1922 में चौरी-चौरा की घटना के बाद गांधीजी द्वारा असहयोग आंदोलन वापस लेने से देश में जो राजनीतिक शून्यता उत्पन्न हुई, उसने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को दो अत्यंत प्रभावशाली नई दिशाओं में मोड़ दिया। एक ओर चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू ने विधानमंडलों के भीतर जाकर औपनिवेशिक तंत्र को ध्वस्त करने हेतु ‘स्वराज पार्टी’ का गठन किया, तो दूसरी ओर युवाओं ने भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल और सूर्य सेन के नेतृत्व में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के जरिए सशस्त्र क्रांति का नया अध्याय लिखा। यह अध्याय साइमन कमीशन के बहिष्कार, नेहरू रिपोर्ट और 1929 के लाहौर अधिवेशन में ‘पूर्ण स्वराज’ की घोषणा तक के निर्णायक कालखंड का गहन विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है।
📚 आधुनिक भारत का इतिहास: श्रृंखला अनुक्रमणिका व अंतर्संबंधित कड़ियां
⬅️ पिछला अध्याय (अध्याय 5): गांधीवादी युग: चंपारण, रॉलेट व असहयोग आंदोलन (1915–1922)
➡️ अगला अध्याय (अध्याय 8): सविनय अवज्ञा आंदोलन, दांडी मार्च व पूना पैक्ट (1930–1934)
➡️ अध्याय 9: भारत शासन अधिनियम 1935 व प्रांतीय चुनाव (1935–1939)
➡️ अध्याय 10: भारत छोड़ो आंदोलन (1942) एवं आजाद हिंद फौज (INA)
1. स्वराज पार्टी की स्थापना एवं परिषद प्रवेश की राजनीति (1922–1926)
फरवरी 1922 में बारदोली प्रस्ताव द्वारा असहयोग आंदोलन की आकस्मिक वापसी और मार्च 1922 में महात्मा गांधी को 6 वर्ष के कारावास की सजा सुनाए जाने के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के समक्ष एक गंभीर गतिरोध उत्पन्न हो गया। इस निराशाजनक स्थिति से उबरने के लिए कांग्रेस नेतृत्व दो वैचारिक धाराओं में विभाजित हो गया:
🏛️ परिवर्तनवादी (Pro-Changers / स्वराजवादी)
प्रमुख नेता: चित्तरंजन दास (सी.आर. दास), पंडित मोतीलाल नेहरू, विट्ठलभाई पटेल, हकीम अजमल खां।
दृष्टिकोण: इनका तर्क था कि आंदोलन समाप्त होने से जनता में घोर निराशा फैल रही है। अतः 1919 के भारत शासन अधिनियम के तहत होने वाले विधान परिषदों के चुनावों में भाग लेना चाहिए और परिषदों के भीतर प्रवेश करके सरकार की दमनकारी नीतियों में ‘अंदर से निरंतर और संगठित गतिरोध’ पैदा करना चाहिए। वे परिषदों को औपनिवेशिक मुखौटा उतारने का मंच बनाना चाहते थे।
🛡️ अपरिवर्तनवादी (No-Changers / गांधीवादी)
प्रमुख नेता: सरदार वल्लभभाई पटेल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (सी. राजगोपालाचारी), डॉ. एम.ए. अंसारी।
दृष्टिकोण: इनका दृढ़ विश्वास था कि परिषदों में प्रवेश करने से नेताओं में सत्ता का मोह और पदलोलुपता आएगी, जिससे राष्ट्रीय संघर्ष की क्रांतिकारी धार कुंद हो जाएगी। इन्होंने परिषदों के बहिष्कार को जारी रखने तथा खादी, चरखा, मद्यनिषेध, राष्ट्रीय विद्यालय और अस्पृश्यता निवारण जैसे गांधीवादी रचनात्मक कार्यों पर ध्यान केंद्रित करने की वकालत की।
गया अधिवेशन (दिसंबर 1922) एवं पार्टी का गठन
