1935 से 1939 का कालखंड भारतीय स्वाधीनता आंदोलन एवं संवैधानिक विकास के इतिहास का सबसे निर्णायक मोड़ था। एक ओर ब्रिटिश संसद द्वारा पारित भारत शासन अधिनियम 1935 (Government of India Act 1935) औपनिवेशिक भारत का सबसे बड़ा और जटिल संवैधानिक दस्तावेज बना, जिसने स्वतंत्र भारत के संविधान के लिए मूलभूत ढांचा प्रदान किया; वहीं दूसरी ओर 1937 के प्रांतीय चुनावों में कांग्रेस की अभूतपूर्व जीत ने भारतीयों की प्रशासनिक क्षमता को सिद्ध किया। इसके समानांतर 1938-1939 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में कांग्रेस के भीतर समाजवादी और जुझारू विचारधारा का सशक्त उभार हुआ, जिसकी परिणति 1939 के ऐतिहासिक ‘त्रिपुरी संकट’ और फॉरवर्ड ब्लॉक के गठन में हुई। यह आलेख सिविल सेवा परीक्षाओं (UPSC व State PCS) के पाठ्यक्रम के अनुरूप इस पूरे दौर का प्रामाणिक, विस्तृत व विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है।
📚 आधुनिक भारत का इतिहास: श्रृंखला अनुक्रमणिका व अंतर्संबंधित कड़ियां
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➡️ अध्याय 11 (महा-समापन): कैबिनेट मिशन, माउंटबेटन योजना एवं भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947
1. भारत शासन अधिनियम 1935 की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
1919 के ‘मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार’ (भारत शासन अधिनियम 1919) में यह प्रावधान था कि 10 वर्ष बाद संवैधानिक प्रगति की समीक्षा हेतु एक आयोग गठित किया जाएगा। इसके परिणामस्वरूप 1927 में साइमन कमीशन की नियुक्ति हुई, जिसने मई 1930 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। साइमन रिपोर्ट पर विचार करने तथा भारतीय राजनीतिक गतिरोध को सुलझाने के लिए लंदन में तीन गोलमेज सम्मेलन (Round Table Conferences – 1930, 1931, 1932) आयोजित किए गए।
तीसरे गोलमेज सम्मेलन की समाप्ति के बाद ब्रिटिश सरकार ने मार्च 1933 में एक ‘श्वेत पत्र’ (White Paper) जारी किया, जिसमें भावी संवैधानिक सुधारों की रूपरेखा दी गई थी। इस श्वेत पत्र पर विचार करने के लिए ब्रिटिश संसद के दोनों सदनों की एक संयुक्त प्रवर समिति (Joint Select Committee) गठित की गई, जिसके अध्यक्ष लॉर्ड लिनलिथगो (Lord Linlithgow) थे।
इस समिति की सिफारिशों के आधार पर ब्रिटिश संसद में एक विधेयक पेश किया गया, जो 2 अगस्त 1935 को शाही स्वीकृति (Royal Assent) प्राप्त कर ‘भारत शासन अधिनियम 1935’ (Government of India Act 1935) बना।
📌 अधिनियम का आकार एवं जटिलता
भारत शासन अधिनियम 1935 ब्रिटिश संसद के इतिहास में अब तक का सबसे लंबा और विस्तृत अधिनियम था। इसमें कुल 321 धाराएं (Sections) और 10 अनुसूचियां (Schedules) थीं। विशेष बात यह थी कि इस अधिनियम में कोई अलग प्रस्तावना (Preamble) नहीं थी; ब्रिटिश संसद ने 1919 के अधिनियम की प्रस्तावना को ही इसमें जोड़ दिया था ताकि औपनिवेशिक स्वराज्य के लक्ष्य की औपचारिकता बनी रहे।
2. अखिल भारतीय संघ (All India Federation) की संकल्पना
1935 के अधिनियम की सबसे प्रमुख विशेषता एक अखिल भारतीय संघ (All India Federation) की स्थापना का प्रस्ताव था। इस संघ में निम्नलिखित दो घटक शामिल होने थे:
- 11 ब्रिटिश भारतीय प्रांत और 6 चीफ कमिश्नर के प्रांत (इनका संघ में शामिल होना अनिवार्य था)।
- देशी रियासतें (Princely States) — रियासतों का संघ में शामिल होना पूर्णतः ऐच्छिक (स्वेच्छा पर आधारित) था।
⚠️ अखिल भारतीय संघ कभी लागू क्यों नहीं हो सका?
