1940 से 1945 का कालखंड भारतीय स्वाधीनता संग्राम का सर्वाधिक विस्फोटक, निर्णायक और गौरवशाली अध्याय था। द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका के बीच ब्रिटिश साम्राज्यवादी हठधर्मिता ने भारत को अपनी अंतिम स्वाधीनता के लिए आर-पार के संघर्ष में धकेल दिया। एक ओर 8 अगस्त 1942 को बंबई के ग्वालिया टैंक मैदान पर महात्मा गांधी ने राष्ट्र को ‘करो या मरो’ (Do or Die) का अमर मंत्र देकर ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ (Quit India Movement) का शंखनाद किया, जिसमें ‘ऑपरेशन जीरो आवर’ के बावजूद जनता ने समानांतर सरकारें स्थापित कर ब्रिटिश राज की नींव हिला दी; वहीं दूसरी ओर दक्षिण-पूर्व एशिया में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के करिश्माई नेतृत्व में आजाद हिंद फौज (INA) ने “दिल्ली चलो” और “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा” के उद्घोष के साथ स्वतंत्र भारत की ‘आरजी हुकूमत’ बनाई और भारत की सीमाओं पर सैन्य प्रहार किया। यह आलेख सिविल सेवा परीक्षाओं (UPSC व State PCS) के लिए इस संपूर्ण दौर का प्रामाणिक, विस्तृत व विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है।
📚 आधुनिक भारत का इतिहास: श्रृंखला अनुक्रमणिका व अंतर्संबंधित अध्ययन
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📖 अध्याय 8: सविनय अवज्ञा आंदोलन, दांडी मार्च, गोलमेज सम्मेलन व पूना पैक्ट (1930–1934)
📖 अध्याय 7: स्वराज पार्टी, क्रांतिकारी आंदोलन (HRA/HSRA) व साइमन कमीशन (1922–1929)
📖 अध्याय 5: गांधीवादी युग: चंपारण, रॉलेट, जलियांवाला बाग व असहयोग आंदोलन (1915–1922)
1. युद्धकालीन पृष्ठभूमि एवं अगस्त प्रस्ताव (8 अगस्त 1940)
द्वितीय विश्व युद्ध के प्रारंभ में वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो द्वारा बिना भारतीयों की सहमति के भारत को युद्ध में झोंकने के विरोध में अक्टूबर 1939 में आठों प्रांतों के कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने इस्तीफा दे दिया था। 1940 के मध्य तक यूरोप में युद्ध की स्थिति अत्यंत गंभीर हो गई थी; फ्रांस का पतन हो चुका था और ब्रिटेन स्वयं अस्तित्व के संकट से जूझ रहा था।
भारतीयों के सहयोग और वित्तीय-सैन्य संसाधनों को प्राप्त करने हेतु वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने 8 अगस्त 1940 को शिमला से एक आधिकारिक घोषणा की, जिसे ‘अगस्त प्रस्ताव’ (August Offer) कहा जाता है। इसके मुख्य बिंदु थे:
- औपनिवेशिक स्वराज्य (Dominion Status): ब्रिटिश सरकार ने पहली बार आधिकारिक रूप से स्वीकार किया कि भारत के लिए उसका अंतिम लक्ष्य ‘डोमिनियन स्टेटस’ प्रदान करना है।
- संविधान सभा का गठन: युद्ध समाप्ति के तुरंत बाद एक ऐसी प्रतिनिधि संस्था गठित की जाएगी जो मुख्य रूप से भारतीयों द्वारा भारत का संविधान बनाएगी।
- वायसराय की कार्यकारिणी का विस्तार: कार्यकारिणी परिषद में भारतीय सदस्यों की संख्या बढ़ाकर उन्हें बहुमत दिया जाएगा (यद्यपि रक्षा, गृह और वित्त अंग्रेजों के पास ही रहेगा)।
- अल्पसंख्यकों को वीटो शक्ति: घोषणा में कहा गया कि ब्रिटिश सरकार किसी ऐसी संवैधानिक व्यवस्था को किसी शक्तिशाली अल्पसंख्यक वर्ग (मुस्लिम लीग) की असहमति पर जबरन लागू नहीं करेगी।
प्रस्ताव की विफलता: कांग्रेस ने इसे सिरे से खारिज कर दिया। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि “डोमिनियन स्टेटस की पूरी अवधारणा दरवाजे में जड़ी जंग लगी कील की तरह मृतप्राय (Dead as a doornail) हो चुकी है।” मुस्लिम लीग ने भी इसे अस्वीकार कर दिया क्योंकि इसमें स्पष्ट रूप से ‘पाकिस्तान’ की मांग स्वीकार नहीं की गई थी, यद्यपि उसने वीटो शक्ति के आश्वासन का स्वागत किया।
2. व्यक्तिगत सत्याग्रह (17 अक्टूबर 1940): ‘दिल्ली चलो आंदोलन’
अगस्त प्रस्ताव के अस्वीकार होने के बाद ब्रिटिश सरकार ने दमनकारी रुख अपनाया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कठोर प्रतिबंध लगा दिए। गांधीजी ब्रिटेन की युद्धकालीन कठिनाइयों का नाजुक लाभ उठाकर कोई हिंसक या अराजक जन-आंदोलन नहीं छेड़ना चाहते थे। अतः उन्होंने एक सीमित, नैतिक और अत्यंत अनुशासित ‘व्यक्तिगत सत्याग्रह’ (Individual Satyagraha) चलाने का निर्णय लिया।
