Govt Exam Hindi Notes

क्रांतिकारी आंदोलन प्रथम चरण, चापेकर बंधु, अभिनव भारत, अनुशीलन समिति, गदर आंदोलन, कामागाटामारू

भारत में क्रांतिकारी आंदोलन का प्रथम चरण (1897–1918) एवं विदेशों में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद: चापेकर बंधु, अभिनव भारत, अनुशीलन समिति, अलीपुर व दिल्ली षड्यंत्र, गदर पार्टी, कामागाटामारू व काबुल सरकार – संपूर्ण विश्लेषणात्मक अध्ययन व नोट्स

🔥 आधुनिक भारत का इतिहास • मास्टर अध्ययन श्रृंखला (अध्याय 17)

भारत में क्रांतिकारी आंदोलन का प्रथम चरण (1897–1918) एवं विदेशों में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद

19वीं सदी के अंतिम दशक से प्रारंभ होकर प्रथम विश्व युद्ध (1918) की समाप्ति तक फैला क्रांतिकारी राष्ट्रवाद का प्रथम चरण भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का वह स्वर्णिम व रोमांचक अध्याय है जिसने विदेशी औपनिवेशिक सत्ता की जड़ें हिला दीं। महाराष्ट्र में चापेकर बंधुओं द्वारा 1897 रैंड हत्या, वी.डी. सावरकर का ‘मित्र मेला’ व ‘अभिनव भारत’ (1904), बंगाल की अनुशीलन समिति व युगांतर, 1908 मुजफ्फरपुर बम कांड में खुदीराम बोस व प्रफुल्ल चाकी का अमर बलिदान, अलीपुर षड्यंत्र केस व अरबिंदो घोष, 1912 दिल्ली में लॉर्ड हार्डिंग पर बम हमला (रासबिहारी बोस), बाघा जतिन व 1915 की ऐतिहासिक बालासोर मुठभेड़, लंदन में श्यामजी कृष्ण वर्मा का ‘इंडिया हाउस’ व मदनलाल धींगरा (1909 कर्जन वाइली हत्या), पेरिस में मैडम भीकाजी कामा द्वारा 1907 स्टटगार्ट सम्मेलन में प्रथम भारतीय तिरंगा फहराना, सैन फ्रांसिस्को में लाला हरदयाल व सोहन सिंह भकना का ‘गदर आंदोलन’ (1913), कामागाटामारू प्रकरण (1914), बर्लिन समिति व रेशमी रूमाल षड्यंत्र, 1915 सिंगापुर सैनिक विद्रोह, तथा 1 दिसंबर 1915 को काबुल में राजा महेंद्र प्रताप व मौलाना बरकतुल्लाह द्वारा भारत की प्रथम अंतरिम निर्वासित सरकार की स्थापना—यह संपूर्ण अध्ययन UPSC Civil Services, UPPSC, BPSC, MPPSC, HPSC व State PCS मुख्य व प्रारंभिक परीक्षा हेतु सबसे प्रामाणिक, शोधपरक व समग्र संकलन प्रस्तुत करता है।


Table of Contents

📚 आधुनिक भारत का इतिहास: श्रृंखला अनुक्रमणिका व संपूर्ण नेविगेशन हब

📖 अध्याय 16: भारत में यूरोपीय कंपनियों का आगमन एवं ब्रिटिश साम्राज्यवादी विस्तार (1498–1857): पुर्तगाली, डच, अंग्रेज, फ्रांसीसी (कर्नाटक युद्ध), बंगाल विजय (प्लासी व बक्सर), आंग्ल-मैसूर, मराठा व सिख युद्ध
📖 अध्याय 15: ब्रिटिश क्राउन एवं देशी रियासतें (Princely States) तथा 1947–1950 एकीकरण: नीतियां, बटलर समिति, प्रजामंडल आंदोलन व 565+ रियासतों का ऐतिहासिक विलय
📖 अध्याय 14: ब्रिटिश प्रशासनिक, न्यायिक, पुलिस एवं सिविल सेवाओं का विकास तथा संवैधानिक सुधार (1773–1947)
📖 अध्याय 13: आधुनिक भारत में शिक्षा एवं प्रेस का विकास (1781–1947): मैकाले मिनट, वुड्स डिस्पैच, वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट
📖 अध्याय 12: ब्रिटिश शासन की आर्थिक नीतियां: स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी, महालवाड़ी व धन की निकासी (Drain of Wealth)
📖 अध्याय 11: वेवेल योजना, कैबिनेट मिशन, माउंटबेटन योजना एवं 1947 स्वतंत्रता अधिनियम

