Govt Exam Hindi Notes

यूरोपीय कंपनियों का आगमन, पुर्तगाली, डच, अंग्रेज, फ्रांसीसी कर्नाटक युद्ध, प्लासी, बक्सर, आंग्ल-मैसूर व सिख युद्ध

भारत में यूरोपीय कंपनियों का आगमन एवं ब्रिटिश साम्राज्यवादी विस्तार (1498–1857): पुर्तगाली, डच, अंग्रेज, फ्रांसीसी (कर्नाटक युद्ध), बंगाल विजय (प्लासी व बक्सर), आंग्ल-मैसूर, आंग्ल-मराठा व आंग्ल-सिख युद्ध – संपूर्ण विश्लेषणात्मक अध्ययन व नोट्स

🔥 आधुनिक भारत का इतिहास • मास्टर अध्ययन श्रृंखला (अध्याय 16)

भारत में यूरोपीय कंपनियों का आगमन एवं ब्रिटिश साम्राज्यवादी विस्तार (1498–1857)

1498 में वास्कोडिगामा द्वारा कालीकट के तट पर कदम रखने से लेकर 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम तक का कालखंड केवल व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता का इतिहास नहीं था, बल्कि यह भारतीय उपमहाद्वीप पर सदियों से स्थापित राजनीतिक व्यवस्था के विघटन और एक विदेशी व्यापारिक निगम (ईस्ट इंडिया कंपनी) द्वारा संपूर्ण भारत को एक विशाल औपनिवेशिक साम्राज्य में रूपांतरित करने की महा-गाथा है। पुर्तगालियों का समुद्री एकाधिकार (ब्लू वाटर पॉलिसी व कार्टाज व्यवस्था), डचों का वस्त्र व्यापार एवं 1759 का बेदरा युद्ध, ब्रिटिश कंपनी के प्रारंभिक फरमान (1632 सुनहरा फरमान, 1717 का मैग्ना कार्टा), तीन कर्नाटक युद्ध (1746–1763) एवं 1760 वांडीवाश में फ्रांसीसियों का सफाया, 23 जून 1757 का प्लासी युद्ध व 22 अक्टूबर 1764 का बक्सर युद्ध, 1765 की इलाहाबाद संधि व क्लाइव का द्वैध शासन, चार आंग्ल-मैसूर युद्ध (हैदर अली व टीपू सुल्तान), तीन आंग्ल-मराठा युद्ध (सालबाई, बसीन व पेशवाई का अंत 1818), आंग्ल-सिख युद्ध (1809 अमृतसर संधि से 1849 पंजाब विलय व कोहिनूर हीरा), तथा सिंध विलय (1843), सुगौली संधि (1816) व बर्मा युद्ध—यह संपूर्ण अध्ययन UPSC Civil Services, UPPSC, BPSC, MPPSC, HPSC व State PCS मुख्य व प्रारंभिक परीक्षा हेतु सबसे प्रामाणिक, शोधपरक व समग्र संकलन प्रस्तुत करता है।


Table of Contents

📚 आधुनिक भारत का इतिहास: श्रृंखला अनुक्रमणिका व संपूर्ण नेविगेशन हब

➡️ अगला मास्टर अध्याय (अध्याय 17): भारत में क्रांतिकारी आंदोलन का प्रथम चरण (1897–1918) एवं विदेशों में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद: चापेकर बंधु, अभिनव भारत, अनुशीलन समिति, अलीपुर व दिल्ली षड्यंत्र, गदर पार्टी, कामागाटामारू व काबुल सरकार
📖 अध्याय 15: ब्रिटिश क्राउन एवं देशी रियासतें (Princely States) तथा 1947–1950 एकीकरण: नीतियां, बटलर समिति, प्रजामंडल आंदोलन व 565+ रियासतों का ऐतिहासिक विलय
📖 अध्याय 14: ब्रिटिश प्रशासनिक, न्यायिक, पुलिस एवं सिविल सेवाओं का विकास तथा संवैधानिक सुधार (1773–1947)
📖 अध्याय 13: आधुनिक भारत में शिक्षा एवं प्रेस का विकास (1781–1947): मैकाले मिनट, वुड्स डिस्पैच, वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट
📖 अध्याय 12: ब्रिटिश शासन की आर्थिक नीतियां: स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी, महालवाड़ी व धन की निकासी (Drain of Wealth)
📖 अध्याय 11: वेवेल योजना, कैबिनेट मिशन, माउंटबेटन योजना एवं 1947 स्वतंत्रता अधिनियम

1. यूरोपीय कंपनियों के आगमन की पृष्ठभूमि: भौगोलिक खोजें एवं व्यापारिक होड़

प्राचीन एवं मध्यकाल से ही भारत और यूरोप के मध्य व्यापार तीन प्रमुख मार्गों से होता था: (1) फारस की खाड़ी होकर इराक और सीरिया का थल मार्ग, (2) लाल सागर होकर अलेक्जेंड्रिया (मिस्र) का मार्ग, और (3) मध्य एशिया से कैस्पियन सागर और काला सागर का थल मार्ग। इस व्यापार पर अरब व्यापारियों और भूमध्य सागर में इटली के वेनिस व जेनोआ के व्यापारियों का एकाधिकार था।

1453 में जब ऑटोमन तुर्कों ने कुस्तुनतुनिया (Constantinople / इस्तांबुल) पर विजय प्राप्त कर ली, तो यूरोप और एशिया के पारंपरिक थल मार्ग बंद हो गए। इसके साथ ही यूरोप में 15वीं सदी के पुनर्जागरण (Renaissance), दिशासूचक यंत्र (Compass) के आविष्कार और नए समुद्री जहाजों (Caravels) के निर्माण ने अटलांटिक महासागर के तटीय देशों—पुर्तगाल और स्पेन—को पूर्व के लिए नए समुद्री मार्गों की खोज हेतु प्रेरित किया।

