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सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलन राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, ईश्वरचंद्र विद्यासागर एवं ज्योतिराव फुले

19वीं व 20वीं सदी के सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलन (Socio-Religious Reform Movements in India) – संपूर्ण विश्लेषणात्मक अध्ययन एवं नोट्स

UPSC CSE & State PCS Master Notes
आधुनिक भारत का इतिहास (GS Paper 1)
Updated 2026 Edition

19वीं एवं 20वीं सदी के सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलन (Socio-Religious Reform Movements of Modern India) भारतीय इतिहास के सर्वाधिक युगांतरकारी अध्याय हैं। औपनिवेशिक शासन की स्थापना, पाश्चात्य वैज्ञानिक ज्ञान के आगमन, अंग्रेजी शिक्षा और ईसाई मिशनरियों की सांस्कृतिक चुनौतियों के प्रत्युत्तर में भारतीय समाज के भीतर से एक आत्म-निरीक्षण और आत्म-सुधार की लहर उठी, जिसे ‘भारतीय पुनर्जागरण’ (Indian Renaissance) कहा जाता है।

राजा राममोहन राय के ब्रह्म समाज से प्रारंभ होकर स्वामी दयानंद सरस्वती के आर्य समाज, स्वामी विवेकानंद के रामकृष्ण मिशन, महात्मा ज्योतिराव फुले के सत्यशोधक समाज, सर सैयद अहमद खान के अलीगढ़ आंदोलन तथा पेरियार व डॉ. अम्बेडकर के सामाजिक न्याय संघर्षों तक फैले इन आंदोलनों ने न केवल भारतीय समाज में सदियों से व्याप्त सती प्रथा, छुआछूत, बाल विवाह, नरबलि, मूर्तिपूजा व धार्मिक पाखंड जैसी कुरीतियों पर निर्मम प्रहार किया, बल्कि भारत में आधुनिक राष्ट्रवाद, लोकतांत्रिक चेतना और मानव-अधिकारों की आधारशिला रखी।

⚡ AEO Quick Answer: सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन क्या थे और इनका मुख्य उद्देश्य क्या था?

19वीं व 20वीं सदी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन औपनिवेशिक भारत में विवेकवाद, मानवतावाद और धर्मनिरपेक्षता पर आधारित जन-जागरण प्रयास थे। ये आंदोलन मुख्य रूप से दो धाराओं में विभाजित थे: (1) सुधारवादी (Reformist) जैसे ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज, अलीगढ़ आंदोलन—जिन्होंने पाश्चात्य आधुनिक विचारों को स्वीकार किया; तथा (2) पुनरुत्थानवादी (Revivalist) जैसे आर्य समाज, रामकृष्ण मिशन, देवबंद आंदोलन—जिन्होंने अपने प्राचीन वेदों व धर्मग्रंथों की मूल शुद्धता की ओर लौटने पर बल दिया। इनका मुख्य उद्देश्य सामाजिक कुरीतियों (सती, अस्पृश्यता, बाल विवाह) का उन्मूलन, स्त्री शिक्षा का प्रसार तथा रूढ़िवादिता को समाप्त कर भारतीय समाज को बौद्धिक रूप से आधुनिक बनाना था।

💡 विशेष संदर्भ अध्ययन (Recommended Study): 19वीं एवं 20वीं सदी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन (राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद आदि) में आधुनिक शिक्षा (मैकाले मिनट, वुड्स डिस्पैच) एवं भारतीय समाचार-पत्रों (संवाद कौमुदी, मिरात-उल-अखबार, सोम प्रकाश, आदि) की सर्वाधिक निर्णायक भूमिका रही। इसके गहन विश्लेषणात्मक अध्ययन हेतु अवश्य पढ़ें: 👉 आधुनिक भारत में शिक्षा एवं प्रेस का विकास (1781–1947): नीतियां, आयोग व ऐतिहासिक समाचार-पत्र (अध्याय 13 नोट्स)

Table of Contents

1. भारतीय पुनर्जागरण की पृष्ठभूमि एवं उद्भव के प्रमुख कारण

18वीं सदी के उत्तरार्ध में जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में अपना राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित किया, उस समय भारतीय समाज रूढ़िवादी जड़ता, धार्मिक आडंबर और सामाजिक पतन के दौर से गुजर रहा था। समाज में जन्म-आधारित कठोर जाति व्यवस्था, अस्पृश्यता, बाल विवाह, सती प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या, बहुविवाह, विधवाओं का उत्पीड़न और शिक्षा पर केवल उच्च कुलीनों का एकाधिकार जैसी गंभीर कुरीतियां व्याप्त थीं।

भारतीय पुनर्जागरण के उद्भव के 4 प्रमुख कारक:

  1. पाश्चात्य बौद्धिक संपर्क एवं ज्ञानोदय (Enlightenment): बेकन, जॉन लॉक, वोल्टेयर, रूसो और जेरेमी बेंथम के उपयोगितावादी विचारों तथा 1789 की फ्रांसीसी क्रांति (स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व) के सिद्धांतों ने अंग्रेजी-पढ़े भारतीय युवाओं के दृष्टिकोण को तार्किक और वैज्ञानिक बनाया।
  2. औपनिवेशिक सांस्कृतिक चुनौती एवं ईसाई मिशनरियों का आक्रमण: 1813 के चार्टर एक्ट के बाद ईसाई मिशनरियों ने भारत में बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन शुरू किया और हिंदू व मुस्लिम धर्मों को ‘बर्बर’ और ‘अंधविश्वासी’ कहकर उपहास उड़ाया। अपनी सांस्कृतिक पहचान की रक्षा हेतु भारतीय विचारकों ने धर्म के भीतर से ही कुरीतियों को हटाने का बीड़ा उठाया।
  3. प्राच्यवादी शोध एवं भारत के गौरवशाली अतीत की खोज: सर विलियम जोन्स, चार्ल्स विल्किंस और मैक्स मूलर जैसे ओरिएंटलिस्ट विद्वानों ने वेदों, उपनिषदों, गीता और कालिदास के ग्रंथों का अनुवाद कर भारतीयों को यह याद दिलाया कि उनका प्राचीन वैदिक अतीत वैज्ञानिक और समतामूलक था, न कि रूढ़िवादी।
  4. आधुनिक भारतीय प्रेस एवं बुद्धिजीवी वर्ग का उदय: समाचार पत्रों (संवाद कौमुदी, मिरात-उल-अखबार, दर्पण, रस्त गोफ्तार) ने जनसाधारण के बीच सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध जनमत तैयार किया।

