Govt Exam Hindi Notes

ब्रिटिश क्राउन व देशी रियासतें, बटलर समिति, प्रजामंडल आंदोलन, सरदार पटेल व वी.पी. मेनन रियासतों का एकीकरण

ब्रिटिश क्राउन एवं देशी रियासतें (Princely States) तथा 1947–1950 एकीकरण: नीतियां, बटलर समिति, प्रजामंडल आंदोलन व 565+ रियासतों का ऐतिहासिक विलय – संपूर्ण विश्लेषणात्मक अध्ययन व नोट्स

🔥 आधुनिक भारत का इतिहास • मास्टर अध्ययन श्रृंखला (अध्याय 15)

ब्रिटिश क्राउन एवं देशी रियासतें (Princely States) तथा 1947–1950 एकीकरण

1947 में जब भारत ब्रिटिश औपनिवेशिक दासता से मुक्त हुआ, तब उसके सम्मुख केवल ब्रिटिश प्रांतों का शासन संभालना ही चुनौती नहीं थी, बल्कि 565 से अधिक देशी रियासतों (Princely States) के अस्तित्व का जटिल प्रश्न भी था, जो भारत के कुल क्षेत्रफल का लगभग 48% भूभाग और 28% जनसंख्या को समाहित किए हुए थीं। 1757 में प्लासी के युद्ध के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा अपनाई गई ‘घेरे की नीति’ (Ring Fence), लॉर्ड वेलेजली की ‘सहायक संधि’ (Subsidiary Alliance), लॉर्ड डलहौजी का क्रूर ‘व्यपगत सिद्धांत’ (Doctrine of Lapse), 1858 के बाद ब्रिटिश क्राउन की ‘अधीनस्थ संघ की नीति’ व सर्वोच्चता (Paramountcy), 1921 का नरेंद्र मंडल (Chamber of Princes), 1927 की बटलर समिति, रियासतों की जनता द्वारा लड़ा गया जुझारू प्रजामंडल आंदोलन, और अंततः स्वतंत्रता के बाद लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल तथा वी.पी. मेनन के अद्वितीय नेतृत्व में जूनागढ़, हैदराबाद व कश्मीर सहित 565+ रियासतों का भारतीय संघ में ऐतिहासिक एकीकरण—यह गाथा आधुनिक भारत के निर्माण का सबसे रोमांचक व कूटनीतिक अध्याय है। यह विश्लेषणात्मक अध्ययन UPSC Civil Services, UPPSC, BPSC, MPPSC, HPSC व अन्य राज्य प्रशासनिक परीक्षाओं हेतु सबसे प्रामाणिक स्रोत प्रस्तुत करता है।


Table of Contents

📚 आधुनिक भारत का इतिहास: श्रृंखला अनुक्रमणिका व संपूर्ण नेविगेशन हब

➡️ अगला मास्टर अध्याय (अध्याय 17): भारत में क्रांतिकारी आंदोलन का प्रथम चरण (1897–1918) एवं विदेशों में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद: चापेकर बंधु, अभिनव भारत, अनुशीलन समिति, अलीपुर व दिल्ली षड्यंत्र, गदर पार्टी, कामागाटामारू व काबुल सरकार
📖 अध्याय 16: भारत में यूरोपीय कंपनियों का आगमन एवं ब्रिटिश साम्राज्यवादी विस्तार (1498–1857): पुर्तगाली, डच, अंग्रेज, फ्रांसीसी (कर्नाटक युद्ध), बंगाल विजय (प्लासी व बक्सर), आंग्ल-मैसूर, मराठा व सिख युद्ध
📖 अध्याय 14: ब्रिटिश प्रशासनिक, न्यायिक, पुलिस एवं सिविल सेवाओं का विकास तथा संवैधानिक सुधार (1773–1947)
📖 अध्याय 13: आधुनिक भारत में शिक्षा एवं प्रेस का विकास (1781–1947): मैकाले मिनट, वुड्स डिस्पैच, वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट
📖 अध्याय 12: ब्रिटिश शासन की आर्थिक नीतियां: स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी, महालवाड़ी व धन की निकासी (Drain of Wealth)
📖 अध्याय 11: वेवेल योजना, कैबिनेट मिशन, माउंटबेटन योजना एवं 1947 स्वतंत्रता अधिनियम
📖 अध्याय 9: भारत शासन अधिनियम 1935, 1937 के प्रांतीय चुनाव एवं त्रिपुरी संकट

1. ब्रिटिश-रियासत संबंधों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं नीतियां (ली-वार्नर का वर्गीकरण)

ब्रिटिश भारत और देशी रियासतों के संबंध किसी एक निश्चित संधि अथवा व्यवस्था का परिणाम नहीं थे, बल्कि लगभग दो शताब्दियों में ब्रिटिश साम्राज्यवादी आवश्यकताओं और कूटनीतिक दबावों के अनुसार क्रमिक रूप से विकसित हुए थे। प्रसिद्ध ब्रिटिश प्रशासक सर विलियम ली-वार्नर (Sir William Lee-Warner) ने अपनी ऐतिहासिक कृति ‘The Native States of India’ (1910) में ब्रिटिश क्राउन व कंपनी की देशी रियासतों के प्रति नीतियों को चार प्रमुख चरणों में वर्गीकृत किया है:

चरण (Phase)समयावधिनीति का नाम (Policy)मुख्य गवर्नर-जनरल / वायसरायकेंद्रीय उद्देश्य एवं विशेषता
प्रथम चरण1757–1813घेरे की नीति (Policy of Ring Fence / Relative Isolation)रॉबर्ट क्लाइव, वारेन हेस्टिंग्स, जॉन शोर, वेलेजलीकंपनी के अपने क्षेत्रों की सुरक्षा हेतु पड़ोसी राज्यों को ‘बफर स्टेट’ बनाना; वेलेजली द्वारा सहायक संधियों से सुरक्षा तंत्र खड़ा करना।
द्वितीय चरण1813–1857अधीनस्थ पृथक्करण की नीति (Policy of Subordinate Isolation)लॉर्ड हेस्टिंग्स, बेंटिंक, एलेनबरो, डलहौजीरियासतों की बाह्य संप्रभुता समाप्त कर उन्हें ब्रिटिश सर्वोच्चता के अधीन लाना; आपस में संपर्क विहीन रखना; व्यपगत सिद्धांत द्वारा प्रत्यक्ष विलय।
तृतीय चरण1858–1935अधीनस्थ संघ की नीति (Policy of Subordinate Union)लॉर्ड कैनिंग, लिटन, लैंसडाउन, कर्जन, मिंटो, चेम्सफोर्डविलय की नीति का त्याग; रियासतों को साम्राज्य की रक्षा हेतु ‘तरंग-रोधक’ (Breakwaters) बनाना; क्राउन की ‘सर्वोच्चता’ (Paramountcy) स्थापित करना।
चतुर्थ चरण1935–1947समान संघ की नीति (Policy of Equal Federation)विलिंगडन, लिनलिथगो, वेवेल, माउंटबेटन1935 एक्ट के तहत ब्रिटिश प्रांतों और देशी रियासतों को मिलाकर ‘अखिल भारतीय संघ’ बनाने का असफल प्रयास; राष्ट्रवादियों के विरुद्ध राजाओं को ढाल बनाना।