यूरोपीय कंपनीस्थापना वर्षकंपनी का मूल नामभारत में प्रथम फैक्ट्रीमुख्य व्यापारिक वस्तु
1. पुर्तगाली1498एस्तादो दा इंडिया (Estado da India)कोचीन (1503)काली मिर्च, मसाले, घोड़े
2. ब्रिटिश (अंग्रेज)1600गवर्नर एंड कंपनी ऑफ मर्चेंट्स ऑफ लंदन…सूरत (1613) [अस्थायी: मसूलीपट्टनम 1611]सूती वस्त्र, नील, शोरा, रेशम, चाय
3. डच (हॉलैंड)1602वेरिग्दे ऊस्त-इंडिशे कॉम्पेनी (VOC)मसूलीपट्टनम (1605)सूती वस्त्र (वस्त्र निर्यात का केंद्र बनाया), मसाले
4. डेनिश (डेनमार्क)1616डैंस्क ओस्टिंडिस्क कॉम्पैग्नीट्रैंकोबार (1620)चाय, चीनी मिट्टी, सूती वस्त्र
5. फ्रांसीसी1664कंपनी देस इंडेस ओरिएंटल्ससूरत (1668)सूती वस्त्र, रेशम, शोरा

1.1 पुर्तगाली साम्राज्य: अल्मीडा, अल्बुकर्क एवं कार्टाज व्यवस्था

  • वास्कोडिगामा: 17 मई 1498 को गुजराती पथ-प्रदर्शक अब्दुल मजीद की मदद से कालीकट पहुंचा, जहां स्थानीय हिंदू शासक जमोरिन ने स्वागत किया। काली मिर्च बेचकर उसने यात्रा खर्च निकालकर 60 गुना शुद्ध मुनाफा कमाया। 1502 में वह दूसरी बार भारत आया और 1503 में कोचीन में प्रथम पुर्तगाली दुर्ग स्थापित हुआ।
  • फ्रांसिस्को डी अल्मीडा (1505–1509): प्रथम पुर्तगाली वायसराय। उसने ‘शांत जल की नीति’ (Blue Water Policy) अपनाई, जिसका उद्देश्य स्थल पर राज्य विस्तार के बजाय हिंद महासागर में नौसैनिक सर्वोच्चता स्थापित करना था। 1509 में दीव के युद्ध में उसने मिस्र, तुर्की व गुजरात के संयुक्त मुस्लिम बेड़े को नष्ट किया।
  • अल्फोंसो डी अल्बुकर्क (1509–1515): भारत में पुर्तगाली शक्ति का वास्तविक संस्थापक। उसने फरवरी 1510 में बीजापुर के शासक यूसुफ आदिल शाह से गोवा छीना। उसने मलक्का (1511) और होर्मुज (1515) पर अधिकार किया। उसने सती प्रथा पर प्रतिबंध लगाया और पुर्तगाली सैनिकों को भारतीय महिलाओं से विवाह हेतु प्रेरित किया।
  • नीनो डी कुन्हा (1529–1538): 1530 में पुर्तगाली राजधानी को कोचीन से गोवा स्थानांतरित किया। 1534 में बेसिन और 1535 में दीव पर अधिकार किया।
  • कार्टाज-आर्मेडा-काफिला व्यवस्था (Cartaz System): पुर्तगालियों ने स्वयं को ‘सागर का स्वामी’ घोषित किया। हिंद महासागर में किसी भी जहाज (मुगल सम्राट अकबर के जहाजों सहित) को बिना पुर्तगाली ‘कार्टाज’ (शुल्क-युक्त पास) के व्यापार करने की अनुमति नहीं थी; अन्यथा जहाज लूट लिए जाते थे।
  • पुर्तगालियों की भारत को देन: 1556 में गोवा में भारत का प्रथम प्रिंटिंग प्रेस, तंबाकू की खेती (अकबर के काल में), आलू, टमाटर, मक्का, पपीता, अनानास, काजू, लाल मिर्च तथा कैथोलिक चर्चों की गोथिक स्थापत्य कला।
  • पुर्तगालियों का पतन: 1612 में स्वाली के युद्ध में कैप्टन थॉमस बेस्ट द्वारा पराजय, 1632 में शाहजहां के आदेश पर कासिम खान द्वारा हुगली से निष्कासन, ब्राजील की खोज से ध्यान भटकना, धार्मिक असहिष्णुता (जबरन ईसाईकरण व इनक्विजिशन), तथा डचों व अंग्रेजों की नौसैनिक श्रेष्ठता।

1.2 डच साम्राज्य एवं 1759 का बेदरा युद्ध

  • कंपनी गठन: 1602 में हॉलैंड की संसद ने 21 वर्षों के चार्टर के साथ Vereenigde Oostindische Compagnie (VOC) की स्थापना की।
  • फैक्ट्रियां एवं सिक्के: 1605 में मसूलीपट्टनम में प्रथम फैक्ट्री, 1610 में पुलीकट (मुख्यालय, फोर्ट गेल्ड्रिया) में ‘पैगोडा’ (स्वर्ण सिक्के) ढाले। 1653 में बंगाल के चिनसुरा में फोर्ट गुस्तावस बनाया।
  • वस्त्र निर्यात का केंद्र: डचों का ऐतिहासिक योगदान यह था कि उन्होंने मसालों के स्थान पर भारतीय सूती वस्त्रों को वैश्विक निर्यात की प्रमुख वस्तु बनाया।
  • 1741 का कोलाचेल का युद्ध (Battle of Colachel): त्रावणकोर के महाराजा मार्तंड वर्मा ने डच नौसेना को करारी शिकस्त दी। यह एशियाई इतिहास में किसी देशी राजा द्वारा यूरोपीय औपनिवेशिक सेना की दुर्लभ निर्णायक पराजय थी।
  • 1759 का बेदरा का युद्ध (Battle of Bedara): रॉबर्ट क्लाइव के निर्देश पर कर्नल फोर्ड ने हुगली के पास बेदरा में डचों को पूरी तरह पराजित किया। इसके साथ ही भारत में डच राजनीतिक व सैन्य शक्ति हमेशा के लिए समाप्त हो गई।

2. ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रारंभिक विस्तार (1599–1717)