अधिनियम में यह शर्त रखी गई थी कि अखिल भारतीय संघ तभी अस्तित्व में आएगा जब कम से कम आधी रियासतें (जिनकी जनसंख्या कुल रियासती आबादी का कम से कम 50% हो और जिन्हें काउंसिल ऑफ स्टेट्स में 52 सीटें प्राप्त हों) ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन’ (विलय पत्र) पर हस्ताक्षर कर दें। देशी रियासतों के राजा-महाराजाओं ने अपनी संप्रभुता छिनने और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व के भय से संघ में शामिल होने से इनकार कर दिया। इसके अतिरिक्त कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने संघ के जटिल प्रारूप का विरोध किया। अतः अखिल भारतीय संघ का प्रावधान कभी अमल में नहीं आ सका और केंद्र में 1919 के अधिनियम वाली पुरानी व्यवस्था ही 1947 तक चलती रही।
3. प्रांतीय स्वायत्तता (Provincial Autonomy)
भारत शासन अधिनियम 1935 का जो भाग वास्तव में 1 अप्रैल 1937 को प्रभावी हुआ, वह था ‘प्रांतीय स्वायत्तता’ (Provincial Autonomy)। इसके प्रमुख लक्षण निम्नलिखित थे:
- प्रांतों में द्वैध शासन की समाप्ति: 1919 के अधिनियम द्वारा प्रांतों में स्थापित असफल द्वैध शासन (आरक्षित व हस्तांतरित विषयों का विभाजन) को समाप्त कर दिया गया और प्रांतों को एक स्वतंत्र व स्वायत्त संवैधानिक दर्जा दिया गया।
- उत्तरदायी प्रांतीय सरकारें: प्रांतीय प्रशासन अब जनता द्वारा निर्वाचित विधानमंडलों के प्रति उत्तरदायी भारतीय मंत्रियों के हाथों में सौंप दिया गया।
- गवर्नर के विवेकाधीन अधिकार (Discretionary Powers): स्वायत्तता के बावजूद ब्रिटिश गवर्नर को व्यापक वीटो पावर, अध्यादेश जारी करने की शक्ति और विशेष जिम्मेदारियां दी गईं।
- धारा 93 (Section 93): यदि प्रांतीय सरकार संविधान के अनुसार चलने में असमर्थ हो, तो गवर्नर को संपूर्ण प्रांतीय शासन अपने हाथों में लेने (गवर्नर शासन) का अधिकार था (यह स्वतंत्र भारत के अनुच्छेद 356 का पूर्ववर्ती था)।
4. केंद्र में द्वैध शासन (Dyarchy at the Centre)
1935 के अधिनियम ने प्रांतों से द्वैध शासन हटाकर उसे केंद्र (Federal Government) में लागू करने का प्रावधान किया:
1. आरक्षित विषय (Reserved Subjects)
रक्षा (Defence), विदेश मामले (External Affairs), धार्मिक मामले (Ecclesiastical Affairs) और जनजातीय क्षेत्र (Tribal Areas)। इन विषयों का प्रशासन वायसराय अपनी 3 सदस्यीय कार्यकारी परिषद के माध्यम से चलाता था, जो केंद्रीय विधायिका के प्रति उत्तरदायी नहीं थी।
2. हस्तांतरित विषय (Transferred Subjects)
आरक्षित विषयों के अतिरिक्त सभी प्रशासनिक विषय। इनका प्रशासन वायसराय लोकप्रिय मंत्रियों की सलाह पर करता था, जो केंद्रीय विधायिका के प्रति उत्तरदायी होते थे।
द्विसदनीय केंद्रीय व्यवस्थापिका (Bicameral Federal Legislature):
- काउंसिल ऑफ स्टेट (Council of State – उच्च सदन): यह एक स्थायी सदन था जिसमें कुल 260 सदस्य (156 ब्रिटिश प्रांतों से और 104 देशी रियासतों से) थे। एक-तिहाई सदस्य प्रति तीसरे वर्ष सेवानिवृत्त होते थे।
- फेडरल असेंबली (Federal Assembly – निचला सदन): इसका कार्यकाल 5 वर्ष था। इसमें कुल 375 सदस्य (250 ब्रिटिश प्रांतों से और 125 देशी रियासतों के मनोनीत प्रतिनिधि) थे। विडंबना यह थी कि उच्च सदन के लिए प्रत्यक्ष निर्वाचन और निम्न सदन के लिए अप्रत्यक्ष निर्वाचन की व्यवस्था की गई थी।
5. शक्तियों का त्रिपक्षीय विभाजन (Division of Powers)
केंद्र और प्रांतों के बीच विधायी शक्तियों का स्पष्ट विभाजन करने के लिए तीन विस्तृत सूचियां बनाई गईं (जो वर्तमान भारतीय संविधान की 7वीं अनुसूची का आधार बनीं):
| सूची का नाम | कुल विषय | प्रमुख उदाहरण | विधि निर्माण का अधिकार |
|---|---|---|---|
| संघ सूची (Federal List) | 59 विषय | रक्षा, वैदेशिक मामले, मुद्रा, डाक-तार, नौसेना, जनगणना आदि। | केंद्रीय विधायिका |
| प्रांतीय सूची (Provincial List) | 54 विषय | पुलिस, प्रांतीय लोक सेवा, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्थानीय स्वशासन, भू-राजस्व आदि। | प्रांतीय विधानमंडल |
| समवर्ती सूची (Concurrent List) | 36 विषय | दंड विधि, दीवानी प्रक्रिया, विवाह व तलाक, श्रम कल्याण, कारखाने आदि। | केंद्र और प्रांत दोनों (टकराव की स्थिति में केंद्रीय विधि प्रभावी) |
💡 UPSC प्रारंभिक परीक्षा का विशेष प्रश्न: 1935 के अधिनियम के तहत अवशिष्ट शक्तियां (Residuary Powers) न तो केंद्र को दी गई थीं और न ही प्रांतों को; बल्कि वे सीधे गवर्नर-जनरल (वायसराय) के विवेकाधिकार में निहित की गई थीं।
6. अन्य प्रमुख संस्थागत एवं प्रशासनिक प्रावधान