2. सुधारवादी बनाम पुनरुत्थानवादी आंदोलन: तुलनात्मक विश्लेषण (Matrix)

19वीं सदी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों को वैचारिक दृष्टि से दो मुख्य श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है:

मापदंडसुधारवादी आंदोलन (Reformist Movements)पुनरुत्थानवादी आंदोलन (Revivalist Movements)
मूल वैचारिक दर्शनपाश्चात्य विवेकवाद, वैज्ञानिक तर्क और आधुनिक मानवीय मूल्यों पर आधारित। प्राचीन ग्रंथों का अंधानुकरण अस्वीकार।प्राचीन धर्मग्रंथों (वेदों या कुरान) की मूल पवित्रता और सर्वोच्चता की ओर वापसी पर बल।
प्रमुख आंदोलनब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज, यंग बंगाल आंदोलन, अलीगढ़ आंदोलन, सत्यशोधक समाज, रहनुमाई मजदायसन सभा।आर्य समाज, रामकृष्ण मिशन, देवबंद आंदोलन, वहाबी आंदोलन, सिंह सभा आंदोलन।
वेदों/धर्मग्रंथों पर दृष्टिकोणधर्मग्रंथों को अंतिम या अचूक (Infallible) नहीं माना। राजा राममोहन राय ने कहा कि किसी ग्रंथ की व्याख्या बुद्धि और विवेक की कसौटी पर होनी चाहिए।वेदों को ईश्वर-प्रदत्त और पूर्णतः अचूक माना (स्वामी दयानंद: “वेदों की ओर लौटो”)।
पाश्चात्य संस्कृति के प्रति रुखपश्चिमी ज्ञान-विज्ञान, अंग्रेजी शिक्षा और आधुनिक संस्थाओं का खुला स्वागत।पश्चिमी सांस्कृतिक आक्रामकता का विरोध, यद्यपि आधुनिक विज्ञान के व्यावहारिक लाभ को स्वीकार किया।
मुख्य उपलब्धियांसती उन्मूलन (1829), विधवा पुनर्विवाह (1856), सिविल मैरिज एक्ट (1872), जाति-विरोधी चेतना का विकास।आत्मगौरव और स्वाभिमान का जागरण, शुद्धि आंदोलन, स्वदेशी की भावना, राष्ट्रीय स्वाधीनता का आह्वान (“भारत भारतीयों के लिए”)।

3. राजा राममोहन राय एवं ब्रह्म समाज (संपूर्ण इतिहास व विभाजन)

राजा राममोहन राय (1772–1833) को आधुनिक भारत का जनक, भारतीय पुनर्जागरण का अग्रदूत, ‘नव प्रभात का तारा’ और सुभाष चंद्र बोस द्वारा ‘युगदूत’ कहा गया है। वे बहुभाषाविद थे जिन्हें संस्कृत, फारसी, अरबी, अंग्रेजी, हिब्रू, ग्रीक, लैटिन और फ्रेंच भाषाओं का प्रकांड ज्ञान था।

राजा राममोहन राय की प्रमुख साहित्यिक व सामाजिक कृतियां:

  • तुहफात-उल-मुवाहिद्दीन (1803): फारसी भाषा में रचित पुस्तक जिसका अर्थ है ‘एकेश्वरवादियों को उपहार’ (A Gift to Monotheists)। इसमें उन्होंने मूर्तिपूजा और अंधविश्वासों का तार्किक खंडन किया।
  • प्रीसेप्ट्स ऑफ जीसस (1820): इसमें उन्होंने ईसा मसीह के नैतिक और दार्शनिक संदेशों की प्रशंसा की, परंतु ईसाई पादरियों के चमत्कारों और अंधविश्वासों को खारिज कर दिया।
  • समाचार पत्र: 1821 में बांग्ला में ‘संवाद कौमुदी’ (सती प्रथा के विरोध का मुख्य मंच) और 1822 में फारसी भाषा का पहला समाचार पत्र ‘मिरात-उल-अखबार’ प्रकाशित किया।
  • संस्थाएं: 1815 में ‘आत्मीय सभा’ (मित्रों की सभा), 1817 में डेविड हेयर के साथ कलकत्ता में ‘हिंदू कॉलेज’ और 1825 में ‘वेदांत कॉलेज’ की स्थापना की।
  • ‘राजा’ की उपाधि: मुगल सम्राट अकबर द्वितीय ने अपनी पेंशन बढ़वाने हेतु उन्हें अपना दूत बनाकर इंग्लैंड भेजा था और उन्हें ‘राजा’ की पदवी दी थी। 27 सितंबर 1833 को इंग्लैंड के ब्रिस्टल में उनका देहांत हुआ।

ब्रह्म समाज की स्थापना (1828) एवं इसके मूल सिद्धांत

20 अगस्त 1828 को राजा राममोहन राय ने कलकत्ता में ‘ब्रह्म सभा’ की नींव रखी, जो 1830 में ‘ब्रह्म समाज’ (Brahmo Samaj) बना। इसका मुख्य उद्देश्य एक निराकार, सर्वव्यापी ईश्वर की उपासना करना था।

