ब्रिटिश प्रशासनिक, न्यायिक, पुलिस एवं सिविल सेवाओं का विकास तथा संवैधानिक सुधार (1773–1947)
भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन का लगभग 200 वर्षों का इतिहास केवल भौगोलिक विजयों का इतिहास नहीं था, बल्कि यह एक सुगठित, केंद्रीकृत और इस्पाती प्रशासनिक ढांचे (Steel Frame) के निर्माण की दीर्घकालिक प्रक्रिया थी। अंग्रेजों ने भारत पर शासन करने हेतु चार मजबूत स्तंभ खड़े किए—भारतीय सिविल सेवा (ICS), ब्रिटिश भारतीय सेना, आधुनिक पुलिस बल और विधि का शासन (Rule of Law) आधारित न्यायिक तंत्र। 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट से लेकर 1947 के भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम तक हुए क्रमिक संवैधानिक सुधार, लॉर्ड कॉर्नवालिस का 1793 का कोड (शक्तियों का पृथक्करण), 1853 की खुली प्रतियोगिता, 1861 का पुलिस अधिनियम व उच्च न्यायालय अधिनियम, लॉर्ड रिपन का 1882 का स्थानीय स्वशासन संकल्प, ली आयोग 1924, तथा 1935 के एक्ट के तहत 1937 का संघीय न्यायालय (Federal Court) इस संपूर्ण विकास की महत्वपूर्ण कड़ियां हैं। यह आलेख UPSC Civil Services, UPPSC, BPSC, MPPSC, HPSC एवं अन्य State PCS मुख्य व प्रारंभिक परीक्षा हेतु इस अध्याय का सबसे प्रामाणिक व शोधपरक विश्लेषणात्मक संकलन प्रस्तुत करता है।
📚 आधुनिक भारत का इतिहास: श्रृंखला अनुक्रमणिका व संपूर्ण नेविगेशन हब
➡️ अगला विशेष अध्याय (अध्याय 15): ब्रिटिश क्राउन एवं देशी रियासतें (Princely States) तथा 1947–1950 एकीकरण: नीतियां, बटलर समिति, प्रजामंडल आंदोलन व 565+ रियासतों का ऐतिहासिक विलय
➡️ अगला मास्टर अध्याय (अध्याय 16): भारत में यूरोपीय कंपनियों का आगमन एवं ब्रिटिश साम्राज्यवादी विस्तार (1498–1857): पुर्तगाली, डच, अंग्रेज, फ्रांसीसी (कर्नाटक युद्ध), बंगाल विजय (प्लासी व बक्सर), आंग्ल-मैसूर, मराठा व सिख युद्ध
📖 अध्याय 13: आधुनिक भारत में शिक्षा एवं प्रेस का विकास (1781–1947): मैकाले मिनट, वुड्स डिस्पैच, वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट
📖 अध्याय 12: ब्रिटिश शासन की आर्थिक नीतियां: स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी, महालवाड़ी व धन की निकासी (Drain of Wealth)
📖 अध्याय 11: वेवेल योजना, कैबिनेट मिशन, माउंटबेटन योजना एवं 1947 स्वतंत्रता अधिनियम
📖 अध्याय 9: भारत शासन अधिनियम 1935, 1937 के प्रांतीय चुनाव एवं त्रिपुरी संकट
📖 अध्याय 2: 19वीं-20वीं सदी के सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलन (राजा राममोहन राय, दयानंद, विवेकानंद)
1. ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन संवैधानिक सुधार (1773–1853)
1757 के प्लासी के युद्ध और 1764 के बक्सर के युद्ध के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी एक व्यापारिक निगम से बदलकर एक क्षेत्रीय राजनीतिक शक्ति बन गई। रॉबर्ट क्लाइव द्वारा बंगाल में लागू की गई ‘द्वैध शासन प्रणाली’ (1765–1772) ने भारी प्रशासनिक अराजकता, भ्रष्टाचार और 1770 के भीषण बंगाल अकाल को जन्म दिया। परिणामस्वरूप ब्रिटिश संसद को कंपनी के मामलों का विनियमन करने हेतु हस्तक्षेप करना पड़ा।
1.1 1773 का रेगुलेटिंग एक्ट (Regulating Act of 1773)
- प्रशासनिक केंद्रीकरण का प्रारंभ: बंगाल के गवर्नर को ‘गवर्नर-जनरल ऑफ बंगाल’ बनाया गया। मद्रास और बंबई प्रेसीडेंसियों के गवर्नरों को उसके अधीन किया गया (युद्ध और संधि के मामलों में)। वारेन हेस्टिंग्स बंगाल के प्रथम गवर्नर-जनरल बने।
- चार-सदस्यीय कार्यकारी परिषद: गवर्नर-जनरल की सहायता हेतु 4 सदस्यीय परिषद (फिलिप फ्रांसिस, क्लैवरिंग, मॉनसन और बारवेल) गठित की गई। निर्णय बहुमत से होते थे तथा गवर्नर-जनरल को केवल बराबर मत होने पर निर्णायक मत (Casting Vote) देने का अधिकार था।
- कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय (1774): 1773 के एक्ट के तहत 1774 में फोर्ट विलियम (कलकत्ता) में सुप्रीम कोर्ट ऑफ जुडिकेचर स्थापित हुआ, जिसमें एक मुख्य न्यायाधीश (सर एलिजा इम्पे) और तीन अन्य न्यायाधीश (रॉबर्ट चेंबर्स, लेमैत्रे, जॉन हाइड) थे।
- निजी व्यापार पर प्रतिबंध: कंपनी के कर्मचारियों द्वारा निजी व्यापार करने और भारतीयों से उपहार या रिश्वत लेने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया।
1.2 1781 का संशोधनात्मक अधिनियम (Act of Settlement 1781)