- संघीय न्यायालय (Federal Court) की स्थापना: 1 अक्टूबर 1937 को दिल्ली में एक संघीय न्यायालय स्थापित किया गया। इसमें एक मुख्य न्यायाधीश और अधिकतम 6 अन्य न्यायाधीश हो सकते थे। इसके प्रथम मुख्य न्यायाधीश सर मॉरिस ग्वेयर (Sir Maurice Gwyer) थे। ध्यान रहे कि यह अंतिम अपीलीय अदालत नहीं थी; इसके निर्णयों के विरुद्ध लंदन स्थित प्रिवी काउंसिल (Privy Council) में अपील की जा सकती थी।
- भारतीय रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India – RBI): देश की मुद्रा और साख नियंत्रण हेतु 1 अप्रैल 1935 को हिल्टन-यंग कमीशन की सिफारिशों व 1934 के आरबीआई एक्ट के तहत आरबीआई की स्थापना की गई।
- लोक सेवा आयोग: केंद्र में संघीय लोक सेवा आयोग (Federal Public Service Commission – FPSC), प्रांतों में प्रांतीय लोक सेवा आयोग और दो या अधिक प्रांतों हेतु संयुक्त लोक सेवा आयोग का प्रावधान किया गया।
- बर्मा एवं अदन का पृथक्करण: 1937 में बर्मा (म्यांमार) को भारत के प्रशासन से पूर्णतः अलग कर एक पृथक ब्रिटिश उपनिवेश बना दिया गया। इसी प्रकार अदन (Aden) को भी भारत सरकार के नियंत्रण से मुक्त कर क्राउन कॉलोनी बनाया गया।
- दो नए प्रांतों का सृजन: 1 अप्रैल 1936 को बिहार से अलग कर उड़ीसा (Orissa) तथा बंबई प्रेसीडेंसी से अलग कर सिंध (Sindh) दो नए प्रांत बनाए गए। कुल ब्रिटिश प्रांतों की संख्या 9 से बढ़कर 11 हो गई।
- भारत परिषद (Council of India) का उन्मूलन: 1858 के अधिनियम द्वारा भारत सचिव की सहायता के लिए स्थापित 15 सदस्यीय ‘भारत परिषद’ को समाप्त कर दिया गया और केवल कुछ परामर्शदाता नियुक्त किए गए।
- सांप्रदायिक निर्वाचन एवं मताधिकार का विस्तार: दलित वर्गों (अनुसूचित जातियों), महिलाओं और श्रमिकों के लिए भी पृथक निर्वाचन मंडल का विस्तार किया गया। संपत्ति, शिक्षा व कर अदायगी के आधार पर लगभग 10% से 14% जनसंख्या को मताधिकार प्राप्त हुआ।
7. 1935 के अधिनियम पर भारतीय नेताओं की ऐतिहासिक प्रतिक्रियाएं
कांग्रेस, मुस्लिम लीग और अन्य राष्ट्रीय नेताओं ने इस अधिनियम के प्रति तीखा असंतोष व्यक्त किया। सिविल सेवा परीक्षाओं में विभिन्न नेताओं के निम्नलिखित कथन बार-बार पूछे जाते हैं:
पंडित जवाहरलाल नेहरू
“यह एक ऐसी मशीन है जिसमें अनेक ब्रेक तो हैं, परंतु कोई इंजन नहीं है।” (A car with all brakes and no engine) तथा “यह गुलामी का नया अधिकार-पत्र (Charter of Slavery) है।”
मोहम्मद अली जिन्ना
“यह अधिनियम पूरी तरह सड़ा हुआ, मौलिक रूप से खराब और पूर्णतः अस्वीकार्य है।” (Thoroughly rotten, fundamentally bad, and totally unacceptable)
पंडित मदन मोहन मालवीय
“यह अधिनियम बाहर से कुछ हद तक लोकतांत्रिक दिखता है, परंतु भीतर से पूर्णतः खोखला और तानाशाहीपूर्ण है।”
चक्रवर्ती राजगोपालाचारी
“यह नई प्रांतीय व्यवस्था पुरानी द्वैध शासन प्रणाली से भी अधिक बदतर और भ्रामक है।”
8. 1937 के प्रांतीय चुनाव: जनादेश एवं परिणाम
1935 के अधिनियम के तहत फरवरी 1937 में 11 ब्रिटिश भारतीय प्रांतों में चुनाव कराए गए। कांग्रेस के 1936 के लखनऊ एवं फैजपुर अधिवेशनों में गहन बहस के बाद चुनाव में भाग लेने का निर्णय हुआ। जवाहरलाल नेहरू ने चुनाव अभियान का धुआंधार नेतृत्व किया।
चुनावी परिणाम (Electoral Verdict): 11 प्रांतों की कुल 1,585 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस ने 1,161 सीटों पर चुनाव लड़ा और 716 सीटों पर ऐतिहासिक विजय दर्ज की:
- 5 प्रांतों में पूर्ण बहुमत: मद्रास (159/215), संयुक्त प्रांत (134/228), मध्य प्रांत (70/112), बिहार (98/152) और उड़ीसा (36/60)।
- बंबई प्रेसीडेंसी: 175 में से 86 सीटें (लगभग स्पष्ट बहुमत, सहयोगियों के साथ सरकार बनाई)।
- असम एवं पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत (NWFP): कांग्रेस सबसे बड़ा दल बनकर उभरी और बाद में मिली-जुली सरकार बनाई।
- कुल 8 प्रांतों में कांग्रेस सरकारें: 11 में से कुल 8 प्रांतों (मद्रास, बंबई, मध्य प्रांत, उड़ीसा, बिहार, संयुक्त प्रांत, NWFP, असम) में कांग्रेस के प्रीमियर बने।
- 3 गैर-कांग्रेसी प्रांत: बंगाल (फजलुल हक की ‘कृषक प्रजा पार्टी’ व मुस्लिम लीग की गठबंधन सरकार), पंजाब (सर सिकंदर हयात खान की ‘यूनियनिस्ट पार्टी’) तथा सिंध (गुलाम हुसैन हिदायतुल्लाह / अल्लाह बख्श की मिलीजुली सरकार)।
- मुस्लिम लीग की स्थिति: मुस्लिम लीग का प्रदर्शन अत्यंत निराशाजनक रहा। वह कुल 482 आरक्षित मुस्लिम सीटों में से मात्र 109 सीटें (25% से भी कम) जीत सकी और मुस्लिम बहुल प्रांतों (पंजाब, बंगाल, सिंध, NWFP) में कहीं भी अपनी सरकार नहीं बना पाई।
