छा और समय के अनुसार सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ करने का संपूर्ण अधिकार सौंप दिया।

गांधीजी हिंसा और अराजकता से बचना चाहते थे। अतः उन्होंने सीधे जन-विद्रोह छेड़ने से पहले 31 जनवरी 1930 को अपने पत्र ‘यंग इंडिया’ (Young India) के माध्यम से तत्कालीन ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड इरविन (Lord Irwin) के समक्ष 11 सूत्रीय मांगें (Eleven Demands) प्रस्तुत कीं।

📋 गांधीजी की 11 सूत्रीय मांगों का तीन-स्तरीय वर्गीकरण

1. सामान्य हित की मांगें (6)

  • सैन्य व्यय में कम से कम 50% की कटौती।
  • उच्च प्रशासनिक अधिकारियों के वेतन में 50% कमी।
  • पूर्ण शराब बंदी (मादक द्रव्यों की बिक्री बंद)।
  • राजनीतिक बंदियों की तत्काल रिहाई।
  • सीआईडी (गुप्तचर विभाग) पर सार्वजनिक नियंत्रण।
  • आत्मरक्षा हेतु भारतीयों को शस्त्र रखने का अधिकार।

2. बुर्जुआ/व्यापारिक वर्ग की मांगें (3)

  • रुपये की विनिमय दर घटाकर 1 शिलिंग 4 पेंस करना (1s 4d)।
  • विदेशी कपड़ों के आयात पर विशेष संरक्षण शुल्क लगाना।
  • तटीय व्यापार संरक्षण अधिनियम (Coastal Shipping Protection) पारित करना।

3. कृषकों की विशिष्ट मांगें (2)

  • भू-राजस्व (लगान) में 50% की भारी कटौती और उस पर विधानमंडल का नियंत्रण।
  • नमक कर (Salt Tax) की पूर्ण समाप्ति और नमक बनाने पर सरकारी एकाधिकार का खात्मा।

गांधीजी ने 2 मार्च 1930 को लॉर्ड इरविन को एक प्रसिद्ध पत्र लिखा जिसमें उन्होंने चेतावनी दी:

“मैंने घुटने टेककर रोटी मांगी थी, परंतु मुझे पत्थर मिला। निर्णय का समय आ चुका है। भारत एक विशाल कारागार बन चुका है। मैं नमक कानून को तोड़कर इस व्यवस्था को चुनौती देने जा रहा हूँ।”

लॉर्ड इरविन ने गांधीजी के पत्र को नजरअंदाज करते हुए मिलने से भी इनकार कर दिया। इसके बाद सविनय अवज्ञा आंदोलन का मार्ग पूरी तरह प्रशस्त हो गया।

2. दांडी मार्च एवं नमक सत्याग्रह (12 मार्च – 6 अप्रैल 1930)

नमक को ही सत्याग्रह का मुख्य प्रतीक क्यों चुना गया?

कई कांग्रेसी नेताओं (जैसे मोतीलाल नेहरू और सरदार पटेल) को प्रारंभ में लगा कि नमक जैसा सामान्य दैनिक उत्पाद राष्ट्रीय मुक्ति का बड़ा मुद्दा नहीं बन सकता। परंतु गांधीजी की दूरदर्शिता बेजोड़ थी:

  • सार्वभौमिक आवश्यकता: नमक अमीर और गरीब, हिंदू और मुस्लिम, सवर्ण और दलित—सभी के भोजन का अनिवार्य घटक था।
  • अमानवीय शोषण का प्रतीक: प्रकृति द्वारा समुद्र तट पर मुफ्त में दिए जाने वाले नमक पर ब्रिटिश सरकार ने भारी कर लगा रखा था और आम भारतीय को नमक बनाने से रोक रखा था। यह औपनिवेशिक शोषण की सबसे नग्न अभिव्यक्ति थी।
  • भावनात्मक व नैतिक जुड़ाव: नमक कर का विरोध किसी वर्ग विशेष का नहीं बल्कि भारत के सबसे निर्धन व्यक्ति की थाली का प्रश्न था।

📍 दांडी मार्च के प्रमुख ऐतिहासिक तथ्य (Quick Exam Facts)

  • प्रस्थान की तिथि: 12 मार्च 1930 (सुबह 6:30 बजे)।
  • प्रस्थान स्थल: साबरमती आश्रम (अहमदाबाद, गुजरात)।
  • गंतव्य: दांडी (नवसारी जिला, गुजरात तट)।
  • सत्याग्रहियों की संख्या: प्रारंभ में गांधीजी सहित कुल 78 चुने हुए अनुयायी (बाद में रास्ते में लाखों लोग जुड़े)।
  • कुल दूरी: लगभग 241 मील (लगभग 385 से 390 किलोमीटर)।
  • कुल समय: 24 दिन की निरंतर पदयात्रा।
  • पहुँचने की तिथि: 5 अप्रैल 1930 की शाम।
  • नमक कानून तोड़ने की तिथि: 6 अप्रैल 1930 (सुबह 6:30 बजे)। गांधीजी ने समुद्र तट पर एक मुट्ठी प्राकृतिक नमक उठाकर ब्रिटिश नमक कानून का प्रतीकात्मक उल्लंघन किया।
  • प्रतिज्ञा: गांधीजी ने प्रस्थान करते समय प्रतिज्ञा ली थी कि “जब तक मैं स्वराज प्राप्त नहीं कर लेता, तब तक साबरमती आश्रम वापस नहीं लौटूंगा।”