1. क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के प्रथम चरण का उद्भव: कारण एवं वैचारिक पृष्ठभूमि

19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी के प्रारंभ में भारत में ‘क्रांतिकारी राष्ट्रवाद’ (Revolutionary Nationalism) का उदय कोई आकस्मिक घटना नहीं थी, बल्कि यह तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों और ब्रिटिश शासन की निर्मम नीतियों की स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी:

  • नरमपंथियों की संवैधानिक भिक्षावृत्ति की विफलता: कांग्रेस के प्रारंभिक नरमपंथी नेताओं की प्रार्थना, प्रतिवाद और याचिका (3Ps – Prayer, Petition, Protest) की नीति ब्रिटिश सरकार से कोई ठोस राजनीतिक अधिकार नहीं दिला सकी, जिससे युवा वर्ग में गहरा असंतोष फैला।
  • लॉर्ड कर्जन की प्रतिक्रियावादी नीतियां एवं बंगाल विभाजन (1905): कलकत्ता कॉरपोरेशन एक्ट (1899), भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम (1904) और विशेषकर 16 अक्टूबर 1905 को बंगाल के विभाजन ने बंगाली अस्मिता और राष्ट्रवाद पर सीधा प्रहार किया। जब सरकार ने शांतिपूर्ण स्वदेशी व बहिष्कार आंदोलनों को लाठियों और गोलियों से कुचला, तो युवाओं ने ‘सशस्त्र प्रतिरोध’ का मार्ग चुना।
  • अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का प्रेरणादायी प्रभाव: 1896 में अबीसीनिया (इथियोपिया) द्वारा इटली की सेना को पराजित करना, 1904-05 के युद्ध में एक छोटे से एशियाई देश जापान द्वारा विशाल यूरोपीय शक्ति रूस को धूल चटाना, आयरलैंड में ‘सिंन फेन’ (Sinn Féin) का स्वतंत्रता संग्राम, और जारशाही के विरुद्ध रूसी ‘निहिलिस्टों’ (Nihilists / नरोदन्या वोल्या) द्वारा बम व गुप्त समितियों का प्रयोग—इन सबने भारतीयों के मन से गोरे लोगों की अजेयता का मिथक तोड़ दिया।
  • वैचारिक प्रेरणा: बंकिमचंद्र चटर्जी का उपन्यास आनंदमठ (वंदे मातरम), स्वामी विवेकानंद का आह्वान (‘उठो, जागो और तब तक मत रुको… शक्ति ही धर्म है’), और बाल गंगाधर तिलक का सिद्धांत (‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’) युवा क्रांतिकारियों के मुख्य प्रेरक स्रोत बने।

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मॉक टेस्ट 1: महाराष्ट्र में क्रांतिकारी आंदोलन (चापेकर बंधु, रैंड हत्या, अभिनव भारत)

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2. महाराष्ट्र में क्रांतिकारी आंदोलन: चापेकर बंधु, मित्र मेला व अभिनव भारत

भारत में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद का बीजारोपण महाराष्ट्र की वीर भूमि पर हुआ।

(A) आद्य क्रांतिकारी वासुदेव बलवंत फड़के (1879)