9. 11 प्रांतों के प्रधानमंत्री (Premiers) एवं मंत्रिमंडलों का विवरण
1935 के अधिनियम के तहत प्रांतीय सरकारों के प्रमुख को उस समय ‘प्रधानमंत्री’ (Premier) कहा जाता था। जुलाई 1937 में कांग्रेस ने पद ग्रहण किया:
| क्र.सं. | प्रांत का नाम | प्रधानमंत्री (Premier) | सत्तारूढ़ दल / गठबंधन | विशेष विवरण |
|---|---|---|---|---|
| 1. | संयुक्त प्रांत (United Provinces) | गोविंद वल्लभ पंत | कांग्रेस (पूर्ण बहुमत) | रफी अहमद किदवई (राजस्व) व डॉ. कैलाश नाथ काटजू (न्याय) मंत्री बने; विजयलक्ष्मी पंडित प्रथम महिला कैबिनेट मंत्री बनीं। |
| 2. | बिहार (Bihar) | श्रीकृष्ण सिंह (Sri Krishna Sinha) | कांग्रेस (पूर्ण बहुमत) | अनुग्रह नारायण सिन्हा उप-प्रधानमंत्री व वित्त मंत्री बने। काश्तकारी अधिनियम में संशोधन किया गया। |
| 3. | मद्रास (Madras) | चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (C. Rajagopalachari) | कांग्रेस (प्रचंड बहुमत) | सलेम जिले में मद्यनिषेध लागू किया; बिक्री कर (Sales Tax) लगाया; मंदिर प्रवेश कानून पारित कराया। |
| 4. | मध्य प्रांत एवं बरार (Central Provinces) | डॉ. एन.बी. खरे (बाद में पं. रविशंकर शुक्ल) | कांग्रेस (पूर्ण बहुमत) | जुलाई 1938 में आंतरिक मतभेद के कारण खरे के स्थान पर पंडित रविशंकर शुक्ल प्रीमियर बने। |
| 5. | बंबई (Bombay) | बी.जी. खेर (B.G. Kher) | कांग्रेस गठबंधन | के.एम. मुंशी गृह मंत्री बने। औद्योगिक विवाद निवारण अधिनियम (1938) पारित हुआ। |
| 6. | उड़ीसा (Orissa) | विश्वनाथ दास (Bishwanath Das) | कांग्रेस (पूर्ण बहुमत) | नित्यानंद कानूनगो व बोधराम दुबे मंत्री बने; उड़ीसा काश्तकारी विधेयक पारित हुआ। |
| 7. | पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत (NWFP) | डॉ. खान साहब (Dr. Khan Sahib) | कांग्रेस गठबंधन | खान अब्दुल गफ्फार खान के बड़े भाई; सितंबर 1937 में गैर-कांग्रेसी सरकार गिराकर कांग्रेस मंत्रिमंडल बना। |
| 8. | असम (Assam) | गोपीनाथ बोरदोलोई (Gopinath Bordoloi) | कांग्रेस गठबंधन (सितंबर 1938 से) | प्रारंभ में सर मुहम्मद सादुल्ला (गठबंधन) प्रीमियर थे; सितंबर 1938 में उनके इस्तीफे पर बोरदोलोई बने। |
| 9. | बंगाल (Bengal) | ए.के. फजलुल हक (A.K. Fazlul Huq) | कृषक प्रजा पार्टी + मुस्लिम लीग | बंगाल काश्तकारी कानून और कृषि ऋण मुक्ति कानून बनाए गए। |
| 10. | पंजाब (Punjab) | सर सिकंदर हयात खान (Sikandar Hayat Khan) | यूनियनिस्ट पार्टी (Unionist Party) | सर छोटू राम प्रमुख मंत्री थे; कृषक राहत और ऋण निवारण अधिनियम बनाए। |
| 11. | सिंध (Sindh) | सर गुलाम हुसैन हिदायतुल्लाह / अल्लाह बख्श | सिंध यूनाइटेड पार्टी / निर्दलीय गठबंधन | 1938 में अल्लाह बख्श प्रीमियर बने, जिन्हें कांग्रेस का बाहर से समर्थन प्राप्त था। |
10. 28 माह का कांग्रेस शासन (1937–1939): प्रमुख उपलब्धियां व कार्य
जुलाई 1937 से अक्टूबर 1939 तक कुल 28 महीने कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने प्रांतों में शासन किया। कांग्रेस कार्यसमिति ने प्रांतीय मंत्रिमंडलों के मार्गदर्शन और समन्वय हेतु एक संसदीय उप-समिति (Parliamentary Sub-Committee) बनाई, जिसमें तीन शीर्ष नेता शामिल थे: सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद और डॉ. राजेंद्र प्रसाद।
🌱 28 माह के कांग्रेस शासन के प्रमुख ऐतिहासिक सुधार
- नागरिक स्वतंत्रताओं की बहाली: राजनीतिक बंदियों को रिहा किया गया; आपातकालीन कानूनों व प्रेस पर लगी पाबंदियों को हटाया गया; हिंदुस्तान सेवा दल और कई क्रांतिकारी संगठनों पर लगे प्रतिबंध समाप्त किए गए।
- कृषक सुधार (Agrarian Reforms): संयुक्त प्रांत काश्तकारी कानून (Tenancy Act 1939), बिहार काश्तकारी संशोधन अधिनियम और उड़ीसा काश्तकारी अधिनियम पारित कर किसानों को बेदखली से सुरक्षा दी गई और लगान कम किए गए। साहूकारों के ब्याज की दरें सीमित की गईं।
- श्रम सुधार: बंबई औद्योगिक विवाद अधिनियम (1938) पारित हुआ। कपड़ा मिल मजदूरों की मजदूरी में वृद्धि हेतु जांच समितियां बैठाई गईं।
- सामाजिक व शैक्षिक सुधार (वर्धा योजना 1937): अक्टूबर 1937 में वर्धा में आयोजित अखिल भारतीय राष्ट्रीय शिक्षा सम्मेलन में महात्मा गांधी ने ‘बुनियादी शिक्षा’ (Nai Talim / Basic Education) का विचार रखा। इसके पाठ्यक्रम निर्माण हेतु डॉ. जाकिर हुसैन समिति गठित की गई, जिसने हस्तशिल्प और मातृभाषा आधारित 7 वर्ष की अनिवार्य शिक्षा की रूपरेखा तैयार की।