1773 के एक्ट में गवर्नर-जनरल इन काउंसिल और सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को लेकर गंभीर टकराव पैदा हो गया था। 1781 के एक्ट द्वारा गवर्नर-जनरल तथा उसकी परिषद को उनके पदीय कार्यों के लिए सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार से मुक्त कर दिया गया तथा राजस्व वसूली के मामलों को भी सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र से बाहर कर दिया गया।
1.3 1784 का पिट्स इंडिया एक्ट (Pitt’s India Act 1784)
ब्रिटिश प्रधानमंत्री विलियम पिट द यंगर द्वारा प्रस्तुत इस अधिनियम ने भारत में ‘द्वैध शासन प्रणाली’ (Double Government) की स्थापना की, जो 1858 तक जारी रही:
- कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स (Court of Directors): कंपनी के व्यापारिक मामलों का प्रबंधन करता रहा।
- बोर्ड ऑफ कंट्रोल (Board of Control): 6 सदस्यीय नियंत्रण बोर्ड की स्थापना लंदन में की गई, जिसका कार्य भारत में सभी नागरिक, सैन्य और राजस्व मामलों का अधीक्षण व नियंत्रण करना था।
- ‘ब्रिटिश अधिकृत भारतीय प्रदेश’: इस अधिनियम में पहली बार भारत में कंपनी के अधीन क्षेत्र को आधिकारिक तौर पर “भारत में ब्रिटिश संपत्ति” (British Possessions in India) कहा गया।
1.4 1793 एवं 1813 के चार्टर अधिनियम
- 1793 का चार्टर एक्ट: कंपनी के व्यापारिक अधिकारों को अगले 20 वर्षों के लिए बढ़ाया गया। नियंत्रण बोर्ड के सदस्यों और कर्मचारियों का वेतन भारतीय राजस्व से दिया जाना तय किया गया, जिससे ‘धन की निकासी’ (Drain of Wealth) बढ़ी।
- 1813 का चार्टर एक्ट: कंपनी के भारतीय व्यापारिक एकाधिकार को समाप्त कर सभी ब्रिटिश नागरिकों हेतु खोल दिया गया। केवल चाय के व्यापार और चीन के साथ व्यापार पर कंपनी का एकाधिकार 20 वर्षों हेतु बना रहा। ईसाई मिशनरियों को भारत में प्रवेश की अनुमति मिली तथा शिक्षा पर प्रतिवर्ष ₹1 लाख व्यय का प्रावधान हुआ।
1.5 1833 का चार्टर अधिनियम: पूर्ण केंद्रीकरण
1833 का चार्टर एक्ट भारत में ब्रिटिश शासन के केंद्रीकरण का चरमोत्कर्ष था:
- भारत का गवर्नर-जनरल: बंगाल के गवर्नर-जनरल को ‘भारत का गवर्नर-जनरल’ (Governor-General of India) बनाया गया। लॉर्ड विलियम बेंटिंक भारत के प्रथम गवर्नर-जनरल बने।
- विधायी केंद्रीकरण: बंबई और मद्रास के गवर्नरों से कानून बनाने की शक्तियां छीन ली गईं और पूरे भारत के लिए कानून बनाने का एकाधिकार गवर्नर-जनरल इन काउंसिल को दे दिया गया।
- व्यापारिक निकाय का अंत: कंपनी के सभी व्यापारिक कार्य पूर्णतः समाप्त कर दिए गए और वह केवल एक राजनीतिक व प्रशासनिक निकाय बन गई।
- चौथा विधि सदस्य (मैकाले): गवर्नर-जनरल की परिषद में कानूनी सलाह हेतु चौथे सदस्य के रूप में लॉर्ड टी.बी. मैकाले को शामिल किया गया।
- धारा 87: घोषणा की गई कि किसी भी भारतीय को धर्म, जन्मस्थान, वंश या रंग के आधार पर कंपनी की किसी सेवा से वंचित नहीं किया जाएगा।
1.6 1853 का चार्टर अधिनियम: लघु संसद व खुली प्रतियोगिता
- शक्तियों का पृथक्करण: पहली बार गवर्नर-जनरल की परिषद के विधायी और प्रशासनिक कार्यों को अलग किया गया। 6 नए विधान पार्षदों को जोड़कर 12-सदस्यीय ‘अखिल भारतीय विधान परिषद’ (लघु संसद) बनाई गई।
- सिविल सेवा हेतु खुली प्रतियोगिता: सिविल सेवकों की भर्ती में कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स की नामजदगी (Patronage) व्यवस्था समाप्त कर खुली प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली शुरू की गई। इसके नियम बनाने हेतु 1854 में मैकाले समिति नियुक्त हुई।
- अनिश्चितकालीन नवीनीकरण: कंपनी के शासन की कोई निश्चित समय-सीमा (जैसे 20 वर्ष) तय नहीं की गई, जिससे स्पष्ट हुआ कि ब्रिटिश संसद जब चाहे कंपनी का शासन समाप्त कर सकती है।
2. ब्रिटिश ताज के अधीन संवैधानिक विकास (1858–1909)
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की ज्वाला ने ईस्ट इंडिया कंपनी के औपनिवेशिक ढांचे को हिला दिया। ब्रिटिश संसद ने शासन को सीधे अपने हाथों में ले लिया।
2.1 1858 का भारत सरकार अधिनियम (Act for the Better Government of India)
- कंपनी शासन का अंत: भारत का शासन ईस्ट इंडिया कंपनी से छीनकर सीधे ब्रिटिश सम्राट (महारानी विक्टोरिया) के अधीन कर दिया गया। कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स और बोर्ड ऑफ कंट्रोल समाप्त हो गए।
- भारत राज्य सचिव (Secretary of State for India): ब्रिटिश मंत्रिमंडल के एक सदस्य को भारत का राज्य सचिव बनाया गया जो ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदायी था। उसकी सहायता हेतु लंदन में 15 सदस्यीय ‘भारत परिषद’ (India Council) गठित की गई।