  • स्थापना व शाही चार्टर: 1599 में ‘मर्चेंट एडवेंचर्स’ समूह ने कंपनी बनाई। 31 दिसंबर 1600 को महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने 15 वर्षों के लिए पूर्वी व्यापार का शाही एकाधिकार चार्टर दिया। 1609 में जेम्स प्रथम ने इसे अनिश्चित काल हेतु बढ़ाया।
  • कैप्टन विलियम हॉकिंस (1608–1611): ‘हेक्टर’ जहाज से सूरत पहुंचा। अप्रैल 1609 में आगरा में जहांगीर के दरबार में उपस्थित हुआ। हॉकिंस तुर्की और फारसी में निपुण था; जहांगीर ने उसे ‘इंग्लिश खान’ की उपाधि और 400 का मनसब दिया। पुर्तगाली विरोध के कारण प्रारंभ में सूरत में अनुमति रद्द हुई।
  • प्रथम फैक्ट्रियां: 1611 में दक्षिण के मसूलीपट्टनम में प्रथम कोठी, तथा 1612 में स्वाली के युद्ध में पुर्तगालियों को हराने के बाद 1613 में सूरत में प्रथम स्थायी फैक्ट्री खुली।
  • सर थॉमस रो (1615–1619): जेम्स प्रथम का आधिकारिक राजदूत बनकर जनवरी 1616 में अजमेर में जहांगीर से मिला और मुगल साम्राज्य में मुक्त व्यापार के फरमान हासिल किए।
  • 1632 का सुनहरा फरमान (Golden Farman): गोलकुंडा के सुल्तान ने 500 पैगोडा वार्षिक कर के बदले गोलकुंडा के सभी बंदरगाहों से अंग्रेजों को पूर्णतः कर-मुक्त व्यापार की अनुमति दी।
  • मद्रास की स्थापना (1639): फ्रांसिस डे ने चंद्रगिरि के राजा से मद्रास पट्टे पर लिया और वहां ‘फोर्ट सेंट जॉर्ज’ (Fort St. George) दुर्ग बनाया, जो आगे चलकर मद्रास प्रेसीडेंसी का केंद्र बना।
  • बंबई का अधिग्रहण (1661–1668): 1661 में ब्रिटिश सम्राट चार्ल्स द्वितीय का विवाह पुर्तगाली राजकुमारी कैथरीन ऑफ ब्रैगेंजा से हुआ और बंबई दहेज में मिला। 1668 में चार्ल्स द्वितीय ने मात्र 10 पाउंड वार्षिक किराए पर बंबई कंपनी को सौंप दिया। जेराल्ड ऑन्गियर (1669–1677) बंबई का वास्तविक संस्थापक बना, जिसने टकसाल, गोदी व न्यायालय स्थापित किए। 1687 में पश्चिमी मुख्यालय सूरत से बंबई स्थानांतरित हुआ।
  • कलकत्ता की स्थापना (1690): 24 अगस्त 1690 को जॉब चार्नॉक ने सुतानाती में फैक्ट्री बसाई। 1698 में सूबेदार अजीमुश्शान ने ₹1,200 में सुतानाती, कलिकाता और गोविंदपुर की जमींदारी अंग्रेजों को दी। 1700 में ‘फोर्ट विलियम’ बना और सर चार्ल्स आयर इसके प्रथम प्रेसीडेंट नियुक्त हुए।
  • 1717 का फर्रुखसियर का शाही फरमान (कंपनी का मैग्ना कार्टा): 1715 में जॉन सुरमन मिशन में शामिल सर्जन डॉ. विलियम हैमिल्टन ने फर्रुखसियर के असाध्य रोग का सफल इलाज किया। कृतज्ञ होकर सम्राट ने 1717 में फरमान जारी किया:
    • मात्र ₹3,000 वार्षिक भुगतान पर बंगाल में कंपनी के माल पर समस्त चुंगी करों से मुक्ति व ‘दस्तक’ (Dastak) जारी करने का अधिकार।
    • बंबई टकसाल में ढाले गए सिक्कों को संपूर्ण मुगल साम्राज्य में वैध मुद्रा की मान्यता।
    • सूरत में ₹10,000 वार्षिक पर सभी करों से छूट। कलकत्ता के पास 38 गांवों को खरीदने की अनुमति।
    • इतिहासकार सी.आर. ओर्म ने इसे “कंपनी का मैग्ना कार्टा” (Magna Carta of the Company) कहा।

3. आंग्ल-फ्रांसीसी संघर्ष: तीन कर्नाटक युद्ध (1746–1763) एवं वांडीवाश

1664 में लुई 14वें के वित्त मंत्री कोलबर्ट द्वारा स्थापित फ्रांसीसी कंपनी ने 1668 में सूरत और 1673 में फ्रैंकोइस मार्टिन द्वारा पांडिचेरी (फोर्ट लुई) तथा 1690–92 में बंगाल में चंद्रनगर की स्थापना की। 18वीं सदी के मध्य में जब मुगल साम्राज्य का पतन हुआ, तो दक्षिण भारत (कोरोमंडल तट/कर्नाटक) में वर्चस्व हेतु अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच तीन ऐतिहासिक युद्ध लड़े गए जिन्हें ‘कर्नाटक युद्ध’ (Carnatic Wars) कहा जाता है:

युद्धअवधिमूल कारणप्रमुख घटनाएं व युद्धसमाप्ति की संधि व परिणाम
प्रथम कर्नाटक युद्ध1746–1748ऑस्ट्रिया का उत्तराधिकार युद्ध (यूरोप)डुप्ले द्वारा मद्रास विजय; 1746 सेंट थोमे का युद्ध (अड्यार): कैप्टन पैराडाइज (930 फ्रांसीसी सैनिक) द्वारा अनवरुद्दीन की 10,000 की सेना की पराजय।1748 एक्स-ला-शैपेल की संधि: मद्रास अंग्रेजों को वापस मिला। यूरोपीय सेना की सामरिक श्रेष्ठता सिद्ध हुई।
द्वितीय कर्नाटक युद्ध1749–1754हैदराबाद व कर्नाटक में उत्तराधिकार संघर्ष1749 अंबर का युद्ध: अनवरुद्दीन मारा गया; 1751 रॉबर्ट क्लाइव द्वारा अर्काट का 53 दिवसीय घेरा: युद्ध का पासा पलटा; जनरल बुस्सी द्वारा हैदराबाद में नियंत्रण (उत्तरी सरकार प्राप्ति)।1754 डुप्ले की वापसी (गोडेहू आया); 1755 पांडिचेरी की संधि: दोनों पक्षों द्वारा देशी झगड़ों से दूर रहने का वचन। फ्रांसीसी प्रभाव को गहरा आघात।
तृतीय कर्नाटक युद्ध1758–1763यूरोप का सप्तवर्षीय युद्ध (1756–1763)काउंट डी लाली का भारत आगमन; क्लाइव द्वारा 1757 में चंद्रनगर विजय; 22 जनवरी 1760 वांडीवाश का युद्ध: सर आयर कूट द्वारा लाली की निर्णायक पराजय; 1761 में पांडिचेरी का पतन।1763 पेरिस की संधि: पांडिचेरी व चंद्रनगर फ्रांसीसियों को लौटाए गए, किंतु किलेबंदी व सेना रखने पर पूर्ण प्रतिबंध। भारत में फ्रांसीसी साम्राज्य का अंत।
💡 फ्रांसीसी पराजय और ब्रिटिश विजय के निर्णायक कारक:
(1) बंगाल की असीमित संपदा: 1757 में प्लासी विजय के बाद बंगाल के विशाल वित्तीय संसाधनों ने दक्षिण में अंग्रेजी सेना को कभी धन की कमी नहीं होने दी (अल्फ्रेड लायल: “डुप्ले ने मद्रास में जो कुछ बनाया, क्लाइव ने बंगाल की दौलत से उसे खरीद लिया”)।
(2) नौसैनिक श्रेष्ठता: ब्रिटिश रॉयल नेवी ने हिंद महासागर में फ्रांसीसी रसद और सहायता को काट दिया।
(3) कंपनी का स्वरूप: ब्रिटिश कंपनी एक निजी, गतिशील व स्वतंत्र निगम थी, जबकि फ्रांसीसी कंपनी वर्साय के भ्रष्ट दरबार और अक्षम नौकरशाही पर आश्रित सरकारी विभाग थी।