दिसंबर 1922 में कांग्रेस का 37वां वार्षिक अधिवेशन गया (बिहार) में हुआ, जिसकी अध्यक्षता सी.आर. दास ने की। सी.आर. दास ने अपने अध्यक्षीय भाषण में परिषद प्रवेश का औपचारिक प्रस्ताव रखा, किंतु सी. राजगोपालाचारी के नेतृत्व में अपरिवर्तनवादियों ने 890 के मुकाबले 1748 मतों से इस प्रस्ताव को गिरा दिया।
इस पराजय के बाद सी.आर. दास ने कांग्रेस की अध्यक्षता से और मोतीलाल नेहरू ने महासचिव पद से त्यागपत्र दे दिया। 1 जनवरी 1923 को इलाहाबाद में उन्होंने ‘कांग्रेस-खिलाफत स्वराज पार्टी’ की विधिवत स्थापना की। चित्तरंजन दास को इसका अध्यक्ष और पंडित मोतीलाल नेहरू को सचिव चुना गया।
सितंबर 1923 का दिल्ली विशेष अधिवेशन (समझौता)
1907 के सूरत विभाजन की कड़वी यादों से सबक लेते हुए दोनों पक्षों ने टकराव टालने का निर्णय लिया। सितंबर 1923 में मौलाना अबुल कलाम आजाद की अध्यक्षता में दिल्ली में कांग्रेस का विशेष अधिवेशन हुआ, जिसमें कांग्रेस ने स्वराजियों को अपनी व्यक्तिगत हैसियत से चुनाव लड़ने की अनुमति दे दी। फरवरी 1924 में जेल से रिहा होने के बाद गांधीजी ने भी ‘गांधी-दास पैक्ट’ (नवंबर 1924) पर हस्ताक्षर कर स्वराज पार्टी को कांग्रेस का अभिन्न अंग स्वीकार कर लिया।
2. स्वराज पार्टी के चुनावी परिणाम एवं ऐतिहासिक उपलब्धियां
नवंबर 1923 में आयोजित केंद्रीय विधान परिषद और प्रांतीय परिषदों के चुनावों में स्वराज पार्टी को अप्रत्याशित सफलता मिली:
- केंद्रीय विधान परिषद: कुल 101 निर्वाचित सीटों में से स्वराजियों ने 42 सीटों पर शानदार विजय प्राप्त की।
- मध्य प्रांत (Central Provinces): स्वराज पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिला।
- बंगाल प्रेसीडेंसी: सी.आर. दास के नेतृत्व में यह सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी।
⭐ ऐतिहासिक मील का पत्थर: विट्ठलभाई पटेल का अध्यक्ष चुना जाना (1925)
अगस्त 1925 में स्वराज पार्टी के प्रमुख नेता विट्ठलभाई पटेल (सरदार वल्लभभाई पटेल के बड़े भाई) केंद्रीय लेजिस्लेटिव असेंबली (Central Legislative Assembly) के प्रथम भारतीय स्पीकर (अध्यक्ष) चुने गए। उन्होंने सरकारी अधिकारियों के प्रभुत्व को समाप्त कर असेंबली में भारतीय स्वाभिमान की मिसाल कायम की।
अन्य प्रमुख संसदीय उपलब्धियां:
- बजट में सरकारी प्रस्तावों की हार: स्वराजियों ने उदारवादियों (जैसे मदन मोहन मालवीय और जिन्ना के इंडिपेंडेंट ग्रुप) के साथ मिलकर सरकार के वित्तीय बजट को बार-बार खारिज किया, जिससे वायसराय को विशेषाधिकार (Veto/Certification) का उपयोग करने पर विवश होना पड़ा। इससे औपनिवेशिक शासन का निरंकुश चरित्र बेनकाब हुआ।
- मुंडीमैन समिति (Muddiman Committee, 1924): स्वराजियों के निरंतर दबाव पर सरकार ने 1919 के अधिनियम की द्वैध शासन प्रणाली की जांच हेतु गृह सचिव सर अलेक्जेंडर मुंडीमैन की अध्यक्षता में एक समिति गठित की।
- ली आयोग (Lee Commission, 1923) का विरोध: ब्रिटिश सिविल सेवकों को अतिरिक्त विशेषाधिकार देने वाली ली कमीशन की सिफारिशों को असेंबली में बहुमत से खारिज कराया।