  • एकेश्वरवाद का प्रचार: उपनिषदों के आधार पर केवल एक सर्वशक्तिमान ईश्वर की उपासना का संदेश दिया।
  • मूर्तिपूजा, पुरोहितवाद व कर्मकांडों का त्याग: मंदिर में किसी मूर्ति, चित्र, पशुबलि या किसी धर्म की निंदा पर पूर्ण प्रतिबंध रखा गया।
  • सती प्रथा उन्मूलन (1829): राममोहन राय के अथक प्रयासों से लॉर्ड विलियम बेंटिंक ने 4 दिसंबर 1829 को नियम XVII पारित कर सती प्रथा को गैर-कानूनी और हत्या घोषित किया। इसके विरोध में रूढ़िवादी हिंदुओं ने राधाकांत देव के नेतृत्व में ‘धर्म सभा’ बनाई थी।

ब्रह्म समाज का विभाजन (1866 एवं 1878 के ऐतिहासिक विखंडन)

राजा राममोहन राय के इंग्लैंड जाने के बाद रामचंद्र विद्यावागीश और द्वारकानाथ टैगोर ने समाज का संचालन किया। इसके बाद ब्रह्म समाज के विकास में दो प्रमुख विभाजन हुए:

चरण / वर्षशाखा का नामप्रमुख नेतावैचारिक कारण एवं परिणाम
1839–1858तत्वबोधिनी सभा एवं ब्रह्म समाजमहर्षि देवेंद्रनाथ टैगोर1839 में ‘तत्वबोधिनी सभा’ बनाई। बांग्ला पत्रिका ‘तत्वबोधिनी पत्रिका’ (संपादक: अक्षय कुमार दत्त) निकाली। इन्होंने आंदोलन को विशुद्ध भारतीय दार्शनिक आधार दिया।
प्रथम विभाजन (1866)1. आदि ब्रह्म समाज
2. भारतवर्षीय ब्रह्म समाज
1. देवेंद्रनाथ टैगोर
2. केशवचंद्र सेन
केशवचंद्र सेन ने ईसाई और इस्लामी शिक्षाओं को शामिल करना चाहा और अंतर-जातीय विवाहों का समर्थन किया। देवेंद्रनाथ रूढ़िवादी हिंदू धारा से जुड़े रहना चाहते थे। अंततः देवेंद्रनाथ का धड़ा ‘आदि ब्रह्म समाज’ और केशवचंद्र का धड़ा ‘भारतवर्षीय ब्रह्म समाज’ बना।
द्वितीय विभाजन (1878)साधारण ब्रह्म समाज (Sadharan Brahmo Samaj)आनंदमोहन बोस, शिवनाथ शास्त्री, द्वारकानाथ गांगुलीकेशवचंद्र सेन ने 1872 में ‘बाल विवाह निषेध अधिनियम’ (Native Marriage Act) पारित कराया था। किंतु 1878 में उन्होंने स्वयं अपनी 13 वर्षीय अल्पवयस्क पुत्री का विवाह कूचबिहार के नाबालिग राजा से वैदिक रीति से कर दिया। इस पाखंड से क्षुब्ध होकर युवा प्रगतिशीलों ने अलग होकर ‘साधारण ब्रह्म समाज’ की स्थापना की।

4. यंग बंगाल आंदोलन एवं ईश्वरचंद्र विद्यासागर

यंग बंगाल आंदोलन (Young Bengal Movement): हेनरी विवियन डेरोजियो

1820 के दशक के उत्तरार्ध में कलकत्ता के हिंदू कॉलेज के युवा शिक्षक हेनरी विवियन डेरोजियो (1809–1831) ने बंगाल के युवाओं में एक क्रांतिकारी बौद्धिक तूफान खड़ा किया।

  • डेरोजियो फ्रांसीसी क्रांति के स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के नारों से अत्यधिक प्रभावित थे। उन्होंने 1828 में ‘एकेडेमिक एसोसिएशन’ और ‘सोसायटी फॉर द एक्विजिशन ऑफ जनरल नॉलेज’ बनाई।
  • उनके अनुयायियों (डेरोजियंस) ने परंपराओं, रीति-रिवाजों और अंधविश्वासों पर तीखे सवाल उठाए। वे खुलेआम गोमांस खाते और शराब पीते थे ताकि रूढ़िवादी हिंदू समाज को चुनौती दे सकें।
  • डेरोजियो को ‘आधुनिक भारत का प्रथम राष्ट्रवादी कवि’ भी माना जाता है (उनकी कविता: ‘To India – My Native Land’)। मात्र 22 वर्ष की आयु में 1831 में हैजा से उनका निधन हो गया।
  • सीमाएं: यह आंदोलन आम जनता, किसानों और ग्रामीण समाज से पूरी तरह कटा रहा और केवल कलकत्ता के उच्चवर्गीय युवाओं की बौद्धिक उछल-कूद तक सीमित रहा।

पंडित ईश्वरचंद्र विद्यासागर (1820–1891): विधवा पुनर्विवाह के महानायक

संस्कृत कॉलेज के प्रधानाचार्य ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने पारंपरिक पांडित्य और आधुनिक मानवतावाद का अद्वितीय समन्वय प्रस्तुत किया।

विद्यासागर के ऐतिहासिक योगदान:

  • संस्कृत शिक्षा का लोकतंत्रीकरण: उन्होंने संस्कृत कॉलेज के द्वार गैर-ब्राह्मण जातियों (कायस्थों व वैद्यों) के लिए खोल दिए और आधुनिक पश्चिमी विचारों को पाठ्यक्रम में जोड़ा। बांग्ला वर्णमाला सिखाने वाली प्रसिद्ध पुस्तक ‘वर्णपरिचय’ लिखी।
  • हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम 1856 (Act XV of 1856): उन्होंने पराशर स्मृति के श्लोकों को उद्धृत कर सिद्ध किया कि वेदों और शास्त्रों में विधवा विवाह की स्पष्ट अनुमति है। उनके हस्ताक्षरित ज्ञापन के आधार पर लॉर्ड डलहौजी ने विधेयक का प्रारूप तैयार किया और लॉर्ड कैनिंग ने 26 जुलाई 1856 को यह कानून पारित किया। दिसंबर 1856 में कलकत्ता में पहला कानूनी हिंदू विधवा पुनर्विवाह संपन्न कराया।
  • महिला शिक्षा का विस्तार: जे.ई.डी. बेथून के साथ मिलकर 1849 में कलकत्ता में भारत का पहला आधुनिक बालिका विद्यालय ‘बेथून स्कूल’ स्थापित किया और अपने निजी व्यय पर बंगाल में 35 से अधिक बालिका विद्यालय खोले।

5. पश्चिमी भारत में सामाजिक सुधार आंदोलन (महाराष्ट्र का पुनर्जागरण)

महाराष्ट्र में सामाजिक सुधार आंदोलन अधिक व्यावहारिक, व्यापक और जमीनी थे।

  • बालशास्त्री जांभेकर (1812–1846): ‘मराठी पत्रकारिता के जनक’। 1832 में पहला मराठी साप्ताहिक ‘दर्पण’ और 1840 में पहली मासिक पत्रिका ‘दिग्दर्शन’ निकाली। उन्होंने ब्राह्मणवादी रूढ़ियों पर प्रहार किया और शुद्धिकरण द्वारा हिंदू धर्म में वापसी का समर्थन किया।
  • परमहंस मंडली (1849): दादोबा पांडुरंग और दुर्गाराम मेहताजी द्वारा बंबई में स्थापित गुप्त संस्था। इसके सदस्य गुप्त सभाओं में निचली जातियों द्वारा पकाया गया भोजन ग्रहण करते थे और मूर्तिपूजा का विरोध करते थे।
  • गोपाल हरी देशमुख ‘लोकहितवादी’ (1823–1892): उन्होंने साप्ताहिक ‘प्रभाकर’ में 100 खुले पत्र (शतपत्रे) लिखे। उन्होंने घोषणा की: “यदि कोई धर्म सामाजिक सुधारों की अनुमति नहीं देता, तो उस धर्म को ही बदल देना चाहिए।”

प्रार्थना समाज (Prarthana Samaj, 1867)

केशवचंद्र सेन की महाराष्ट्र यात्रा से प्रेरित होकर 31 मार्च 1867 को डॉ. आत्माराम पांडुरंग ने बंबई में ‘प्रार्थना समाज’ की स्थापना की। 1870 में न्यायमूर्ति महादेव गोविंद रानडे (M.G. Ranade) और इतिहासकार डॉ. आर.जी. भंडारकर इसमें शामिल हुए, जिसके बाद यह पश्चिमी भारत का प्रमुख सुधारवादी केंद्र बन गया।

📌 प्रार्थना समाज के 4 प्रमुख सामाजिक स्तंभ:
  1. जाति व्यवस्था की कठोरता और अस्पृश्यता का विरोध (सहभोज एवं अंतर-जातीय विवाह)।
  2. विधवा पुनर्विवाह को प्रोत्साहन (1861 में रानडे ने ‘विधवा विवाह संघ’ बनाया)।
  3. स्त्री शिक्षा का प्रसार और बाल विवाह का उन्मूलन।
  4. दलित व उपेक्षित वर्गों का उत्थान (1906 में वी.आर. शिंदे ने ‘डिप्रेस्ड क्लासेज मिशन’ बनाया)।

एम.जी. रानडे ने 1870 में ‘पूना सार्वजनिक सभा’ और 1887 में ‘भारतीय राष्ट्रीय सामाजिक सम्मेलन’ (National Social Conference) की स्थापना की, जिसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का सामाजिक सुधार प्रकोष्ठ माना जाता था। इसके तहत ‘शपथ आंदोलन’ (Pledge Movement) चलाया गया जिसमें लोगों से बाल विवाह न करने की शपथ दिलवाई जाती थी।

6. जाति विरोधी एवं सामाजिक समानता आंदोलन (फुले, शाहू व अम्बेडकर)

महात्मा ज्योतिराव गोविंदराव फुले (1827–1890) एवं सत्यशोधक समाज

माली (शूद्र) जाति में जन्मे ज्योतिराव फुले आधुनिक भारत के प्रथम महान जाति-विरोधी और सामाजिक क्रांति के जनक थे।

  • सत्यशोधक समाज की स्थापना (24 सितंबर 1873): इस समाज का मुख्य उद्देश्य शूद्रों और अति-शूद्रों (दलितों) को ब्राह्मणवादी शोषण और धार्मिक पाखंड से मुक्ति दिलाना था। उन्होंने बिना पुरोहित के विवाह संस्कार की शुरुआत की।
  • प्रसिद्ध रचनाएं: ‘गुलामगिरी’ (1873)—जो अमेरिका में दास प्रथा को समाप्त करने वाले आंदोलनकारियों को समर्पित थी; ‘शेतकऱ्याचा आसूड’ (किसान का कोड़ा – 1883) और ‘सार्वजनिक सत्य धर्म पुस्तक’।
  • क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले एवं फातिमा शेख: सावित्रीबाई ने 1848 में पुणे के भिड़े वाड़ा में भारत का पहला बालिका विद्यालय खोला। 1863 में फुले दंपती ने ‘बालहत्या प्रतिबंधक गृह’ स्थापित किया जहाँ पीड़ित विधवाओं के बच्चों का पालन-पोषण किया जाता था।