4. बंगाल विजय का प्रथम चरण: सिराजुद्दौला एवं 23 जून 1757 का प्लासी युद्ध

4.1 तनाव की पृष्ठभूमि एवं ब्लैक होल त्रासदी

अप्रैल 1756 में अलीवर्दी खान की मृत्यु के बाद 23-वर्षीय सिराजुद्दौला बंगाल का नवाब बना। अंग्रेजों ने नवाब की अनुमति के बिना फोर्ट विलियम की किलेबंदी शुरू कर दी और नवाब के खजाने के भगोड़े कृष्णदास (राजवल्लभ के पुत्र) को शरण दी। क्रोधित नवाब ने 20 जून 1756 को कलकत्ता पर अधिकार कर लिया और उसका नाम ‘अलीनगर’ रखकर मानिकचंद को प्रभारी बनाया।

ब्लैक होल त्रासदी (20 जून 1756): अंग्रेज अधिकारी जे.जे. हॉलवेल के अनुसार, 146 अंग्रेज बंदियों को 18×14 फीट की कोठरी में बंद किया गया, जिसमें अगली सुबह 123 व्यक्ति दम घुटने से मर गए। आधुनिक इतिहासकार इसे अंग्रेजों द्वारा सैन्य आक्रमण को नैतिक औचित्य देने हेतु किया गया अतिरंजित प्रचार मानते हैं।

4.2 षड्यंत्र, अलीनगर संधि एवं प्लासी का विश्वासघात

मद्रास से रॉबर्ट क्लाइव और एडमिरल वाटसन सेना लेकर पहुंचे और मानिकचंद को घूस देकर कलकत्ता वापस जीत लिया। 9 फरवरी 1757 को विवश सिराजुद्दौला ने ‘अलीनगर की संधि’ की। इसके बाद क्लाइव ने नवाब के असंतुष्ट दरबारियों के साथ गुप्त षड्यंत्र रचा:

  • मीर जाफर: नवाब का मीर बख्शी (सेनापति), जिसे नवाब बनाने का लालच दिया गया।
  • जगत सेठ महताब राय: बंगाल का सबसे धनी बैंकर व साहूकार।
  • राय दुर्लभ: नवाब का कोषाध्यक्ष। मानिकचंद: कलकत्ता का पूर्व प्रभारी।
  • अमीचंद: दलाल व्यापारी, जिसे शांत रखने हेतु क्लाइव ने वाटसन के जाली हस्ताक्षर वाला लाल कागज (Red Treaty) तैयार किया।

23 जून 1757: प्लासी का युद्ध (Battle of Plassey): नदिया जिले में भागीरथी नदी के तट पर युद्ध हुआ। नवाब के 50,000 सैनिकों के सामने क्लाइव के पास मात्र 3,200 सैनिक थे। किंतु मीर जाफर और राय दुर्लभ की 45,000 सेना मूकदर्शक खड़ी रही। नवाब के निष्ठावान सेनापति मीर मदान और मोहन लाल ने अद्भुत वीरता दिखाई, किंतु मीर मदान के तोप के गोले से वीरगति पाने के बाद मीर जाफर ने नवाब को युद्ध रोकने की कपटपूर्ण सलाह दी। पीछे हटती सेना पर क्लाइव ने हमला किया। सिराजुद्दौला भागकर राजमहल पहुंचा, जहां मीर जाफर के पुत्र मीरन के आदेश पर मुहम्मद बेग ने 2 जुलाई 1757 को उसकी हत्या कर दी।

परिणाम एवं ऐतिहासिक महत्व: मीर जाफर नया नवाब बना (‘क्लाइव का गधा’)। कंपनी को 24 परगना की जमींदारी और ₹1.77 करोड़ से अधिक हर्जाना मिला। क्लाइव को ₹2.34 लाख निजी भेंट मिली। प्रसिद्ध इतिहासकार के.एम. पणिक्कर ने लिखा: “प्लासी एक ऐसा सौदा था जिसमें बंगाल के धनी सेठों और मीर जाफर ने नवाब को अंग्रेजों के हाथों बेच दिया।” सर जदुनाथ सरकार के अनुसार: “23 जून 1757 को भारत के मध्यकालीन युग का अंत हुआ और आधुनिक युग का प्रारंभ हुआ।”

5. बंगाल विजय का द्वितीय चरण: 1764 का बक्सर युद्ध एवं द्वैध शासन (1765–1772)

5.1 मीर कासिम के सुधार एवं टकराव

1760 में अंग्रेजों ने मीर जाफर को हटाकर उसके दामाद मीर कासिम को नवाब बनाया (‘1760 की क्रांति’)। मीर कासिम ने कंपनी को बर्दवान, मिदनापुर और चटगांव जिले दिए। किंतु मीर कासिम एक स्वतंत्र चेता और योग्य प्रशासक था:

  • उसने कलकत्ता के षड्यंत्रों से बचने हेतु राजधानी मुर्शिदाबाद से हटाकर मुंगेर (बिहार) स्थानांतरित की।
  • मुंगेर में तोपों और तोड़ेदार बंदूकों का विशाल शस्त्रागार बनाया और आर्मेनियाई सेनापति गुर्गिन खान के अधीन सेना का यूरोपीय तर्ज पर पुनर्गठन किया।
  • जब अंग्रेज अधिकारियों ने दस्तक का दुरुपयोग बंद नहीं किया, तो मीर कासिम ने मार्च 1763 में समस्त आंतरिक व्यापारिक चुंगी और कर सभी भारतीय व्यापारियों के लिए भी समाप्त कर दिए। अंग्रेज इस समानता को बर्दाश्त नहीं कर सके और उन्होंने युद्ध छेड़ दिया।
  • 1763 में कटवा, गिरिया, सोथी व उधौनाला के युद्धों में पराजित होकर मीर कासिम अवध भागा। (पटना हत्याकांड में उसके जर्मन सेनापति समरू ने 148 अंग्रेजों को मार डाला था)।