- वायसराय पदनाम: गवर्नर-जनरल अब ब्रिटिश क्राउन का प्रत्यक्ष प्रतिनिधि बन गया और उसे ‘वायसराय’ (Viceroy) कहा जाने लगा। लॉर्ड कैनिंग भारत के प्रथम वायसराय बने।
- महारानी की उद्घोषणा (1 नवंबर 1858): इलाहाबाद दरबार में लॉर्ड कैनिंग ने महारानी विक्टोरिया का घोषणा-पत्र पढ़ा, जिसमें भारतीय रियासतों के विलय की नीति त्यागने, धार्मिक सहिष्णुता और सभी प्रजाजनों को योग्यतानुसार अवसर देने का वादा किया गया।
2.2 1861 का भारतीय परिषद अधिनियम (Indian Councils Act 1861)
- विधायी विकेंद्रीकरण की शुरुआत: 1833 के केंद्रीकरण को पलटते हुए बंबई और मद्रास प्रेसीडेंसियों को पुनः कानून बनाने की शक्तियां लौटाई गईं।
- पोर्टफोलियो प्रणाली (Portfolio System): लॉर्ड कैनिंग द्वारा 1859 में प्रारंभ की गई विभागीय प्रणाली को कानूनी मान्यता मिली। वायसराय की परिषद के सदस्यों को अलग-अलग मंत्रालयों का प्रभारी बनाया गया।
- वायसराय की अध्यादेश शक्ति (Ordinance Power): वायसराय को संकटकाल में बिना विधान परिषद की सहमति के 6 माह की अवधि हेतु अध्यादेश जारी करने की शक्ति दी गई (वर्तमान अनुच्छेद 123 का मूल आधार)।
- भारतीयों का गैर-सरकारी मनोनयन: 1862 में लॉर्ड कैनिंग ने तीन भारतीयों—बनारस के राजा, पटियाला के महाराजा और सर दिनकर राव—को अपनी विस्तारित परिषद में गैर-सरकारी सदस्य मनोनीत किया।
2.3 1892 का भारतीय परिषद अधिनियम: बजट पर बहस
1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के बाद बढ़ते राष्ट्रवादी दबाव में यह अधिनियम पारित हुआ:
- बजट पर विचार-विमर्श का अधिकार: भारतीय सदस्यों को विधान परिषद में वार्षिक वित्तीय विवरण (बजट) पर बहस करने और 6 दिन की पूर्व सूचना पर जनहित के मामलों पर प्रश्न पूछने का अधिकार मिला। (किंतु पूरक प्रश्न पूछने या बजट पर वोट देने का अधिकार नहीं मिला)।
- अप्रत्यक्ष निर्वाचन का सिद्धांत: नगरपालिकाओं, जिला बोर्डों, विश्वविद्यालयों एवं चैंबर ऑफ कॉमर्स की सिफारिश पर गैर-सरकारी सदस्यों के मनोनयन की व्यवस्था हुई, जो वस्तुतः अप्रत्यक्ष निर्वाचन की शुरुआत थी।
2.4 1909 का मार्ले-मिंटो सुधार (Indian Councils Act 1909)
- सांप्रदायिक निर्वाचन मंडल (Communal Electorates): मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र बनाए गए। लॉर्ड मिंटो ने लिखा था—“हम नाग के दांत बो रहे हैं और इसका फल बहुत कड़वा होगा।” लॉर्ड मिंटो को ‘सांप्रदायिक निर्वाचन का जनक’ कहा जाता है।
- पूरक प्रश्न पूछने का अधिकार: सदस्यों को बजट पर संकल्प रखने और सरकार से पूरक प्रश्न (Supplementary Questions) पूछने का अधिकार दिया गया।
- वायसराय की कार्यकारिणी में प्रथम भारतीय: सत्येंद्र प्रसन्न सिन्हा (एस.पी. सिन्हा) वायसराय की कार्यपालिका परिषद में शामिल होने वाले प्रथम भारतीय (विधि सदस्य) बने। 1907 में के.जी. गुप्ता और सैयद हुसैन बिलग्रामी लंदन स्थित भारत परिषद में नियुक्त हुए थे।
3. 1919 मोंट-फोर्ड सुधार, 1935 भारत सरकार अधिनियम एवं 1947 स्वतंत्रता अधिनियम
3.1 1919 का भारत शासन अधिनियम (मोंटागु-चेम्सफोर्ड सुधार)
20 अगस्त 1917 की मोंटागु घोषणा (‘अगस्त घोषणा’) के आधार पर पारित इस अधिनियम ने उत्तरदायी शासन की दिशा में कदम बढ़ाया:
- प्रांतों में द्वैध शासन (Dyarchy in Provinces): प्रांतीय विषयों को दो भागों में बांटा गया—
- आरक्षित विषय (Reserved Subjects): पुलिस, न्याय, जेल, वित्त, भू-राजस्व आदि—इनका प्रशासन गवर्नर अपनी नौकरशाह कार्यकारिणी परिषद द्वारा बिना किसी संसदीय जवाबदेही के चलाता था।
- हस्तांतरित विषय (Transferred Subjects): शिक्षा, स्वास्थ्य, स्थानीय स्वशासन, कृषि आदि—इनका प्रशासन प्रांतीय विधान परिषद के प्रति उत्तरदायी भारतीय मंत्रियों को सौंपा गया।
- केंद्र में द्विसदनीय विधायिका (Bicameralism): पहली बार केंद्र में उच्च सदन (राज्य परिषद / Council of State – 60 सदस्य) और निम्न सदन (केंद्रीय विधान सभा / Legislative Assembly – 144 सदस्य) स्थापित हुए।
- सांप्रदायिक निर्वाचन का विस्तार: पृथक निर्वाचन सिखों, भारतीय ईसाइयों, आंग्ल-भारतीयों (Anglo-Indians) और यूरोपियनों तक विस्तृत किया गया।
- प्रांतीय बजट का पृथक्करण: पहली बार केंद्रीय बजट से प्रांतीय बजट को अलग किया गया।
- लोक सेवा आयोग: धारा 96C के तहत भारत में एक केंद्रीय लोक सेवा आयोग गठित करने का प्रावधान किया गया (जो 1926 में बना)।
- उच्चायुक्त का पद: लंदन में ‘भारत का उच्चायुक्त’ (High Commissioner for India) पद सृजित किया गया।