सुभाष चंद्र बोस ने गांधीजी के दांडी मार्च के विश्व-ऐतिहासिक प्रभाव की तुलना करते हुए लिखा:

“गांधीजी का यह दांडी मार्च नेपोलियन के एल्बा द्वीप से पेरिस की ओर ऐतिहासिक अभियान (Napoleon’s march from Elba to Paris) तथा मुसोलिनी के रोम मार्च (Mussolini’s March on Rome) के समान युगान्तरकारी था।”

3. आंदोलन का देशव्यापी स्वरूप एवं क्षेत्रीय प्रसार (All-India Spread)

6 अप्रैल 1930 को दांडी में नमक कानून टूटते ही पूरे देश में सविनय अवज्ञा आंदोलन दावानल की तरह फैल गया। विभिन्न प्रांतों में स्थानीय नेताओं ने अपने-अपने ढंग से कानूनों का उल्लंघन किया:

क्षेत्र / प्रांतप्रमुख नेताआंदोलन का मुख्य स्वरूप व विशेष घटना
धरासना (गुजरात)सरोजिनी नायडू, इमाम साहब, मणिलाल गांधी21 मई 1930 को धरासना सॉल्ट डिपो पर 2500 सत्याग्रहियों का शांतिपूर्ण धावा। पुलिस ने बर्बरता से लाठियां बरसाईं। अमेरिकी पत्रकार वेब मिलर (Webb Miller) ने लिखा: “मैंने अपने जीवन में इतनी दर्दनाक और बर्बर हिंसा कभी नहीं देखी।”
पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत (NWFP)खान अब्दुल गफ्फार खान (‘सीमांत गांधी’ / बाचा खान)‘खुदाई खिदमतगार’ (ईश्वर के सेवक / ‘लाल कुर्ती’ दल – Red Shirts) का गठन। 23 अप्रैल 1930 को पेशावर में चंद्र सिंह गढ़वाली के नेतृत्व में रॉयल गढ़वाल राइफल्स ने निहत्थे पठानों पर गोली चलाने से साफ इनकार कर दिया।
तमिलनाडु (मद्रास प्रांत)सी. राजगोपालाचारी (‘राजाजी’)तिरुचिरापल्ली से वेदारण्यम (तंजौर तट) तक 150 मील की ऐतिहासिक नमक पदयात्रा निकाली और वेदारण्यम में नमक कानून तोड़ा।
केरल (मालाबार तट)के. केलप्पन (‘केरल के गांधी’) एवं पी. कृष्ण पिल्लईकालीकट से पय्यानूर (Payyanur) तक नमक सत्याग्रह यात्रा का सफल नेतृत्व किया।
शोलापुर (महाराष्ट्र)सूती मिल मजदूर व स्थानीय नागरिकगांधीजी की गिरफ्तारी के विरोध में मजदूरों का भीषण विद्रोह। शराब की भट्टियां, अदालतें व रेलवे स्टेशन जलाए। कई दिनों तक शहर पर मजदूरों का समानांतर नियंत्रण रहा, जिसे कुचलने हेतु मार्शल लॉ लगाना पड़ा।
पूर्वोत्तर (नागालैंड/मणिपुर)रानी गाइदिनल्यू (Rani Gaidinliu) व जदोनांग‘हेरका’ व ‘जियालरोंग’ धार्मिक-राजनीतिक आंदोलन। मात्र 13 वर्ष की आयु में गाइदिनल्यू ने अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह किया। नेहरू ने उन्हें ‘पहाड़ों की बेटी’ व ‘रानी’ की उपाधि दी।
बिहारडॉ. राजेंद्र प्रसाद, अब्दुल बारी, अंबिका कांत सिंहसमुद्र तट न होने के कारण खारे पानी और सोरा से नमक बनाया गया। इसके बाद व्यापक रूप से ‘चौकीदारी कर बंदी आंदोलन’ (No-Chaukidari Tax) चलाया गया।
असमछात्र एवं युवा संगठनडीपीआई कनिंघम द्वारा जारी ‘कनिंघम सर्कुलर’ (Cunningham Circular) का कड़ा विरोध, जिसके तहत छात्रों और अभिभावकों से राजनीति में भाग न लेने का लिखित बांड भरवाया जा रहा था।
संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश)जवाहरलाल नेहरू, पुरुषोत्तम दास टंडन‘कर-बंदी’ (No-Tax – जमींदारों द्वारा सरकार को कर न देना) तथा ‘लगान-बंदी’ (No-Rent – काश्तकारों द्वारा जमींदारों को लगान न देना) अभियान चलाया गया।

4. सामाजिक सहभागिता: महिलाओं और युवाओं का अभूतपूर्व प्रवेश

सविनय अवज्ञा आंदोलन की सबसे क्रांतिकारी विशेषता भारतीय महिलाओं की विशाल सार्वजनिक सहभागिता थी। पर्दा प्रथा को त्यागकर हजारों संभ्रांत व सामान्य महिलाएं सड़कों पर उतरीं:

  • पिकेटिंग (Picketing): शराब, अफीम और विदेशी कपड़ों की दुकानों के बाहर महिलाओं ने शांतिपूर्ण धरने दिए। कमला नेहरू, सरोजिनी नायडू, स्वरूप रानी नेहरू, और हंसा मेहता ने इसका नेतृत्व किया।
  • बाल एवं युवा संगठन: लड़कों के दल को ‘वानर सेना’ और बालिकाओं के दल को ‘मंजरी सेना’ नाम दिया गया, जिन्होंने गुप्त संदेश पहुँचाने, पर्चे बांटने और झंडा फहराने का कार्य किया।
  • व्यापारियों का समर्थन: भारतीय उद्योगपति (जैसे जी.डी. बिड़ला, जमनालाल बजाज, अंबालाल साराभाई) और फिक्की (FICCI) ने विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार को खुला समर्थन दिया।

5. प्रथम गोलमेज सम्मेलन (12 नवंबर 1930 – 19 जनवरी 1931, लंदन)

साइमन कमीशन की रिपोर्ट पर विचार करने और भावी संवैधानिक सुधारों पर चर्चा करने हेतु ब्रिटिश सरकार ने लंदन के सेंट जेम्स पैलेस में प्रथम गोलमेज सम्मेलन (First Round Table Conference) का आयोजन किया:

  • उद्घाटनकर्ता: ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम (King George V)।
  • सम्मेलन के अध्यक्ष: ब्रिटिश प्रधानमंत्री जेम्स रैम्से मैकडोनाल्ड (James Ramsay MacDonald)।
  • कुल प्रतिनिधि: 89 सदस्य (16 ब्रिटिश राजनीतिक दलों से, 16 देशी रियासतों के नरेश/दीवान, और 57 ब्रिटिश भारत के विभिन्न दलों के प्रतिनिधि)।
  • प्रमुख भारतीय प्रतिभागी:
    • उदारवादी (Liberals): तेज बहादुर सप्रू, सी.वाई. चिंतामणि, एम.आर. जयकर।
    • मुस्लिम लीग: मोहम्मद अली जिन्ना, आगा खान, मुहम्मद शफी, मौलाना मोहम्मद अली।
    • दलित वर्ग (Depressed Classes): डॉ. बी.आर. अंबेडकर एवं राव बहादुर आर. श्रीनिवासन।
    • हिंदू महासभा: बी.एस. मुंजे एवं एम.आर. जयकर।
    • सिख समुदाय: सरदार उज्ज्वल सिंह।
    • देशी रियासतें: बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह, भोपाल के नवाब, बड़ौदा के गायकवाड़।
  • कांग्रेस की भूमिका: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इस सम्मेलन का पूर्ण बहिष्कार किया, क्योंकि उसके अधिकांश शीर्ष नेता सविनय अवज्ञा आंदोलन के कारण जेलों में बंद थे।
  • परिणाम: भारत के सबसे बड़े राजनीतिक दल (कांग्रेस) की अनुपस्थिति के कारण यह सम्मेलन निरर्थक सिद्ध हुआ। एक ब्रिटिश समीक्षक ने लिखा कि “यह सम्मेलन उस रामलीला के समान था जिसमें राम ही अनुपस्थित हों।”

6. गांधी-इरविन समझौता (दिल्ली पैक्ट – 5 मार्च 1931)

प्रथम गोलमेज सम्मेलन की विफलता के बाद ब्रिटिश सरकार को यह भान हो गया कि बिना कांग्रेस के कोई भी संवैधानिक समझौता असंभव है। तेज बहादुर सप्रू और एम.आर. जयकर के मध्यस्थता प्रयासों से 26 जनवरी 1931 को गांधीजी और अन्य कांग्रेस कार्यसमिति सदस्यों को जेल से बिना शर्त रिहा कर दिया गया।

वायसराय लॉर्ड इरविन और महात्मा गांधी के बीच 15 दिनों तक चली 8 मैराथन वार्ताओं के पश्चात 5 मार्च 1931 को ऐतिहासिक गांधी-इरविन समझौता (Gandhi-Irwin Pact) संपन्न हुआ, जिसे ‘दिल्ली समझौता’ भी कहा जाता है।

🤝 गांधी-इरविन समझौते के प्रमुख प्रावधान

सरकार द्वारा मानी गई मांगें:

  • हिंसा के दोषियों को छोड़कर शेष सभी राजनीतिक बंदियों की तत्काल रिहाई।
  • आंदोलन के दौरान जब्त की गई ऐसी संपत्तियों की वापसी जो अभी तीसरे पक्ष को न बेची गई हों।
  • सरकारी नौकरियों से इस्तीफा देने वाले भारतीयों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण नीति।
  • तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को स्वयं उपभोग हेतु बिना कर के नमक बनाने की अनुमति।
  • शराब और विदेशी कपड़ों की दुकानों पर शांतिपूर्ण धरने का अधिकार।
  • आंदोलन के दौरान जारी सभी आपातकालीन अध्यादेशों की वापसी।

कांग्रेस (गांधीजी) द्वारा मानी गई शर्तें:

  • सविनय अवज्ञा आंदोलन को तत्काल स्थगित करना।
  • कांग्रेस आगामी द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेगी।
  • ब्रिटिश सामानों के बहिष्कार को राजनीतिक हथियार के रूप में वापस लेना।
  • पुलिस अत्याचारों की निष्पक्ष जांच की मांग को छोड़ देना (इरविन के दबाव में गांधीजी ने यह मांग वापस ली)।