यह सत्याग्रह 17 अक्टूबर 1940 को महाराष्ट्र के वर्धा के निकट पवनार आश्रम से प्रारंभ हुआ। इसमें चुने हुए सत्याग्रही जनसभाओं में जाकर युद्ध विरोधी भाषण देते थे और घोषणा करते थे: “युद्ध प्रयासों में किसी भी प्रकार से सहायता करना (धन या जन से) पूर्णतः गलत है।” भाषण के बाद वे गिरफ्तारी देते थे, और यदि गिरफ्तार न किए जाएं तो पैदल दिल्ली की ओर मार्च करते थे; इसीलिए इसे ‘दिल्ली चलो आंदोलन’ भी कहा गया।
🏆 तीन प्रमुख व्यक्तिगत सत्याग्रही (परीक्षा हेतु अनिवार्य)
- प्रथम सत्याग्रही: आचार्य विनोबा भावे (17 अक्टूबर 1940 को भाषण देकर गिरफ्तार हुए)।
- द्वितीय सत्याग्रही: पंडित जवाहरलाल नेहरू (7 नवंबर 1940 को गिरफ्तार हुए)।
- तृतीय सत्याग्रही: ब्रह्मदत्त (Brahma Dutt) — गांधीजी के आश्रम के निष्ठावान कार्यकर्ता।
मई 1941 तक लगभग 25,000 प्रतिष्ठित सत्याग्रहियों ने गिरफ्तारियां दीं। दिसंबर 1941 में जब जापान ने द्वितीय विश्व युद्ध में कूदकर दक्षिण-पूर्व एशिया में तेजी से आगे बढ़ना शुरू किया, तो ब्रिटिश सरकार ने सत्याग्रहियों को जेलों से रिहा कर दिया।
3. क्रिप्स मिशन (मार्च-अप्रैल 1942): संवैधानिक प्रस्ताव एवं विफलता
दिसंबर 1941 में जापान ने पर्ल हार्बर पर हमला किया और तेजी से मलाया, सिंगापुर, जावा, सुमात्रा और बर्मा (रंगून) पर अधिकार कर लिया। मार्च 1942 तक जापानी सेनाएं भारत के पूर्वोत्तर द्वार (असम और बंगाल की सीमाओं) पर दस्तक दे रही थीं। इस गंभीर संकट के समय अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट और चीनी मार्शल च्यांग काई-शेक ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल पर भारतीयों का पूर्ण सक्रिय सहयोग प्राप्त करने हेतु संवैधानिक सुधार करने का भारी दबाव डाला।
विवश होकर चर्चिल ने ब्रिटिश वॉर कैबिनेट के वरिष्ठ सदस्य सर स्टेफोर्ड क्रिप्स (Sir Stafford Cripps) को भारत भेजा। क्रिप्स 23 मार्च 1942 को दिल्ली पहुंचे और 30 मार्च 1942 को अपने प्रस्ताव प्रस्तुत किए:
📋 क्रिप्स प्रस्तावों के मुख्य प्रावधान
- युद्ध के पश्चात भारत को पूर्ण स्वायत्तता के साथ ‘डोमिनियन स्टेटस’ दिया जाएगा, जिसे राष्ट्रमंडल से अलग होने का भी अधिकार होगा।
- युद्ध समाप्ति के बाद एक संविधान सभा बनाई जाएगी जिसके सदस्य प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व से चुने जाएंगे और देशी रियासतों के शासक अपने प्रतिनिधियों को मनोनीत करेंगे।
- प्रांतों को अलग होने का अधिकार (Non-accession clause): यदि कोई प्रांत नया संविधान स्वीकार न करना चाहे, तो वह अपनी पुरानी स्थिति में रह सकता है या अपना अलग संविधान बना सकता है (यह भारत के विखंडन का बीज था)।
- युद्धकाल के दौरान भारत की रक्षा का संपूर्ण नियंत्रण ब्रिटिश सरकार के हाथों में ही रहेगा।
प्रस्तावों पर राष्ट्रीय प्रतिक्रियाएं:
- महात्मा गांधी: उन्होंने क्रिप्स प्रस्तावों को “एक दिवालिया बैंक के नाम भविष्य की तिथि का चेक” (A Post-dated cheque on a crashing bank) कहकर सिरे से नकार दिया।
- पंडित नेहरू व मौलाना आजाद (कांग्रेस के आधिकारिक वार्ताकार): उन्होंने विरोध किया कि अंतरिम काल में वास्तविक राष्ट्रीय सरकार और रक्षा मंत्री भारतीयों को नहीं सौंपा जा रहा है, तथा प्रांतों को अलग होने की छूट देकर भारत के टुकड़े करने की साजिश रची गई है।
- मुस्लिम लीग: जिन्ना ने प्रस्ताव को इसलिए ठुकराया क्योंकि इसमें सीधे और स्पष्ट रूप से अलग ‘पाकिस्तान’ की मांग स्वीकार नहीं की गई थी।
11 अप्रैल 1942 को वार्ताएं पूरी तरह टूट गईं और क्रिप्स निराश होकर लंदन लौट गए। क्रिप्स मिशन की विफलता ने यह स्पष्ट कर दिया कि ब्रिटिश सरकार भारतीयों को वास्तविक शक्ति सौंपने की तनिक भी इच्छुक नहीं है।
4. भारत छोड़ो आंदोलन का सूत्रपात एवं वर्धा प्रस्ताव (14 जुलाई 1942)
क्रिप्स मिशन की विफलता के बाद देश में घोर हताशा, युद्धजनित महंगाई और जापानी आक्रमण का गहरा भय व्याप्त हो गया था। गांधीजी इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि अंग्रेजों की भारत में मौजूदगी ही जापानियों को भारत पर हमला करने का निमंत्रण दे रही है। यदि अंग्रेज तुरंत भारत छोड़ दें, तो भारत स्वयं अपनी रक्षा की व्यवस्था कर सकता है या जापानियों से निपट सकता है।