2. कंपनी काल में रियासती नीतियां: रिंग फेंस, सहायक संधि व व्यपगत सिद्धांत (1757–1857)

2.1 वारेन हेस्टिंग्स की ‘घेरे की नीति’ (Ring Fence Policy)

1765 की इलाहाबाद की संधि और वारेन हेस्टिंग्स (1772–1785) के कार्यकाल में ईस्ट इंडिया कंपनी का लक्ष्य केवल अपने नव-अर्जित बंगाल, बिहार व उड़ीसा के क्षेत्रों की बाहरी आक्रमणों (विशेषकर मराठों और अफगानों) से रक्षा करना था।

  • अवध को बफर स्टेट (Buffer State) बनाना: 1765 में क्लाइव ने अवध के नवाब शुजाउद्दौला को उसका राज्य वापस लौटा दिया, ताकि अवध बंगाल और मराठों के बीच एक सुरक्षा कवच (Buffer) का कार्य करे।
  • खर्च राज्य का, सुरक्षा कंपनी की: 1773 की बनारस की संधि और 1774 के रोहिल्ला युद्ध में हेस्टिंग्स ने अवध के नवाब की सहायता हेतु कंपनी की सेना भेजी, किंतु उसका संपूर्ण आर्थिक भार नवाब पर डाल दिया गया। यही व्यवस्था आगे चलकर वेलेजली की सहायक संधि का अग्रदूत बनी।

2.2 लॉर्ड वेलेजली की सहायक संधि प्रणाली (Subsidiary Alliance System, 1798–1805)

यद्यपि भारत में सहायक संधि प्रणाली का सर्वप्रथम प्रयोग फ्रांसीसी गवर्नर डुप्ले (Dupleix) ने किया था, किंतु इसे एक संगठित, आक्रामक और साम्राज्यवादी औजार के रूप में विकसित करने का श्रेय लॉर्ड वेलेजली (Lord Wellesley) को जाता है। 1798 में जब वेलेजली भारत आया, तब नेपोलियन बोनापार्ट के मिस्र आक्रमण और टीपू सुल्तान व मराठों के साथ संभावित फ्रांसीसी गठजोड़ का गंभीर भय था।

📌 सहायक संधि की अनिवार्य एवं कठोर शर्तें:

  1. विदेश नीति का पूर्ण समर्पण: देशी रियासत किसी अन्य राज्य के साथ युद्ध, संधि अथवा राजनीतिक वार्ता बिना कंपनी की पूर्व अनुमति के नहीं कर सकती थी।
  2. स्थायी ब्रिटिश सेना व आर्थिक भार: राज्य की सीमा के भीतर एक ब्रिटिश सेना तैनात रहेगी, जिसके भरण-पोषण हेतु राज्य को नकद धनराशि अथवा अपने राज्य का एक निश्चित राजस्व क्षेत्र (Ceded Territory) कंपनी को स्थायी रूप से सौंपना होगा।
  3. ब्रिटिश रेजीडेंट (Resident): रियासत की राजधानी में एक ब्रिटिश रेजीडेंट रहेगा, जो औपचारिक रूप से केवल सलाहकार था, किंतु व्यावहारिक रूप से आंतरिक प्रशासन का वास्तविक संचालक बन जाता था।
  4. यूरोपियनों का निष्कासन: राज्य अपनी सेवा में किसी अन्य यूरोपीय (विशेषकर फ्रांसीसी) को कंपनी की अनुमति के बिना नियुक्त नहीं करेगा और पहले से कार्यरत यूरोपियनों को निष्कासित करेगा।
  5. आंतरिक मामलों में अहस्तक्षेप का दिखावा: कंपनी ने राज्य के आंतरिक शासन में हस्तक्षेप न करने का वचन दिया, जो व्यवहार में कभी पूरा नहीं हुआ।

सहायक संधि स्वीकार करने वाले प्रमुख राज्यों का कालानुक्रम (UPSC Prelims Hotspot):

  • 1. हैदराबाद (1798 एवं 1800): सबसे पहले वेलेजली की सहायक संधि स्वीकार करने वाला राज्य। 1798 में निजाम ने फ्रांसीसी टुकड़ियों को बर्खास्त किया। 1800 में नई संधि द्वारा सेना के खर्च हेतु बेलारी और कुड्डप्पा के जिले कंपनी को सौंपे।
  • 2. मैसूर (1799): चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध (4 मई 1799) में टीपू सुल्तान की वीरगति के बाद वाडियार वंश के बालक कृष्णराज तृतीय पर सहायक संधि थोपी गई।
  • 3. तंजौर (अक्टूबर 1799): राजा सरफोजी के साथ संधि।
  • 4. अवध (नवंबर 1801): नवाब सआदत अली खान पर जबरन थोपी गई; रोहिलखंड व दोआब का आधा भूभाग सेना के खर्च हेतु कंपनी ने छीन लिया।
  • 5. पेशवा बाजीराव द्वितीय (31 दिसंबर 1802 – बसीन की संधि / Treaty of Bassein): यशवंतराव होल्कर द्वारा पुणे पर अधिकार करने के बाद पेशवा ने बसीन में शरण लेकर सहायक संधि स्वीकार की, जिसके कारण द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1803–1805) भड़का।
  • 6. भोंसले (देवगांव की संधि, दिसंबर 1803): कटक और बालासोर कंपनी को दिए।
  • 7. सिंधिया (सुरजी-अर्जुनगांव की संधि, दिसंबर 1803 / 1804): गंगा-यमुना दोआब और अहमदनगर सौंपा।
  • 8. जोधपुर, जयपुर, मछेरी, बूंदी तथा भरतपुर (1818 तक क्रमिक रूप से)।

2.3 लॉर्ड डलहौजी का व्यपगत सिद्धांत (Doctrine of Lapse, 1848–1856)

लॉर्ड डलहौजी (1848–1856) एक कट्टर साम्राज्यवादी और उपयोगितावादी (Utilitarian) प्रशासक था। उसका मानना था कि भारत में ब्रिटिश प्रत्यक्ष शासन देशी रियासतों के सामंती व भ्रष्ट शासन से कहीं अधिक जनहितकारी है। डलहौजी ने हिंदू विधि की ‘गोद लेने की प्रथा’ (Adoption) को विकृत करते हुए व्यपगत सिद्धांत लागू किया।

डलहौजी ने देशी राज्यों को तीन विशिष्ट श्रेणियों में विभाजित किया:

  • श्रेणी 1 (स्वतंत्र राज्य): वे राज्य जो कभी कंपनी के अधीन नहीं रहे और न ही कर देते थे। इन्हें दत्तक पुत्र (Adopted Son) लेने की पूर्ण स्वतंत्रता थी।
  • श्रेणी 2 (मुगल सम्राट अथवा पेशवा के पूर्व आश्रित राज्य, अब ब्रिटिश अधीन): इन्हें दत्तक पुत्र लेने हेतु कंपनी की पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य था, जिसे कंपनी आमतौर पर दे देती थी।
  • श्रेणी 3 (कंपनी द्वारा नव-सृजित या पुनर्जीवित राज्य – Subordinate States): वे राज्य जिनका निर्माण कंपनी की कृपा अथवा सनद से हुआ था (जैसे सतारा, मैसूर)। इन राज्यों को दत्तक पुत्र लेने का कोई अधिकार नहीं था और निसंतान शासक की मृत्यु पर राज्य सीधे ब्रिटिश साम्राज्य में विलीन (Lapse) हो जाता था।

⚔️ व्यपगत सिद्धांत (Doctrine of Lapse) के तहत राज्यों के विलय का सही कालानुक्रम:

1️⃣ सतारा (Satara – 1848): राजा अप्पा साहिब की मृत्यु के बाद सर्वप्रथम विलय।
2️⃣ जैतपुर (Jaitpur, बुंदेलखंड) व संभलपुर (Sambalpur, ओडिशा – 1849): संभलपुर के राजा नारायण सिंह निसंतान मरे।
3️⃣ बघाट (Baghat, पंजाब हिल स्टेट – 1850): (बाद में लॉर्ड कैनिंग ने इसे वापस लौटा दिया)।
4️⃣ उदयपुर (Udaipur, छत्तीसगढ़ – 1852): (इसे भी 1860 में वापस लौटाया गया)।
5️⃣ झांसी (Jhansi – 1853): राजा गंगाधर राव की मृत्यु के बाद महारानी लक्ष्मीबाई के दत्तक पुत्र दामोदर राव को उत्तराधिकारी मानने से इंकार।
6️⃣ नागपुर (Nagpur – 1854): रघुजी तृतीय की मृत्यु के बाद। शाही महल के खजाने और हाथियों की कलकत्ता में नीलामी की गई।
⚠️ अपवाद: करौली (Karauli – 1855) का विलय डलहौजी करना चाहता था, किंतु लंदन स्थित कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स (Court of Directors) ने यह कहते हुए विलय रद्द कर दिया कि करौली एक ‘सुरक्षित अधीनस्थ’ राज्य है, निर्मित राज्य नहीं।

2.4 कुशासन के आरोप पर अवध का ऐतिहासिक विलय (1856)

अवध के नवाब के वैध उत्तराधिकारी मौजूद थे, इसलिए व्यपगत सिद्धांत वहां लागू नहीं हो सकता था। डलहौजी ने ‘कुशासन’ (Misgovernance / Maladministration) का आरोप लगाया:

  • 1849–1851 में ब्रिटिश रेजीडेंट कर्नल विलियम स्लीमैन (Col. William Sleeman) ने अवध का दौरा किया और कुशासन की रिपोर्ट दी, किंतु स्लीमैन ने चेतावनी दी थी कि अवध का प्रत्यक्ष विलय करने से कंपनी की सेना में सेवारत अवध के 75,000 सिपाही विद्रोह कर देंगे।
  • 1854 में डलहौजी ने सर जेम्स आउट्रम (Sir James Outram) को रेजीडेंट नियुक्त किया। आउट्रम की 1855 की पक्षपातपूर्ण रिपोर्ट के आधार पर 13 फरवरी 1856 को नवाब वाजिद अली शाह को गद्दी से हटाकर कलकत्ता (मटियाबुर्ज) निर्वासित कर दिया गया और अवध को हड़प लिया गया।
  • विलय के बाद अवध का प्रथम चीफ कमिश्नर मेजर जनरल जेम्स आउट्रम बना (उसके बाद हेनरी लॉरेंस)। अवध का यह अन्यायपूर्ण विलय 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बड़ा तात्कालिक राजनीतिक कारण बना।

3. ब्रिटिश क्राउन के अधीन सर्वोच्चता का सिद्धांत (Paramountcy) (1858–1919)

3.1 1857 के संग्राम से सबक: ‘तरंग-रोधक’ (Breakwaters in the Storm)

1857 के विद्रोह के समय पटियाला, जींद, ग्वालियर (सिंधिया), हैदराबाद (सालारजंग) और नेपाल के शासकों ने ब्रिटिश हुकूमत का सक्रिय साथ दिया। भारत के प्रथम वायसराय लॉर्ड कैनिंग ने अपनी डायरी में लिखा था:

“यदि सिंधिया भी विद्रोह में शामिल हो जाता, तो मुझे कल ही अपना बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ता… इन देशी राजाओं और सरदारों ने उस भीषण तूफान में तरंग-रोधक (Breakwaters) का कार्य किया, अन्यथा वह लहर एक ही झटके में हमें बहा ले जाती।”

3.2 1 नवंबर 1858 की महारानी विक्टोरिया की उद्घोषणा

  • विलय की नीति का स्थायी त्याग: घोषणा की गई कि ब्रिटिश क्राउन अब भारतीय राज्यों के किसी भी नए भूभाग का विलय नहीं करेगा।
  • दत्तक पुत्र की सनद (Adoption Sanads): लॉर्ड कैनing ने लगभग 140 प्रमुख हिंदू व मुस्लिम शासकों को ‘सनद’ प्रदान की, जिसके तहत उन्हें निसंतान होने पर उत्तराधिकारी गोद लेने की पूर्ण मान्यता दी गई।
  • साम्राज्य के अधीनस्थ अंग: यद्यपि विलय रोक दिया गया, किंतु देशी राजाओं को स्पष्ट बता दिया गया कि वे अब संप्रभु शासक नहीं, बल्कि ब्रिटिश क्राउन के जागीरदार/सामंत हैं।

3.3 1876 का शाही उपाधि अधिनियम एवं 1891 का मणिपुर केस

  • शाही उपाधि अधिनियम 1876 (Royal Titles Act): ब्रिटिश प्रधानमंत्री बेंजामिन डिजरायली ने संसद से यह कानून पारित कराया, जिसके तहत 1 जनवरी 1877 के भव्य दिल्ली दरबार में महारानी विक्टोरिया को ‘कैसर-ए-हिंद’ (Empress of India) घोषित किया गया। इसके द्वारा क्राउन और देशी रियासतों के बीच सामंती प्रभुत्व का औपचारिक संबंध स्थापित हुआ।
  • 1873 का बड़ौदा केस (मल्हारराव गायकवाड़): बड़ौदा के शासक मल्हारराव गायकवाड़ पर ब्रिटिश रेजीडेंट कर्नल फेयर को जहर देने की कोशिश का आरोप लगा। एक विशेष आयोग की जांच के बाद उन्हें कुशासन और अक्षमता के आधार पर 1875 में पदच्युत कर दिया गया, किंतु राज्य का विलय नहीं किया गया बल्कि एक अन्य बालक (सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय) को गद्दी पर बैठाया गया।
  • 1891 का ऐतिहासिक मणिपुर केस (Landmark Manipur Case): मणिपुर में उत्तराधिकार संघर्ष के दौरान ब्रिटिश चीफ कमिश्नर क्विंटन और चार अन्य ब्रिटिश अधिकारियों की हत्या कर दी गई। ब्रिटिश सेना ने मणिपुर पर अधिकार कर सेनापति टिकेंद्रजीत सिंह को फांसी दे दी। ब्रिटिश भारत सरकार ने आधिकारिक गजट (Gazette of India, 21 August 1891) में घोषणा की: “सर्वोच्च शक्ति (ब्रिटिश क्राउन) और देशी राज्यों के बीच संबंध अंतर्राष्ट्रीय कानून के अधीन नहीं आते; देशी रियासतों पर क्राउन की सर्वोच्चता (Paramountcy) निर्विवाद और असीमित है, और क्राउन को किसी भी राज्य में विद्रोह दबाने और उत्तराधिकार तय करने का पूर्ण अधिकार है।”