- पब्लिक सेफ्टी बिल को गिराना (1928): कम्युनिस्टों और राष्ट्रवादियों के दमन हेतु लाए गए इस काले कानून को स्पीकर विट्ठलभाई पटेल ने अपने निर्णायक वोट (Casting Vote) से गिरा दिया था।
3. क्रांतिकारी आंदोलन का द्वितीय चरण (Second Revolutionary Phase): वैचारिक उत्थान
1920 के दशक के मध्य में भारतीय क्रांतिकारी राष्ट्रवाद में एक युगांतरकारी गुणात्मक परिवर्तन आया। प्रथम चरण (1905–1915) के क्रांतिकारी मुख्यतः व्यक्तिगत वीरता, बम-पिस्तौल और ब्रिटिश अधिकारियों की हत्या तक सीमित थे। किंतु द्वितीय चरण (1922–1934) के क्रांतिकारियों ने मार्क्सवाद, समाजवाद और सोवियत संघ की 1917 की बोल्शेविक क्रांति से गहरा वैचारिक मार्गदर्शन लिया।
💡 भगत सिंह का प्रसिद्ध कथन: “क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है… क्रांति से हमारा आशय केवल ब्रिटिश शासकों को हटाना नहीं, बल्कि मानव द्वारा मानव के शोषण का पूर्ण अंत करना और किसानों व मजदूरों के राज की स्थापना करना है।”
4. हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA – 1924) एवं काकोरी ट्रेन एक्शन (1925)
अक्टूबर 1924 में कानपुर में उत्तर भारत के प्रमुख युवा क्रांतिकारियों का एक गुप्त सम्मेलन आयोजित हुआ। इसमें हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) की स्थापना की गई। इसके संस्थापक सदस्यों में शचींद्रनाथ सान्याल, रामप्रसाद बिस्मिल, जोगेश चंद्र चटर्जी और चंद्रशेखर आजाद प्रमुख थे। शचींद्रनाथ सान्याल की पुस्तक ‘बंदी जीवन’ क्रांतिकारियों की गीता बन गई।
काकोरी ट्रेन एक्शन (9 अगस्त 1925)
संगठन के प्रचार और हथियार खरीदने के लिए धन की सख्त आवश्यकता थी। 9 अगस्त 1925 को रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में 10 क्रांतिकारियों ने लखनऊ के निकट काकोरी रेलवे स्टेशन पर सहारनपुर से लखनऊ आ रही 8-डाउन पैसेंजर ट्रेन को रोककर सरकारी रेलवे खजाना सफलतापूर्वक जब्त कर लिया।
ब्रिटिश प्रशासन ने इसके बाद व्यापक छापेमारी कर 29 क्रांतिकारियों को गिरफ्तार किया। इस ऐतिहासिक काकोरी षड्यंत्र केस में पंडित मदन मोहन मालवीय और गोविंद वल्लभ पंत ने बचाव पक्ष की पैरवी की। न्यायालय ने 4 महान देशभक्तों को फांसी की सजा सुनाई:
| अमर क्रांतिकारी | फांसी का स्थल (जेल) | ऐतिहासिक तथ्य / अंतिम शब्द |
|---|---|---|
| पंडित रामप्रसाद बिस्मिल | गोरखपुर जेल (19 दिसंबर 1927) | अंतिम शब्द: “मालिक तेरी रज़ा रहे और तू ही तू रहे…” तथा अमर गान ‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है’। |
| अशफाक उल्ला खां | फैजाबाद जेल (19 दिसंबर 1927) | फांसी के फंदे को चूमने वाले प्रथम रिकॉर्डेड मुस्लिम क्रांतिकारी। कुरान हाथ में लेकर फंदे पर झूले। |
| ठाकुर रोशन सिंह | नैनी जेल, प्रयागराज (19 दिसंबर 1927) | काकोरी ट्रेन में न होने के बावजूद अन्य गतिविधियों के कारण फांसी। |
| राजेंद्र लाहिड़ी | गोंडा जेल (17 दिसंबर 1927) | जन-विद्रोह के डर से अंग्रेजों ने निर्धारित तिथि से 2 दिन पूर्व ही फांसी दे दी। |
🎯 स्वराज पार्टी एवं क्रांतिकारी आंदोलन: 200 उच्च-स्तरीय प्रश्नों की टेस्ट सीरीज