3.2 1935 का भारत सरकार अधिनियम (Government of India Act 1935)
साइमन कमीशन रिपोर्ट, तीन गोलमेज सम्मेलनों और श्वेत-पत्र (1933) के आधार पर निर्मित यह ब्रिटिश काल का सबसे बड़ा और जटिल अधिनियम था (321 धाराएं, 10 अनुसूचियां):
- अखिल भारतीय संघ (All India Federation): 11 ब्रिटिश प्रांतों, 6 चीफ कमिश्नर प्रांतों और देसी रियासतों से मिलकर बनने वाले संघ का प्रस्ताव रखा गया। (रियासतों के शामिल न होने से यह संघ कभी लागू नहीं हो सका)।
- प्रांतीय स्वायत्तता (Provincial Autonomy): प्रांतों से द्वैध शासन समाप्त कर उन्हें पूर्ण प्रशासनिक और वित्तीय स्वायत्तता दी गई। प्रांतीय मंत्री अब विधायिका के प्रति उत्तरदायी थे। 1937 में 11 प्रांतों में चुनाव हुए।
- केंद्र में द्वैध शासन: संघीय विषयों को आरक्षित (रक्षा, विदेश, चर्च मामले—गवर्नर-जनरल के अधीन) और हस्तांतरित में बांटा गया। (यह भाग भी लागू नहीं हो सका)।
- तीन विधायी सूचियां: शक्तियों का त्रिस्तरीय विभाजन—संघ सूची (59 विषय), प्रांतीय सूची (54 विषय) तथा समवर्ती सूची (36 विषय)। अवशिष्ट शक्तियां गवर्नर-जनरल के स्वविवेक में निहित थीं।
- संघीय न्यायालय (Federal Court 1937): 1 अक्टूबर 1937 को दिल्ली में संघीय न्यायालय स्थापित हुआ (प्रथम मुख्य न्यायाधीश: सर मॉरिस ग्वेयर)।
- भारतीय रिजर्व बैंक (RBI 1935): देश की मुद्रा और साख नियंत्रण हेतु 1 अप्रैल 1935 को RBI की स्थापना हुई।
- बर्मा का पृथक्करण: 1937 में बर्मा (म्यांमार) और अदन को भारत से अलग किया गया।
- पंडित नेहरू का कथन: नेहरू ने इसे “अनेक ब्रेकों वाली इंजन-रहित गाड़ी” और “दासता का नया अधिकार-पत्र” कहा।
3.3 1947 का भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम (Indian Independence Act 1947)
माउंटबेटन योजना (3 जून 1947) के आधार पर 4 जुलाई 1947 को ब्रिटिश संसद में पेश हुआ और 18 जुलाई 1947 को शाही स्वीकृति मिली। इसके प्रमुख प्रावधान थे: 15 अगस्त 1947 को भारत और पाकिस्तान दो संप्रभु डोमिनियन बने; भारत सचिव का पद और भारत परिषद समाप्त हुई; रियासतों पर ब्रिटिश सर्वोच्चता (Paramountcy) समाप्त कर दी गई; तथा संविधान सभाओं को अपने-अपने संविधान बनाने तक 1935 के एक्ट के तहत शासन चलाने का पूर्ण अधिकार दिया गया।
4. भारतीय सिविल सेवा (ICS) का उद्भव एवं विकास (1786–1885)
ब्रिटिश भारत में सिविल सेवा को साम्राज्य की ‘इस्पाती चौखट’ (Steel Frame) कहा गया, जिस पर पूरा औपनिवेशिक तंत्र टिका हुआ था।
4.1 लॉर्ड कॉर्नवालिस: सिविल सेवा का जनक
लॉर्ड कॉर्नवालिस (1786–1793) को भारत में सिविल सेवा का जन्मदाता माना जाता है। उसने निम्नलिखित सुधार किए:
- कंपनी के अधिकारियों के निजी व्यापार और उपहार लेने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया।
- कर्मचारियों के वेतन में पर्याप्त वृद्धि की (कलेक्टर का वेतन ₹1500 प्रतिमाह + राजस्व संग्रह पर 1% कमीशन)।
- नियुक्ति और पदोन्नति में वरिष्ठता (Seniority) का नियम लागू किया ताकि पक्षपात रुके।
- प्रसंविदाबद्ध सेवा (Covenanted Civil Service): उच्च प्रशासनिक पदों को केवल यूरोपीय नागरिकों के लिए आरक्षित किया, क्योंकि कॉर्नवालिस का मानना था कि “हिंदुस्तान का प्रत्येक मूल निवासी भ्रष्ट है।”
4.2 प्रशिक्षण संस्थान: फोर्ट विलियम कॉलेज व हेलीबरी कॉलेज
- फोर्ट विलियम कॉलेज (1800): लॉर्ड वेलेजली ने युवा सिविल सेवकों को भारतीय भाषाओं, कानूनों और परंपराओं के प्रशिक्षण हेतु कलकत्ता में स्थापित किया। 1802 में कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स ने इसे बंद करवा दिया।
- ईस्ट इंडिया कॉलेज, हेलीबरी (1806–1858): कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स ने इंग्लैंड के हेलीबरी में कॉलेज खोला, जहां चयनित ब्रिटिश युवाओं को 2 वर्ष का कठोर प्रशासनिक प्रशिक्षण देकर भारत भेजा जाता था। 1858 में इसे बंद कर दिया गया।
4.3 खुली प्रतियोगिता और सत्येंद्रनाथ टैगोर (1853–1863)
1853 के चार्टर एक्ट द्वारा खुली प्रतियोगिता शुरू हुई और मैकाले समिति (1854) ने नियम बनाए। 1855 से लंदन में परीक्षाएं होने लगीं:
- सत्येंद्रनाथ टैगोर (1863): रवींद्रनाथ टैगोर के बड़े भाई सत्येंद्रनाथ टैगोर 1863 में आईसीएस परीक्षा पास करने वाले प्रथम भारतीय बने। उनकी नियुक्ति बॉम्बे प्रेसीडेंसी में हुई।
- 1869 का ऐतिहासिक बैच: चार भारतीयों—सुरेंद्रनाथ बनर्जी, रोमेश चंद्र दत्त (आर.सी. दत्त), बिहारी लाल गुप्ता और आनंदराम बरुआ ने एक साथ सफलता पाई।