4. नरेंद्र मंडल (Chamber of Princes, 1921)

प्रथम विश्व युद्ध में भारतीय नरेशों की सैन्य और आर्थिक सहायता से प्रसन्न होकर ब्रिटिश सरकार ने उन्हें अखिल भारतीय स्तर पर एक मंच देने का निर्णय लिया।

  • मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट (1918): रिपोर्ट के पैरा 296 में नरेशों की एक स्थायी सलाहकार परिषद गठित करने की सिफारिश की गई थी।
  • उद्घाटन: 8 फरवरी 1921 को दिल्ली के लाल किले में ड्यूक ऑफ कनॉट (Duke of Connaught) द्वारा शाही उद्घोषणा के साथ ‘नरेंद्र मंडल’ का विधिवत उद्घाटन किया गया।
  • सदस्यता संरचना (कुल 120 सदस्य):
    • 108 प्रथम श्रेणी के नरेश, जिन्हें 11 या अधिक तोपों की सलामी (Salute States) प्राप्त थी, वे अपने अधिकार से व्यक्तिगत सदस्य थे।
    • 12 प्रतिनिधि नरेश, जो अन्य 127 छोटी रियासतों द्वारा चुने जाते थे।
    • शेष 327 अत्यंत छोटी जागीरों और सामंतों को कोई प्रतिनिधित्व नहीं मिला।
  • प्रथम चांसलर: बीकानेर के प्रसिद्ध महाराजा गंगा सिंह (Maharaja Ganga Singh) नरेंद्र मंडल के प्रथम चांसलर बने (1921–1926)। बाद में पटियाला के महाराजा भूपेंद्र सिंह और भोपाल के नवाब हमीदुल्ला खान भी इसके चांसलर रहे।
  • प्रकृति एवं सीमाएं: नरेंद्र मंडल केवल एक **सलाहकार और विचार-विमर्श निकाय** था। इसे राज्यों के आंतरिक प्रशासन अथवा ब्रिटिश क्राउन की ‘सर्वोच्चता’ (Paramountcy) के अधिकारों पर चर्चा करने का कोई अधिकार नहीं था।

5. बटलर समिति (Indian States Committee / Butler Committee, 1927–1929)

1920 के दशक में जब भारत में स्वराज और उत्तरदायी सरकार की मांग तेज हुई, तो देशी राजाओं को भय सताने लगा कि यदि ब्रिटिश भारत में कोई भारतीय लोकतांत्रिक सरकार बनी, तो क्या रियासतें उस भारतीय सरकार के अधीन हो जाएंगी? इस कानूनी पहेली को सुलझाने हेतु 1927 में भारत सचिव लॉर्ड बर्केनहेड ने सर हरकोर्ट बटलर की अध्यक्षता में तीन-सदस्यीय समिति नियुक्त की (अन्य दो सदस्य: एस.सी. पील और सर डब्ल्यू.एस. होल्ड्सवर्थ)।

📋 बटलर समिति की ऐतिहासिक सिफारिशें व निष्कर्ष (1929):

  1. “सर्वोच्चता को सर्वोच्च ही रहना होगा” (Paramountcy must remain paramount): समिति ने कहा कि सर्वोच्चता को किसी संकीर्ण परिभाषा या संधियों के शब्दों में सीमित नहीं किया जा सकता। यह बदलती राजनीतिक परिस्थितियों, अंतर्राष्ट्रीय उत्तरदायित्वों और संपूर्ण भारत की सुरक्षा के अनुसार स्वयं को ढालती है।
  2. संधियां ब्रिटिश क्राउन के साथ हैं: समिति ने नरेशों के इस दावे को स्वीकार किया कि उनकी संधियां ब्रिटिश सम्राट (क्राउन) के साथ हुई थीं, न कि ब्रिटिश भारत की सरकार के साथ।
  3. राजाओं की सहमति बिना हस्तांतरण नहीं: बटलर समिति ने स्पष्ट घोषणा की कि “देशी रियासतों के क्राउन के साथ संबंधों को, संबंधित नरेशों की स्पष्ट सहमति के बिना, ब्रिटिश भारत में स्थापित होने वाली किसी भी नई भारतीय सरकार को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता।” (इस प्रावधान ने भविष्य में भारत के एकीकरण की राह में भारी कानूनी अड़चन खड़ी की)।
  4. वायसराय के माध्यम से संबंध: गवर्नर-जनरल इन काउंसिल के स्थान पर वायसराय (क्राउन का प्रतिनिधि) रियासतों के साथ संपर्क का माध्यम होगा।

6. देशी राज्यों में प्रजामंडल आंदोलन (Praja Mandal Movements)

देशी रियासतों में ब्रिटिश भारत की तुलना में शासन अत्यंत निरंकुश, सामंती और पिछड़ा हुआ था। जनता पर भारी भू-राजस्व, दर्जनों प्रकार की अवैध लाग-बाग (Cesses), और अपमानजनक ‘बेगार’ (अवैतनिक जबरन श्रम) थोपी गई थी। नागरिक स्वतंत्रताएं (प्रेस, सभा, संगठन) पूर्णतः प्रतिबंधित थीं। इसी दमनकारी व्यवस्था के विरुद्ध 1920 के दशक से रियासतों में जन-आंदोलनों का विस्फोट हुआ जिन्हें ‘प्रजामंडल आंदोलन’ कहा गया।

6.1 अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद (AISPC, 1927)

  • स्थापना: दिसंबर 1927 में बंबई में विभिन्न रियासतों के लगभग 700 प्रतिनिधियों ने मिलकर ‘ऑल इंडिया स्टेट्स पीपुल्स कॉन्फ्रेंस’ (AISPC) की स्थापना की।
  • प्रमुख संस्थापक नेता: दीवान बहादुर एम. रामचंद्र राव (अध्यक्ष), बलवंत राय मेहता (महासचिव), जी.आर. अभ्यंकर, और कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी।
  • नेहरू की अध्यक्षता (1939): 1939 में AISPC के लुधियाना अधिवेशन में पंडित जवाहरलाल नेहरू को अध्यक्ष चुना गया। नेहरू के अध्यक्ष बनने से देशी रियासतों का जन-आंदोलन सीधे राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन की मुख्यधारा से जुड़ गया। (1946 में उदयपुर अधिवेशन में शेख अब्दुल्ला उपाध्यक्ष बने)।