- हरिजन कल्याण एवं मद्यनिषेध: मद्रास में सी. राजगोपालाचारी ने मद्यनिषेध लागू किया और 1938 में ऐतिहासिक ‘मंदिर प्रवेश प्राधिकरण एवं क्षतिपूर्ति अधिनियम’ पारित कराया।
- राष्ट्रीय योजना समिति (National Planning Committee 1938): अक्टूबर 1938 में कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष चंद्र बोस ने देश के आर्थिक पुनर्निर्माण हेतु पहली बार राष्ट्रीय योजना समिति के गठन की घोषणा की और पंडित जवाहरलाल नेहरू को इसका अध्यक्ष नियुक्त किया। इसके सचिव प्रोफेसर के.टी. शाह थे। यह स्वतंत्र भारत के योजना आयोग का बीज रूप था।
11. द्वितीय विश्व युद्ध एवं कांग्रेस मंत्रिमंडलों का ऐतिहासिक त्यागपत्र
1 सितंबर 1939 को जर्मनी के पोलैंड पर आक्रमण के साथ द्वितीय विश्व युद्ध प्रारंभ हो गया। 3 सितंबर 1939 को ब्रिटिश सरकार ने जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।
भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो (Lord Linlithgow) ने भारतीय जनप्रतिनिधियों अथवा प्रांतीय मंत्रिमंडलों से कोई परामर्श किए बिना एकतरफा घोषणा कर दी कि “भारत भी ब्रिटेन की ओर से युद्धरत है”। इसके साथ ही भारत में आपातकाल लागू कर प्रांतीय स्वायत्तता के अधिकारों को सीमित कर दिया गया।
कांग्रेस का रुख: कांग्रेस ने स्पष्ट किया कि यद्यपि वह फासीवाद और नाजीवाद की विरोधी है, परंतु जब तक ब्रिटेन भारत के युद्ध-उद्देश्यों (War Aims) को स्पष्ट नहीं करता और केंद्र में वास्तविक उत्तरदायी अंतरिम सरकार स्थापित नहीं करता, तब तक एक गुलाम देश दूसरे की स्वतंत्रता की रक्षा हेतु युद्ध में भाग नहीं ले सकता।
ब्रिटिश सरकार की हठधर्मिता के विरोध में कांग्रेस कार्यसमिति के निर्देश पर 22 अक्टूबर 1939 को सभी 8 प्रांतों के कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने एक साथ त्यागपत्र (Resignation) दे दिया। इस प्रकार 28 माह के कांग्रेस शासन का अंत हो गया।
⚡ मुस्लिम लीग का ‘मुक्ति दिवस’ (Day of Deliverance – 22 दिसंबर 1939)
कांग्रेस मंत्रिमंडलों के इस्तीफे पर प्रसन्न होकर मोहम्मद अली जिन्ना ने भारतीय मुसलमानों से 22 दिसंबर 1939 (शुक्रवार) को ‘मुक्ति दिवस’ (Day of Deliverance) अथवा ‘धन्यवाद दिवस’ (Day of Thanksgiving) के रूप में मनाने का आह्वान किया। जिन्ना ने आरोप लगाया कि कांग्रेस शासन हिंदुओं का एकाधिकारवादी शासन था। उल्लेखनीय है कि इस अवसर पर डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने भी मुस्लिम लीग के साथ मिलकर मुक्ति दिवस में भाग लिया था।
12. हरिपुरा अधिवेशन (1938) से त्रिपुरी संकट (1939) और फॉरवर्ड ब्लॉक
1930 के दशक के उत्तरार्ध में कांग्रेस के भीतर वामपंथी और जुझारू समाजवादी धारा अत्यंत शक्तिशाली हो चुकी थी, जिसके प्रमुख प्रवक्ता सुभाष चंद्र बोस थे।
क. हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन (फरवरी 1938)
गुजरात के सूरत जिले में स्थित हरिपुरा में कांग्रेस का 51वां वार्षिक अधिवेशन आयोजित हुआ। इस अधिवेशन में सुभाष चंद्र बोस निर्विरोध अध्यक्ष चुने गए। हरिपुरा अधिवेशन में मुख्य रूप से देशी रियासतों के प्रजामंडलों के आंदोलन को नैतिक समर्थन देने का प्रस्ताव पारित हुआ तथा आधुनिक उद्योगों एवं योजनाबद्ध आर्थिक विकास हेतु राष्ट्रीय योजना समिति (National Planning Committee) का गठन किया गया, जिसकी अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू को सौंपी गई।
ख. त्रिपुरी अधिवेशन और अध्यक्ष पद का चुनाव (जनवरी – मार्च 1939)
1939 में मध्य प्रांत के जबलपुर के निकट त्रिपुरी (Tripuri) में कांग्रेस अधिवेशन होना था। सुभाष चंद्र बोस ने अंतरराष्ट्रीय युद्ध की आहट को देखते हुए ब्रिटिश सरकार को 6 माह का अल्टीमेटम देकर देशव्यापी जन-आंदोलन छेड़ने का प्रस्ताव रखा। वे पुनः अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ना चाहते थे।
महात्मा गांधी और कांग्रेस का दक्षिणपंथी खेमा (सरदार पटेल, राजेंद्र प्रसाद आदि) सुभाष बोस के आक्रामक रुख के पक्ष में नहीं थे। गांधीजी ने पहले मौलाना आजाद और फिर आंध्र प्रदेश के नेता डॉ. पट्टाभि सीतारमैया (Dr. Pattabhi Sitaramayya) को अपना आधिकारिक उम्मीदवार बनाया।
🗳️ 29 जनवरी 1939 का ऐतिहासिक चुनावी परिणाम
कांग्रेस के 54 वर्षों के इतिहास में यह अध्यक्ष पद का पहला खुला लोकतांत्रिक मुकाबला था:
- सुभाष चंद्र बोस: 1,580 मत (विजेता)
- डॉ. पट्टाभि सीतारमैया: 1,377 मत
- सुभाष चंद्र बोस 203 मतों के अंतर से विजयी घोषित हुए।
गांधीजी का ऐतिहासिक बयान: “पट्टाभि की हार मेरी अपनी हार है।” (Pattabhi’s defeat is my defeat.)