- सुरेंद्रनाथ बनर्जी को सिलहट (असम) में एक मामूली प्रक्रियात्मक त्रुटि के आधार पर 1874 में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया, जिसके बाद वे भारत के अग्रणी राष्ट्रवादी नेता बने।
4.4 आयु सीमा विवाद एवं सिविल सेवा आंदोलन (1877–1878)
भारतीयों के आईसीएस में प्रवेश को रोकने हेतु अंग्रेजों ने लगातार आयु सीमा घटाई (1859 में 23 वर्ष से घटाकर 22 वर्ष, 1866 में 21 वर्ष, और 1877 में लॉर्ड लिटन ने घटाकर 19 वर्ष कर दी)। इसके विरोध में सुरेंद्रनाथ बनर्जी और उनकी ‘इंडियन एसोसिएशन’ (1876) ने पूरे देश में पहला व्यापक राजनीतिक जन-आंदोलन (‘सिविल सेवा आंदोलन’) चलाया और लंदन जाकर याचिकाएं दीं।
5. सिविल सेवा आयोग, भारतीयकरण एवं लोक सेवा आयोग (1886–1947)
5.1 ऐचिसन आयोग (Aitchison Commission 1886)
लॉर्ड डफरिन ने सर चार्ल्स ऐचिसन की अध्यक्षता में लोक सेवा आयोग नियुक्त किया। इसकी प्रमुख सिफारिशें थीं:
- सिविल सेवाओं को तीन स्पष्ट श्रेणियों में पुनर्गठित किया गया:
- इंपीरियल इंडियन सिविल सर्विस (ICS): भर्ती परीक्षा केवल इंग्लैंड में।
- प्रांतीय सिविल सेवा (PCS): भर्ती प्रांतीय स्तर पर।
- अधीनस्थ सिविल सेवा (Subordinate Service): निचले पद।
- स्टैच्यूचरी सिविल सेवा (1879) को समाप्त कर दिया गया।
- अधिकतम आयु सीमा 19 से बढ़ाकर 23 वर्ष की गई।
- भारत और लंदन में एक साथ परीक्षा कराने की भारतीय मांग को अस्वीकार कर दिया गया।
5.2 भारत में प्रथम आईसीएस परीक्षा (1922 इलाहाबाद) एवं ली आयोग (1924)
- 1922 इलाहाबाद परीक्षा: मोंट-फोर्ड सुधारों के तहत 1922 में इतिहास में पहली बार लंदन के साथ-साथ भारत में इलाहाबाद में आईसीएस की खुली परीक्षा आयोजित हुई (बाद में 1927 से दिल्ली में)।
- ली आयोग (Lee Commission 1923–24): लॉर्ड ली की अध्यक्षता में गठित आयोग ने सिफारिश की कि:
- अगले 15 वर्षों में आईसीएस में 50% भारतीय और 50% यूरोपीय का अनुपात प्राप्त किया जाए।
- सीधी भर्ती में 40% ब्रिटिश, 40% भारतीय और 20% पद प्रांतीय सिविल सेवा (PCS) से पदोन्नति द्वारा भरे जाएं।
- 1919 के एक्ट की धारा 96C के तहत तुरंत एक ‘लोक सेवा आयोग’ स्थापित किया जाए।
5.3 लोक सेवा आयोग की स्थापना (1926) से UPSC तक
- केंद्रीय लोक सेवा आयोग (1 अक्टूबर 1926): ली आयोग की सिफारिश पर स्थापित हुआ। इसके प्रथम अध्यक्ष सर रॉस बार्कर (Sir Ross Barker) बने।
- संघीय लोक सेवा आयोग (FPSC 1937): 1935 के एक्ट के तहत इसका नाम बदलकर संघीय लोक सेवा आयोग किया गया और प्रांतों में प्रांतीय लोक सेवा आयोग (PPSC) बने।
- संघ लोक सेवा आयोग (UPSC 1950): 26 जनवरी 1950 को संविधान के अनुच्छेद 315 के तहत यह ‘संघ लोक सेवा आयोग’ (UPSC) बना।
- सरदार पटेल एवं आईएएस (IAS): गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने अक्टूबर 1946 में आईसीएस को समाप्त कर ‘भारतीय प्रशासनिक सेवा’ (IAS) और आईपी को ‘भारतीय पुलिस सेवा’ (IPS) के रूप में पुनर्गठित किया। सरदार पटेल को ‘आधुनिक अखिल भारतीय सेवाओं का जनक’ कहा जाता है।
6. ब्रिटिश न्यायिक व्यवस्था का क्रमिक विकास (1772–1861)
मुगल काल की पारंपरिक काजी व जमींदारी न्याय व्यवस्था को समाप्त कर अंग्रेजों ने एक आधुनिक, लिखित और संस्थागत न्यायिक ढांचा स्थापित किया।
6.1 वारेन हेस्टिंग्स की 1772 की न्यायिक योजना
वारेन हेस्टिंग्स ने प्रत्येक जिले में दो प्रकार की अदालतें बनाईं:
- जिला दीवानी अदालत: नागरिक/दीवानी मामलों हेतु, कलेक्टर की अध्यक्षता में (हिंदू पंडितों व मुस्लिम मौलवियों की सहायता से)।
- जिला फौजदारी अदालत: आपराधिक मामलों हेतु, भारतीय काजी व मुफ्ती के अधीन, जिन पर कलेक्टर का पर्यवेक्षण था।
- सदर अदालतें (कलकत्ता): जिला अदालतों की अपीलों हेतु कलकत्ता में ‘सदर दीवानी अदालत’ (गवर्नर व परिषद) और ‘सदर निजामत अदालत’ (नायब नाजिम व काजी) स्थापित की गईं।
6.2 कॉर्नवालिस कोड (Cornwallis Code 1793): शक्तियों का पृथक्करण
लॉर्ड कॉर्नवालिस ने 1793 में अपना प्रसिद्ध कोड लागू किया जिसका मूल आधार शक्तियों का पृथक्करण (Separation of Powers) था:
- कलेक्टर से न्यायिक और दंडाधिकारीय शक्तियां छीन ली गईं और उसे केवल राजस्व वसूली तक सीमित किया गया।
- जिले में न्याय हेतु एक नया पद ‘जिला जज’ (District Judge) बनाया गया।
- सर्किट कोर्ट (भ्रमणकारी अदालतें): 4 प्रांतीय सर्किट कोर्ट (कलकत्ता, ढाका, मुर्शिदाबाद, पटना) स्थापित की गईं जो जिलों में जाकर फौजदारी मुकदमों का फैसला करती थीं।