6.2 भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की नीति का विकास

  • 1920 का नागपुर अधिवेशन: कांग्रेस ने रियासतों की जनता के प्रति सहानुभूति व्यक्त की, किंतु स्पष्ट किया कि कांग्रेस के नाम पर रियासतों में राजनीतिक आंदोलन शुरू नहीं किए जाएंगे।
  • 1938 का हरिपुरा अधिवेशन (सुभाष चंद्र बोस की अध्यक्षता): कांग्रेस ने ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया कि यद्यपि रियासतों में उत्तरदायी शासन की स्थापना कांग्रेस का अंतिम लक्ष्य है, किंतु स्थानीय परिस्थितियों को देखते हुए आंदोलन कांग्रेस के बैनर तले नहीं, बल्कि स्थानीय ‘प्रजामंडलों’ द्वारा लड़े जाएंगे; कांग्रेस उन्हें नैतिक समर्थन देगी।
  • 1939 का त्रिपुरी अधिवेशन: कांग्रेस ने अपनी अहस्तक्षेप की नीति को पूर्णतः समाप्त कर प्रजामंडल आंदोलनों को प्रत्यक्ष संगठनात्मक और राजनीतिक समर्थन देने की घोषणा की।

6.3 प्रमुख क्षेत्रीय प्रजामंडल आंदोलन

  • राजस्थान के प्रजामंडल:
    • जयपुर प्रजामंडल (1931): कपूरचंद पाटनी और 1936-38 में जमनालाल बजाज व हीरालाल शास्त्री द्वारा पुनर्गठित।
    • मेवाड़ प्रजामंडल (1938): माणिक्यलाल वर्मा और बलवंत सिंह मेहता द्वारा स्थापित। बिजोलिया किसान आंदोलन (विजय सिंह पथिक) की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि।
    • मारवाड़ (जोधपुर) प्रजामंडल (1934): जयनारायण व्यास, भंवरलाल सर्राफ।
  • हैदराबाद स्टेट कांग्रेस: 1938 में स्वामी रामानंद तीर्थ के नेतृत्व में गठित। निजाम ने इस पर तुरंत प्रतिबंध लगा दिया। स्वामी रामानंद तीर्थ, गोविंदभाई श्रॉफ और पी.वी. नरसिम्हा राव ने सत्याग्रह चलाया। 1946–1948 में तेलंगाना का प्रसिद्ध सशस्त्र कृषक संघर्ष भी भड़का।
  • जम्मू एवं कश्मीर: 1932 में स्थापित ‘ऑल जम्मू एंड कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस’ को 1939 में शेख अब्दुल्ला ने धर्मनिरपेक्ष बनाकर ‘नेशनल कॉन्फ्रेंस’ (National Conference) में परिवर्तित किया। मई 1946 में महाराजा हरि सिंह के निरंकुश शासन के विरुद्ध ऐतिहासिक ‘क्विट कश्मीर’ (Quit Kashmir Movement) आंदोलन शुरू किया गया।
  • त्रावणकोर: सर सी.पी. रामास्वामी अय्यर के तानाशाही शासन और ‘अमेरिकन मॉडल’ के विरुद्ध 1946 का प्रसिद्ध पुन्नप्रा-वायलार संघर्ष (Punnapra-Vayalar Uprising)।

7. 1947 का भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम और ‘सर्वोच्चता’ का अंत

1947 में जब ब्रिटिश संसद ने भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 (Indian Independence Act, 1947) पारित किया, तो उसकी धारा 7(1)(b) ने भारत के राजनीतिक भूगोल के सम्मुख सबसे भयंकर संकट खड़ा कर दिया:

  • सर्वोच्चता की समाप्ति (Lapse of Paramountcy): अधिनियम ने घोषित किया कि 15 अगस्त 1947 से ब्रिटिश सम्राट की देशी रियासतों पर सर्वोच्चता पूर्णतः समाप्त हो जाएगी और वे सभी संधियां व समझौते रद्द हो जाएंगे।
  • स्वतंत्र रहने का सैद्धांतिक विकल्प: सर्वोच्चता किसी भी उत्तराधिकारी सरकार (भारत अथवा पाकिस्तान) को नहीं सौंपी गई। देशी रियासतों को यह विकल्प दिया गया कि वे चाहें तो भारत अधिराज्य (Dominion of India) में शामिल हों, चाहें तो पाकिस्तान अधिराज्य में शामिल हों, अथवा स्वतंत्र (Independent) रहें!
  • ‘बाल्कनीकरण’ (Balkanization) का खतरा: यदि 565 रियासतें स्वतंत्र रहने का निर्णय ले लेतीं, तो भारत का मानचित्र सैकड़ों छोटे-छोटे विरोधी टुकड़ों में बंट जाता, जिससे देश की संप्रभुता, आर्थिक एकता और सैन्य सुरक्षा सदा के लिए छिन्न-भिन्न हो जाती। मोहम्मद अली जिन्ना ने नरेशों को स्वतंत्र रहने और पाकिस्तान में शामिल होने हेतु खुले प्रलोभन दिए।

8. 565+ देशी रियासतों का ऐतिहासिक एकीकरण (1947–1950)

8.1 रियासती विभाग (States Department) और पटेल-मेनन की कूटनीति

इस संकट से निपटने हेतु अंतरिम सरकार ने 27 जून 1947 को एक नए ‘रियासती विभाग’ (Ministry of States / States Department) का गठन किया:

  • सरदार वल्लभभाई पटेल: रियासती विभाग के मंत्री बने। उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति, अदम्य साहस और व्यावहारिक यथार्थवाद के कारण उन्हें भारत का ‘लौह पुरुष’ और ‘भारतीय बिस्मार्क’ कहा जाता है।
  • वी.पी. मेनन (V.P. Menon): विभाग के सचिव बने। मेनन एक असाधारण कूटनीतिज्ञ और संवैधानिक विशेषज्ञ थे, जिन्होंने बाद में अपनी अमर पुस्तक ‘The Story of the Integration of the Indian States’ में इस संपूर्ण प्रक्रिया का दस्तावेज तैयार किया।
  • लॉर्ड माउंटबेटन की भूमिका: 25 जुलाई 1947 को नरेंद्र मंडल के अंतिम अधिवेशन में माउंटबेटन ने नरेशों को संबोधित करते हुए स्पष्ट चेतावनी दी कि भौगोलिक वास्तविकता और जनता की इच्छा को अनदेखा कर स्वतंत्र रहने का प्रयास करना आत्मघाती होगा; वे 15 अगस्त से पूर्व भारत के साथ अधिमिलन कर लें।

8.2 दो प्रमुख दस्तावेज: Instrument of Accession और Standstill Agreement

सरदार पटेल ने अत्यंत व्यावहारिक और चरणबद्ध रणनीति अपनाई। 15 अगस्त 1947 से पूर्व नरेशों को केवल तीन विषयों पर समझौता करने का प्रस्ताव दिया गया:

📄 1. अधिमिलन पत्र (Instrument of Accession):