मई 1942 में गांधीजी ने अपनी पत्रिका ‘हरिजन’ में खुला आह्वान किया: “अंग्रेजों! भारत को भगवान के भरोसे छोड़ दो, यदि वह बहुत अधिक लगे तो उसे अराजकता के हवाले छोड़ दो।”
14 जुलाई 1942 को महाराष्ट्र के वर्धा में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक हुई। जब कुछ नेताओं ने युद्धकाल में आंदोलन छेड़ने पर संदेह व्यक्त किया, तो गांधीजी ने दृढ़ता से कहा:
“यदि कांग्रेस मेरे आंदोलन के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करती, तो मैं इस देश की बालू (रेत) से ही कांग्रेस से भी बड़ा आंदोलन खड़ा कर दूंगा।”
इसके पश्चात वर्धा में ‘भारत छोड़ो प्रस्ताव’ (Quit India Resolution) सर्वसम्मति से पारित हुआ और अंतिम अनुमोदन हेतु बंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक बुलाई गई।
5. ग्वालिया टैंक मैदान (8 अगस्त 1942) एवं ‘करो या मरो’ का अमर महामंत्र
7-8 अगस्त 1942 को बंबई के ऐतिहासिक ग्वालिया टैंक मैदान (अब अगस्त क्रांति मैदान) पर अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का ऐतिहासिक अधिवेशन हुआ। इस ऐतिहासिक सत्र की अध्यक्षता तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम आजाद ने की।
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पेश किया और सरदार वल्लभभाई पटेल ने इसका जोरदार समर्थन किया। 8 अगस्त 1942 की देर रात यह प्रस्ताव भारी बहुमत से पारित हुआ।
⚡ ‘क्विट इंडिया’ नारा एवं गांधीजी का 70 मिनट का ऐतिहासिक उद्बोधन
• नारे के रचयिता: ‘क्विट इंडिया’ (Quit India) नारा बंबई के समाजवादी नेता और मेयर युसुफ मेहरअली (Yusuf Meherally) ने गढ़ा था।
• गांधीजी का अमर मंत्र: गांधीजी ने लगभग 70 मिनट के ऐतिहासिक भाषण में कहा: “मैं आपको एक छोटा-सा मंत्र देता हूं, इसे अपने हृदय में अंकित कर लीजिए – ‘करो या मरो’ (Do or Die)। हम या तो भारत को स्वतंत्र कराएंगे या इस प्रयास में अपनी जान दे देंगे; हम अपनी आंखों से अपनी गुलामी का स्थायित्व देखने के लिए जीवित नहीं रहेंगे।”
गांधीजी द्वारा विभिन्न वर्गों को दिए गए 5 विशिष्ट निर्देश:
- सरकारी कर्मचारी: नौकरी से त्यागपत्र देने की आवश्यकता नहीं है, परंतु वे कांग्रेस और देश के प्रति अपनी वफादारी की खुली घोषणा करें।
- सैनिक: सेना में बने रहें, परंतु अपने ही निहत्थे देशवासियों पर गोली चलाने का आदेश मिलने पर साफ इनकार कर दें।
- छात्र: शिक्षण संस्थानों का तभी त्याग करें जब वे आजादी मिलने तक उस निर्णय पर अडिग रहने का आत्मबल रखते हों।
- किसान: जो जमींदार देशभक्त और राष्ट्रवादियों के साथ हों उन्हें आपसी सहमति से लगान दें; परंतु जो जमींदार अंग्रेजों के पिट्ठू बने रहें उन्हें एक कौड़ी भी लगान न दें।
- देशी रियासतें: शासक अपनी प्रजा की संप्रभुता को मान्यता दें और जनता स्वयं को भारतीय राष्ट्र का अभिन्न अंग घोषित करे।
6. ‘ऑपरेशन जीरो आवर’ (9 अगस्त 1942) एवं नेताओं की गिरफ्तारियां
ब्रिटिश हुकूमत पहले से पूरी तैयारी में थी। 9 अगस्त 1942 की भोर में सूर्योदय से पूर्व ही ब्रिटिश पुलिस ने ‘ऑपरेशन जीरो आवर’ (Operation Zero Hour) चलाकर कांग्रेस के सभी शीर्ष नेताओं को एक साथ गिरफ्तार कर लिया:
| शीर्ष राष्ट्रीय नेता | नजरबंदी / कारावास का स्थान | ऐतिहासिक विवरण |
|---|---|---|
| महात्मा गांधी | आगा खां पैलेस, पूना (महाराष्ट्र) | कस्तूरबा गांधी, सरोजिनी नायडू व महादेव देसाई के साथ कैद। 10 फरवरी 1943 से 21 दिनी अनशन किया। 6 मई 1944 को बीमारी के आधार पर रिहा हुए। |
| महादेव देसाई व कस्तूरबा गांधी | आगा खां पैलेस, पूना | महादेव देसाई का 15 अगस्त 1942 को तथा कस्तूरबा गांधी का 22 फरवरी 1944 को इसी जेल में निधन हुआ। |
| पंडित नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना आजाद, गोविंद वल्लभ पंत, कृपलानी | अहमदनगर किला (Ahmednagar Fort) | कांग्रेस कार्यसमिति के 12 शीर्ष नेता लगभग तीन वर्ष कैद रहे। नेहरू ने यहीं ‘भारत की खोज’ (Discovery of India) पुस्तक लिखी। |