1876-77 के भीषण अकाल के समय ब्रिटिश अधिकारियों की असंवेदनशीलता से क्षुब्ध होकर वासुदेव बलवंत फड़के (1845–1883) ने सरकारी सेवा त्याग दी। उन्होंने रामोसी, कोली और भील जातियों को संगठित कर ‘रामोसी कृषक सेना’ बनाई और सरकारी खजाने लूटे। 1879 में उन्हें गिरफ्तार कर अदन जेल निर्वासित किया गया, जहां 1883 में भूख हड़ताल से उनका देहांत हुआ। फड़के को ‘भारतीय सशस्त्र क्रांति का जनक’ कहा जाता है।

(B) चापेकर बंधु एवं रैंड हत्याकांड (22 जून 1897)

1896-97 में पूना में ब्यूबोनिक प्लेग (Plague) फैला। सरकार ने प्लेग नियंत्रण हेतु एक विशेष समिति बनाई जिसके अध्यक्ष डब्ल्यू. सी. रैंड (W.C. Rand) और लेफ्टिनेंट आयर्स्ट (Lt. Ayerst) थे। रैंड की सेना ने प्लेग जांच के नाम पर पूना के घरों में घुसकर महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया और घरेलू सामानों को जला दिया।

22 जून 1897 को महारानी विक्टोरिया के हीरक जयंती समारोह की रात दामोदर हरि चापेकर और बालकृष्ण हरि चापेकर ने रैंड और आयर्स्ट की गोली मारकर हत्या कर दी। यह आधुनिक भारत में अंग्रेजों की प्रथम राजनीतिक हत्या थी। बाद में गद्दार द्रविड़ बंधुओं की मुखबिरी पर चापेकर बंधुओं को फांसी दे दी गई। इसके प्रतिशोध में तीसरे भाई वासुदेव चापेकर और महादेव रानाडे ने द्रविड़ बंधुओं को गोलियों से भून दिया और वे भी फांसी पर चढ़े।

(C) विनायक दामोदर सावरकर: मित्र मेला (1899) से ‘अभिनव भारत’ (1904)

1899 में वी.डी. सावरकर और उनके बड़े भाई गणेश सावरकर (बाबाराव) ने नासिक में ‘मित्र मेला’ नामक गुप्त संस्था बनाई। 1904 में 200 क्रांतिकारियों के सम्मेलन में इसका नाम बदलकर इटली के मेजिनी के ‘यंग इटली’ की तर्ज पर ‘अभिनव भारत’ (Abhinav Bharat) कर दिया गया।

📌 नासिक षड्यंत्र केस (1909) एवं जैक्सन हत्याकांड:

  • कारण: नासिक के जिला जज आर्थर जैक्सन (A.M.T. Jackson) ने गणेश सावरकर को ‘लघु अभिनव भारत मेला’ कविताओं के लिए आजीवन कालेपानी की सजा सुनाई थी।
  • घटना: 21 दिसंबर 1909 को नासिक के विजयानंद थिएटर में नाटक मंचन के दौरान 18 वर्षीय अनंत लक्ष्मण कान्हेरे ने जैक्सन की गोली मारकर हत्या कर दी।
  • परिणाम: अनंत कान्हेरे, कृष्णाजी गोपाल कर्वे और विनायक नारायण देशपांडे को 19 अप्रैल 1910 को ठाणे जेल में फांसी दी गई।
  • सावरकर पर दोहरे आजीवन कालेपानी की सजा: लंदन से 20 ब्राउनिंग पिस्तौलें भेजने के आरोप में सावरकर को गिरफ्तार कर 50 वर्ष (दो आजीवन कारावास) की सजा सुनाकर अंडमान की सेलुलर जेल भेजा गया।

3. बंगाल में क्रांतिकारी आंदोलन: अनुशीलन समिति व युगांतर समूह

बंगाल में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद का मुख्य केंद्र ‘अनुशीलन समिति’ और ‘युगांतर’ पत्रिका बनी:

शाखा / संगठनस्थापना वर्षप्रमुख संस्थापक व नेतामुख्य कार्य व विशेषता
मिदनापुर अनुशीलन समिति1902ज्ञानेंद्रनाथ बसु, हेमचंद्र कानूनगोबंगाल की प्रथम गुप्त क्रांतिकारी शाखा; व्यायाम व अस्त्र अभ्यास
कलकत्ता अनुशीलन समिति1902 (24 मार्च)प्रमथनाथ मित्र (अध्यक्ष), सतीश चंद्र बसु, सी.आर. दास, अरबिंदो घोषबंकिमचंद्र के ‘अनुशीलन तत्व’ से प्रेरित; बौद्धिक व शारीरिक क्रांति
ढाका अनुशीलन समिति1906 (अक्टूबर)पुलिन बिहारी दास500 से अधिक शाखाएं; अर्ध-सैनिक अनुशासन, 1908 बर्रा डकैती
युगांतर समूह (कलकत्ता)1906 (अप्रैल)बारिंद्र कुमार घोष, भूपेंद्रनाथ दत्त, अबिनाश भट्टाचार्य‘युगांतर’ साप्ताहिक पत्र; प्रत्यक्ष सशस्त्र कार्रवाई व बम निर्माण

‘युगांतर’ पत्र एवं ‘मुक्ति कोन पाथे’: भूपेंद्रनाथ दत्त (स्वामी विवेकानंद के छोटे भाई) द्वारा संपादित ‘युगांतर’ ने उद्घोष किया: “यदि 30 करोड़ भारतीय अपने 60 करोड़ हाथ ऊपर उठा लें, तो विदेशी सत्ता तिनके की तरह उड़ जाएगी।” युगांतर के लेखों के संग्रह ‘मुक्ति कोन पाथे’ (Which Way Lies Freedom?) में भारतीय सैनिकों से हथियार छीनने और राजनीतिक डकैतियों का आह्वान किया गया।

4. मुजफ्फरपुर बम कांड (1908) एवं अलीपुर षड्यंत्र केस

(A) मुजफ्फरपुर बम कांड (30 अप्रैल 1908)

कलकत्ता के क्रूर चीफ प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट डगलस किंग्सफोर्ड ने स्वदेशी कार्यकर्ताओं को कोड़े मारने की अमानवीय सजाएं दी थीं। क्रांतिकारियों ने उसे मारने का फैसला किया। सरकार ने उसे मुजफ्फरपुर (बिहार) का जिला जज बनाकर भेज दिया।

युगांतर दल ने दो नवयुवकों—खुदीराम बोस (18 वर्ष) और प्रफुल्ल चाकी (19 वर्ष) को मुजफ्फरपुर भेजा। 30 अप्रैल 1908 की रात किंग्सफोर्ड के क्लब से निकलते समय उसकी बग्घी समझकर बम फेंका गया। दुर्भाग्यवश उस गाड़ी में बैरिस्टर प्रिंगल कैनेडी की पत्नी व पुत्री बैठी थीं, जो मारी गईं; किंग्सफोर्ड बच गया।

  • प्रफुल्ल चाकी का आत्म-बलिदान (2 मई 1908): मोकामा घाट रेलवे स्टेशन पर पुलिस द्वारा घिर जाने पर उन्होंने गद्दार सब-इंस्पेक्टर नंदलाल बनर्जी के सामने आत्मसमर्पण करने के बजाय अपनी रिवॉल्वर से खुद के सिर में गोली मार ली।
  • खुदीराम बोस की शहादत (11 अगस्त 1908): वैनी स्टेशन पर पकड़े गए खुदीराम बोस को मुजफ्फरपुर जेल में 11 अगस्त 1908 को फांसी दी गई। वे हाथ में भगवद्गीता लिए मुस्कुराते हुए फांसी के फंदे पर झूल गए। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे कम उम्र के अमर शहीदों में गिने जाते हैं।

(B) अलीपुर षड्यंत्र केस (1908–1909)