इस अध्याय के प्रत्येक सूक्ष्म पहलू (HRA, काकोरी, भगत सिंह, सांडर्स वध, साइमन कमीशन, नेहरू रिपोर्ट) पर आधारित 10 मॉक टेस्ट उपलब्ध हैं। अपनी तैयारी को परखें:
5. हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA – 1928)
काकोरी कांड के बाद चंद्रशेखर आजाद पुलिस की गिरफ्त से बाहर रहे। उन्होंने पंजाब के युवा संगठन ‘पंजाब नौजवान भारत सभा’ (1926 में भगत सिंह द्वारा स्थापित) के साथियों के साथ मिलकर संगठन को पुनर्जीवित किया। 8-9 सितंबर 1928 को दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान के खंडहरों में एक ऐतिहासिक बैठक हुई।
भगत सिंह के आग्रह पर संगठन का नाम बदलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) कर दिया गया। चंद्रशेखर आजाद को इसके सैन्य विभाग (Commander-in-Chief) का प्रमुख बनाया गया। अब संगठन का लक्ष्य केवल स्वाधीनता नहीं, बल्कि मार्क्सवादी समाजवाद पर आधारित शोषण-मुक्त भारत की स्थापना था।
6. लाला लाजपत राय की शहादत एवं सांडर्स वध (17 दिसंबर 1928)
30 अक्टूबर 1928 को जब साइमन कमीशन लाहौर पहुंचा, तो लाला लाजपत राय के नेतृत्व में हजारों लोगों ने शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन किया। लाहौर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक जेम्स ए. स्कॉट (James A. Scott) के आदेश पर पुलिस ने लाला जी की छाती और सिर पर बेरहमी से लाठियां बरसाईं। घायल लाला जी ने दहाड़ते हुए कहा:
“मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत में आखिरी कील साबित होगी।”
17 नवंबर 1928 को लाला जी का देहांत हो गया। पूरे देश में शोक और प्रतिशोध की ज्वाला भड़क उठी। HSRA ने स्कॉट को मारकर राष्ट्रीय अपमान का बदला लेने की योजना बनाई। 17 दिसंबर 1928 को भगत सिंह, शिवराम राजगुरु और चंद्रशेखर आजाद ने लाहौर पुलिस मुख्यालय के सामने स्कॉट के भ्रम में सहायक पुलिस अधीक्षक जॉन पी. सांडर्स (J.P. Saunders) को गोलियों से भून दिया। इसके बाद लाहौर की दीवारों पर पोस्टर चिपका दिए गए: “लाला जी की हत्या का बदला ले लिया गया है।”
7. सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली बम कांड (8 अप्रैल 1929)
ब्रिटिश सरकार दो काले कानून पारित करने जा रही थी: (1) पब्लिक सेफ्टी बिल (जिसके तहत विदेशी कम्युनिस्टों को निर्वासित किया जा सकता था), और (2) ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल (जिसके तहत मजदूरों की हड़तालों को गैर-कानूनी घोषित किया गया था)।
HSRA ने असेंबली के भीतर इन कानूनों के विरोध में बम विस्फोट करने का निर्णय लिया। 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में खाली सीटों की ओर दो कम तीव्रता वाले धुएं के बम फेंके।
- उनका उद्देश्य किसी की जान लेना नहीं था, बल्कि बम के साथ फेंके गए पर्चों में लिखा था: “बहरों को सुनाने के लिए धमाके की जरूरत होती है” (To make the deaf hear)।
- उन्होंने पहली बार सार्वजनिक रूप से ‘इंकलाब जिंदाबाद’ और ‘साम्राज्यवाद का नाश हो’ के नारे लगाए।