| डॉ. राजेंद्र प्रसाद | बांकीपुर जेल, पटना (बिहार) | अस्वस्थ होने के कारण बंबई नहीं गए थे; पटना में गिरफ्तार कर बांकीपुर जेल में रखा गया। |
| जयप्रकाश नारायण | हजारीबाग सेंट्रल जेल (झारखंड) | दीपावली की रात (8 नवंबर 1942) 5 साथियों सहित दीवार फांदकर फरार हुए और नेपाल में ‘आजाद दस्ता’ बनाया। |
नेतृत्वहीन स्वतःस्फूर्त जन-विद्रोह: सभी शीर्ष नेताओं के अचानक जेल जाने से कोई केंद्रीय योजना लागू नहीं हो सकी। इसके बावजूद देश की आम जनता, छात्रों और स्थानीय कार्यकर्ताओं ने स्वयं आंदोलन की बागडोर संभाल ली। सरकारी थानों, डाकघरों, रेलवे स्टेशनों और टेलीफोन तारों को बड़े पैमाने पर नष्ट किया गया।
7. भूमिगत प्रतिरोध, गुप्त कांग्रेस रेडियो एवं महिला वीरांगनाएं
खुले आंदोलन के दमन के बाद समाजवादियों और युवाओं ने एक सुगठित भूमिगत आंदोलन (Underground Movement) संचालित किया:
- अरुणा आसफ अली: 9 अगस्त 1942 को जब पुलिस ने ग्वालिया टैंक मैदान घेर लिया, तब अरुणा आसफ अली ने वीरतापूर्वक तिरंगा फहराया। बाद में वे भूमिगत केंद्रीय समिति की रीढ़ बनीं। उन्हें ‘1942 की वीरांगना’ और ‘ग्रैंड ओल्ड लेडी ऑफ द मूवमेंट’ कहा गया।
- उषा मेहता और गुप्त कांग्रेस रेडियो: 22 वर्षीय छात्रा उषा मेहता, बाबूभाई और विट्ठलभाई झावेरी ने बंबई से 42.34 मीटर फ्रीक्वेंसी पर ‘गुप्त कांग्रेस रेडियो’ प्रारंभ किया। इसका प्रसारण शुरू होता था: “यह कांग्रेस रेडियो है जो 42.34 मीटर पर भारत में किसी अज्ञात स्थान से प्रसारित हो रहा है।” डॉ. राम मनोहर लोहिया नियमित रूप से इस रेडियो पर भाषण देते थे। 12 नवंबर 1942 को पुलिस ने इस स्टेशन को पकड़ लिया।
- मातंगिनी हाजरा (‘गांधी बूढ़ी’): बंगाल के तामलुक (मिदनापुर) में 73 वर्ष की वयोवृद्ध स्वतंत्रता सेनानी मातंगिनी हाजरा 29 सितंबर 1942 को हाथ में तिरंगा लिए जुलूस का नेतृत्व करते हुए पुलिस की तीन गोलियां खाकर शहीद हुईं।
- कनकलता बरुआ: असम के गोहपुर थाने पर 20 सितंबर 1942 को मात्र 17 वर्ष की आयु में तिरंगा फहराते हुए ‘मृत्यु वाहिनी’ की सदस्या कनकलता बरुआ पुलिस की गोली से शहीद हुईं।
- तारा रानी श्रीवास्तव: बिहार के सीवान में पति के गोली लगने के बाद उनकी साड़ी से पट्टी बांधी और थाने पर आगे बढ़कर तिरंगा फहराया।
8. जयप्रकाश नारायण एवं नेपाल के तराई में ‘आजाद दस्ता’
8 नवंबर 1942 को दीपावली की रात जयप्रकाश नारायण (JP) अपने पांच साथियों (रामानंद मिश्र, योगेंद्र शुक्ल, सूरज नारायण सिंह आदि) के साथ हजारीबाग सेंट्रल जेल की ऊंची दीवार फांदकर फरार हो गए।
जेपी ने नेपाल के राजविलास जंगल में भूमिगत होकर ‘आजाद दस्ता’ (Azad Dasta) का गठन किया। इसका मुख्य उद्देश्य छापामार युद्ध के जरिए ब्रिटिश संचार लाइनों (रेल, टेलीग्राफ, पुल) को ध्वस्त करना और ब्रिटिश हुकूमत को लकवाग्रस्त करना था। सरदार नित्यानंद सिंह ने युवाओं को शस्त्र व गोरिल्ला युद्ध का सैन्य प्रशिक्षण दिया।
मई 1943 में जब नेपाल पुलिस ने जेपी और डॉ. राम मनोहर लोहिया को गिरफ्तार कर हनुमान नगर जेल में डाल दिया, तब सूरज नारायण सिंह के नेतृत्व में आजाद दस्ता के क्रांतिकारियों ने जेल पर सशस्त्र हमला बोलकर दोनों शीर्ष नेताओं को छुड़ा लिया।
9. 1942 की ऐतिहासिक समानांतर सरकारें (Parallel Governments)
भारत छोड़ो आंदोलन का सबसे अभूतपूर्व पहलू कई क्षेत्रों में ब्रिटिश शासन का पूर्ण खात्मा और स्वतंत्र समानांतर सरकारों की स्थापना थी:
| समानांतर सरकार | स्थान एवं काल | प्रमुख नेता | मुख्य विशेषताएं एवं कार्य |
|---|---|---|---|
| बलिया समानांतर सरकार | बलिया, उत्तर प्रदेश (अगस्त 1942 – 7 से 10 दिन) | चित्तू पांडेय (‘बलिया का शेर’) | देश की सर्वप्रथम समानांतर सरकार; जेल तोड़कर सभी बंदियों को रिहा कराया और कलेक्टर से सत्ता छीनी। |
| तामलुक ‘जातीय सरकार’ | मिदनापुर, बंगाल (दिसंबर 1942 – सितंबर 1944) | सतीश चंद्र सामंत, सुशील धारा | ‘विद्युत वाहिनी’ नामक सुगठित सेना बनाई; 1943 के अकाल में जमाखोरों से अनाज जब्त कर गरीबों में मुफ्त बांटा। गांधीजी की अपील पर 1 सितंबर 1944 को भंग हुई। |