5.2 22 अक्टूबर 1764: बक्सर का युद्ध (Battle of Buxar)

मीर कासिम ने अवध के नवाब शुजाउद्दौला और भगोड़े मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय के साथ मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध एक त्रिगुट (Tripartite Alliance) बनाया। 22 अक्टूबर 1764 को बिहार के बक्सर में गंगा किनारे दोनों सेनाएं भिड़ीं। अंग्रेजी सेना का नेतृत्व मेजर हेक्टर मुनरो (Major Hector Munro) ने किया (7,072 सैनिक)। हेक्टर मुनरो के तोपखाने और बंदूकधारियों ने त्रिगुट की 40,000 की सेना को कुछ ही घंटों में पराजित कर दिया।

बक्सर का महत्व: बक्सर की विजय प्लासी से कहीं अधिक निर्णायक थी। प्लासी में केवल विश्वासघात था, जबकि बक्सर में अंग्रेजों ने उत्तर भारत के तीन सबसे बड़े शासकों की संयुक्त सेना को खुले मैदान में अपने सैन्य बाहुबल से पराजित किया। इसने सिद्ध किया कि कंपनी भारत की सर्वश्रेष्ठ सैन्य शक्ति है।

5.3 1765 की इलाहाबाद की संधियां एवं द्वैध शासन (1765–1772)

रॉबर्ट क्लाइव मई 1765 में दोबारा गवर्नर बनकर आया और उसने दो ऐतिहासिक संधियां कीं:

📜 1. प्रथम इलाहाबाद संधि (12 अगस्त 1765 – शाह आलम द्वितीय के साथ):

मुगल सम्राट ने एक शाही फरमान द्वारा कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की ‘दीवानी’ (राजस्व वसूली का अधिकार) स्थायी रूप से सौंप दी। इसके बदले कंपनी ने सम्राट को ₹26 लाख वार्षिक पेंशन देना स्वीकार किया। अवध से छीने गए कड़ा और इलाहाबाद के जिले सम्राट को दिए गए।

📜 2. द्वितीय इलाहाबाद संधि (16 अगस्त 1765 – शुजाउद्दौला के साथ):

नवाब से ₹50 लाख युद्ध हर्जाना लिया गया, चुनार दुर्ग अंग्रेजों को मिला, और अवध में कर-मुक्त व्यापार मिला। क्लाइव ने अवध का विलय नहीं किया बल्कि उसे मराठों के विरुद्ध ‘बफर स्टेट’ (Buffer State) बनाए रखा।

क्लाइव का द्वैध शासन (Dual Government, 1765–1772): बंगाल में सत्ता का विभाजन हुआ—दीवानी (राजस्व व दीवानी न्याय) कंपनी के पास, और निजामत (पुलिस, कानून-व्यवस्था व प्रशासन) नवाब के पास। कंपनी के पास संपूर्ण अधिकार व धन था किंतु कोई उत्तरदायित्व नहीं; नवाब के पास जिम्मेदारी थी किंतु साधन नहीं। कंपनी ने राजस्व वसूली हेतु मुहम्मद रजा खान (बंगाल) और राजा शिताब राय (बिहार) को नायब दीवान नियुक्त किया।

विनाशकारी परिणाम: द्वैध शासन ने कृषि और उद्योग को तबाह कर दिया। 1770 के भीषण बंगाल अकाल में लगभग एक-तिहाई जनता (1 करोड़ लोग) भूख से मर गई। इतिहासकार पर्सीवल स्पीयर ने इसे “खुली और बेशर्म लूट का काल” कहा। 1772 में वारेन हेस्टिंग्स ने द्वैध शासन समाप्त कर कंपनी द्वारा प्रत्यक्ष शासन प्रारंभ किया।

6. मैसूर के विरुद्ध ब्रिटिश संघर्ष: चार आंग्ल-मैसूर युद्ध (1767–1799)

18वीं सदी में दक्षिण भारत में मैसूर का उत्थान हुआ। हैदर अली (1761–1782) और उनके वीर पुत्र टीपू सुल्तान (1782–1799) ने फ्रांसीसी सहायता से आधुनिक तोपखाना, मजबूत अर्थव्यवस्था और अनुशासित सेना खड़ी कर अंग्रेजों के साम्राज्यवादी मंसूबों को सबसे कड़ी टक्कर दी:

युद्धअवधिगवर्नर / जनरलमुख्य घटनाएं व युद्धसंधि व ऐतिहासिक परिणाम
प्रथम युद्ध1767–1769लॉर्ड वेरेल्स्ट / कर्नल स्मिथहैदर अली ने मराठों व निजाम को अपनी ओर मिलाया; मद्रास की दीवारों तक धावा बोला।1769 मद्रास की संधि: हैदर अली की शर्तों पर रक्षात्मक संधि। अंग्रेजों की भारी कूटनीतिक पराजय।
द्वितीय युद्ध1780–1784वारेन हेस्टिंग्स / सर आयर कूट1780 पोलीलोर में कर्नल बेली पराजित; 1781 पोर्टो नोवो में आयर कूट द्वारा हैदर पराजित; 7 दिसंबर 1782 को हैदर अली की मृत्यु; टीपू ने युद्ध संभाला।1784 मंगलोर की संधि: टीपू व मैकार्टनी के बीच एक-दूसरे के जीते क्षेत्र वापस। हेस्टिंग्स नाराज हुआ।
तृतीय युद्ध1790–1792लॉर्ड कॉर्नवालिसटीपू द्वारा त्रावणकोर पर हमला; कॉर्नवालिस ने मराठा व निजाम से त्रिगुट बनाया; श्रीरंगपट्टनम का घेरा।1792 श्रीरंगपट्टनम की संधि: टीपू का आधा राज्य छिना; ₹3.30 करोड़ हर्जाना; दो बेटे बंधक रखे गए। (कॉर्नवालिस: “शत्रु पंगु बन गया”)।
चतुर्थ युद्ध1799लॉर्ड वेलेजली / जनरल हैरिसटीपू ने सहायक संधि अस्वीकार की; नेपोलियन से पत्र-व्यवहार का आरोप; 4 मई 1799 को श्रीरंगपट्टनम दुर्ग की रक्षा करते हुए टीपू की वीरगति।वेलेजली: “पूरब का साम्राज्य हमारे कदमों में है”। वाडियार बालक कृष्णराज तृतीय गद्दी पर; सहायक संधि थोपी गई।