2 मई 1908 को पुलिस ने मानिकतला (32, मुरारीपुकुर रोड) स्थित बारिंद्र घोष के बगीचे पर छापा मारा, जहां से भारी मात्रा में बम, डायनामाइट और हथियार बरामद हुए। पुलिस ने अरबिंदो घोष और बारिंद्र घोष सहित 34 लोगों को गिरफ्तार कर ‘अलीपुर षड्यंत्र केस’ शुरू किया।

  • सी.आर. दास का ऐतिहासिक बचाव: चित्तरंजन दास ने अदालत में ऐसा तेजस्वी कानूनी बचाव किया कि जज बीचपक्रॉफ्ट को अरबिंदो घोष को साक्ष्यों के अभाव में बाइज्जत बरी करना पड़ा।
  • नरेंद्र गोसाईं की जेल में हत्या: सरकारी गवाह बने नरेंद्र गोसाईं को अलीपुर जेल के अस्पताल में घुसकर कन्हाईलाल दत्त और सत्येंद्रनाथ बोस ने गोलियों से भून दिया। दोनों को नवंबर 1908 में फांसी दी गई।
  • अरबिंदो घोष का आध्यात्मिक रूपांतरण: जेल में एक वर्ष के एकांत कारावास के दौरान भगवान श्रीकृष्ण का साक्षात्कार होने के बाद अरबिंदो ने सक्रिय राजनीति छोड़कर पांडिचेरी में साधना केंद्र स्थापित किया।

5. दिल्ली षड्यंत्र केस (1912) एवं बाघा जतिन का सशस्त्र संघर्ष

(A) 23 दिसंबर 1912: लॉर्ड हार्डिंग पर चांदनी चौक बम हमला

1911 में राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित की गई। 23 दिसंबर 1912 को वायसराय लॉर्ड हार्डिंग द्वितीय जब सजे-धजे हाथी पर सवार होकर चांदनी चौक (दिल्ली) से शाही जुलूस में गुजर रहा था, तभी पंजाब नेशनल बैंक की छत से उस पर भीषण बम फेंका गया। हार्डिंग गंभीर रूप से घायल हुआ और उसका छत्रधारी सिपाही मारा गया।

  • मास्टरमाइंड: रासबिहारी बोस (देहरादून FRI के क्लर्क)। वे पुलिस को चकमा देकर भूमिगत रहे और 1915 में ‘पी.एन. टैगोर’ के छद्म नाम से जापान फरार हो गए।
  • बम फेंकने वाला: बसंत कुमार बिस्वास (महिला के भेष में)।
  • अमर बलिदानी: दिल्ली षड्यंत्र केस में मास्टर अमीरचंद, अवध बिहारी, भाई बालमुकुंद और बसंत कुमार बिस्वास को मई 1915 में फांसी दी गई।

(B) बाघा जतिन और बालासोर मुठभेड़ (9 सितंबर 1915)

जतींद्रनाथ मुखर्जी (1879–1915) को एक आदमखोर बाघ को अकेले खुखरी से मार गिराने के कारण ‘बाघा जतिन’ कहा जाता था। उन्होंने नारा दिया: “अमरा मोरबो, जगत जागबे” (हम मरेंगे, देश जागेगा)।

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जर्मन हथियारों की खेप (जिमरमैन योजना) की प्रतीक्षा में बाघा जतिन उड़ीसा के बालासोर के जंगलों में थे। 9 सितंबर 1915 को बुढ़ी बालंग नदी के तट पर ब्रिटिश सेना और पुलिस ने उन्हें घेर लिया। चित्तप्रिय, मनोरंजन, नीरेन और ज्योतिश पाल के साथ 75 मिनट तक खाई में डटकर लड़ी गई इस मुठभेड़ में बाघा जतिन गंभीर रूप से घायल हुए और 10 सितंबर 1915 को बालासोर अस्पताल में वीरगति को प्राप्त हुए।