- विधि का शासन (Rule of Law): सरकारी कर्मचारियों को भी उनके पदीय कृत्यों हेतु दीवानी अदालतों में जवाबदेह बनाया गया।
- अदालतों का पदानुक्रम बना: मुंसिफ अदालत (₹50 तक) → रजिस्ट्रार अदालत → जिला अदालत → प्रांतीय अपीलीय अदालतें → सदर दीवानी अदालत कलकत्ता।
6.3 लॉर्ड विलियम बेंटिंक के न्यायिक सुधार (1828–1835)
- खर्चीली और विलंबकारी 4 प्रांतीय अपीलीय व सर्किट अदालतों को समाप्त कर दिया और उनका काम जिला मजिस्ट्रेटों व सत्र न्यायाधीशों को सौंपा।
- कलेक्टर और मजिस्ट्रेट (DM) के पदों को पुनः मिला दिया।
- अदालतों की भाषा में सुधार: 1837 में अदालतों से फारसी भाषा हटाकर सदर अदालतों में अंग्रेजी तथा निचली अदालतों में स्थानीय भारतीय भाषाएं (उर्दू, हिंदी, बंगाली आदि) लागू की गईं।
- प्रधान सदर अमीन (Principal Sadar Ameen 1831): भारतीयों को उच्च न्यायिक पदों पर नियुक्त करने हेतु पद सृजित किया गया जिसे असीमित वित्तीय अधिकार मिले।
- पश्चिमोत्तर प्रांतों (यूपी) के लिए 1831 में इलाहाबाद में एक अलग सदर दीवानी व सदर निजामत अदालत स्थापित की।
7. आधुनिक न्यायालय, विधि संहिताकरण एवं फेडरल कोर्ट (1861–1950)
7.1 1861 का भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम (High Courts Act 1861)
पुरानी दोहरी न्यायिक व्यवस्था (क्राउन का सुप्रीम कोर्ट और कंपनी की सदर अदालतें) को समाप्त कर 1862 में तीन प्रेसीडेंसी नगरों में उच्च न्यायालय बने: कलकत्ता उच्च न्यायालय (1 जुलाई 1862), बंबई उच्च न्यायालय (14 अगस्त 1862), और मद्रास उच्च न्यायालय (15 अगस्त 1862)। 1866 में आगरा में चौथा उच्च न्यायालय स्थापित हुआ जिसे 1869 में इलाहाबाद स्थानांतरित किया गया (इलाहाबाद उच्च न्यायालय)।
7.2 प्रमुख विधिक संहिताओं का निर्माण (Codification)
- 1859: सिविल प्रक्रिया संहिता (Civil Procedure Code – CPC)।
- 1860: भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code – IPC 1860) – मैकाले के प्रथम विधि आयोग द्वारा तैयार, 1 जनवरी 1862 से लागू।
- 1861: दंड प्रक्रिया संहिता (Code of Criminal Procedure – CrPC 1861)।
- 1872: भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act 1872) – सर जेम्स स्टीफन द्वारा तैयार।
7.3 इल्बर्ट बिल विवाद (1883) एवं नस्लीय भेदभाव
लॉर्ड रिपन के विधि सदस्य सर सी.पी. इल्बर्ट ने 1883 में विधेयक प्रस्तुत किया कि भारतीय सेशन जजों को भी यूरोपीय अपराधियों पर मुकदमा चलाने का अधिकार मिले। अंग्रेजों के भारी विरोध (‘श्वेत विद्रोह’) के आगे झुककर संशोधन किया गया कि यूरोपीय अभियुक्त 50% यूरोपीय सदस्यों वाली जूरी की मांग कर सकता है। इस घटना ने भारतीयों को संगठित होने की सीख दी।
7.4 संघीय न्यायालय (Federal Court 1937) से उच्चतम न्यायालय (1950) तक
- 1935 के एक्ट के तहत 1 अक्टूबर 1937 को दिल्ली में संघीय न्यायालय बना। प्रथम मुख्य न्यायाधीश सर मॉरिस ग्वेयर तथा दो अन्य जज सर शाह मोहम्मद सुलेमान और एम.आर. जयकर थे।
- संघीय न्यायालय के निर्णयों के विरुद्ध अंतिम अपील लंदन की प्रिवी काउंसिल में होती थी।
- संविधान सभा ने सितंबर 1949 में Abolition of Privy Council Jurisdiction Act 1949 पारित कर प्रिवी काउंसिल का अधिकार समाप्त किया।
- 28 जनवरी 1950 को संसद भवन के नरेंद्र मंडल कक्ष में भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) का उद्घाटन हुआ। प्रथम मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एच. जे. कनिया बने।
8. ब्रिटिश पुलिस व्यवस्था का गठन एवं सुधार (1791–1947)
8.1 दरोगा प्रणाली की शुरुआत (कॉर्नवालिस 1791)
1791 में कॉर्नवालिस ने जमींदारों से पुलिस अधिकार छीन लिए। जिले को 20-20 मील के थानों में बांटा गया और प्रत्येक थाने का प्रमुख एक भारतीय ‘दरोगा’ बनाया गया। जिले में पुलिस का समग्र नियंत्रण जिला मजिस्ट्रेट (DM) को सौंपा गया। कलकत्ता हेतु एक पुलिस अधीक्षक (SP) नियुक्त हुआ। अल्प वेतन और असीमित अधिकारों के कारण दरोगा प्रणाली घोर भ्रष्ट और दमनकारी सिद्ध हुई।
8.2 सिंध मॉडल (1843) और 1861 का भारतीय पुलिस अधिनियम
1843 में सर चार्ल्स नेपियर ने सिंध में ‘रॉयल आयरिश कांस्टेबुलरी’ की तर्ज पर एक पृथक अर्ध-सैनिक पुलिस बल का गठन किया। इसी आधार पर 1860 के एम.एच. कोर्ट पुलिस आयोग की सिफारिश पर 1861 का भारतीय पुलिस अधिनियम (Act V of 1861) पारित हुआ:
- प्रांत का पुलिस प्रमुख: पुलिस महानिरीक्षक (IGP)।
- जिले का पुलिस प्रमुख: पुलिस अधीक्षक (SP)।