⚠️ भगत सिंह की फांसी और गांधीजी की भूमिका का ऐतिहासिक विवाद:

इस समझौते की सबसे तीखी आलोचना इस बात पर हुई कि गांधीजी ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदलने की मांग को समझौते की अनिवार्य शर्त (Binding Condition) नहीं बनाया। गांधीजी ने इरविन से मौखिक अनुरोध अवश्य किया था, परंतु इरविन के मना करने पर वे अड़े नहीं। 23 मार्च 1931 को तीनों वीरों को फांसी दे दी गई, जिससे देश के युवाओं में भारी रोष उत्पन्न हुआ।

7. कराची कांग्रेस अधिवेशन (29 मार्च 1931): मूल अधिकार एवं आर्थिक कार्यक्रम

भगत सिंह की शहादत के मात्र 6 दिन बाद 29 मार्च 1931 को कराची में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का विशेष वार्षिक अधिवेशन हुआ। इसकी अध्यक्षता सरदार वल्लभभाई पटेल ने की:

  • काले झंडों का सामना: कराची रेलवे स्टेशन पर नौजवान भारत सभा के आक्रोशित युवाओं ने गांधीजी को काले फूल और काले झंडे दिखाए। इसी अधिवेशन में गांधीजी ने अपना ऐतिहासिक वक्तव्य दिया: “गांधी मर सकता है, परंतु गांधीवाद सदा जीवित रहेगा।”
  • गांधी-इरविन समझौते का अनुमोदन: अधिवेशन ने दिल्ली समझौते को आधिकारिक स्वीकृति प्रदान की और गांधीजी को द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस का एकमात्र प्रतिनिधि नियुक्त किया।
  • मौलिक अधिकारों का ऐतिहासिक प्रस्ताव: पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा प्रारूपित (Drafted) ‘मौलिक अधिकार एवं राष्ट्रीय आर्थिक नीति’ (Fundamental Rights and National Economic Programme) का ऐतिहासिक प्रस्ताव पहली बार कांग्रेस द्वारा पारित किया गया। इसमें शामिल थे:
    • अभिव्यक्ति, प्रेस, सभा और संगठन बनाने की पूर्ण स्वतंत्रता।
    • धर्मनिरपेक्ष राज्य (Secular State) और सर्वधर्म समभाव।
    • वयस्क मताधिकार (Universal Adult Franchise)।
    • मजदूरों के लिए न्यूनतम मजदूरी, काम के मानवीय घंटे और यूनियन बनाने का अधिकार।
    • प्रमुख उद्योगों, खानों और परिवहन के साधनों पर राज्य का स्वामित्व व नियंत्रण।
    • लगान और मालगुजारी में भारी छूट।

8. द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (7 सितंबर – 1 दिसंबर 1931, लंदन)

29 अगस्त 1931 को महात्मा गांधी बंबई से एस.एस. राजपूताना (S.S. Rajputana) जहाज से लंदन के लिए रवाना हुए। उनके साथ महादेव देसाई, मदन मोहन मालवीय, देवदास गांधी, प्यारेलाल, और घनश्याम दास बिड़ला थे। सरोजिनी नायडू भारतीय महिलाओं की प्रतिनिधि के रूप में शामिल हुईं:

  • कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि: कांग्रेस की ओर से केवल और केवल महात्मा गांधी ही अधिकृत प्रतिनिधि थे।
  • विंस्टन चर्चिल का अपमानजनक बयान: सेंट जेम्स पैलेस की सीढ़ियां चढ़ते गांधीजी को देखकर ब्रिटिश कंजर्वेटिव नेता विंस्टन चर्चिल ने तीखा तंज कसा:

    “यह घिनौना और शर्मनाक दृश्य है कि मिडिल टेम्पल का एक बागी वकील, जो अब एक राजद्रोही अर्धनग्न फकीर (Seditious Half-naked Fakir) बन चुका है, वायसराय और सम्राट के साथ बराबरी की शर्तों पर बात करने सीढ़ियां चढ़ रहा है।”

  • सांप्रदायिक गतिरोध: सम्मेलन में मूल संवैधानिक प्रश्न (स्वतंत्रता या डोमिनियन स्टेटस) गौण हो गया और ब्रिटिश सरकार ने अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व के प्रश्न को आगे कर दिया। डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने दलितों (Depressed Classes) के लिए मुसलमानों और सिखों की तरह ‘पृथक निर्वाचक मंडल’ (Separate Electorates) की पुरजोर मांग की।
  • गांधीजी का कड़ा विरोध: गांधीजी ने दलितों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल का पुरजोर विरोध किया। उनका तर्क था कि दलित हिंदू समाज के अभिन्न अंग हैं; उन्हें अलग राजनीतिक दर्जा देने से वे हिंदू समाज से सदा के लिए कट जाएंगे और अस्पृश्यता का कलंक स्थायी हो जाएगा।
  • विफलता और वापसी: सम्मेलन बिना किसी ठोस परिणाम के 1 दिसंबर 1931 को समाप्त हो गया। 28 दिसंबर 1931 को बंबई लौटकर गांधीजी ने कहा:
    “मैं खाली हाथ लौटा हूँ, लेकिन मुझे इस बात का संतोष है कि मैंने अपने देश के स्वाभिमान के ध्वज को झुकने नहीं दिया।”