- दोनों वीरों ने भागने के स्थान पर स्वेच्छा से आत्मसमर्पण कर दिया ताकि वे अदालत के मंच का उपयोग अपने समाजवादी क्रांतिकारी विचारों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए कर सकें।
8. लाहौर षड्यंत्र केस, जतिन दास का बलिदान एवं 23 मार्च 1931
जेल के भीतर क्रांतिकारियों को साधारण अपराधियों की भांति गंदा भोजन, फटे कपड़े और अमानवीय यातनाएं दी जाती थीं। भगत सिंह और उनके साथियों ने मांग की कि उन्हें ‘राजनीतिक बंदी’ (Political Prisoners) का दर्जा दिया जाए, अध्ययन हेतु पुस्तकें और अखबार दिए जाएं।
मांगें न माने जाने पर क्रांतिकारियों ने ऐतिहासिक भूख हड़ताल शुरू की। महान बंगाली क्रांतिकारी जतिन दास (Jatindra Nath Das) ने लगातार 63 दिनों तक आमरण अनशन किया और 13 सितंबर 1929 को जेल में ही वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी शवयात्रा में कलकत्ता में 5 लाख से अधिक लोग उमड़े।
विशेष ट्रिब्यूनल ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को सांडर्स वध के मामले में फांसी की सजा सुनाई। 23 मार्च 1931 को लाहौर सेंट्रल जेल में इन तीनों अमर सपूतों ने हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूमा। पूरा देश रो पड़ा और यह दिन भारतीय इतिहास में ‘शहीद दिवस’ के रूप में अमर हो गया।
इससे पूर्व 27 फरवरी 1931 को प्रयागराज के अल्फ्रेड पार्क में पुलिस से घिर जाने पर चंद्रशेखर आजाद ने अपनी अंतिम गोली स्वयं को मार ली और अपनी प्रतिज्ञा पूरी की कि वे कभी जीवित नहीं पकड़े जाएंगे।
9. बंगाल में चटगांव शस्त्रागार छापा (1930) एवं वीरांगनाएं
बंगाल में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद का नेतृत्व एक राष्ट्रीय विद्यालय के शिक्षक सूर्य सेन (‘मास्टर दा’) ने किया। उन्होंने ‘इंडियन रिपब्लिकन आर्मी (चटगांव शाखा)’ का गठन किया।
18 अप्रैल 1930 को सूर्य सेन, अनंत सिंह, गणेश घोष और लोकनाथ बल के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने चटगांव के दो ब्रिटिश शस्त्रागारों पर धावा बोला, शस्त्रागारों पर कब्जा कर लिया, टेलीग्राफ लाइनें काट दीं और रेलवे ट्रैक उखाड़ दिए। सूर्य सेन ने राष्ट्रीय ध्वज फहराकर अस्थायी क्रांतिकारी सरकार की घोषणा की।
22 अप्रैल 1930 को जलालाबाद की पहाड़ियों में ब्रिटिश सेना के साथ भयंकर युद्ध हुआ जिसमें 12 क्रांतिकारी शहीद हुए किंतु उन्होंने ब्रिटिश सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। 1933 में सूर्य सेन को धोखे से गिरफ्तार कर 12 जनवरी 1934 को फांसी दे दी गई।
क्रांतिकारी वीरांगनाओं का अदम्य साहस:
- प्रीतिलता वाडेदार: सितंबर 1932 में पहाड़तली के यूरोपीय क्लब (जिसके बाहर लिखा था: ‘कुत्तों और भारतीयों का प्रवेश वर्जित है’) पर सफल हमला किया और पकड़े जाने से बचने के लिए सायनाइड खाकर सर्वोच्च बलिदान दिया।
- कल्पना दत्त: सूर्य सेन के साथ भूमिगत रहकर संघर्ष किया और आजीवन कारावास भुगता।
- बीना दास: फरवरी 1932 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में उपाधि लेते समय बंगाल के गवर्नर स्टेनली जैक्सन पर नजदीक से गोलियां चलाईं।