रियासतों को भारत सरकार को केवल तीन केंद्रीय विषय सौंपने थे: (1) रक्षा (Defence), (2) विदेशी मामले (External Affairs), और (3) संचार (Communications)। शेष सभी आंतरिक मामलों में राजाओं की स्वायत्तता यथावत स्वीकार की गई।

📄 2. यथास्थिति समझौता (Standstill Agreement):

जब तक नया स्थायी संवैधानिक समझौता न हो जाए, तब तक ब्रिटिश शासनकाल में प्रचलित व्यापार, सीमा शुल्क, डाक-तार और रेलवे से जुड़े प्रशासनिक प्रबंध यथावत लागू रहेंगे।

पटेल ने ‘गाजर और छड़ी’ (Carrot and Stick) की नीति अपनाई: सहयोग करने वाले नरेशों को प्रिवी पर्स (Privy Purse), व्यक्तिगत संपत्ति और राजप्रमुख (Rajpramukh) का पद दिया गया, जबकि हठधर्मिता करने वालों को जनता के विद्रोह और सैन्य कार्रवाई की स्पष्ट चेतावनी दी गई। 15 अगस्त 1947 तक तीन अपवादों को छोड़कर शेष सभी 562 रियासतों ने भारत में विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए।

8.3 तीन विवादित रियासतों का विलय: जूनागढ़, हैदराबाद एवं कश्मीर

🟣 1. जूनागढ़ का विलय (फरवरी 1948 – जनमत संग्रह)

सौराष्ट्र में स्थित जूनागढ़ की 82% से अधिक जनता हिंदू थी, किंतु उसका शासक नवाब मुहम्मद महाबत खान तृतीय था और उसका मुस्लिम लीग समर्थक दीवान शाहनवाज भुट्टो (जुल्फिकार अली भुट्टो के पिता) था। नवाब ने भौगोलिक निरंतरता न होने के बावजूद 15 अगस्त 1947 को पाकिस्तान में विलय की घोषणा कर दी, जिसे पाकिस्तान ने 13 सितंबर को स्वीकार कर लिया। जूनागढ़ के अधीनस्थ राज्यों (बाबरियावाड़ और मांगरोल) ने भारत में विलय की घोषणा की, जिस पर नवाब ने सेना भेज दी। बंबई में महात्मा गांधी के भतीजे समलदास गांधी के नेतृत्व में ‘आरजी हुकूमत’ (समानांतर जन-सरकार) बनी। भारतीय सेना ने जूनागढ़ की सीमाओं की आर्थिक नाकेबंदी कर दी। नवाब अपने कुत्तों और खजाने के साथ हवाई जहाज से कराची भाग गया। नवाब के भागने के बाद दीवान शाहनवाज भुट्टो ने भारत सरकार से प्रशासन संभालने का अनुरोध किया। 20 फरवरी 1948 को जूनागढ़ और उसकी अधीनस्थ जागीरों में निष्पक्ष जनमत संग्रह (Referendum) कराया गया, जिसमें 1,90,870 वोटों में से मात्र 91 वोट पाकिस्तान के पक्ष में पड़े और 99.9% जनता ने भारत में विलय का समर्थन किया।

🟠 2. हैदराबाद का विलय (सितंबर 1948 – ऑपरेशन पोलो)

हैदराबाद भारत की सबसे बड़ी और धनी रियासत थी, जिसकी 85% जनता हिंदू थी किंतु शासक निजाम मीर उस्मान अली खान स्वतंत्र ‘उस्मानिस्तान’ का स्वप्न देख रहा था। 29 नवंबर 1947 को भारत सरकार और निजाम के बीच एक वर्ष का ‘यथास्थिति समझौता’ (Standstill Agreement) हुआ। किंतु निजाम ने गुप्त रूप से पाकिस्तान को ₹20 करोड़ का ऋण दिया, गोवा के पुर्तगालियों से हथियार खरीदने की कोशिश की और कासिम रजवी के नेतृत्व वाले सांप्रदायिक अर्धसैनिक संगठन ‘रजाकार’ (Razakars) को खुली छूट दे दी। रजाकारों ने हिंदू आबादी और सीमावर्ती भारतीय गांवों में भीषण लूटपाट, हत्याएं और अत्याचार किए। सरदार पटेल ने इसे “भारत के पेट में कैंसर” करार दिया जिसे शल्य चिकित्सा से ही ठीक किया जा सकता था। 13 सितंबर 1948 को भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन पोलो’ (Operation Polo) नाम से पुलिस एक्शन प्रारंभ किया। दक्षिणी कमान के लेफ्टिनेंट जनरल महाराज श्री राजेंद्रसिंहजी के मार्गदर्शन और मेजर जनरल जे.एन. चौधरी के मैदानी कमान में सेना ने हैदराबाद में प्रवेश किया। 17 सितंबर 1948 को शाम 5 बजे निजाम की सेना के कमांडर मेजर जनरल अल-एदरूस ने आत्मसमर्पण कर दिया। 18 सितंबर को औपचारिक विलय हुआ। निजाम को ‘राजप्रमुख’ बनाया गया और मेजर जनरल जे.एन. चौधरी हैदराबाद के प्रथम मिलिट्री गवर्नर नियुक्त हुए।

🟢 3. जम्मू एवं कश्मीर का विलय (अक्टूबर 1947 – अधिमिलन पत्र)

जम्मू और कश्मीर की बहुसंख्यक आबादी मुस्लिम थी, किंतु शासक हिंदू डोगरा राजा महाराजा हरि सिंह थे। महाराजा कश्मीर को ‘पूरब का स्विट्जरलैंड’ बनाकर दोनों देशों से स्वतंत्र रहना चाहते थे। उन्होंने दोनों देशों के साथ यथास्थिति समझौता प्रस्तावित किया; पाकिस्तान ने समझौता कर लिया किंतु भारत ने आगे की बातचीत की मांग की। पाकिस्तान ने समझौते का उल्लंघन कर कश्मीर की आवश्यक आपूर्ति (पेट्रोल, नमक, खाद्यान्न) रोक दी और 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तानी सेना के मेजर जनरल अकबर खान के नेतृत्व में हजारों पश्तून कबाइलियों ने कश्मीर पर भीषण आक्रमण कर दिया (‘ऑपरेशन गुलमर्ग’)। कबाइलियों ने मुजफ्फराबाद और बारामूला में कत्लेआम मचाया। असहाय होकर महाराजा हरि सिंह ने भारत से तत्काल सैन्य सहायता की गुहार लगाई। दिल्ली में रक्षा समिति की बैठक में सरदार पटेल और वी.पी. मेनन ने स्पष्ट किया कि जब तक कश्मीर औपचारिक रूप से भारत में विलय नहीं करता, तब तक अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत भारतीय सेना नहीं भेजी जा सकती। वी.पी. मेनन श्रीनगर पहुंचे; महाराजा ने 26 अक्टूबर 1947 को भारत के ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन’ (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर कर दिए, जिसे 27 अक्टूबर की सुबह गवर्नर-जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने स्वीकार कर लिया। 27 अक्टूबर 1947 को भारतीय सेना की 1 सिख रेजिमेंट के वीर जवान लेफ्टिनेंट कर्नल दीवान रंजीत राय के नेतृत्व में श्रीनगर हवाई अड्डे पर उतरे और श्रीनगर को आक्रमणकारियों से बचाया।