9. सविनय अवज्ञा आंदोलन का द्वितीय चरण (1932–1934)

गांधीजी के भारत लौटने तक देश का राजनीतिक परिदृश्य बदल चुका था। लॉर्ड इरविन के स्थान पर कठोर और अहंकारी लॉर्ड विलिंगटन (Lord Willingdon) नया वायसराय बन चुका था। विलिंगटन ने गांधीजी से मिलने से इनकार कर दिया।

  • आंदोलन का पुनः प्रारंभ: 4 जनवरी 1932 को कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन के दूसरे चरण की शुरुआत की।
  • सरकारी बर्बरता: उसी दिन गांधीजी और सरदार पटेल को गिरफ्तार कर पुणे की यरवदा जेल भेज दिया गया। सरकार ने ‘सिविल मार्शल लॉ’ लागू करते हुए कांग्रेस की सभी शाखाओं को गैर-कानूनी घोषित कर दिया, संपत्तियां कुर्क कर लीं और प्रेस पर कठोर सेंसरशिप लगा दी।
  • आंदोलन की शिथिलता: नेतृत्वविहीन जनता ने वीरता से मुकाबला किया, परंतु संगठनात्मक ढांचे के अभाव और भीषण सरकारी दमन के कारण आंदोलन 1933 तक धीमा पड़ गया। मई 1933 में गांधीजी ने इसे सामूहिक आंदोलन के बजाय ‘व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा’ में बदला और अंततः 7 अप्रैल 1934 को आंदोलन को पूर्णतः वापस ले लिया गया।

10. सांप्रदायिक पंचाट (Communal Award – 16 अगस्त 1932)

द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भारतीय नेताओं के बीच अल्पसंख्यकों के मुद्दे पर सहमति न बन पाने का लाभ उठाते हुए ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्से मैकडोनाल्ड ने 16 अगस्त 1932 को ‘सांप्रदायिक पंचाट’ (Communal Award) की घोषणा की:

  • प्रावधान: प्रांतीय विधानमंडलों में मुसलमानों, सिखों, यूरोपीय, भारतीय ईसाइयों, एंग्लो-इंडियंस और महिलाओं के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की व्यवस्था को जारी रखा गया।
  • सबसे घातक प्रहार: पहली बार ‘दलित वर्गों’ (Depressed Classes / अछूतों) को भी एक अलग अल्पसंख्यक समुदाय मानकर उनके लिए पृथक निर्वाचक मंडल (Separate Electorates) की व्यवस्था कर दी गई और उन्हें 71 आरक्षित सीटें दी गईं।
  • ब्रिटिश चाल: यह ‘फूट डालो और राज करो’ (Divide and Rule) नीति की चरम पराकाष्ठा थी, जिसका उद्देश्य हिंदू बहुसंख्यक समाज को दो फाड़ करके भारतीय राष्ट्रवाद की रीढ़ को तोड़ना था।

11. ऐतिहासिक पूना पैक्ट (Poona Pact – 24 सितंबर 1932)

यरवदा जेल में गांधीजी का आमरण अनशन

पुणे की यरवदा जेल में बंद महात्मा गांधी ने कम्यूनल अवॉर्ड को हिंदू समाज और दलितों के भविष्य के लिए आत्मघाती माना। उन्होंने सरकार को पत्र लिखकर चेतावनी दी और 20 सितंबर 1932 से यरवदा जेल में आमरण अनशन (Fast unto Death) प्रारंभ कर दिया।

गांधीजी के अनशन से पूरे देश में भारी सनसनी फैल गई। उनकी गिरती तबीयत को देखते हुए पंडित मदन मोहन मालवीय, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, तेज बहादुर सप्रू, घनश्याम दास बिड़ला और एम.सी. राजा ने डॉ. बी.आर. अंबेडकर से वार्ता कर बीच का रास्ता निकालने का अथक प्रयास किया।

समझौते की शर्तें एवं पूना पैक्ट के मुख्य बिंदु

अथक वार्ताओं के बाद 24 सितंबर 1932 को यरवदा जेल में गांधीजी की सहमति से पूना पैक्ट (Poona Pact) पर हस्ताक्षर हुए:

📜 पूना पैक्ट (1932) के ऐतिहासिक प्रावधान:

  1. पृथक निर्वाचक मंडल की समाप्ति: दलित वर्गों के लिए प्रस्तावित ‘पृथक निर्वाचक मंडल’ (Separate Electorates) को पूरी तरह रद्द कर दिया गया। दलित सामान्य हिंदू समाज के साथ ‘संयुक्त निर्वाचन प्रणाली’ (Joint Electorates) के तहत ही मतदान करेंगे।
  2. प्रांतीय सीटों में दोगुने से अधिक वृद्धि: प्रांतीय विधानमंडलों में दलितों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या कम्यूनल अवॉर्ड की 71 सीटों से बढ़ाकर 147 (कुछ स्रोतों में 148) सीटें कर दी गई। (मद्रास-30, बंगाल-30, बॉम्बे-15, पंजाब-8, बिहार-उड़ीसा-18, सीपी-20, असम-7, यूपी-20)।
  3. केंद्रीय विधायिका में आरक्षण: केंद्रीय विधानमंडल (Central Legislature) में सामान्य सीटों का 18% स्थान दलित वर्गों के लिए आरक्षित किया गया।
  4. द्वि-स्तरीय मतदान पद्धति (Primary Elections): आरक्षित सीटों पर उम्मीदवारों के चयन हेतु एक प्राथमिक निर्वाचन प्रणाली तय की गई, जिसमें केवल दलित मतदाता 4 उम्मीदवारों का पैनल चुनेंगे और फिर संयुक्त मतदाता उनमें से एक को अंतिम रूप से चुनेंगे।
  5. हस्ताक्षरकर्ता: समझौते पर गांधीजी की ओर से पंडित मदन मोहन मालवीय और दलित वर्ग की ओर से डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने हस्ताक्षर किए। साथ ही सी. राजगोपालाचारी, राजेंद्र प्रसाद, देवदास गांधी, तेज बहादुर सप्रू, एम.सी. राजा आदि ने भी हस्ताक्षर किए।

पूना पैक्ट के पश्चात गांधीजी ने अपना अनशन तोड़ा और अपना पूरा ध्यान अस्पृश्यता निवारण पर केंद्रित कर दिया। उन्होंने 1932 में ‘अखिल भारतीय अस्पृश्यता विरोधी लीग’ (All India Anti-Untouchability League / बाद में ‘हरिजन सेवक संघ’) की स्थापना की और 1933 में ‘हरिजन’ नामक साप्ताहिक समाचार पत्र प्रारंभ किया।

12. तृतीय गोलमेज सम्मेलन (17 नवंबर – 24 दिसंबर 1932) एवं श्वेत पत्र

  • अत्यंत संक्षिप्त एवं निरर्थक सम्मेलन: इसमें केवल 46 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और ब्रिटेन की मुख्य विपक्षी लेबर पार्टी (Labour Party) दोनों ने इसका बहिष्कार किया।
  • डॉ. अंबेडकर की उपस्थिति: डॉ. बी.आर. अंबेडकर और तेज बहादुर सप्रू ऐसे दुर्लभ भारतीय नेता थे जिन्होंने तीनों गोलमेज सम्मेलनों (1930, 1931 और 1932) में भाग लिया था।
  • परिणाम: तीनों सम्मेलनों की चर्चाओं के आधार पर ब्रिटिश सरकार ने मार्च 1933 में एक ‘श्वेत पत्र’ (White Paper) जारी किया। इस श्वेत पत्र की सिफारिशों पर ब्रिटिश संसद की संयुक्त प्रवर समिति (अध्यक्ष: लॉर्ड लिनलिथगो) ने विचार किया, जिसके आधार पर अंततः ‘भारत शासन अधिनियम 1935’ (Government of India Act 1935) निर्मित हुआ।

13. तुलनात्मक विश्लेषण सारणी: असहयोग आंदोलन (1920) बनाम सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930)

तुलना का आधारअसहयोग आंदोलन (NCM – 1920–22)सविनय अवज्ञा आंदोलन (CDM – 1930–34)
मुख्य लक्ष्य (Objective)स्वराज की अस्पष्ट मांग (ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर या बाहर)।‘पूर्ण स्वराज’ (Complete Independence) की सुस्पष्ट घोषणा।
कार्यपद्धति (Method)सरकारी तंत्र के साथ सहयोग न करना (बहिष्कार, उपाधि त्याग)। कानून तोड़ने का प्रत्यक्ष आह्वान नहीं था।सक्रिय रूप से विशिष्ट कानूनों का उल्लंघन करना (नमक कानून, वन कानून, कर न देना)।
मुस्लिम सहभागिताखिलाफत मुद्दे के कारण मुसलमानों की विशाल और व्यापक भागीदारी रही।मुस्लिम लीग के विरोध के कारण तुलनात्मक रूप से कम सहभागिता (NWFP को छोड़कर)।
महिला सहभागितासीमित थी, मुख्य रूप से चरखा कातने और फंड जुटाने तक।अभूतपूर्व एवं ऐतिहासिक! पिकेटिंग, जेल यात्रा और अग्रिम पंक्ति का नेतृत्व।
व्यापारिक व पूंजीपति वर्गप्रारंभ में संशय में था, सीमित वित्तीय सहयोग।खुला समर्थन, वित्तीय सहायता और विदेशी कपड़ों का संगठित बहिष्कार।
सरकारी गिरफ्तारियांलगभग 30,000 लोग जेल गए।90,000 से अधिक सत्याग्रही जेल भेजे गए (तीन गुना अधिक व्यापक)।

14. परीक्षा हेतु 20 त्वरित स्मरणीय तथ्य (High-Yield Quick Revision Points)