- दोहरी नियंत्रण व्यवस्था: जिले में एसपी प्रशासनिक रूप से आईजीपी के अधीन था, किंतु दैनिक कानून-व्यवस्था में जिला मजिस्ट्रेट (DM) के सामान्य नियंत्रण में था।
- पदानुक्रम बना: IGP → DIG → SP → DSP / ASP → इंस्पेक्टर → सब-इंस्पेक्टर (दरोगा) → हेड कांस्टेबल → कांस्टेबल।
8.3 सर एंड्रयू फ्रेजर पुलिस आयोग (1902)
लॉर्ड कर्जन ने 1902 में फ्रेजर की अध्यक्षता में पुलिस आयोग बनाया। आयोग ने टिप्पणी की कि “भारतीय पुलिस पूर्णतः अयोग्य, अप्रशिक्षित, भ्रष्ट और दमनकारी है।” आयोग की सिफारिश पर:
- प्रांतों में सीआईडी (CID) तथा केंद्र में केंद्रीय गुप्तचर विभाग की स्थापना हुई।
- 1905 में भारतीयों हेतु उप-पुलिस अधीक्षक (DSP) का नया पद सृजित हुआ।
- सब-इंस्पेक्टर (SI) पद पर शिक्षित युवाओं की सीधी भर्ती और पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज (मुरादाबाद, भागलपुर) में प्रशिक्षण शुरू हुआ।
- लंदन में खुली परीक्षा द्वारा 1893 से इंडियन पुलिस (IP) संवर्ग की भर्ती प्रारंभ हुई, जिसे 1948 में पटेल ने आईपीएस (IPS) में परिवर्तित किया।
9. ब्रिटिश सैन्य संगठन एवं औपनिवेशिक रक्षा नीति (1857–1947)
9.1 पील आयोग (Peel Commission 1859) और संतुलन नीति
1857 के विद्रोह के बाद जोनाथन पील की अध्यक्षता में शाही आयोग बना। इसकी सिफारिश पर सेना में भविष्य के विद्रोहों को रोकने हेतु ‘संतुलन और जवाबी संतुलन’ (Counterpoise of Natives against Natives) की नीति अपनाई गई:
- सैनिक अनुपात: बंगाल सेना में 1 यूरोपीय पर 2 भारतीय (1:2) तथा मद्रास व बंबई में 1:3 का अनुपात तय किया गया।
- तोपखाना (Artillery): तोपखाना और उन्नत हथियार पूरी तरह यूरोपीय सैनिकों के हाथों में आरक्षित किए गए।
- मार्शल और गैर-मार्शल जातियों का सिद्धांत: विद्रोह में भाग लेने वाले अवध, बिहार और बंगाल के सैनिकों को ‘गैर-मार्शल’ घोषित कर भर्ती से बाहर किया गया, जबकि अंग्रेजों का साथ देने वाले गोरखा, सिख, पठान और डोगरा सैनिकों को ‘मार्शल कौम’ बताकर भर्ती में प्राथमिकता दी गई।
- जाति, क्षेत्र और धर्म के आधार पर पृथक रेजीमेंटें (सिख, गोरखा, जाट, राजपूत) बनाई गईं ताकि उनमें साझी राष्ट्रीय चेतना न पनपे।
9.2 सेना का भारतीयकरण, सैंडहर्स्ट समिति व आईएमए (1932)
- 1918 से सैंडहर्स्ट (इंग्लैंड) में भारतीयों को ‘किंग्स कमीशन’ (KCIO) मिलना शुरू हुआ। के.एम. करियप्पा प्रारंभिक बैच में थे।
- सैंडहर्स्ट समिति / स्कीन समिति (1925): सर एंड्रयू स्कीन की अध्यक्षता में (मोतीलाल नेहरू सदस्य) बनी। इसने भारत में सैन्य अकादमी खोलने की सिफारिश की।
- भारतीय सैन्य अकादमी (IMA Dehradun 1932): 1 अक्टूबर 1932 को देहरादून में आईएमए की स्थापना हुई। इसके प्रथम कमांडेंट ब्रिगेडियर एल.पी. कॉलिन्स थे। फील्ड मार्शल चेटवोड ने प्रसिद्ध ‘चेटवोड आदर्श वाक्य’ दिया।
- 1946 का नौसेना विद्रोह: बंबई में ‘एचएमआईएस तलवार’ के भारतीय नाविकों के विद्रोह ने ब्रिटिश हुकूमत की सैन्य बुनियाद हिला दी और सत्ता हस्तांतरण को अपरिहार्य बना दिया।
10. वित्तीय विकेंद्रीकरण, स्थानीय स्वशासन एवं प्रशासनिक पुनरीक्षण
10.1 वित्तीय विकेंद्रीकरण का विकास (1870–1882)
- लॉर्ड मेयो का संकल्प (1870): पहली बार प्रांतों को पुलिस, जेल, शिक्षा और सड़कों हेतु एकमुश्त वार्षिक बजट सौंपा गया। इसे ‘वित्तीय विकेंद्रीकरण का पहला कदम’ कहा जाता है।
- लॉर्ड लिटन (1877): प्रांतों को स्टाम्प, आबकारी और न्याय जैसे राजस्व स्रोतों का प्रबंधन दिया गया।
- लॉर्ड रिपन (1882): राजस्व स्रोतों को तीन स्पष्ट श्रेणियों में बांटा गया: 1. पूर्णतः केंद्रीय (इंपीरियल), 2. पूर्णतः प्रांतीय, और 3. विभाजित मदें (Divided Heads – भू-राजस्व, स्टाम्प आदि)। यह व्यवस्था 1919 तक चली।
10.2 लॉर्ड रिपन का 1882 का संकल्प: स्थानीय स्वशासन का मैग्नाकार्टा
18 मई 1882 को लॉर्ड रिपन ने स्थानीय स्वशासन पर ऐतिहासिक संकल्प जारी किया। लॉर्ड रिपन को ‘भारत में स्थानीय स्वशासन का जनक’ और उनके संकल्प को ‘स्थानीय स्वशासन का मैग्नाकार्टा’ कहा जाता है:
- ग्रामीण क्षेत्रों में तालुका बोर्ड व जिला बोर्ड तथा शहरों में नगरपालिकाओं का गठन।
- स्थानीय निकायों में गैर-सरकारी (गैर-अधिकारी) सदस्यों का स्पष्ट बहुमत।
- सदस्यों का चुनाव जनता द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचन से कराने की संस्तुति।
- बोर्डों के अध्यक्ष गैर-सरकारी व्यक्ति होने चाहिए और जिला मजिस्ट्रेट को केवल बाहरी पर्यवेक्षक रहना चाहिए।
10.3 हॉबहाउस विकेंद्रीकरण आयोग (1907) एवं समग्र निष्कर्ष