ग. त्रिपुरी संकट और गोविंद वल्लभ पंत प्रस्ताव (मार्च 1939)
जब मार्च 1939 में त्रिपुरी अधिवेशन हुआ, तब सुभाष चंद्र बोस गंभीर रूप से बीमार (104°F तेज बुखार) थे और उन्हें स्ट्रेचर पर लाया गया था। अधिवेशन में संयुक्त प्रांत के प्रीमियर गोविंद वल्लभ पंत (Govind Ballabh Pant) ने एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पेश किया:
“कांग्रेस कार्यसमिति के सभी 14 सदस्यों का मनोनयन केवल महात्मा गांधी की इच्छा और परामर्श के अनुसार ही किया जाएगा।”
यह प्रस्ताव भारी बहुमत से पारित हो गया। इसके बाद गांधीजी ने कार्यसमिति के सदस्यों के नाम सुझाने से इनकार कर दिया और सुभाष बोस से अपनी मर्जी से टीम बनाने को कहा, जबकि पुरानी कार्यसमिति के 12 सदस्यों (पटेल, राजेंद्र प्रसाद आदि) ने पहले ही त्यागपत्र दे दिया था। नेहरू ने तटस्थ रुख अपनाया।
घ. सुभाष बोस का त्यागपत्र एवं फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना
- वैचारिक गतिरोध और कार्यसमिति के गठन में असहयोग के कारण सुभाष चंद्र बोस ने 29 अप्रैल 1939 को अखिल भारतीय कांग्रेस कार्यसमिति (कलकत्ता बैठक) में कांग्रेस अध्यक्ष पद से औपचारिक त्यागपत्र (Resignation) दे दिया।
- सुभाष बोस के त्यागपत्र के बाद डॉ. राजेंद्र प्रसाद को 1939 के शेष कार्यकाल के लिए कांग्रेस का नया अध्यक्ष चुना गया।
- अध्यक्ष पद छोड़ने के तुरंत बाद सुभाष चंद्र बोस ने 3 मई 1939 को कलकत्ता में कांग्रेस के भीतर ही वामपंथी और जुझारू राष्ट्रवादियों को संगठित करने के लिए ‘फॉरवर्ड ब्लॉक’ (Forward Bloc) की स्थापना की।
- अगस्त 1939 में प्रांतीय सरकारों के निर्णयों के विरुद्ध सार्वजनिक प्रदर्शन करने के कारण कांग्रेस कार्यसमिति ने सुभाष चंद्र बोस को बंगाल प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद से हटा दिया और 3 वर्षों के लिए कांग्रेस के किसी भी निर्वाचित पद पर रहने के अयोग्य घोषित कर दिया।
13. तुलनात्मक विश्लेषण सारणी: 1919 का अधिनियम बनाम 1935 का अधिनियम
| मापदंड / विषय | भारत शासन अधिनियम 1919 | भारत शासन अधिनियम 1935 |
|---|---|---|
| प्रांतों में शासन प्रणाली | द्वैध शासन (Dyarchy) लागू किया गया (आरक्षित व हस्तांतरित विषय)। | द्वैध शासन समाप्त; प्रांतीय स्वायत्तता (Provincial Autonomy) लागू। |
| केंद्र में शासन प्रणाली | एकात्मक शासन; द्विसदनीय विधायिका किंतु कोई द्वैध शासन नहीं। | केंद्र में द्वैध शासन का प्रावधान (आरक्षित व हस्तांतरित विषय)। |
| अखिल भारतीय संघ | कोई परिकल्पना नहीं थी। | ब्रिटिश प्रांतों व देशी रियासतों को मिलाकर अखिल भारतीय संघ का प्रस्ताव। |
| विधायी सूचियां | केवल 2 सूचियां: केंद्रीय विषय और प्रांतीय विषय। | 3 विस्तृत सूचियां: संघ सूची (59), प्रांतीय सूची (54), समवर्ती सूची (36)। |
| अवशिष्ट शक्तियां (Residuary) | केंद्रीय सरकार/गवर्नर-जनरल में। | सीधे वायसराय (गवर्नर-जनरल) के विवेकाधिकार में निहित। |
| न्यायिक ढांचा | कोई केंद्रीय/संघीय न्यायालय नहीं। | संघीय न्यायालय (Federal Court 1937) की स्थापना। |
| सांप्रदायिक निर्वाचन | मुस्लिम, सिख, भारतीय ईसाई, आंग्ल-भारतीय व यूरोपीय तक सीमित। | विस्तार कर दलित वर्ग (SC), महिला एवं श्रमिकों को भी शामिल किया। |
| मताधिकार का दायरा | लगभग 3% वयस्क जनसंख्या। | बढ़कर लगभग 10% से 14% जनसंख्या तक पहुंचा। |
14. परीक्षा हेतु 20 त्वरित स्मरणीय तथ्य (High-Yield Quick Revision Points)
- 1935 अधिनियम का मूल आधार: साइमन कमीशन रिपोर्ट, तीनों गोलमेज सम्मेलन, 1933 का व्हाइट पेपर और लॉर्ड लिनलिथगो की संयुक्त प्रवर समिति रिपोर्ट।
- अधिनियम की धाराएं व अनुसूचियां: कुल 321 धाराएं (Sections) और 10 अनुसूचियां (Schedules); कोई पृथक प्रस्तावना नहीं थी।
- अखिल भारतीय संघ का न बनना: देशी रियासतों के राजाओं द्वारा निर्धारित न्यूनतम कोटे के विलय पत्र पर हस्ताक्षर न करने के कारण संघ कभी अस्तित्व में नहीं आया।
- प्रांतीय स्वायत्तता लागू होने की तिथि: 1 अप्रैल 1937 को प्रांतीय स्वायत्तता औपचारिक रूप से लागू की गई।
- अवशिष्ट शक्तियां: 1935 के अधिनियम में अवशिष्ट विधायी शक्तियां गवर्नर-जनरल (वायसराय) के पास थीं।