छत्रपति शाहू महाराज (1874–1922) एवं कोल्हापुर रियासत

कोल्हापुर के महाराजा छत्रपति शाहू जी महाराज ने 1902 में अपनी रियासत में पिछड़े और वंचित वर्गों के लिए 50% आरक्षण लागू किया, जो भारत के इतिहास में आरक्षण का पहला ऐतिहासिक वैधानिक प्रावधान था। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य व निःशुल्क बनाया और डॉ. अम्बेडकर के समाचार पत्र ‘मूकनायक’ (1920) के प्रकाशन हेतु वित्तीय सहायता दी।

डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर (1891–1956): महासंग्राम एवं मुक्ति आंदोलन

डॉ. अम्बेडकर ने जाति व्यवस्था के विरुद्ध आंदोलन को संवैधानिक, राजनीतिक और जनआंदोलन के शीर्ष पर पहुंचाया।

वर्षसंस्था / आंदोलनमहत्व एवं ऐतिहासिक प्रभाव
1924बहिष्कृत हितकारिणी सभा (बंबई)दलितों में शिक्षा और आत्मसम्मान जगाने हेतु स्थापना। मूल मंत्र: “शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो”।
20 मार्च 1927महाड़ सत्याग्रह (चवदार तालाब)सार्वजनिक चवदार तालाब से अछूतों के पानी पीने के अधिकार हेतु पहला मानवाधिकार सत्याग्रह (20 मार्च को ‘सामाजिक अधिकारिता स्मृति दिवस’ मनाया जाता है)।
25 दिसंबर 1927मनुस्मृति दहनजातिगत असमानता और महिलाओं व शूद्रों के दमन के प्रतीक ग्रंथ ‘मनुस्मृति’ का सार्वजनिक दहन।
1930कालाराम मंदिर सत्याग्रह (नासिक)अस्पृश्यों के मंदिर प्रवेश के अधिकार हेतु 5 वर्षों तक चला ऐतिहासिक अहिंसक संघर्ष।
1936 / 1942इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी / अनुसूचित जाति परिसंघमजदूरों और शोषित वर्गों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व हेतु स्वतंत्र राजनीतिक दलों का गठन।
14 अक्टूबर 1956बौद्ध धर्म दीक्षा (दीक्षाभूमि, नागपुर)लाखों अनुयायियों के साथ हिंदू धर्म की वर्णव्यवस्था का त्याग कर समतामूलक नवयान बौद्ध धर्म अंगीकार किया।

7. आर्य समाज एवं स्वामी दयानंद सरस्वती (वैदिक पुनरुत्थानवाद)

स्वामी दयानंद सरस्वती (1824–1883) का मूल नाम मूलशंकर था। उनका जन्म गुजरात के टंकारा में हुआ था। मथुरा के प्रज्ञाचक्षु स्वामी विरजानंद से वैदिक दर्शन की दीक्षा लेने के बाद उन्होंने संपूर्ण भारत में वैदिक धर्म के शुद्ध रूप का प्रचार किया।

आर्य समाज (10 अप्रैल 1875): स्थापना एवं सिद्धांत

  • स्थापना: 10 अप्रैल 1875 को बंबई (काकड़वाड़ी) में आर्य समाज की स्थापना हुई। 1877 में इसका मुख्यालय लाहौर स्थानांतरित किया गया जहाँ इसके ’10 नियम’ निर्धारित किए गए।
  • मूल नारा: “वेदों की ओर लौटो” (Go Back to the Vedas)। स्वामीजी का मानना था कि केवल चारों वेद ही ईश्वर-प्रदत्त और अकाट्य ज्ञान हैं; पुराण, तंत्र और मध्यकालीन ग्रंथ पाखंड व मिलावट हैं।
  • स्वराज का प्रथम उद्घोष: स्वामी दयानंद पहले व्यक्ति थे जिन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “विदेशी शासन चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, वह स्वदेशी शासन का विकल्प कभी नहीं हो सकता”। उन्होंने हिंदी को ‘राष्ट्रभाषा’ बनाने का प्रथम सशक्त समर्थन किया।
  • सत्यार्थ प्रकाश (1875): उदयपुर में हिंदी भाषा में रचित उनका कालजयी ग्रंथ जिसमें हिंदू, ईसाई, इस्लाम और जैन मतों की तार्किक समीक्षा की गई है।
  • सामाजिक सुधार: मूर्तिपूजा, अवतारवाद, बलि प्रथा, बहुविवाह, बाल विवाह और जन्म-आधारित जाति का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कर्म व गुण के आधार पर वर्ण व्यवस्था का समर्थन किया तथा स्त्रियों और शूद्रों को भी वेदों का अध्ययन करने और यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण करने का अधिकार दिया।
  • शुद्धि आंदोलन एवं गौ-रक्षिणी सभा: गैर-हिंदू धर्मों में चले गए हिंदुओं को पुनः वैदिक धर्म में वापस लाने हेतु ‘शुद्धि आंदोलन’ चलाया तथा 1882 में ‘गौ-रक्षिणी सभा’ गठित की।

आर्य समाज का महान विभाजन (1893)

1883 में स्वामी दयानंद के देहांत के बाद आर्य समाज में शिक्षा की पद्धति और खान-पान को लेकर दो गुट बन गए:

गुटप्रमुख नेताशिक्षा पद्धति एवं खान-पानस्थापित प्रमुख संस्थान
कॉलेज पार्टी (उदारवादी दल)लाला हंसराज एवं लाला लाजपत रायअंग्रेजी माध्यम, आधुनिक पाश्चात्य विज्ञान एवं तकनीकी शिक्षा के समर्थक। मांसाहार के प्रति उदार दृष्टिकोण।DAV (दयानंद एंग्लो-वैदिक) स्कूल एवं कॉलेज (1886 में लाहौर में प्रथम स्थापना)।
गुरुकुल पार्टी (कट्टर दल)स्वामी श्रद्धानंद (महात्मा मुंशीराम) एवं पंडित लेखरामविशुद्ध प्राचीन वैदिक गुरुकुल पद्धति, संस्कृत माध्यम, ब्रह्मचर्य एवं पूर्ण शाकाहार के कट्टर समर्थक।गुरुकुल कांगड़ी (1902 में हरिद्वार के निकट स्थापना)।

8. रामकृष्ण परमहंस एवं स्वामी विवेकानंद: रामकृष्ण मिशन

रामकृष्ण परमहंस (1836–1886): सर्वधर्म समन्वय के संत

कलकत्ता के निकट दक्षिणेश्वर काली मंदिर के पुजारी गदाधर चट्टोपाध्याय (रामकृष्ण परमहंस) ने इस्लाम, ईसाई और हिंदू धर्म के विभिन्न संप्रदायों की साधना कर यह प्रत्यक्ष अनुभव किया कि सभी धर्म एक ही परम सत्य (ईश्वर) तक पहुंचने के अलग-अलग मार्ग हैं—“यतो मत, ततो पथ” (जितने मत, उतने पथ)।

स्वामी विवेकानंद (1863–1902) एवं रामकृष्ण मिशन

नरेंद्रनाथ दत्त (स्वामी विवेकानंद) ने अपने गुरु के संदेश को एक वैश्विक और व्यावहारिक आंदोलन में बदल दिया:

  • शिकागो विश्व धर्म संसद (11 सितंबर 1893): अमेरिका के शिकागो में आयोजित धर्म संसद में स्वामीजी ने अपने प्रसिद्ध संबोधन “मेरे अमेरिका के भाइयों और बहनों!” से विश्व को चकित कर दिया। न्यूयॉर्क हेराल्ड ने लिखा: “उन्हें सुनने के बाद ऐसा लगता है कि भारत जैसे प्रबुद्ध राष्ट्र में ईसाई मिशनरियों को भेजना कितनी बड़ी मूर्खता है।”
  • वेदांत सोसायटी: उन्होंने 1894 में न्यूयॉर्क और 1895 में लंदन में वेदांत सोसायटियों की स्थापना की।
  • रामकृष्ण मिशन की स्थापना (1 मई 1897): हावड़ा (पश्चिम बंगाल) के बेलूर मठ में उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। इसका आदर्श वाक्य था: ‘आत्मनो मोक्षार्थं जगद्धिताय च’ (अपनी मुक्ति और संसार के कल्याण के लिए)।
  • व्यावहारिक वेदांत (Practical Vedanta): स्वामीजी ने कहा कि भूखे पेट को धर्म की शिक्षा देना ईश्वर का अपमान है। उन्होंने ‘दरिद्र नारायण’ की सेवा को ही सच्ची ईश्वर पूजा माना—“जीव ही शिव है”।
  • साहित्य एवं पत्रिकाएं: अंग्रेजी में ‘प्रबुद्ध भारत’ (1896) और बांग्ला में ‘उद्बोधन’ (1899) पत्रिकाएं निकालीं। सुभाष चंद्र बोस ने विवेकानंद को ‘आधुनिक राष्ट्रीय आंदोलन का आध्यात्मिक पिता’ कहा था।

9. दक्षिण भारत के प्रमुख सुधार आंदोलन

श्री नारायण गुरु एवं SNDP योगम (केरल का पुनर्जागरण)

केरल में जहाँ अछूतों के साथ अमानवीय अस्पृश्यता और ‘दूरी का नियम’ (Unseeability / Unapproachability) था, वहाँ एझावा (ताड़ी निकालने वाली जाति) में जन्मे श्री नारायण गुरु (1856–1928) ने क्रांति की शुरुआत की:

  • अरुविप्पुरम शिव प्रतिष्ठा (1888): त्रावणकोर के अरुविप्पुरम में नेय्यार नदी से एक पत्थर निकालकर नारायण गुरु ने स्वयं शिवलिंग की स्थापना की। जब रूढ़िवादी ब्राह्मणों ने प्रश्न उठाया कि एक अवर्ण कैसे शिव की प्रतिष्ठा कर सकता है, तो उन्होंने ऐतिहासिक उत्तर दिया: “मैंने ब्राह्मण शिव की नहीं, बल्कि एझावा शिव की प्रतिष्ठा की है।”
  • SNDP योगम (1903): डॉ. पलपु और कवि कुमारन आशान के सहयोग से ‘श्री नारायण धर्म परिपालन योगम’ का गठन किया।
  • मूल संदेश: “ओरु जाति, ओरु मतम, ओरु दैवम मनुष्यनु” (मनुष्य के लिए एक जाति, एक धर्म, एक ईश्वर)। उनके शिष्य सहोदरन अय्यप्पन ने इसे और आगे बढ़ाकर नारा दिया: “न कोई जाति, न कोई धर्म, न कोई ईश्वर मनुष्य के लिए”।

आत्मसम्मान आंदोलन (Self-Respect Movement, 1925): ई.वी. रामास्वामी ‘पेरियार’

तमिलनाडु में कांग्रेस की सवर्ण नीतियों से असंतुष्ट होकर ई.वी. रामास्वामी नायकर (‘पेरियार’) ने 1925 में आत्मसम्मान आंदोलन चलाया।