1907 में सर चार्ल्स हॉबहाउस की अध्यक्षता में गठित शाही विकेंद्रीकरण आयोग (आर.सी. दत्त सदस्य) ने ग्राम पंचायतों को स्थानीय स्वशासन की बुनियादी इकाई बनाकर पुनर्जीवित करने की सिफारिश की। 1919 के एक्ट में स्थानीय स्वशासन को ‘हस्तांतरित विषय’ बनाया गया जिससे भारतीय मंत्रियों ने पंचायत कानूनों का विस्तार किया।
समग्र निष्कर्ष: ब्रिटिश प्रशासनिक, न्यायिक और सैन्य संरचना का प्राथमिक उद्देश्य भारत का कल्याण नहीं, बल्कि औपनिवेशिक दोहन और ब्रिटिश साम्राज्य की सुरक्षा सुनिश्चित करना था। तथापि, अनजाने में इस व्यवस्था ने एक एकीकृत अखिल भारतीय प्रशासनिक ढांचा, समान विधि संहिताएं और संस्थागत आधार प्रदान किया, जिसे स्वतंत्र भारत ने 1947 के बाद एक लोक-कल्याणकारी लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में सफलतापूर्वक रूपांतरित किया।
⚡ त्वरित पुनरीक्षण तालिका: ब्रिटिश प्रशासनिक व संवैधानिक मील के पत्थर
| वर्ष / अधिनियम | प्रमुख गवर्नर-जनरल / आयोग | ऐतिहासिक महत्व एवं प्रशासनिक प्रभाव |
|---|---|---|
| 1773 रेगुलेटिंग एक्ट | वारेन हेस्टिंग्स | गवर्नर-जनरल ऑफ बंगाल पद, 4 सदस्यीय परिषद, 1774 में कलकत्ता सुप्रीम कोर्ट (एलिजा इम्पे)। |
| 1784 पिट्स इंडिया एक्ट | विलियम पिट / हेस्टिंग्स | द्वैध शासन (Court of Directors + Board of Control), ‘ब्रिटिश संपत्ति’ शब्द का प्रथम प्रयोग। |
| 1793 कॉर्नवालिस कोड | लॉर्ड कॉर्नवालिस | शक्तियों का पृथक्करण (कलेक्टर से न्यायिक अधिकार वापस), जिला जज का पद, दरोगा प्रणाली। |
| 1833 चार्टर अधिनियम | लॉर्ड विलियम बेंटिंक | ‘भारत का गवर्नर-जनरल’ पद, कंपनी के व्यापार का पूर्ण अंत, विधि सदस्य (मैकाले), धारा 87। |
| 1853 चार्टर अधिनियम | लॉर्ड डलहौजी | विधायी व प्रशासनिक कार्य पृथक (लघु संसद), सिविल सेवा हेतु खुली प्रतियोगी परीक्षा की शुरुआत। |
| 1858 भारत सरकार अधिनियम | लॉर्ड कैनिंग | कंपनी राज का अंत, क्राउन का शासन, भारत सचिव व 15-सदस्यीय भारत परिषद, वायसराय पद। |
| 1861 पुलिस व हाई कोर्ट एक्ट | लॉर्ड कैनिंग | पोर्टफोलियो प्रणाली, अध्यादेश शक्ति, 1861 पुलिस अधिनियम (IGP/SP), 1862 में तीन उच्च न्यायालय। |
| 1882 स्थानीय स्वशासन संकल्प | लॉर्ड रिपन | स्थानीय स्वशासन का मैग्नाकार्टा, गैर-सरकारी बहुमत, रिपन को ‘स्थानीय स्वशासन का जनक’ कहा गया। |
| 1909 मार्ले-मिंटो सुधार | लॉर्ड मिंटो / जॉन मार्ले | मुसलमानों हेतु पृथक सांप्रदायिक निर्वाचन मंडल, एस.पी. सिन्हा कार्यकारिणी में प्रथम भारतीय। |
| 1919 मोंट-फोर्ड सुधार | चेम्सफोर्ड / मोंटागु | प्रांतों में द्वैध शासन (आरक्षित व हस्तांतरित), केंद्र में द्विसदनीय विधायिका, प्रत्यक्ष निर्वाचन। |
| 1924 ली आयोग / 1926 PSC | लॉर्ड ली / सर रॉस बार्कर | आईसीएस में 50:50 का अनुपात, 1 अक्टूबर 1926 को भारत में प्रथम लोक सेवा आयोग का गठन। |
| 1935 भारत सरकार अधिनियम | लॉर्ड विलिंगडन | प्रांतीय स्वायत्तता, तीन सूचियां, 1937 में संघीय न्यायालय (सर मॉरिस ग्वेयर), 1935 RBI स्थापना। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ) – ब्रिटिश प्रशासनिक व संवैधानिक विकास
प्र. 1: भारत में सिविल सेवा का जनक किसे माना जाता है?
उत्तर: लॉर्ड कॉर्नवालिस को भारत में सिविल सेवा का जनक माना जाता है। उन्होंने निजी व्यापार पर रोक लगाई, अधिकारियों का वेतन बढ़ाया और प्रशासन को पेशेवर व अनुशासित बनाया।
प्र. 2: भारत के प्रथम आईसीएस (ICS) अधिकारी कौन थे?
उत्तर: रवींद्रनाथ टैगोर के बड़े भाई सत्येंद्रनाथ टैगोर ने 1863 ई. में लंदन में आईसीएस परीक्षा पास कर प्रथम भारतीय आईसीएस अधिकारी बनने का गौरव प्राप्त किया था।
प्र. 3: ‘कॉर्नवालिस कोड 1793’ का मूल सिद्धांत क्या था?
उत्तर: कॉर्नवालिस कोड ‘शक्तियों के पृथक्करण’ (Separation of Powers) पर आधारित था। इसने राजस्व प्रशासन को न्याय प्रशासन से अलग किया और कलेक्टर से न्यायिक शक्तियां लेकर जिला जज का स्वतंत्र पद बनाया।
प्र. 4: भारत में स्थानीय स्वशासन का जनक किसे कहा जाता है?
उत्तर: लॉर्ड रिपन को भारत में स्थानीय स्वशासन का जनक कहा जाता है। उन्होंने 18 मई 1882 को ऐतिहासिक स्थानीय स्वशासन संकल्प जारी किया जिसे इसका मैग्नाकार्टा कहा जाता है।
प्र. 5: 1937 में स्थापित संघीय न्यायालय (Federal Court) के प्रथम मुख्य न्यायाधीश कौन थे?
उत्तर: सर मॉरिस ग्वेयर (Sir Maurice Gwyer) संघीय न्यायालय के प्रथम मुख्य न्यायाधीश थे। 1950 में स्वतंत्र भारत का उच्चतम न्यायालय बनने पर न्यायमूर्ति एच.जे. कनिया प्रथम भारतीय मुख्य न्यायाधीश बने।