- संघीय न्यायालय (Federal Court): 1 अक्टूबर 1937 को दिल्ली में स्थापित हुआ; प्रथम मुख्य न्यायाधीश सर मॉरिस ग्वेयर थे।
- बर्मा का पृथक्करण: 1935 के अधिनियम के प्रावधानों के तहत 1937 में बर्मा को भारत से अलग किया गया।
- 1936 में बने दो नए प्रांत: उड़ीसा (बिहार से अलग) और सिंध (बंबई प्रेसीडेंसी से अलग)।
- नेहरू का प्रसिद्ध कथन: 1935 के अधिनियम को “अनेक ब्रेकों वाली इंजन रहित गाड़ी” और “गुलामी का अधिकार पत्र” कहा।
- जिन्ना का कथन: अधिनियम को “पूरी तरह सड़ा हुआ, मौलिक रूप से खराब और अस्वीकार्य” कहा।
- 1937 के चुनावों में कांग्रेस की सीटें: कुल 1,585 प्रांतीय विधानसभा सीटों में से कांग्रेस ने 716 सीटें जीतीं।
- पूर्ण बहुमत वाले 5 प्रांत: मद्रास, संयुक्त प्रांत, मध्य प्रांत, बिहार और उड़ीसा।
- संयुक्त प्रांत के प्रीमियर: पंडित गोविंद वल्लभ पंत (रफी अहमद किदवई राजस्व मंत्री तथा विजयलक्ष्मी पंडित स्वास्थ्य मंत्री बनीं)।
- मद्रास के प्रीमियर: चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (जिन्होंने पहली बार बिक्री कर और मद्यनिषेध लागू किया)।
- 28 माह के शासन का कार्यकाल: जुलाई 1937 से अक्टूबर 1939 तक।
- मंत्रिमंडलों का त्यागपत्र (22 अक्टूबर 1939): भारतीयों की सहमति के बिना वायसराय लिनलिथगो द्वारा भारत को द्वितीय विश्व युद्ध में झोंकने के विरोध में।
- मुक्ति दिवस (22 दिसंबर 1939): मुस्लिम लीग (जिन्ना) और डॉ. बी.आर. अंबेडकर द्वारा कांग्रेस मंत्रिमंडलों के त्यागपत्र पर मनाया गया।
- हरिपुरा अधिवेशन (1938): सुभाष चंद्र बोस निर्विरोध अध्यक्ष बने; राष्ट्रीय योजना समिति गठित हुई (अध्यक्ष: जवाहरलाल नेहरू)।
- त्रिपुरी चुनाव (जनवरी 1939): सुभाष बोस ने गांधीजी समर्थित उम्मीदवार डॉ. पट्टाभि सीतारमैया को 203 मतों से पराजित किया (1580 बनाम 1377 मत)।
- फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना: 3 मई 1939 को सुभाष चंद्र बोस ने कलकत्ता (मकरंद) में कांग्रेस के भीतर फॉरवर्ड ब्लॉक का गठन किया।
👉 आगे पढ़ें (अध्याय 10): 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध प्रारंभ होने के बाद वायसराय लिनलिथगो का अगस्त प्रस्ताव (1940), व्यक्तिगत सत्याग्रह, क्रिप्स मिशन (1942), 8 अगस्त 1942 का ऐतिहासिक ‘करो या मरो’ उद्घोष तथा नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा आजाद हिंद फौज के गठन का संपूर्ण अध्ययन करने हेतु पढ़ें — भारत छोड़ो आंदोलन (1942) एवं आजाद हिंद फौज (INA) संपूर्ण नोट्स
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इस पूरे अध्याय के प्रत्येक सूक्ष्म ऐतिहासिक व संवैधानिक पहलू (व्हाइट पेपर, लिनलिथगो समिति, अखिल भारतीय संघ, प्रांतीय स्वायत्तता, तीनों विधायी सूचियां, संघीय न्यायालय, 1937 चुनाव परिणाम, 11 प्रांतों के प्रीमियर, 28 माह का शासन, वर्धा योजना, द्वितीय विश्व युद्ध त्यागपत्र, मुक्ति दिवस, हरिपुरा व त्रिपुरी संकट, गोविंद वल्लभ पंत प्रस्ताव एवं फॉरवर्ड ब्लॉक) पर आधारित 200 बहुविकल्पीय प्रश्नों (10 टेस्ट्स) का अभ्यास करें। Mock Test 1 पूर्णतः निःशुल्क है!
15. UPSC एवं State PCS हेतु 10 अभ्यास बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तरी (Model MCQs)
Q1. भारत शासन अधिनियम 1935 के तहत प्रस्तावित ‘अखिल भारतीय संघ’ (All India Federation) के लागू न हो पाने का मुख्य कारण क्या था?
(A) मुस्लिम लीग ने इसका पूर्ण विरोध किया था (B) ब्रिटिश संसद ने इसे अंतिम समय में अस्वीकार कर दिया था
(C) देशी रियासतों ने संघ में शामिल होने के लिए निर्धारित शर्तों के अनुसार सहमति पत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए (D) कांग्रेस ने इसके विरोध में सविनय अवज्ञा आंदोलन छेड़ दिया था
उत्तर व्याख्या: अधिनियम की शर्त के अनुसार कुल रियासती जनसंख्या का 50% प्रतिनिधित्व करने वाली रियासतों का संघ में शामिल होना अनिवार्य था। देशी नरेश अपनी संप्रभुता और विशेषाधिकार खोने के डर से संघ में शामिल नहीं हुए, जिससे यह प्रावधान कभी लागू नहीं हो सका।
Q2. 1935 के भारत शासन अधिनियम में ‘अवशिष्ट विधायी शक्तियां’ (Residuary Legislative Powers) किसे सौंपी गई थीं?