7. मराठा परिसंघ का विखंडन एवं पतन: तीन आंग्ल-मराठा युद्ध (1775–1818)

18वीं सदी के उत्तरार्ध में मराठा परिसंघ भारत की सबसे प्रबल अखिल भारतीय शक्ति थी, जिसमें पांच प्रमुख शक्तियां शामिल थीं: (1) पेशवा (पुणे), (2) गायकवाड़ (बड़ौदा), (3) सिंधिया (ग्वालियर), (4) होल्कर (इंदौर), और (5) भोंसले (नागपुर)। किंतु पानीपत के तृतीय युद्ध (1761) के झटके और आंतरिक उत्तराधिकार की फूट ने अंग्रेजों को हस्तक्षेप का खुला अवसर दिया:

7.1 प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775–1782) एवं सालबाई की संधि

  • 1773 में नारायणराव की हत्या के बाद रघुनाथराव (राघोबा) ने पेशवा बनने हेतु बंबई सरकार से 1775 में सूरत की संधि की। कलकत्ता परिषद ने इसे रद्द कर 1776 में पुरंदर की संधि की।
  • 1779 में महादजी सिंधिया ने वडगांव के सम्मेलन (Convention of Wadgaon) में अंग्रेजों को शर्मनाक आत्मसमर्पण पर विवश किया।
  • वारेन हेस्टिंग्स ने गोडार्ड और पोफम को भेजकर ग्वालियर व अहमदाबाद जीता। अंततः 17 मई 1782 को महादजी सिंधिया की मध्यस्थता से ‘सालबाई की संधि’ हुई। सवाई माधवराव पेशवा माने गए, राघोबा को पेंशन मिली, साल्सेट अंग्रेजों को मिला और 20 वर्षों तक शांति बनी रही।

7.2 द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1803–1805) एवं बसीन की संधि

  • 1800 में ‘मराठा मैकियावेली’ नाना फड़नवीस की मृत्यु हो गई। कमजोर व षड्यंत्रकारी पेशवा बाजीराव द्वितीय और दौलतराव सिंधिया ने यशवंतराव होल्कर के भाई विठोजी को हाथी से कुचलवा दिया। अक्टूबर 1802 में हडपसर के युद्ध में होल्कर ने पेशवा व सिंधिया को हरा दिया।
  • बाजीराव द्वितीय बसीन भागा और 31 दिसंबर 1802 को ‘बसीन की संधि’ (Treaty of Bassein) द्वारा अंग्रेजों की सहायक संधि स्वीकार कर अपनी संप्रभुता बेच दी।
  • सिंधिया और भोंसले ने युद्ध छेड़ा। 1803 में असाय (Assaye) के खूनी युद्ध में आर्थर वेलेजली ने दोनों को हराया। उत्तर भारत में जनरल लेक ने लासवारी व दिल्ली में सिंधिया को हराकर दिल्ली व शाह आलम द्वितीय पर कब्जा किया।
  • संधियां: दिसंबर 1803 में भोंसले के साथ देवगांव की संधि (कटक व बालासोर अंग्रेजों को) तथा सिंधिया के साथ सुरजी-अर्जुनगांव की संधि (दोआब, दिल्ली, आगरा अंग्रेजों को)। होल्कर ने लड़ाई जारी रखी, भरतपुर के लोहागढ़ किले में लेक को पीछे धकेला, और 1806 में राजघाट की संधि हुई।

7.3 तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1817–1818): पेशवाई का अंत

  • लॉर्ड हेस्टिंग्स का पिंडारी दमन: पिंडारियों के सफाए के बहाने मराठा राज्यों पर दबाव बनाया गया। जून 1817 में एल्फिंस्टन ने पेशवा पर पूना की संधि थोपकर मराठा संघ की अध्यक्षता छुड़वा दी।
  • बाजीराव द्वितीय ने पूना रेजीडेंसी जलाकर युद्ध छेड़ा: खड़की का युद्ध (1817) में पेशवा पराजित; नागपुर में सीताबर्डी का युद्ध में अप्पा साहिब भोंसले पराजित; महिदपुर का युद्ध (1817) में होल्कर पराजित (1818 मंदसौर संधि)।
  • 1 जनवरी 1818 को कोरेगांव का युद्ध तथा 20 फरवरी 1818 को आष्टी का युद्ध (वीर सेनापति बापू गोखले की शहादत)।
  • 3 जून 1818 को बाजीराव द्वितीय ने जॉन मैल्कम के सामने आत्मसमर्पण किया। पेशवा पद हमेशा के लिए समाप्त कर दिया गया। बाजीराव द्वितीय को ₹8 लाख पेंशन देकर कानपुर के पास बिठूर निर्वासित किया गया। शिवाजी के वंशज प्रताप सिंह को सतारा का राजा बनाया गया।

8. पंजाब का सिख राज्य एवं ब्रिटिश विलय (1809–1849)