| सतारा ‘प्रति सरकार’ | सतारा, महाराष्ट्र (1943 – 1946) | क्रांतिसिंह नाना पाटिल, वाई.बी. चव्हाण, किसान वीर | सर्वाधिक दीर्घकालिक समानांतर सरकार; ‘तूफान सेना’ बनाई; ‘न्यायदान मंडल’ (लोक अदालतें) चलाईं; दहेज-मुक्त सादगीपूर्ण ‘गांधी विवाह’ कराए। |
| तलचर मुक्त सरकार | उड़ीसा (सितंबर 1942) | प्रजामंडल नेता व किसान | किसानों का पूर्ण नियंत्रण; इसे कुचलने हेतु अंग्रेजों ने लड़ाकू विमानों से मशीनगन से गोलियां बरसाईं। |
10. सामाजिक सहभागिता एवं आंदोलन के विरोधी दल
भारत छोड़ो आंदोलन में समाज के विभिन्न वर्गों की सहभागिता अभूतपूर्व थी। जमशेदपुर के टाटा स्टील में मजदूरों ने 13 दिन की हड़ताल की; अहमदाबाद के कपड़ा मिल मजदूरों ने 3.5 महीने (105 दिन) काम बंद रखा जिसे ‘भारत का स्टालिनग्राद’ कहा गया। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) और पटना विश्वविद्यालय के छात्र आंदोलन के अग्रदूत बने।
⚠️ भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध अथवा बहिष्कार करने वाले संगठन
- मुस्लिम लीग: मोहम्मद अली जिन्ना ने आंदोलन को ‘हिंदू राज’ स्थापित करने का षड्यंत्र बताया और मुसलमानों से दूर रहने को कहा। 1943 के कराची अधिवेशन में लीग ने नारा दिया: “बांटो और भागो” (Divide and Quit)।
- हिंदू महासभा एवं वी.डी. सावरकर: सावरकर ने आंदोलन का बहिष्कार किया और हिंदुओं को ब्रिटिश सेना व सरकारी नौकरियों में बने रहने का निर्देश दिया।
- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS): संघ ने स्वयं को आंदोलन से पूरी तरह अलग रखा।
- कम्युनिस्ट पार्टी (CPI): हिटलर द्वारा सोवियत संघ पर आक्रमण के बाद युद्ध को ‘जन-युद्ध’ (People’s War) घोषित कर ब्रिटिश युद्ध प्रयासों का समर्थन किया और आंदोलन का विरोध किया।
- डॉ. बी.आर. अंबेडकर: उन्होंने युद्ध के समय ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध आंदोलन को गैर-जिम्मेदाराना और अनुचित माना।
- देशी राजा-महाराजा: अपनी रियासतों में आंदोलन का बर्बर दमन किया और अंग्रेजों के प्रति पूर्ण वफादार रहे।
11. आजाद हिंद फौज (INA) की स्थापना का प्रथम चरण
द्वितीय विश्व युद्ध में जब जापानी सेना ने मलाया में ब्रिटिश सेना को हराया, तब 14 पंजाब रेजिमेंट के कैप्टन मोहन सिंह और गदर क्रांतिकारी ज्ञानी प्रीतम सिंह ने जापानी खुफिया अधिकारी मेजर इवाइची फुजिवारा के साथ मिलकर भारतीय युद्धबंदियों से एक राष्ट्रीय सेना बनाने का विचार प्रस्तुत किया।
15 फरवरी 1942 को सिंगापुर के पतन पर 45,000 भारतीय युद्धबंदियों को जापानियों ने कैप्टन मोहन सिंह को सौंप दिया। 1 सितंबर 1942 को सिंगापुर में प्रथम ‘आजाद हिंद फौज’ (1st INA) की औपचारिक स्थापना हुई जिसमें 16,300 सैनिक शामिल हुए।
जापान में निर्वासित महान क्रांतिकारी रास बिहारी बोस ने मार्च 1942 में टोक्यो और जून 1942 में बैंकॉक में सम्मेलन आयोजित कर ‘इंडियन इंडिपेंडेंस लीग’ (IIL) बनाई और INA को उसकी सैन्य शाखा घोषित किया। बैंकॉक सम्मेलन में सुभाष चंद्र बोस को जर्मनी से आमंत्रित करने का प्रस्ताव पारित हुआ।
दिसंबर 1942 में जब जापानियों ने INA को केवल एक साधन की तरह इस्तेमाल करना चाहा, तो कैप्टन मोहन सिंह ने दृढ़ विरोध किया। जापानियों ने उन्हें गिरफ्तार कर निर्वासित कर दिया और प्रथम INA बिखर गई जिसे रास बिहारी बोस ने संभाला।
12. नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज का पुनर्गठन
16-17 जनवरी 1941 की रात सुभाष चंद्र बोस कलकत्ता से ‘मौलवी जियाउद्दीन’ के छद्म वेश में फरार होकर पेशावर, काबुल और मॉस्को होते हुए बर्लिन (जर्मनी) पहुंचे। बर्लिन में उन्होंने ‘फ्री इंडिया सेंटर’ और ‘इंडियन लीजन’ बनाई जहां सैनिकों ने उन्हें सर्वप्रथम ‘नेताजी’ की उपाधि दी।
फरवरी 1943 में नेताजी ने जर्मन पनडुब्बी यू-180 (U-180) से 90 दिनों की अत्यंत जोखिम भरी महासागरीय यात्रा की और मेडागास्कर के निकट जापानी पनडुब्बी I-29 में सवार होकर टोक्यो पहुंचे।
2 जुलाई 1943 को नेताजी सिंगापुर पहुंचे। 4 जुलाई 1943 को रास बिहारी बोस ने खुशी-खुशी इंडियन इंडिपेंडेंस लीग और आजाद हिंद फौज का सर्वोच्च नेतृत्व नेताजी को सौंप दिया। 5 जुलाई 1943 को सिंगापुर के पडांग मैदान में नेताजी ने सैनिकों को अमर नारा दिया: “दिल्ली चलो!” (Chalo Delhi!)