(A) केंद्रीय संघीय व्यवस्थापिका को (B) प्रांतीय विधानमंडलों को (C) गवर्नर-जनरल (वायसराय) को (D) ब्रिटिश क्राउन को
उत्तर व्याख्या: 1935 के अधिनियम के तहत तीनों सूचियों (संघ, प्रांतीय, समवर्ती) से बाहर के किसी भी नए विषय पर कानून बनाने का अंतिम विवेकाधिकार गवर्नर-जनरल (वायसराय) को सौंपा गया था।
Q3. 1937 के प्रांतीय चुनावों के पश्चात गठित संयुक्त प्रांत (United Provinces) के मंत्रिमंडल में वित्त एवं राजस्व विभाग किसे सौंपा गया था?
(A) गोविंद वल्लभ पंत (B) रफी अहमद किदवई (Rafi Ahmad Kidwai) (C) कैलाश नाथ काटजू (D) मोहम्मद इस्माइल
उत्तर व्याख्या: संयुक्त प्रांत में पंडित गोविंद वल्लभ पंत प्रीमियर (प्रधानमंत्री) बने थे, जबकि वित्त व राजस्व विभाग रफी अहमद किदवई को तथा न्याय एवं उद्योग विभाग डॉ. कैलाश नाथ काटजू को सौंपा गया था।
Q4. 22 अक्टूबर 1939 को आठों प्रांतों में कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने सामूहिक त्यागपत्र क्यों दिया था?
(A) मुस्लिम लीग के सांप्रदायिक दंगों के विरोध में (B) ब्रिटिश सरकार द्वारा भूमि सुधार कानून रद्द करने के कारण
(C) भारतीय जनता व विधायिकाओं की सहमति के बिना वायसराय द्वारा भारत को द्वितीय विश्व युद्ध में शामिल करने के विरोध में (D) गांधीजी के अनशन के समर्थन में
उत्तर व्याख्या: 3 सितंबर 1939 को वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने बिना किसी भारतीय परामर्श के एकतरफा भारत को द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटिश पक्ष का भागीदार घोषित कर दिया था, जिसके विरोध में कांग्रेस ने त्यागपत्र दिया।
Q5. 1939 के त्रिपुरी कांग्रेस अधिवेशन में सुभाष चंद्र बोस के त्यागपत्र के पश्चात कांग्रेस का नया अध्यक्ष किसे चुना गया था?
(A) पट्टाभि सीतारमैया (B) पंडित जवाहरलाल नेहरू (C) डॉ. राजेंद्र प्रसाद (Dr. Rajendra Prasad) (D) मौलाना अबुल कलाम आजाद
उत्तर व्याख्या: 29 अप्रैल 1939 को कलकत्ता में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में सुभाष बोस द्वारा त्यागपत्र दिए जाने के बाद शेष कार्यकाल के लिए डॉ. राजेंद्र प्रसाद को अध्यक्ष बनाया गया था।
16. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ – Frequently Asked Questions)
Q1. भारत शासन अधिनियम 1935 को भारतीय संविधान का सबसे बड़ा स्रोत क्यों माना जाता है?
स्वतंत्र भारत के संविधान के लगभग 250 से अधिक अनुच्छेद या तो सीधे 1935 के अधिनियम से लिए गए हैं या उनमें मामूली भाषाई संशोधन किया गया है। संघीय ढांचा, राज्यपाल का पद, न्यायपालिका (सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट), लोक सेवा आयोग, आपातकालीन उपबंध तथा तीनों विधायी सूचियों का प्रारूप मूलतः 1935 के अधिनियम से ही अपनाया गया है।
Q2. 1937 के चुनावों में कांग्रेस ने कुल कितने प्रांतों में सरकारें बनाई थीं?
कांग्रेस ने कुल 11 प्रांतों में से 8 प्रांतों में अपनी सरकारें बनाई थीं। इनमें से 5 प्रांतों (मद्रास, संयुक्त प्रांत, मध्य प्रांत, बिहार, उड़ीसा) में पूर्ण बहुमत था; बंबई में लगभग पूर्ण बहुमत था; तथा असम और पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत (NWFP) में गठबंधन सरकारें बनाई थीं। केवल बंगाल, पंजाब और सिंध में गैर-कांग्रेसी सरकारें थीं।
Q3. त्रिपुरी संकट (Tripuri Crisis 1939) क्या था और इसका क्या परिणाम हुआ?
जनवरी 1939 में त्रिपुरी कांग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष पद के चुनाव में सुभाष चंद्र बोस ने गांधीजी समर्थित उम्मीदवार पट्टाभि सीतारमैया को पराजित कर दिया। इसके बाद गोविंद वल्लभ पंत के प्रस्ताव के तहत कार्यसमिति के गठन को लेकर गांधीजी और सुभाष बोस के बीच वैचारिक गतिरोध पैदा हो गया। परिणामस्वरूप 29 अप्रैल 1939 को सुभाष बोस ने त्यागपत्र दे दिया और 3 मई 1939 को ‘फॉरवर्ड ब्लॉक’ की स्थापना की। डॉ. राजेंद्र प्रसाद नए अध्यक्ष बने।
Q4. मुस्लिम लीग ने 22 दिसंबर 1939 को ‘मुक्ति दिवस’ (Day of Deliverance) क्यों मनाया?
ब्रिटिश वायसराय लिनलिथगो द्वारा बिना परामर्श भारत को द्वितीय विश्व युद्ध में शामिल करने के विरोध में 22 अक्टूबर 1939 को आठों प्रांतों के कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने सामूहिक त्यागपत्र दे दिया था। कांग्रेस शासन के अंत पर जश्न मनाते हुए मोहम्मद अली जिन्ना के आह्वान पर मुस्लिम लीग और डॉ. अंबेडकर ने 22 दिसंबर 1939 को ‘मुक्ति दिवस’ के रूप में मनाया।



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