  • उन्होंने तमिल तमिल पत्रिका ‘कुडी अरासु’ (गणतंत्र) शुरू की।
  • ब्राह्मण पुरोहितों के बिना ‘आत्मसम्मान विवाह’ (Self-Respect Marriages) कराए और मनुस्मृति का दहन किया। 1944 में उन्होंने जस्टिस पार्टी को ‘द्रविड़ कड़गम’ (DK) में बदल दिया, जिससे आगे चलकर डीएमके और अन्नाद्रमुक निकलीं।

वायकोम एवं गुरुवायूर मंदिर प्रवेश सत्याग्रह

वायकोम सत्याग्रह (1924–1925): त्रावणकोर के प्रसिद्ध शिव मंदिर की सड़कों को अछूतों के चलने हेतु खोलने के लिए टी.के. माधवन, के.पी. केशव मेनन ने सत्याग्रह किया। पेरियार और गांधीजी ने इसमें भाग लिया।
मंदिर प्रवेश घोषणा (12 नवंबर 1936): त्रावणकोर के महाराजा चित्तिरा तिरुनल ने घोषणा जारी कर त्रावणकोर रियासत के सभी सरकारी मंदिरों के द्वार सभी जातियों के लिए खोल दिए।

10. मुस्लिम सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलन

अलीगढ़ आंदोलन: सर सैयद अहमद खान (1817–1898)

1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश हुकूमत का कहर सबसे ज्यादा मुसलमानों पर टूटा था। सर सैयद अहमद खान ने महसूस किया कि जब तक मुस्लिम समाज पाश्चात्य वैज्ञानिक ज्ञान और अंग्रेजी शिक्षा को नहीं अपनाएगा, तब तक उसका उत्थान संभव नहीं है।

सर सैयद अहमद खान के प्रमुख कार्य एवं विचार:

  • कुरान की वैज्ञानिक व्याख्या: उन्होंने कहा कि कुरान का कोई भी शब्द प्रकृति के नियमों (Laws of Nature) के विपरीत नहीं है; उन्होंने बहुविवाह, पर्दा प्रथा और आसान तलाक की कड़ी निंदा की।
  • साइंटिफिक सोसायटी (1864): गाजीपुर और बाद में अलीगढ़ में पश्चिमी वैज्ञानिक ग्रंथों का उर्दू में अनुवाद करने हेतु स्थापना।
  • तहजीब-उल-अखलाक (1870): ‘मुहम्मडन सोशल रिफॉर्मर’ पत्रिका के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों पर तीखा प्रहार किया।
  • MAO कॉलेज (1875): अलीगढ़ में ‘मुहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज’ की स्थापना की जो 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) बना।
  • राजनीतिक दृष्टिकोण: प्रारंभ में वे हिंदू-मुस्लिम एकता के समर्थक थे (उन्होंने कहा था कि हिंदू और मुस्लिम सुंदर भारत रूपी दुल्हन की दो आंखें हैं)। किंतु बाद में वे ब्रिटिश सरकार के निष्ठावान समर्थक बन गए और मुसलमानों को कांग्रेस के राष्ट्रीय आंदोलन से दूर रहने की सलाह दी। 1888 में उन्होंने राजा शिवप्रसाद ‘सितारे हिंद’ के साथ मिलकर कांग्रेस विरोधी ‘यूनाइटेड इंडियन पैट्रियोटिक एसोसिएशन’ बनाई।

देवबंद आंदोलन (1866) बनाम अन्य मुस्लिम सुधार धाराएं

आंदोलन का नामसंस्थापक एवं केंद्रप्रकृति एवं मुख्य उद्देश्य
देवबंद आंदोलन (1866)मौलाना मुहम्मद कासिम नानौतवी व रशीद अहमद गंगोही (सहारनपुर, UP)पुनरुत्थानवादी व उलेमा-नेतृत्व। अंग्रेजों के खिलाफ जिहाद की भावना को जीवित रखना तथा शुद्ध इस्लामी शिक्षा देना। अलीगढ़ के विपरीत, देवबंद ने कांग्रेस का स्वागत किया और सर सैयद की राजभक्त राजनीति के खिलाफ फतवा जारी किया।
फराइजी आंदोलन (1818)हाजी शरीअतुल्लाह एवं दादू मियां (पूर्वी बंगाल)इस्लाम के मूल अनिवार्य कर्तव्यों (फराइज) पर जोर। बंगाल के शोषित मुस्लिम किसानों को जमींदारों और ब्रिटिश नीलहों के खिलाफ संगठित किया।
वहाबी आंदोलन (1820 के दशक)सैयद अहमद बरेलवी (पटना मुख्य केंद्र)भारत को ‘दार-उल-हर्ब’ (काफिरों का देश) से ‘दार-उल-इस्लाम’ में बदलने का उग्र सशस्त्र आंदोलन। सिथाना में सैन्य केंद्र बनाकर अंग्रेजों से संघर्ष किया।
अहमदिया आंदोलन (1889)मिर्जा गुलाम अहमद (कादियान, पंजाब)उदारवादी धारा। तलवार के जिहाद का विरोध किया, सर्वधर्म शांति और मानवीय बंधुत्व का प्रचार किया।