  • महाराजा रणजीत सिंह (सुकरचकिया मिसल): 1799 में लाहौर व 1802 में अमृतसर जीता। फ्रांसीसी जनरलों (वेंतुरा, अलार्ड) के सहयोग से ‘फौज-ए-खास’ बनाकर एशिया की दूसरी सबसे आधुनिक सेना बनाई। मुल्तान (1818), कश्मीर (1819) व पेशावर (1834) जीता। 1813 में शाह शुजा से कोहिनूर हीरा प्राप्त किया।
  • 25 अप्रैल 1809 अमृतसर की संधि: चार्ल्स मेटकाफ व रणजीत सिंह के बीच। सतलज नदी को दोनों राज्यों की सीमा माना गया।
  • अराजकता व प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध (1845–1846): 1839 में रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद षड्यंत्र शुरू हुए। बालक दलीप सिंह राजा बने। वजीर लाल सिंह और सेनापति तेजा सिंह ने गद्दारी की। 10 फरवरी 1846 को सबराओं के युद्ध में वयोवृद्ध सरदार शाम सिंह अटारीवाला वीरगति को प्राप्त हुए। 9 मार्च 1846 की लाहौर की संधि द्वारा जालंधर दोआब अंग्रेजों को मिला और ₹75 लाख में कश्मीर गुलाब सिंह को बेच दिया गया (अमृतसर संधि)।
  • द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध (1848–1849): मुल्तान के दीवान मूलराज और छत्तर सिंह व शेर सिंह अटारीवाला का विद्रोह। 13 जनवरी 1849 को चिलियांवाला के युद्ध में लॉर्ड गफ की अंग्रेजी सेना को भारी क्षति हुई। 21 फरवरी 1849 को गुजरात के युद्ध (‘तोपों का युद्ध’) में चार्ल्स नेपियर ने सिखों को अंतिम रूप से पराजित किया।
  • 29 मार्च 1849: पंजाब का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय: लॉर्ड डलहौजी ने घोषणा पत्र द्वारा पंजाब का विलय कर लिया। प्रशासन हेतु हेनरी लॉरेंस, जॉन लॉरेंस व चार्ल्स मैन्सेल का 3-सदस्यीय बोर्ड बना। दलीप सिंह को पेंशन देकर इंग्लैंड भेजा गया और कोहिनूर हीरा महारानी विक्टोरिया को सौंपा गया।

9. सीमांत विस्तार: सिंध (1843), नेपाल (1816), अफगानिस्तान एवं बर्मा

  • सिंध का विलय (1843): सिंध पर टालपुर बलूच अमीरों का शासन था। प्रथम अफगान युद्ध की शर्मनाक पराजय की खीझ मिटाने हेतु लॉर्ड एलेनबरो ने सर चार्ल्स नेपियर को भेजा। मियानी और दब्बो के युद्ध (1843) में अमीरों को हराकर सिंध का अनैतिक विलय किया। नेपियर ने टेलीग्राम भेजा: ‘Pecavi’ (मैंने पाप किया है / I have sinned)। एल्फिंस्टन ने इसे ‘डकैती में पिटने के बाद पत्नी को पीटने जैसा’ बताया।
  • आंग्ल-नेपाल युद्ध (1814–1816) व सुगौली की संधि: बूटवल व शिवराज सीमा विवाद पर लॉर्ड हेस्टिंग्स ने युद्ध छेड़ा। डेविड ऑक्टरलोनी ने अमर सिंह थापा को मलावं में हराया। मार्च 1816 की सुगौली की संधि द्वारा गढ़वाल, कुमाऊं, शिमला, मसूरी, नैनीताल अंग्रेजों को मिले, काठमांडू में ब्रिटिश रेजीडेंट नियुक्त हुआ और ब्रिटिश सेना में गोरखा भर्ती शुरू हुई।
  • आंग्ल-अफगान युद्ध: प्रथम युद्ध (1838–1842, लॉर्ड ऑकलैंड की विनाशकारी फॉरवर्ड नीति, 16,500 की ब्रिटिश सेना का खुर्द-काबुल में संहार, डॉ. विलियम ब्राइडन एकमात्र जीवित गवाह)। द्वितीय युद्ध (1878–1880, लॉर्ड लिटन, 1879 गंडमक संधि)। 1893 में डूरंड रेखा का निर्धारण।
  • आंग्ल-बर्मा युद्ध: प्रथम युद्ध (1824–26, लॉर्ड एमहर्स्ट, 1826 यांदबू की संधि—असम, मणिपुर, अराकान अंग्रेजों को); द्वितीय युद्ध (1852, लॉर्ड डलहौजी—पेगू का विलय); तृतीय युद्ध (1885, लॉर्ड डफरिन—राजा थिबा का समर्पण, 1 जनवरी 1886 को बर्मा का पूर्ण विलय, 1937 में भारत से अलग)।

10. UPSC/PCS मुख्य परीक्षा मॉडल प्रश्न व विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण (Mains Framework)

प्रश्न 1: “प्लासी की लड़ाई केवल एक झड़प थी, जबकि बक्सर का युद्ध वास्तविक सैन्य विजय थी जिसने भारत में ब्रिटिश प्रभुसत्ता की वास्तविक नींव रखी।” इस कथन की समीक्षा कीजिए। (250 शब्द • 15 अंक)

उत्तर प्रारूप एवं मुख्य बिंदु:
• प्रस्तावना: प्लासी (1757) और बक्सर (1764) भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना के दो क्रमिक पड़ाव थे, किंतु दोनों के सैन्य और राजनीतिक स्वरूप में मौलिक अंतर था।
• प्लासी का चरित्र: यह कोई वास्तविक युद्ध नहीं था बल्कि कूटनीतिक विश्वासघात और षड्यंत्र था (के.एम. पणिक्कर का कथन)। मीर जाफर और राय दुर्लभ की सेना लड़ी ही नहीं; अंग्रेजों के मात्र 22 सैनिक मरे। इससे कंपनी को बंगाल की गद्दी पर कठपुतली बैठाने और धन लूटने का मौका मिला, पर संप्रभुता नहीं।
• बक्सर का वास्तविक सैन्य चरित्र: बक्सर में मेजर हेक्टर मुनरो के नेतृत्व वाली सेना ने खुले मैदान में उत्तर भारत की तीन प्रमुख शक्तियों—मीर कासिम, शुजाउद्दौला और मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय—के संयुक्त त्रिगुट को अपनी सामरिक श्रेष्ठता, आधुनिक तोपखाने और अनुशासन से हराया।
• परिणामों की तुलना: 1765 की इलाहाबाद संधि ने कंपनी को बंगाल, बिहार व उड़ीसा की ‘दीवानी’ दी, जिससे कंपनी भारत की वैधानिक शासक बनी। अवध आश्रित हुआ और मुगल सम्राट पेंशनर बना।
• निष्कर्ष: प्लासी ने अंग्रेजों को बंगाल का स्वामी बनाया, किंतु बक्सर ने उन्हें संपूर्ण भारत का दावेदार और संप्रभु शक्ति बना दिया।

प्रश्न 2: “18वीं-19वीं सदी में भारत के देशी राज्यों (मैसूर, मराठा, सिख) के पतन के मुख्य कारणों का परीक्षण कीजिए। यूरोपीय अनुशासन के सम्मुख पारंपरिक भारतीय युद्ध प्रणाली क्यों विफल रही?” (250 शब्द • 15 अंक)