13. ‘आरजी हुकूमत-ए-आजाद हिंद’ (21 अक्टूबर 1943) एवं INA ब्रिगेड
21 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर के कैथे हॉल में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने स्वतंत्र भारत की अस्थाई सरकार — ‘आरजी हुकूमत-ए-आजाद हिंद’ (Provisional Government of Free India) की ऐतिहासिक स्थापना की घोषणा की।
🏛️ आजाद हिंद सरकार की रूपरेखा एवं विशेषताएं
- मंत्रिमंडल: नेताजी स्वयं राष्ट्राध्यक्ष, प्रधानमंत्री, युद्ध व विदेश मंत्री बने। कैप्टन लक्ष्मी सहगल (महिला मामले), एस.ए. अय्यर (प्रचार व सूचना) और लेफ्टिनेंट कर्नल ए.सी. चटर्जी (वित्त मंत्री) बने।
- अंतरराष्ट्रीय मान्यता: जापान, जर्मनी, इटली, थाईलैंड, बर्मा, क्रोएशिया, फिलीपींस, मंचूरिया और चीन सहित 9 संप्रभु देशों ने आधिकारिक राजनयिक मान्यता दी।
- युद्ध की घोषणा: 23 अक्टूबर 1943 को सरकार ने ब्रिटेन और अमेरिका के खिलाफ युद्ध की घोषणा की।
- आजाद हिंद बैंक: अप्रैल 1944 में रंगून में अपनी मुद्रा और बॉन्ड जारी करने हेतु बैंक स्थापित किया।
- चार प्रमुख इन्फैंट्री ब्रिगेड: राष्ट्रीय नेताओं के सम्मान में सुभाष ब्रिगेड (कमांडर: शाहनवाज खान), गांधी ब्रिगेड, नेहरू ब्रिगेड एवं आजाद ब्रिगेड बनाई गईं।
- ध्येय वाक्य एवं नारे: आदर्श वाक्य — इत्तेहाद, एतमाद, कुर्बानी (एकता, विश्वास, बलिदान); राष्ट्रीय अभिवादन — “जय हिंद” (कैप्टन आबिद हसन द्वारा रूपायित)।
14. रानी झांसी रेजिमेंट (Rani of Jhansi Regiment)
जुलाई 1943 में नेताजी ने आधुनिक एशिया और विश्व की पहली पूर्णतः लड़ाकू महिला सैन्य वाहिनी ‘रानी झांसी रेजिमेंट’ का गठन किया। मद्रास की विख्यात चिकित्सक डॉ. लक्ष्मी स्वामिनाथन (कैप्टन लक्ष्मी सहगल) को इसका सर्वोच्च कमांडर बनाया गया।
इस रेजिमेंट में दक्षिण-पूर्व एशिया की 1,000 से अधिक भारतीय युवतियों को कठोर सैन्य प्रशिक्षण (राइफल, स्टेनगन, संगीन और ग्रेनेड चलाना) दिया गया। उन्होंने बर्मा के मोर्चे पर अदम्य शौर्य का प्रदर्शन किया। मई 1945 में जब रंगून खाली करना पड़ा, तब नेताजी स्वयं पैदल चलकर अपनी महिला सैनिकों को सुरक्षित बैंकॉक छोड़कर आए।
15. अंडमान-निकोबार, कोहिमा-इम्फाल अभियान एवं लाल किला मुकदमा
- शहीद और स्वराज द्वीप (नवंबर 1943): जापानी प्रधानमंत्री तोजो ने अंडमान-निकोबार का प्रशासन आजाद हिंद सरकार को सौंपा। नेताजी ने अंडमान का नाम ‘शहीद द्वीप’ और निकोबार का नाम ‘स्वराज द्वीप’ रखा। 30 दिसंबर 1943 को पोर्ट ब्लेयर में पहली बार राष्ट्रीय तिरंगा फहराया गया।
- मोइरांग (मणिपुर) में तिरंगा (14 अप्रैल 1944): कर्नल शौकत अली मलिक के नेतृत्व में INA ने भारत की मुख्य भूमि मोइरांग (मणिपुर) पर कब्जा कर तिरंगा फहराया।
- कोहिमा-इम्फाल का भीषण युद्ध (1944): INA और जापानी सेना ने असम की सीमाओं पर ब्रिटिश सेना को घेरा; परंतु असमय मानसूनी बाढ़, रसद की कमी और जापानी वायुसेना की पराजय के कारण पीछे हटना पड़ा।
- गांधीजी को ‘राष्ट्रपिता’ संबोधन (6 जुलाई 1944): रंगून के आजाद हिंद रेडियो से नेताजी ने गांधीजी से आशीर्वाद मांगते हुए उन्हें सर्वप्रथम ‘राष्ट्रपिता’ (Father of the Nation) कहकर संबोधित किया।
- 18 अगस्त 1945 की दुर्घटना: जापानी आत्मसमर्पण के बाद ताइवान के ताइहोकु हवाई अड्डे पर विमान दुर्घटना में नेताजी के देहावसान की जापानी रिपोर्ट आई, जिस पर आज भी जांच आयोगों (शाहनवाज, खोसला, मुखर्जी आयोग) में मतभेद रहे हैं।
- लाल किला मुकदमा (नवंबर 1945): दिल्ली के लाल किले में कर्नल प्रेम सहगल (हिंदू), कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों (सिख) और मेजर जनरल शाहनवाज खान (मुस्लिम) पर संयुक्त राजद्रोह का मुकदमा चला। भूलाभाई देसाई, पंडित नेहरू, सर तेज बहादुर सप्रू और काटजू ने बचाव किया। पूरे देश में नारा गूंजा: “लाल किले को तोड़ दो, आजाद हिंद फौज को छोड़ दो!” सेना में विद्रोह के डर से कमांडर-इन-चीफ ऑचिनलेक ने उनकी सजा माफ कर दी।