  1. गांधीजी की 11 मांगें: 31 जनवरी 1930 को ‘यंग इंडिया’ में प्रकाशित हुईं; वायसराय लॉर्ड इरविन ने खारिज कर दिया।
  2. दांडी मार्च की अवधि: 12 मार्च 1930 से 6 अप्रैल 1930 (कुल 24 दिन, 241 मील, 78 प्रारंभिक अनुयायी)।
  3. दांडी मार्च का सबसे युवा सत्याग्रही: 16 वर्षीय लीलाधर, जबकि सबसे वयोवृद्ध 61 वर्षीय स्वयं महात्मा गांधी थे।
  4. एकमात्र ईसाई सत्याग्रही: जे.सी. कुमारप्पा दांडी मार्च में गांधीजी के साथ थे।
  5. सुभाष बोस की उपमा: दांडी मार्च की तुलना नेपोलियन के एल्बा से पेरिस मार्च और मुसोलिनी के रोम मार्च से की।
  6. धरासना नमक सत्याग्रह (21 मई 1930): सरोजिनी नायडू, इमाम साहब और मणिलाल द्वारा नेतृत्व; अमेरिकी पत्रकार वेब मिलर (Webb Miller) ने बर्बरता की रिपोर्टिंग की।
  7. खुदाई खिदमतगार (‘लाल कुर्ती’): खान अब्दुल गफ्फार खान द्वारा 1929 में स्थापित; पश्तो पत्रिका ‘पख्तून’ निकालते थे।
  8. पेशावर घटना (23 अप्रैल 1930): चंद्र सिंह गढ़वाली (2/18 रॉयल गढ़वाल राइफल्स) ने निहत्थे पठानों पर गोली चलाने से इनकार किया।
  9. दक्षिण भारत में नमक यात्रा: सी. राजगोपालाचारी ने तिरुचिरापल्ली से वेदारण्यम तक पदयात्रा की।
  10. केरल में नमक यात्रा: के. केलप्पन (‘केरल के गांधी’) ने कालीकट से पय्यानूर तक यात्रा की।
  11. कनिंघम सर्कुलर (असम): छात्रों को आंदोलन से रोकने हेतु जारी किया गया, जिसके विरोध में व्यापक छात्र आंदोलन भड़का।
  12. रानी गाइदिनल्यू (नागालैंड): मात्र 13 वर्ष की आयु में विद्रोह किया; जवाहरलाल नेहरू ने ‘रानी’ की उपाधि दी।
  13. प्रथम गोलमेज सम्मेलन (1930): लंदन में आयोजित; कांग्रेस ने बहिष्कार किया; अध्यक्ष रैम्से मैकडोनाल्ड थे।
  14. गांधी-इरविन समझौता: 5 मार्च 1931 को नई दिल्ली में हस्ताक्षरित हुआ (मध्यस्थ: तेज बहादुर सप्रू व एम.आर. जयकर)।
  15. कराची अधिवेशन (29 मार्च 1931): अध्यक्ष सरदार पटेल; मूल अधिकार व राष्ट्रीय आर्थिक कार्यक्रम का प्रस्ताव (नेहरू द्वारा प्रारूपित) पारित।
  16. एस.एस. राजपूताना जहाज: इसी जहाज से महात्मा गांधी द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931) में भाग लेने लंदन गए थे।
  17. विंस्टन चर्चिल का कथन: गांधीजी को “राजद्रोही अर्धनग्न फकीर” (Seditious Half-naked Fakir) कहा।
  18. कम्यूनल अवॉर्ड (16 अगस्त 1932): ब्रिटिश पीएम रैम्से मैकडोनाल्ड द्वारा घोषित; दलितों को पृथक निर्वाचक मंडल दिया गया।
  19. पूना पैक्ट (24 सितंबर 1932): गांधीजी (यरवदा जेल अनशन) व डॉ. अंबेडकर के बीच समझौता; प्रांतीय सीटें 71 से बढ़ाकर 147 की गईं।
  20. तीनों गोलमेज सम्मेलनों में भाग लेने वाले नेता: डॉ. बी.आर. अंबेडकर और सर तेज बहादुर सप्रू।

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इस पूरे अध्याय के प्रत्येक सूक्ष्म पहलू (गांधीजी की 11 मांगें, दांडी मार्च, धरासना, खुदाई खिदमतगार, तीनों गोलमेज सम्मेलन, गांधी-इरविन पैक्ट, कराची अधिवेशन, कम्यूनल अवॉर्ड एवं पूना पैक्ट) पर आधारित 200 बहुविकल्पीय प्रश्नों (10 टेस्ट्स) का अभ्यास करें। Mock Test 1 पूर्णतः निःशुल्क है!

15. UPSC एवं State PCS हेतु 10 अभ्यास बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तरी (Model MCQs)

Q1. गांधीजी के दांडी मार्च (12 मार्च – 6 अप्रैल 1930) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. गांधीजी ने साबरमती आश्रम से 78 चुने हुए सत्याग्रहियों के साथ 241 मील की पदयात्रा प्रारंभ की।
  2. दांडी पहुँचकर 6 अप्रैल 1930 को उन्होंने समुद्र तट पर प्राकृतिक नमक बनाकर नमक कानून तोड़ा।
  3. सुभाष चंद्र बोस ने इस यात्रा की तुलना नेपोलियन के पेरिस मार्च से की थी।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(A) केवल 1 और 2    (B) केवल 2 और 3    (C) केवल 1 और 3    (D) 1, 2 और 3 (सभी सही)

उत्तर व्याख्या: तीनों कथन ऐतिहासिक रूप से पूर्णतः सत्य हैं। गांधीजी ने 24 दिनों में 241 मील की यात्रा पूरी की और 6 अप्रैल 1930 को सांकेतिक रूप से नमक कानून तोड़ा।

Q2. 21 मई 1930 के ऐतिहासिक ‘धरासना नमक सत्याग्रह’ का नेतृत्व किसने किया था और किस विदेशी पत्रकार ने इसके बर्बर लाठीचार्ज का सजीव चित्रण किया था?