- सुनीति चौधरी व शांति घोष: कोमिल्ला की दो स्कूली छात्राओं ने दिसंबर 1931 में जिला मजिस्ट्रेट सी.जी.बी. स्टीवंस की गोली मारकर हत्या कर दी।
10. साइमन कमीशन (1927) एवं ‘साइमन गो बैक’ का देशव्यापी नारा
1919 के भारत शासन अधिनियम में प्रावधान था कि 10 वर्ष बाद (1929 में) संवैधानिक सुधारों की समीक्षा हेतु एक आयोग गठित किया जाएगा। किंतु ब्रिटेन में सत्तारूढ़ कंजरवेटिव सरकार को आशंका थी कि आगामी चुनावों में लेबर पार्टी जीत सकती है, इसलिए उन्होंने दो वर्ष पूर्व ही नवंबर 1927 में ‘भारतीय वैधानिक आयोग’ (Indian Statutory Commission) की घोषणा कर दी। इसके अध्यक्ष सर जॉन साइमन थे।
⚠️ बहिष्कार का मुख्य कारण: ‘ऑल-व्हाइट कमीशन’ (All-White Commission)
साइमन कमीशन में कुल 7 सदस्य थे और सातों ब्रिटिश संसद के अंग्रेज सदस्य थे। भारत के संविधान और भविष्य का फैसला करने वाले आयोग में एक भी भारतीय सदस्य शामिल नहीं था। इसे भारतीयों के आत्म-सम्मान का खुला अपमान माना गया।
दिसंबर 1927 के मद्रास कांग्रेस अधिवेशन (अध्यक्ष: डॉ. एम.ए. अंसारी) में साइमन कमीशन के पूर्ण बहिष्कार का निर्णय लिया गया। 3 फरवरी 1928 को जब कमीशन बॉम्बे बंदरगाह पहुंचा, तो काले झंडों, देशव्यापी हड़ताल और ‘साइमन गो बैक’ (Simon Go Back) के नारों से उसका स्वागत किया गया। यह अमर नारा स्वतंत्रता सेनानी यूसुफ मेहरअली द्वारा गढ़ा गया था।
11. नेहरू रिपोर्ट (1928) एवं जिन्ना के 14 सूत्र
भारत सचिव लॉर्ड बर्कनहेड (Lord Birkenhead) ने भारतीय नेताओं को घमंडी चुनौती दी: “भारतीय ऐसा संविधान बनाने में असमर्थ हैं जो सभी समुदायों को स्वीकार्य हो।”
भारतीय नेताओं ने इस चुनौती को स्वीकार किया और फरवरी 1928 में सर्वदलीय सम्मेलन (All Parties Conference) बुलाया। मई 1928 में पंडित मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में 9 सदस्यीय समिति गठित की गई (जिसमें तेज बहादुर सप्रू, सुभाष चंद्र बोस, एम.एस. अणे आदि शामिल थे)। इस समिति द्वारा तैयार मसौदे को ‘नेहरू रिपोर्ट’ (Nehru Report, अगस्त 1928) कहा जाता है। यह भारतीयों द्वारा अपने लिए संविधान बनाने का पहला ऐतिहासिक प्रयास था।
📜 नेहरू रिपोर्ट की प्रमुख ऐतिहासिक सिफारिशें:
- डोमिनियन स्टेटस (औपनिवेशिक स्वराज्य): भारत का दर्जा ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर स्वशासी उपनिवेश जैसा हो।
- 19 मौलिक अधिकार: भाषण, अभिव्यक्ति, शांतिपूर्ण सभा, धार्मिक स्वतंत्रता, 21 वर्ष से ऊपर सभी स्त्री-पुरुषों को व्यस्क मताधिकार।
- पृथक निर्वाचक मंडल की समाप्ति: धर्म के आधार पर अलग निर्वाचन समाप्त हो; केवल संयुक्त निर्वाचन प्रणाली के तहत अल्पसंख्यकों हेतु जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण हो।
- धर्मनिरपेक्ष राज्य (Secular State): राज्य का कोई आधिकारिक धर्म न हो।
- अवशिष्ट शक्तियां (Residuary Powers): केंद्र के पास हों, न कि प्रांतों के पास।