उत्तर प्रारूप एवं मुख्य बिंदु:
• प्रस्तावना: मुगलों के पतन के बाद उभरे क्षेत्रीय राज्य (मैसूर, मराठा, सिख) व्यक्तिगत वीरता से परिपूर्ण थे, किंतु संरचनात्मक दुर्बलताओं के कारण ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की आधुनिक राज्य-व्यवस्था के आगे टिक नहीं सके।
• आंतरिक राजनीतिक व सामाजिक कारण: अखिल भारतीय राष्ट्रीय चेतना का अभाव; सामंती जागीरदारी व्यवस्था; उत्तराधिकार के अंतहीन खूनी संघर्ष; मराठा परिसंघ की आपसी ईर्ष्या (सिंधिया बनाम होल्कर); सिख दरबार में लाल सिंह व तेजा सिंह जैसे गद्दार।
• सैन्य व तकनीकी विषमता: अंग्रेजों के पास आधुनिक बंदूकें (Flintlock), त्वरित तोपखाना, पेशेवर जासूसी तंत्र और रॉयल नेवी की वैश्विक रसद थी। भारतीय शासकों ने अपनी पारंपरिक गतिशीलता (जैसे मराठा गुरिल्ला) छोड़ दी और आधी-अधूरी यूरोपीय ड्रिल अपनाई, जहां भाड़े के यूरोपीय कमांडरों ने संकट में धोखा दिया।
• आर्थिक आधार: अंग्रेजों के पास बंगाल का विशाल राजस्व और ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति का वित्तीय आधार था, जबकि देशी राज्य वित्तीय दिवालियेपन और लूट पर निर्भर थे।
• निष्कर्ष: यह पराजय केवल सैनिकों की नहीं, बल्कि मध्यकालीन सामंती व्यवस्था की आधुनिक औपनिवेशिक पूंजीवादी तंत्र के सम्मुख अनिवार्य ऐतिहासिक पराजय थी।

11. प्रारंभिक परीक्षा सार-संग्रह (Prelims Revision Quick Digest)

⚡ UPSC/PCS Prelims Fast-Facts Tracker:

• 1498: वास्कोडिगामा कालीकट (जमोरिन, गुजराती पथ-प्रदर्शक अब्दुल मजीद)।
• 1503: कोचीन में प्रथम पुर्तगाली फैक्ट्री; 1510 में अल्बुकर्क द्वारा बीजापुर से गोवा विजय।
• 1556: गोवा में भारत का प्रथम प्रिंटिंग प्रेस स्थापित (पुर्तगालियों द्वारा)।
• 1600: 31 दिसंबर एलिजाबेथ प्रथम का 15-वर्षीय चार्टर (ईस्ट इंडिया कंपनी)।
• 1605: मसूलीपट्टनम में प्रथम डच फैक्ट्री; 1610 पुलीकट में पैगोडा सिक्के।
• 1613: जहांगीर के फरमान से सूरत में अंग्रेजों की प्रथम स्थायी फैक्ट्री।
• 1632: गोलकुंडा का सुनहरा फरमान (500 पैगोडा में कर-मुक्त व्यापार)।
• 1639: फ्रांसिस डे द्वारा मद्रास में फोर्ट सेंट जॉर्ज की स्थापना।
• 1668: जेराल्ड ऑन्गियर बंबई का वास्तविक संस्थापक बना।
• 1690: जॉब चार्नॉक द्वारा कलकत्ता (सुतानाती) की नींव; 1700 फोर्ट विलियम।
• 1717: फर्रुखसियर का शाही फरमान (कंपनी का मैग्ना कार्टा / दस्तक)।
• 1746: सेंट थोमे का युद्ध (अड्यार) – कैप्टन पैराडाइज द्वारा अनवरुद्दीन की पराजय।
• 1751: रॉबर्ट क्लाइव का 53 दिवसीय अर्काट का घेरा।
• 23 जून 1757: प्लासी का युद्ध (भागीरथी तट, क्लाइव विजयी, मीर जाफर नवाब)।
• 1759: बेदरा का युद्ध – कर्नल फोर्ड द्वारा डचों की निर्णायक पराजय।
• 22 जनवरी 1760: वांडीवाश का युद्ध – सर आयर कूट द्वारा फ्रांसीसी सेनापति लाली पराजित।
• 22 अक्टूबर 1764: बक्सर का युद्ध – मेजर हेक्टर मुनरो द्वारा त्रिगुट (मीर कासिम, शुजाउद्दौला, शाह आलम द्वितीय) पराजित।
• 1765: 12 व 16 अगस्त इलाहाबाद की संधियां, बंगाल-बिहार-उड़ीसा की दीवानी, क्लाइव का द्वैध शासन।
• 1769: मद्रास की संधि (प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध समाप्त, हैदर अली विजयी)।
• 1782: 17 मई सालबाई की संधि (प्रथम मराठा युद्ध समाप्त, महादजी सिंधिया)।
• 1784: मंगलोर की संधि (द्वितीय मैसूर युद्ध समाप्त, टीपू सुल्तान)।
• 1792: श्रीरंगपट्टनम की संधि (तृतीय मैसूर युद्ध समाप्त, टीपू का आधा राज्य छिना)।
• 4 मई 1799: चतुर्थ मैसूर युद्ध, श्रीरंगपट्टनम में टीपू सुल्तान की वीरगति।
• 31 दिसंबर 1802: बसीन की संधि (पेशवा बाजीराव द्वितीय द्वारा सहायक संधि स्वीकार)।
• 1803: असाय व लासवारी युद्ध; देवगांव (भोंसले) व सुरजी-अर्जुनगांव (सिंधिया) संधियां।
• 25 अप्रैल 1809: अमृतसर की संधि (रणजीत सिंह व चार्ल्स मेटकाफ, सतलज सीमा)।
• मार्च 1816: सुगौली की संधि (आंग्ल-नेपाल युद्ध समाप्त, ऑक्टरलोनी)।
• 1818: तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध समाप्त, पेशवा पद समाप्त, बाजीराव द्वितीय बिठूर निर्वासित।
• 1826: यांदबू की संधि (प्रथम आंग्ल-बर्मा युद्ध समाप्त, असम व मणिपुर अंग्रेजों को)।
• 1843: सिंध का विलय (चार्ल्स नेपियर, ‘Pecavi’)।
• 1846: सबराओं का युद्ध (शाम सिंह अटारीवाला), लाहौर संधि, गुलाब सिंह को कश्मीर बिक्री।
• 29 मार्च 1849: गुजरात के युद्ध (‘तोपों का युद्ध’) के बाद लॉर्ड डलहौजी द्वारा पंजाब का पूर्ण विलय।

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