6. विदेशों में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद: लंदन, पेरिस व यूरोप केंद्र

(A) लंदन केंद्र: श्यामजी कृष्ण वर्मा, इंडिया हाउस व मदनलाल धींगरा (1905–1909)

  • द इंडियन होम रूल सोसाइटी (1905): श्यामजी कृष्ण वर्मा द्वारा लंदन में स्थापित। मुखपत्र: द इंडियन सोशियोलॉजिस्ट (The Indian Sociologist)।
  • इंडिया हाउस (Highgate, London): भारतीय छात्रों का छात्रावास जो सावरकर, लाला हरदयाल और धींगरा का क्रांतिकारी मुख्यालय बना।
  • मदनलाल धींगरा द्वारा कर्जन वाइली की हत्या (1 जुलाई 1909): धींगरा ने भारत सचिव के जासूस राजनीतिक सलाहकार सर विलियम कर्जन वाइली को जहांगीर हॉल में 5 गोलियां मारीं।
  • धींगरा की अमर शहादत (17 अगस्त 1909): लंदन की पेंटनविले जेल में फांसी। उनका अंतिम वक्तव्य: “मेरी एकमात्र प्रार्थना है कि मैं पुनः इसी भारत माता की गोद में जन्म लूं और इसी पवित्र उद्देश्य के लिए बार-बार बलिदान होऊं!” विंस्टन चर्चिल ने इसे देशभक्ति का सबसे उत्कृष्ट भाषण कहा।

(B) पेरिस केंद्र: मैडम भीकाजी कामा व 1907 स्टटगार्ट सम्मेलन

  • भारतीय क्रांति की जननी: मैडम भीकाजी रुस्तम कामा (1861–1936) ने पेरिस में सरदार सिंह राणा (S.R. Rana) के साथ ‘पेरिस इंडियन सोसाइटी’ बनाई।
  • 22 अगस्त 1907: प्रथम राष्ट्रीय तिरंगा ध्वज: जर्मनी के स्टटगार्ट में ‘सातवीं अंतरराष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस’ में मैडम कामा ने विदेशी धरती पर पहली बार स्वतंत्र भारत का राष्ट्रीय ध्वज फहराया। इस ध्वज में हरा, पीला और लाल रंग था, बीच में ‘वन्दे मातरम्’ तथा 8 कमल व सूर्य-चंद्रमा अंकित थे।
  • क्रांतिकारी पत्रिकाएं: जिनेवा से ‘वंदे मातरम’ और बर्लिन से ‘तलवार’ (वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय द्वारा) का संपादन।

7. अमेरिका व कनाडा में गदर आंदोलन (1913) एवं कामागाटामारू प्रकरण (1914)

(A) गदर पार्टी की स्थापना व कार्यप्रणाली (1913)

मई 1913 में अमेरिका के ओरेगन में ‘द पैसिफिक कोस्ट हिंदुस्तान एसोसिएशन’ की स्थापना हुई। इसके प्रथम अध्यक्ष बाबा सोहन सिंह भकना और महासचिव लाला हरदयाल बने। सैन फ्रांसिस्को में इसका मुख्यालय ‘युगांतर आश्रम’ बनाया गया।

  • ‘गदर’ साप्ताहिक पत्र (1 नवंबर 1913): प्रथम अंक उर्दू में, फिर गुरमुखी में छपा। इसके मुखपृष्ठ पर छपता था: “अंग्रेजी राज का कच्चा चिट्ठा”।
  • ऐतिहासिक विज्ञापन: “आवश्यकता है: वीर सिपाहियों की; वेतन: मौत; पुरस्कार: शहादत; पेंशन: आजादी; युद्ध का मैदान: भारत!”
  • 21 फरवरी 1915 का सशस्त्र विद्रोह: गदर नेताओं (करतार सिंह सराभा, विष्णु गणेश पिंगले) और रासबिहारी बोस ने भारतीय छावनियों में एक साथ विद्रोह की योजना बनाई, परंतु गद्दार कृपाल सिंह की मुखबिरी से योजना विफल हो गई। 16 नवंबर 1915 को 19 वर्षीय करतार सिंह सराभा को लाहौर में फांसी दी गई।