- शाही नौसेना विद्रोह (RIN Mutiny – फरवरी 1946): INA के बलिदान से प्रेरित होकर बंबई में ‘एचएमआईएस तलवार’ के भारतीय नौसैनिकों ने विद्रोह कर दिया। 1956 में पूर्व ब्रिटिश पीएम क्लेमेंट एटली ने स्वीकार किया कि 1947 में भारत छोड़ने का सबसे निर्णायक कारण सुभाष बोस की INA द्वारा भारतीय सेना की वफादारी तोड़ना था।
16. परीक्षा हेतु 20 त्वरित स्मरणीय तथ्य (High-Yield Quick Revision Points)
- अगस्त प्रस्ताव की तिथि: 8 अगस्त 1940 (वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो द्वारा घोषित)।
- व्यक्तिगत सत्याग्रह की शुरुआत: 17 अक्टूबर 1940 को पवनार आश्रम (महाराष्ट्र) से।
- प्रथम, द्वितीय व तृतीय सत्याग्रही: क्रमशः आचार्य विनोबा भावे, पंडित जवाहरलाल नेहरू एवं ब्रह्मदत्त।
- क्रिप्स मिशन का आगमन: 23 मार्च 1942 को नई दिल्ली पहुंचा (अध्यक्ष: सर स्टेफोर्ड क्रिप्स)।
- गांधीजी का कथन: क्रिप्स प्रस्ताव को “दिवालिया बैंक का पोस्ट-डेटेड चेक” कहा।
- वर्धा में भारत छोड़ो प्रस्ताव: 14 जुलाई 1942 को कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा स्वीकृत।
- ग्वालिया टैंक ऐतिहासिक अधिवेशन: 8 अगस्त 1942 को बंबई में मौलाना अबुल कलाम आजाद की अध्यक्षता में पारित।
- ‘क्विट इंडिया’ नारे के रचयिता: युसुफ मेहरअली (Yusuf Meherally)।
- ‘करो या मरो’ (Do or Die): 8 अगस्त 1942 को गांधीजी द्वारा दिया गया अमर महामंत्र।
- ऑपरेशन जीरो आवर: 9 अगस्त 1942 की भोर में सभी शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारी का ब्रिटिश कोडनेम।
- गांधीजी का कैद स्थल: आगा खां पैलेस, पूना (कस्तूरबा व महादेव देसाई का यहीं देहावसान हुआ)।
- नेहरू, पटेल व आजाद का कैद स्थल: अहमदनगर किला (नेहरू ने यहीं ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ लिखी)।
- ग्वालिया टैंक पर तिरंगा: 9 अगस्त को अरुणा आसफ अली ने पुलिस घेरे के बीच फहराया।
- गुप्त कांग्रेस रेडियो: उषा मेहता ने बंबई से 42.34 मीटर पर संचालित किया (डॉ. लोहिया मुख्य वक्ता)।
- आजाद दस्ता: जयप्रकाश नारायण ने हजारीबाग जेल से फरार होकर नेपाल के तराई में स्थापित किया।
- सर्वप्रथम समानांतर सरकार: अगस्त 1942 में बलिया (उत्तर प्रदेश) में चित्तू पांडेय (‘बलिया का शेर’) द्वारा।
- दीर्घकालिक समानांतर सरकार: सतारा (महाराष्ट्र) में नाना पाटिल व वाई.बी. चव्हाण की ‘प्रति सरकार’ (1943–1946)।
- तामलुक जातीय सरकार: मिदनापुर (बंगाल) में सतीश सामंत द्वारा; ‘विद्युत वाहिनी’ सेना बनाई; 73 वर्षीय मातंगिनी हाजरा शहीद हुईं।
- आरजी हुकूमत-ए-आजाद हिंद: 21 अक्टूबर 1943 को नेताजी द्वारा सिंगापुर में स्थापित; 9 देशों ने मान्यता दी।
- राष्ट्रपिता का प्रथम संबोधन: 6 जुलाई 1944 को रंगून रेडियो से नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने महात्मा गांधी को दिया।
🎯 भारत छोड़ो आंदोलन (1942) व आजाद हिंद फौज – 10 Online Mock Tests (200 MCQs)
इस पूरे अध्याय के प्रत्येक ऐतिहासिक सूक्ष्म पहलू (अगस्त प्रस्ताव, व्यक्तिगत सत्याग्रह, क्रिप्स मिशन, करो या मरो, ऑपरेशन जीरो आवर, गुप्त रेडियो, आजाद दस्ता, समानांतर सरकारें, आजाद हिंद फौज, आरजी हुकूमत, रानी झांसी रेजिमेंट, मोइरांग, कोहिमा व लाल किला मुकदमा) पर आधारित 200 बहुविकल्पीय प्रश्नों (10 टेस्ट्स) का अभ्यास करें। Mock Test 1 पूर्णतः निःशुल्क है!
17. UPSC एवं State PCS हेतु 10 अभ्यास बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तरी (Model MCQs)
Q1. 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के संदर्भ में ‘क्विट इंडिया’ (Quit India) नारा मूलतः किसके द्वारा गढ़ा गया था?