युवाओं का विरोध: युवा नेता जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस ने ‘डोमिनियन स्टेटस’ का विरोध किया और पूर्ण स्वतंत्रता की मांग करते हुए नवंबर 1928 में ‘इंडिपेंडेंस फॉर इंडिया लीग’ (Independence for India League) का गठन किया।
जिन्ना के 14 सूत्र (मार्च 1929): मुस्लिम लीग के मोहम्मद अली जिन्ना ने नेहरू रिपोर्ट की सिफारिशों को खारिज करते हुए अपनी 14 सूत्रीय मांगें रखीं, जिनमें मुसलमानों के लिए 1/3 केंद्रीय प्रतिनिधित्व, अलग निर्वाचक मंडल और अवशिष्ट शक्तियां प्रांतों को देने की मांग शामिल थी।
12. 1929 का ऐतिहासिक लाहौर कांग्रेस अधिवेशन एवं ‘पूर्ण स्वराज’ की घोषणा
कलकत्ता अधिवेशन (1928) में कांग्रेस ने ब्रिटिश सरकार को एक वर्ष का अल्टीमेटम दिया था कि यदि 31 दिसंबर 1929 तक नेहरू रिपोर्ट के आधार पर डोमिनियन स्टेटस नहीं दिया गया, तो कांग्रेस पूर्ण स्वतंत्रता की मांग करेगी। वायसराय लॉर्ड इरविन द्वारा कोई स्पष्ट आश्वासन न दिए जाने पर दिसंबर 1929 में पंजाब के लाहौर में रावी नदी के तट पर कांग्रेस का 44वां वार्षिक अधिवेशन आयोजित हुआ।
गांधीजी के समर्थन से 40 वर्षीय युवा नेता पंडित जवाहरलाल नेहरू को अध्यक्ष चुना गया। नेहरू ने अपने अध्यक्षीय भाषण में उद्घोष किया: “मैं एक समाजवादी और गणतंत्रवादी हूं, और मुझे राजाओं और राजकुमारों में कोई विश्वास नहीं है।”
🚩 लाहौर अधिवेशन के ऐतिहासिक निर्णय:
- पूर्ण स्वराज (Complete Independence) का प्रस्ताव पारित: कांग्रेस का एकमात्र और अंतिम लक्ष्य अब ‘डोमिनियन स्टेटस’ नहीं बल्कि पूर्ण स्वतंत्रता घोषित किया गया।
- सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement) की स्वीकृति: गांधीजी के नेतृत्व में राष्ट्रव्यापी कर-बंदी और नमक कानून तोड़ने की अनुमति दी गई।
- तिरंगा फहराया गया: 31 दिसंबर 1929 की मध्यरात्रि को रावी नदी के तट पर ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के गगनभेदी नारों के बीच स्वतंत्रता का नया तिरंगा ध्वज फहराया गया।
- 26 जनवरी: प्रथम ‘स्वतंत्रता दिवस’ (Independence Day): तय किया गया कि 26 जनवरी 1930 को समूचे भारत में सार्वजनिक रूप से पूर्ण स्वतंत्रता की शपथ ली जाएगी और इसे हर वर्ष ‘स्वतंत्रता दिवस’ के रूप में मनाया जाएगा। (यही कारण है कि 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू किया गया था)।
13. परीक्षा उपयोगी त्वरित सारांश: HRA बनाम HSRA
| मापदंड | HRA (हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन) | HSRA (हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन) |
|---|---|---|
| स्थापना वर्ष व स्थान | अक्टूबर 1924, कानपुर | सितंबर 1928, फिरोजशाह कोटला (दिल्ली) |
| मुख्य संस्थापक | शचींद्रनाथ सान्याल, रामप्रसाद बिस्मिल | चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, सुखदेव |
| वैचारिक धुरी | उग्र राष्ट्रवाद एवं सशस्त्र गणराज्य | वैज्ञानिक समाजवाद, मार्क्सवाद एवं वर्गहीन समाज |
| प्रमुख ऐतिहासिक घटनाएं | काकोरी ट्रेन एक्शन (9 अगस्त 1925) | सांडर्स वध (1928), असेंबली बम कांड (1929) |
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