(B) कामागाटामारू प्रकरण (Komagata Maru Incident – 1914)

कनाडा सरकार ने भारतीयों के प्रवेश को रोकने हेतु ‘सतत यात्रा नियम’ (Continuous Journey Regulation) बना रखा था। बाबा गुरदित सिंह ने 376 यात्रियों (340 सिख, 24 मुस्लिम, 12 हिंदू) के साथ जापानी जहाज ‘कामागाटामारू’ किराए पर लेकर हांगकांग से वैंकूवर की यात्रा की।

  • वैंकूवर में गतिरोध: कनाडाई अधिकारियों ने 2 महीने तक यात्रियों को उतरने नहीं दिया। यात्रियों की सहायता हेतु कनाडा में ‘शोर कमेटी’ (हुसैन रहीम, सोहनलाल पाठक, बलवंत सिंह) बनी। अंततः नौसैनिक जहाज ‘एचएमसीएस रेनबो’ से धमकाकर जहाज वापस लौटा दिया गया।
  • बज-बज घाट गोलीबारी (29 सितंबर 1914): कलकत्ता के बज-बज बंदरगाह पर उतरते समय ब्रिटिश पुलिस ने यात्रियों पर गोलियां चलाईं, जिसमें 18-20 यात्री शहीद हो गए और सैकड़ों को जेल में डाल दिया गया।

8. प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) और अंतरराष्ट्रीय मोर्चे

🌐 प्रथम विश्व युद्ध के दौरान प्रमुख अंतरराष्ट्रीय क्रांतिकारी गतिविधियां:

  1. बर्लिन समिति / भारतीय स्वतंत्रता समिति (1915): वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय, भूपेंद्रनाथ दत्त और लाला हरदयाल द्वारा जर्मन सहयोग से स्थापित। डॉ. चंपकरमन पिल्लई ने यहीं से प्रथम बार ‘जय हिंद’ का नारा दिया।
  2. काबुल में भारत की प्रथम अंतरिम सरकार (1 दिसंबर 1915): राजा महेंद्र प्रताप (राष्ट्रपति) और मौलाना बरकतुल्लाह (प्रधानमंत्री) ने अफगानिस्तान के काबुल में भारत की प्रथम निर्वासित सरकार की स्थापना की, जिसे जर्मनी, तुर्की और सोवियत रूस ने मान्यता दी।
  3. रेशमी रूमाल षड्यंत्र (Silk Letter Movement): मौलाना महमूद हसन (शेख-उल-हिंद) और मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी द्वारा पीले रेशमी रूमालों पर गुप्त कोड में तुर्की व काबुल से ब्रिटिश विरोधी जिहाद का पत्राचार।
  4. सिंगापुर सैनिक विद्रोह (15 फरवरी 1915): 5वीं लाइट इन्फैंट्री के सूबेदार दाउद खान व चिश्ती खान के नेतृत्व में बगावत; 47 भारतीय सैनिकों को आउट्राम जेल की दीवार से सटाकर सार्वजनिक रूप से गोलियों से भूना गया।

9. ब्रिटिश दमनकारी कानून एवं रॉलेट सेडिशन कमेटी (1918)

क्रांतिकारियों के बढ़ते प्रभाव से भयभीत होकर ब्रिटिश संसद और भारतीय औपनिवेशिक सरकार ने एक के बाद एक कठोर कानून बनाए:

  • राजद्रोहात्मक सभा अधिनियम 1907 (Seditious Meetings Act): सार्वजनिक राजनीतिक सभाओं पर प्रतिबंध।
  • विस्फोटक पदार्थ अधिनियम 1908 (Explosive Substances Act): बम बनाने व रखने पर आजीवन कालापानी।
  • भारतीय समाचार पत्र अधिनियम 1910 (Indian Press Act): प्रेस की संपत्ति व जमानत जब्त करने का अधिकार।
  • भारत रक्षा अधिनियम 1915 (Defence of India Act): विशेष गुप्त ट्रिब्यूनल बनाकर बिना अपील के फांसी व नजरबंदी।
  • रॉलेट कमेटी रिपोर्ट (1918): जस्टिस सिडनी रॉलेट की अध्यक्षता में सेडिशन कमेटी बनी, जिसकी सिफारिशों पर 1919 का कुख्यात ‘रॉलेट एक्ट’ (बिना वकील, बिना अपील, बिना दलील कानून) बना।

10. प्रथम चरण का समग्र मूल्यांकन एवं ऐतिहासिक महत्व

यद्यपि प्रथम चरण के क्रांतिकारी तात्कालिक रूप से ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ नहीं सके, लेकिन उनका ऐतिहासिक योगदान अतुलनीय था:

  • औपनिवेशिक अजेयता के मिथक का अंत: उन्होंने यह साबित कर दिया कि भारतीय युवा अपनी मातृभूमि के लिए हंसते-हंसते प्राण दे सकते हैं।
  • अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय प्रश्न की गूंज: लंदन, पेरिस, बर्लिन, सैन फ्रांसिस्को और काबुल में भारत की आजादी की आवाज गूंजी।
  • द्वितीय चरण के लिए उर्वर भूमि: चापेकर बंधुओं, खुदीराम बोस, मदनलाल धींगरा, करतार सिंह सराभा और बाघा जतिन के बलिदानों ने ही 1920 के दशक में भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, अशफाक उल्ला खां और सुभाष चंद्र बोस जैसे नायकों के लिए प्रेरणा की मशाल जलाई।

📊 प्रथम चरण के प्रमुख षड्यंत्र केस एवं ऐतिहासिक फैसले (Master Reference Table):

मुकदमा / षड्यंत्र केसवर्षसंबंधित प्रमुख क्रांतिकारीअदालती निर्णय व शहादत
रैंड हत्याकांड मुकदमा1897–98दामोदर चापेकर, बालकृष्ण चापेकर, वासुदेव चापेकरतीनों भाइयों को यरवदा जेल में फांसी
मुजफ्फरपुर बम केस1908खुदीराम बोस, प्रफुल्ल चाकीप्रफुल्ल चाकी का मोकामा पर आत्म-बलिदान; खुदीराम बोस को 11 अगस्त 1908 को फांसी
अलीपुर षड्यंत्र केस1908–09अरबिंदो घोष, बारिंद्र घोष, उल्लासकर दत्त, कन्हाईलाल दत्तअरबिंदो बरी; कन्हाईलाल व सत्येंद्रनाथ को फांसी; बारिंद्र व उल्लासकर को कालापानी
कर्जन वाइली हत्या केस (लंदन)1909मदनलाल धींगरा17 अगस्त 1909 को लंदन की पेंटनविले जेल में फांसी
नासिक षड्यंत्र केस1909–10अनंत कान्हेरे, कृष्णाजी कर्वे, विनायक देशपांडे, वी.डी. सावरकरकान्हेरे, कर्वे व देशपांडे को फांसी; सावरकर को 50 वर्ष कालापानी
दिल्ली षड्यंत्र केस1912–15रासबिहारी बोस, मास्टर अमीरचंद, अवध बिहारी, बालमुकुंद, बसंत बिस्वासअमीरचंद, अवध बिहारी, बालमुकुंद व बसंत बिस्वास को फांसी; रासबिहारी बोस जापान फरार
प्रथम लाहौर षड्यंत्र केस1915करतार सिंह सराभा, विष्णु गणेश पिंगले, सोहन सिंह भकनाकरतार सराभा व पिंगले सहित 7 को फांसी; भकना सहित दर्जनों को कालापानी

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