(A) महात्मा गांधी (B) पंडित जवाहरलाल नेहरू (C) युसुफ मेहरअली (Yusuf Meherally) (D) अरुणा आसफ अली
उत्तर व्याख्या: बंबई के प्रसिद्ध समाजवादी नेता और तत्कालीन मेयर युसुफ मेहरअली ने ‘क्विट इंडिया’ तथा ‘साइमन गो बैक’ दोनों ऐतिहासिक नारे गढ़े थे।
Q2. भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बंबई से 42.34 मीटर पर गुप्त ‘कांग्रेस रेडियो’ का सफल संचालन किसने किया था?
(A) अरुणा आसफ अली (B) उषा मेहता (Usha Mehta) (C) सुचेता कृपलानी (D) सरोजिनी नायडू
उत्तर व्याख्या: 22 वर्षीय छात्रा उषा मेहता और उनके सहयोगियों ने बंबई में गुप्त कांग्रेस रेडियो स्थापित किया जिस पर डॉ. राम मनोहर लोहिया नियमित भाषण देते थे।
Q3. 1942 के आंदोलन के दौरान महाराष्ट्र के सतारा में स्थापित ‘प्रति सरकार’ के मुख्य नेता कौन थे?
(A) चित्तू पांडेय (B) क्रांतिसिंह नाना पाटिल एवं वाई.बी. चव्हाण (C) सतीश सामंत (D) अच्युत पटवर्धन
उत्तर व्याख्या: सतारा में नाना पाटिल और यशवंतराव चव्हाण के नेतृत्व में सर्वाधिक दीर्घकालिक (1943 से 1946) समानांतर ‘प्रति सरकार’ चली जिसने ‘तूफान सेना’ और ‘न्यायदान मंडल’ बनाए।
Q4. 21 अक्टूबर 1943 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने ‘आरजी हुकूमत-ए-आजाद हिंद’ की स्थापना किस स्थान पर की थी?
(A) टोक्यो (जापान) (B) रंगून (बर्मा) (C) सिंगापुर (Singapore) (D) बर्लिन (जर्मनी)
उत्तर व्याख्या: नेताजी ने सिंगापुर के कैथे सिनेमा हॉल में स्वतंत्र भारत की अस्थाई सरकार की घोषणा की जिसे जापान, जर्मनी सहित 9 संप्रभु देशों ने राजनयिक मान्यता दी थी।
Q5. नवंबर 1945 के ऐतिहासिक ‘लाल किला मुकदमा’ (Red Fort Trials) में आजाद हिंद फौज के अधिकारियों की पैरवी करने वाले मुख्य अधिवक्ता कौन थे?
(A) डॉ. बी.आर. अंबेडकर (B) भूलाभाई देसाई (Bhulabhai Desai) (C) मोहम्मद अली जिन्ना (D) सी. राजगोपालाचारी
उत्तर व्याख्या: भूलाभाई देसाई कांग्रेस रक्षा समिति के प्रमुख वकील थे; उनके साथ पंडित जवाहरलाल नेहरू, सर तेज बहादुर सप्रू और डॉ. कैलाश नाथ काटजू ने भी अदालत में पैरवी की थी।
18. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ – Frequently Asked Questions)
Q1. ‘करो या मरो’ (Do or Die) का नारा गांधीजी ने कब और किस संदर्भ में दिया था?
यह नारा 8 अगस्त 1942 को बंबई के ग्वालिया टैंक मैदान पर अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी द्वारा ‘भारत छोड़ो प्रस्ताव’ पारित होने के बाद महात्मा गांधी ने अपने 70 मिनट के ऐतिहासिक उद्बोधन में देशवासियों को दिया था। इसका अर्थ था कि हम या तो भारत को स्वतंत्र कराएंगे या इस प्रयास में अपने प्राण न्योछावर कर देंगे।
Q2. ‘ऑपरेशन जीरो आवर’ क्या था और इसके तहत नेताओं को कहाँ कैद किया गया?
ब्रिटिश हुकूमत द्वारा 9 अगस्त 1942 की भोर में सूर्योदय पूर्व कांग्रेस के सभी शीर्ष नेताओं को एक साथ गिरफ्तार करने के गुप्त अभियान का कोडनेम ‘ऑपरेशन जीरो आवर’ था। इसके तहत महात्मा गांधी को पूना के आगा खां पैलेस में, कांग्रेस कार्यसमिति (नेहरू, पटेल, आजाद आदि) को अहमदनगर किले में और डॉ. राजेंद्र प्रसाद को पटना की बांकीपुर जेल में नजरबंद किया गया।
Q3. 1942 में स्थापित प्रमुख समानांतर सरकारें कौन-सी थीं?
तीन प्रमुख समानांतर सरकारें स्थापित हुईं: (1) बलिया (उत्तर प्रदेश): चित्तू पांडेय के नेतृत्व में सर्वप्रथम सरकार; (2) तामलुक (बंगाल): सतीश सामंत के नेतृत्व में ‘जातीय सरकार’ जिसने ‘विद्युत वाहिनी’ बनाई; और (3) सतारा (महाराष्ट्र): नाना पाटिल व वाई.बी. चव्हाण के नेतृत्व में ‘प्रति सरकार’, जो 1943 से 1946 तक सबसे लंबे समय तक चली।
Q4. नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने गांधीजी को ‘राष्ट्रपिता’ कब और कहाँ संबोधित किया था?
नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने 6 जुलाई 1944 को बर्मा की राजधानी रंगून स्थित ‘आजाद हिंद रेडियो’ से देशवासियों को संबोधित करते हुए महात्मा गांधी को सर्वप्रथम ‘राष्ट्रपिता’ (Father of the Nation) कहकर संबोधित किया था और स्वाधीनता के इस अंतिम युद्ध में उनका आशीर्वाद मांगा था।



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