8.4 अन्य जटिल रियासतें: त्रावणकोर, जोधपुर व भोपाल

  • त्रावणकोर: दीवान सर सी.पी. रामास्वामी अय्यर ने जून 1947 में घोषणा कर दी थी कि त्रावणकोर अपने विशाल थोरियम (मोनोजाइट) भंडारों और समुद्र तट के आधार पर एक संप्रभु स्वतंत्र राज्य बनेगा। किंतु जब स्थानीय जनता ने विद्रोह किया और दीवान पर जानलेवा हमला हुआ, तो महाराजा ने 30 जुलाई 1947 को भारत में विलय स्वीकार कर लिया।
  • जोधपुर: युवा महाराजा हनवंत सिंह को जिन्ना ने कराची बंदरगाह के उपयोग, हथियार आयात और एक कोरे कागज (Blank Cheque) पर मनचाही शर्तें लिखने का खुला प्रस्ताव दिया था। पटेल और वी.पी. मेनन ने महाराजा को समझाया कि हिंदू बहुल राज्य का पाकिस्तान में जाना उनकी अपनी सत्ता और प्रजा के लिए आत्मघाती होगा; अंततः महाराजा ने अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर किए।
  • भोपाल: नरेंद्र मंडल के पूर्व चांसलर नवाब हमीदुल्ला खान जिन्ना के घनिष्ठ मित्र थे और स्वतंत्र रहने का प्रयास कर रहे थे। सरदार पटेल के कड़े रुख और भोपाल की जनता के भारी प्रजामंडल आंदोलन के दबाव में नवाब को अगस्त 1947 में अधिमिलन पत्र पर और अंततः 1 जून 1949 को पूर्ण विलय पर हस्ताक्षर करने पड़े।

9. एकीकरण का द्वितीय चरण: संघीकरण व राज्यों का पुनर्गठन (1948–1950)

15 अगस्त 1947 को अधिमिलन केवल प्रथम चरण था (जिसमें केवल 3 विषय केंद्र को मिले थे)। सरदार पटेल और वी.पी. मेनन का वास्तविक चमत्कार इसके बाद शुरू हुआ, जब उन्होंने इन 565+ इकाइयों का भारत के प्रशासनिक ढांचे में पूर्ण लोकतंत्रीकरण और संघीकरण (Integration & Democratization) किया:

  • निकटवर्ती प्रांतों में विलय: ओडिशा और मध्य प्रांत की दर्जनों छोटी पिछड़ी रियासतों को सीधे संबंधित प्रांतों में मिला दिया गया (जैसे ओडिशा की 23 गड़जात रियासतें)।
  • रियासतों के बड़े संघों का निर्माण:
    • काठियावाड़ संघ (सौराष्ट्र – फरवरी 1948): 222 छोटी-बड़ी रियासतों को मिलाकर बना प्रथम संघ (उद्घाटन पटेल ने किया)।
    • मत्स्य संघ (मार्च 1948) एवं राजस्थान संघ: अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली आदि को मिलाकर।
    • मध्य भारत संघ (ग्वालियर व इंदौर सहित): मई 1948।
    • पटियाला एंड ईस्ट पंजाब स्टेट्स यूनियन (PEPSU – जुलाई 1948): 8 सिख रियासतों (पटियाला, नाभा, जींद, फरीदकोट, कपूरथला आदि) को मिलाकर बना संघ।
    • त्रावणकोर-कोचीन संघ: जुलाई 1949।
  • केंद्र शासित मुख्य आयुक्त के प्रांत (Part C States): हिमाचल प्रदेश (30 पहाड़ी रियासतों को मिलाकर), विंध्य प्रदेश, भोपाल, बिलासपुर, त्रिपुरा और मणिपुर को केंद्र के सीधे नियंत्रण में रखा गया।

9.1 1950 के संविधान में राज्यों का 4-स्तरीय वर्गीकरण

26 जनवरी 1950 को जब भारतीय संविधान लागू हुआ, तो देश के सभी क्षेत्रों को चार श्रेणियों में विभाजित किया गया:

भाग (Part)राज्यों का स्वरूपप्रमुख उदाहरणसंवैधानिक प्रमुख
भाग ‘क’ (Part A)पूर्व ब्रिटिश प्रांत (9 राज्य)संयुक्त प्रांत (UP), बिहार, मद्रास, बंबई, पश्चिम बंगाल, असम आदिराज्यपाल (Governor)
भाग ‘ख’ (Part B)बड़ी रियासतें अथवा रियासतों के संघ (8 राज्य)हैदराबाद, मैसूर, जम्मू एवं कश्मीर, राजस्थान, मध्य भारत, सौराष्ट्र, PEPSU, त्रावणकोर-कोचीनराजप्रमुख (Rajpramukh – पूर्व शासक)
भाग ‘ग’ (Part C)पूर्व चीफ कमिश्नर प्रांत व छोटी रियासतें (10 राज्य)दिल्ली, अजमेर, कुर्ग, भोपाल, बिलासपुर, कूचबिहार, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा, विंध्य प्रदेशमुख्य आयुक्त (Chief Commissioner) / उपराज्यपाल
भाग ‘घ’ (Part D)एकमात्र द्वीप क्षेत्रअंडमान एवं निकोबार द्वीप समूहलेफ्टिनेंट गवर्नर / चीफ कमिश्नर

(नोट: 7वें संविधान संशोधन अधिनियम 1956 द्वारा यह चार-स्तरीय वर्गीकरण समाप्त कर 14 राज्य और 6 केंद्र शासित प्रदेश बनाए गए)।

9.2 प्रिवी पर्स (Privy Purse) और 26वां संविधान संशोधन 1971

रियासतों के विलय के समझौते के तहत पूर्व शासकों और उनके उत्तराधिकारियों को जीवन-यापन हेतु भारतीय संचित निधि से एक कर-मुक्त वार्षिक पेंशन दी गई जिसे ‘प्रिवी पर्स’ (Privy Purse) कहा गया (अनुच्छेद 291 व 362)। साथ ही उन्हें निजी उपाधियां और ध्वज फहराने के विशेषाधिकार दिए गए। 1971 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में 26वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1971 पारित किया गया, जिसके द्वारा अनुच्छेद 291 और 362 को निरस्त कर प्रिवी पर्स और भूतपूर्व राजाओं के सभी सामंती विशेषाधिकार हमेशा के लिए समाप्त कर दिए गए।

10. UPSC/PCS मुख्य परीक्षा मॉडल प्रश्न व विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण (Mains Framework)

प्रश्न 1: “1858 के उपरांत ब्रिटिश क्राउन द्वारा देशी रियासतों के प्रति अपनाई गई नीति ‘अधीनस्थ पृथक्करण’ से ‘अधीनस्थ संघ’ की ओर एक रणनीतिक बदलाव थी।” स्पष्ट कीजिए तथा बटलर समिति (1927) के निष्कर्षों के आलोक में इसका मूल्यांकन कीजिए। (250 शब्द • 15 अंक)