(A) सी. राजगोपालाचारी एवं लुई फिशर    (B) सरोजिनी नायडू, इमाम साहब व मणिलाल एवं वेब मिलर (Webb Miller)
(C) खान अब्दुल गफ्फार खान एवं जॉर्ज स्लोकोम्ब    (D) वल्लभभाई पटेल एवं विलियम शाइरर

उत्तर व्याख्या: गांधीजी की गिरफ्तारी के बाद सरोजिनी नायडू, इमाम साहब और गांधीजी के पुत्र मणिलाल ने धरासना सॉल्ट डिपो पर 2500 सत्याग्रहियों का नेतृत्व किया। अमेरिकी ‘न्यू फ्रीमैन’ के पत्रकार वेब मिलर ने पुलिस लाठीचार्ज के अमानवीय दृश्य को विश्व पटल पर उजागर किया।

Q3. सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत में पेशावर में निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने से इनकार करने वाले ‘रॉयल गढ़वाल राइफल्स’ के नायक कौन थे?

(A) जदोनांग    (B) चंद्र सिंह गढ़वाली (Chandra Singh Garhwali)    (C) राम सिंह पठानिया    (D) दरबान सिंह नेगी

उत्तर व्याख्या: 23 अप्रैल 1930 को पेशावर के किस्सा ख्वानी बाजार में चंद्र सिंह गढ़वाली के नेतृत्व वाली 2/18 रॉयल गढ़वाल राइफल्स ने निहत्थे खुदाई खिदमतगारों पर गोली चलाने से साफ मना कर दिया था।

Q4. 5 मार्च 1931 के गांधी-इरविन समझौते को संपन्न कराने में किन दो राष्ट्रवादी नेताओं ने मध्यस्थ (Mediators) के रूप में मुख्य भूमिका निभाई थी?

(A) जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस    (B) तेज बहादुर सप्रू और एम.आर. जयकर
(C) मदन मोहन मालवीय और डॉ. अंबेडकर    (D) मौलाना आजाद और सरदार पटेल

उत्तर व्याख्या: उदारवादी नेता सर तेज बहादुर सप्रू और एम.आर. जयकर के लगातार प्रयासों से ही गांधीजी और वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच वार्ताएं संभव हो सकीं।

Q5. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 1931 के कराची अधिवेशन में पारित ‘मूल अधिकार एवं राष्ट्रीय आर्थिक नीति’ का प्रारूप किसने तैयार किया था?

(A) महात्मा गांधी    (B) सरदार वल्लभभाई पटेल    (C) पंडित जवाहरलाल नेहरू    (D) डॉ. बी.आर. अंबेडकर

उत्तर व्याख्या: कराची अधिवेशन के अध्यक्ष सरदार वल्लभभाई पटेल थे, परंतु ‘मौलिक अधिकार एवं राष्ट्रीय आर्थिक कार्यक्रम’ का ऐतिहासिक प्रारूप पंडित जवाहरलाल नेहरू ने एम.एन. रॉय के परामर्श से तैयार किया था।

16. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ – Frequently Asked Questions)

Q1. सविनय अवज्ञा आंदोलन कब और किस घटना से प्रारंभ हुआ था?

यह आंदोलन 12 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से प्रारंभ हुए दांडी मार्च के पश्चात 6 अप्रैल 1930 को दांडी के समुद्र तट पर महात्मा गांधी द्वारा नमक कानून तोड़े जाने के साथ औपचारिक रूप से पूरे देश में प्रारंभ हुआ।

Q2. दांडी मार्च में कुल कितने सत्याग्रहियों ने भाग लिया था और दूरी कितनी थी?

प्रारंभ में गांधीजी के साथ साबरमती आश्रम के 78 चुने हुए सत्याग्रही थे। यह पदयात्रा 24 दिनों में लगभग 241 मील (लगभग 385 किमी) की दूरी तय करके दांडी पहुँची थी।

Q3. पूना पैक्ट (1932) क्या था और इसके तहत क्या तय हुआ था?

पूना पैक्ट 24 सितंबर 1932 को यरवदा जेल में गांधीजी और डॉ. बी.आर. अंबेडकर के मध्य हुआ समझौता था। इसके तहत ब्रिटिश कम्यूनल अवॉर्ड द्वारा दलितों को दिए गए ‘पृथक निर्वाचक मंडल’ को समाप्त कर दिया गया और इसके बदले संयुक्त निर्वाचन में प्रांतीय विधायिकाओं में आरक्षित सीटें 71 से बढ़ाकर 147 तथा केंद्रीय विधायिका में 18% कर दी गईं।

Q4. तीनों गोलमेज सम्मेलनों में भाग लेने वाले प्रमुख भारतीय नेता कौन थे?

डॉ. बी.आर. अंबेडकर और सर तेज बहादुर सप्रू ऐसे प्रमुख भारतीय नेता थे जिन्होंने लंदन में आयोजित तीनों गोलमेज सम्मेलनों (1930, 1931 एवं 1932) में भाग लिया था। कांग्रेस ने केवल द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931) में गांधीजी के माध्यम से भाग लिया था।


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