उत्तर प्रारूप एवं प्रमुख बिंदु:
• प्रस्तावना: 1857 के महासंग्राम ने अंग्रेजों को यह अहसास कराया कि डलहौजी की हड़प नीति आत्मघाती थी; देशी राजाओं ने विद्रोह के समय ‘तरंग-रोधक’ (Breakwaters) की भूमिका निभाई थी। अतः 1858 के बाद नीति विलय से बदलकर संरक्षण और सामंती नियंत्रण की हो गई।
• अधीनस्थ संघ की प्रमुख विशेषताएं: 1858 घोषणापत्र द्वारा विलय पर रोक और सनदें देना; 1876 शाही उपाधि अधिनियम द्वारा महारानी को ‘कैसर-ए-हिंद’ घोषित कर सामंती अधीनता की स्थापना; 1891 मणिपुर केस द्वारा सर्वोच्चता (Paramountcy) को असीमित व गैर-अंतरराष्ट्रीय घोषित करना।
• बटलर समिति (1927) की भूमिका: 1920 के दशक में भारतीय राष्ट्रवाद के उभार के विरुद्ध राजाओं को ढाल बनाना। बटलर समिति का यह सिद्धांत कि “सर्वोच्चता को सर्वोच्च ही रहना होगा” और क्राउन-रियासत संबंध भारतीय लोकतांत्रिक सरकार को बिना राजाओं की सहमति हस्तांतरित नहीं होंगे—यह राष्ट्रवादियों के विरुद्ध ब्रिटिश साम्राज्य का अंतिम कूटनीतिक दांव था।
• निष्कर्ष: इस नीति ने यद्यपि रियासतों को सुरक्षा दी, किंतु अंततः उन्हें भारतीय राष्ट्रीय मुख्यधारा और लोकतांत्रिक आकांक्षाओं से अलग-थलग कर दिया, जिसका समाधान पटेल के नेतृत्व में ही संभव हुआ।

प्रश्न 2: “1947 में भारत के राजनीतिक एकीकरण में सरदार वल्लभभाई पटेल और वी.पी. मेनन की भूमिका बिस्मार्क के जर्मनी एकीकरण से भी अधिक जटिल और प्रशंसनीय थी।” तर्कसम्मत विवेचना कीजिए। (250 शब्द • 15 अंक)

उत्तर प्रारूप एवं प्रमुख बिंदु:
• प्रस्तावना: ऑटो वॉन बिस्मार्क ने जर्मनी का एकीकरण ‘रक्त और लौह’ (Blood and Iron) की हिंसक नीति तथा तीन युद्धों द्वारा किया था, जबकि सरदार पटेल और वी.पी. मेनन ने 565 से अधिक विषम रियासतों का एकीकरण न्यूनतम रक्तपात और अधिकतम संवैधानिक कूटनीति से संपन्न किया।
• चुनौतियों का स्वरूप: 1947 स्वतंत्रता अधिनियम की धारा 7(1)(b) द्वारा रियासतों को स्वतंत्र रहने की छूट; जिन्ना द्वारा रियासतों को भड़काना; जूनागढ़, हैदराबाद, त्रावणकोर और भोपाल जैसे राज्यों का अलगाववादी रुख।
• पटेल-मेनन की रणनीति: दो-चरणीय दृष्टिकोण (पहले Instrument of Accession द्वारा 3 विषयों का समर्पण, फिर आंतरिक संघीकरण); ‘गाजर और छड़ी’ की नीति (प्रिवी पर्स व राजप्रमुख पद का सम्मान, किंतु दृढ़ इच्छाशक्ति); जन-दबाव (प्रजामंडल) का रणनीतिक उपयोग; आवश्यकता पड़ने पर त्वरित व निर्णायक सैन्य कार्रवाई (ऑपरेशन पोलो, जूनागढ़ जनमत संग्रह, कश्मीर एयरलिफ्ट)।
• निष्कर्ष: पटेल-मेनन की इस युगल जोड़ी ने ‘बाल्कनीकरण’ के कगार पर खड़े भारत को एक अखंड, लोकतांत्रिक गणराज्य में परिवर्तित कर आधुनिक विश्व इतिहास का सबसे महान प्रशासनिक चमत्कार कर दिखाया।

11. प्रारंभिक परीक्षा सार-संग्रह (Prelims Revision Quick Digest)

⚡ UPSC/PCS Prelims Fast-Facts Tracker:

• ‘The Native States of India’ पुस्तक: सर विलियम ली-वार्नर (1910)।
• ‘The Story of the Integration of the Indian States’ पुस्तक: वी.पी. मेनन (1956)।
• सहायक संधि का प्रथम प्रयोगकर्ता: फ्रांसीसी गवर्नर डुप्ले; व्यापक संगठित प्रयोगकर्ता: लॉर्ड वेलेजली (1798)।
• सहायक संधि स्वीकार करने वाला प्रथम राज्य: हैदराबाद (1798); द्वितीय: मैसूर (1799); तृतीय: तंजौर (1799); चतुर्थ: अवध (1801)।
• व्यपगत सिद्धांत (Doctrine of Lapse) का प्रथम शिकार: सतारा (1848); अंतिम बड़े राज्य: झांसी (1853), नागपुर (1854)।
• कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स द्वारा विलय निरस्त: करौली (Karauli – 1855)।
• कुशासन के आधार पर विलय: अवध (1856), आउट्रम रिपोर्ट के आधार पर, नवाब वाजिद अली शाह।
• नरेंद्र मंडल (Chamber of Princes): उद्घाटन 8 फरवरी 1921 (ड्यूक ऑफ कनॉट), प्रथम चांसलर महाराजा गंगा सिंह (बीकानेर)।
• बटलर समिति (1927): 3 सदस्य (बटलर, पील, होल्ड्सवर्थ); रिपोर्ट 1929; सिद्धांत: *”Paramountcy must remain paramount”*।
• AISPC (अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद): स्थापना 1927 बंबई; 1939 लुधियाना अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू अध्यक्ष बने।
• रियासती विभाग (States Department): 27 जून 1947 को गठन; मंत्री: सरदार पटेल; सचिव: वी.पी. मेनन।
• ऑपरेशन पोलो (Operation Polo): 13–18 सितंबर 1948; हैदराबाद का पुलिस एक्शन; सेनापति मेजर जनरल जे.एन. चौधरी।
• जूनागढ़ जनमत संग्रह: 20 फरवरी 1948 (99.9% भारत के पक्ष में); समलदास गांधी की ‘आरजी हुकूमत’।
• कश्मीर अधिमिलन: महाराजा हरि सिंह द्वारा 26 अक्टूबर 1947 को हस्ताक्षर; 27 अक्टूबर को भारतीय सेना का श्रीनगर में आगमन।
• प्रिवी पर्स की समाप्ति: 26वां संविधान संशोधन अधिनियम 1971 (अनुच्छेद 291 व 362 निरस्त)।

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