11. पारसी, सिख एवं थियोसोफिकल सुधार आंदोलन

  • पारसी सुधार – रहनुमाई मजदायसन सभा (1851): नौरोजी फुरदोनजी, दादाभाई नौरोजी और एस.एस. बंगाली द्वारा बंबई में गठित। उन्होंने मुखपत्र ‘रस्त गोफ्तार’ (सत्यवादी) निकाला और पारसी महिलाओं में पर्दा प्रथा हटाने और विवाह की आयु बढ़ाने में सफलता पाई।
  • सिख सुधार आंदोलन:
    • निरंकारी आंदोलन: बाबा दयाल दास ने अकाल पुरख (निराकार ईश्वर) की पूजा और मूर्तिपूजा-कर्मकांड त्यागने पर बल दिया।
    • नामधारी (कूका) आंदोलन: बाबा राम सिंह ने स्वदेशी वस्त्रों और ब्रिटिश बहिष्कार का बिगुल फूंका।
    • सिंह सभा (1873): अमृतसर में स्थापना, 1892 में खालसा कॉलेज अमृतसर बनाया।
    • अकाली आंदोलन (1920–1925): गुरुद्वारों को भ्रष्ट उदासी महंतों से मुक्त कराने हेतु अहिंसक सत्याग्रह। अंततः ब्रिटिश सरकार झुकी और सिख गुरुद्वारा अधिनियम 1925 पारित हुआ जिसके तहत SGPC बनी।
  • थियोसोफिकल सोसायटी (1875): मैडम एच.पी. ब्लावात्स्की और कर्नल एच.एस. ऑलकॉट द्वारा न्यूयॉर्क में स्थापित। 1882 में इसका अंतरराष्ट्रीय मुख्यालय मद्रास के अड्यार में बना। 1893 में श्रीमती एनी बेसेंट के भारत आने पर इसे अपार ख्याति मिली। उन्होंने प्राचीन हिंदू दर्शन (उपनिषद, गीता) के गौरव को पुनः स्थापित किया और 1898 में बनारस में ‘सेंट्रल हिंदू कॉलेज’ की स्थापना की (जो 1916 में पंडित मदन मोहन मालवीय के प्रयासों से BHU बना)।

12. ब्रिटिश काल के सामाजिक सुधार कानूनों की संपूर्ण समयरेखा (1795–1937)

UPSC एवं State PCS की प्रारंभिक परीक्षाओं में सुधार कानूनों के वर्ष, तत्कालीन गवर्नर-जनरल और मुख्य प्रावधानों पर लगातार प्रश्न पूछे जाते हैं:

वर्षअधिनियम / विनियमनगवर्नर-जनरल / वायसरायमुख्य प्रावधान एवं सहयोगी समाज सुधारक
1795 एवं 1804कन्या भ्रूण हत्या निषेध नियमसर जॉन शोर एवं लॉर्ड वेलेजलीनवजात बालिकाओं की हत्या को साधारण हत्या के बराबर अपराध घोषित किया गया।
1829सती प्रथा निषेध विनियमन XVIIलॉर्ड विलियम बेंटिंकसती प्रथा को गैर-कानूनी व दंडनीय अपराध घोषित किया (राजा राममोहन राय के प्रयास)।
1843अधिनियम V (दास प्रथा उन्मूलन)लॉर्ड एलेनबरोपूरे ब्रिटिश भारत में दास प्रथा और बंधुआ मजदूरी को अवैध घोषित किया गया।
1850धार्मिक अक्षमता अधिनियम (Lex Loci Act)लॉर्ड डलहौजीधर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्ति को पैतृक संपत्ति के अधिकार से वंचित करने पर रोक।
1856हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम XVलॉर्ड कैनिंग (प्रारूप: डलहौजी)विधवा पुनर्विवाह को वैधानिक मान्यता एवं संतानों को वैध घोषित किया (ईश्वरचंद्र विद्यासागर)।
1872सिविल मैरिज एक्ट / नेटिव मैरिज एक्टलॉर्ड नॉर्थब्रुकबाल विवाह व बहुविवाह पर रोक; बालिकाओं हेतु न्यूनतम विवाह आयु 14 वर्ष व बालकों हेतु 18 वर्ष (केशवचंद्र सेन)।
1891संमति आयु अधिनियम (Age of Consent Act)लॉर्ड लैंसडाउन12 वर्ष से कम आयु की बालिकाओं के विवाह/संभोग पर पूर्ण प्रतिबंध (बी.एम. मालाबारी के प्रयास, तिलक द्वारा विरोध)।
1929शारदा अधिनियम (बाल विवाह निरोधक अधिनियम)लॉर्ड इरविनविवाह की न्यूनतम आयु बालिकाओं हेतु 14 वर्ष और बालकों हेतु 18 वर्ष तय की गई (डॉ. हरविलास शारदा)।
1937हिंदू महिला संपत्ति अधिकार अधिनियमलॉर्ड लिनलिथगोहिंदू महिलाओं को पति की मृत्यु के बाद संपत्ति में हिस्सा पाने का सीमित कानूनी अधिकार मिला।

13. UPSC स्तर के 5 विश्लेषणात्मक अभ्यास प्रश्न (MCQs)

प्रश्न 1. राजा राममोहन राय एवं ब्रह्म समाज के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राजा राममोहन राय ने 1803 में फारसी भाषा में ‘तुहफात-उल-मुवाहिद्दीन’ (एकेश्वरवादियों को उपहार) नामक पुस्तक लिखी थी।
2. ब्रह्म समाज के ट्रस्ट डीड (1830) के अनुसार भवन में किसी भी मूर्ति, चित्र या पशुबलि की सख्त मनाही थी।
3. 1866 में ब्रह्म समाज का पहला विभाजन केशवचंद्र सेन के ‘आदि ब्रह्म समाज’ और देवेंद्रनाथ टैगोर के ‘भारतवर्षीय ब्रह्म समाज’ के रूप में हुआ था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?

(A) केवल 1 और 2
(B) केवल 2 और 3
(C) केवल 1 और 3
(D) 1, 2 और 3

👉 उत्तर एवं व्याख्या देखें

सही उत्तर: (A) केवल 1 और 2 सही हैं।
व्याख्या: कथन 3 गलत है क्योंकि 1866 के विभाजन में देवेंद्रनाथ टैगोर का गुट ‘आदि ब्रह्म समाज’ कहलाया और केशवचंद्र सेन का नया गुट ‘भारतवर्षीय ब्रह्म समाज’ (Brahmo Samaj of India) बना।

प्रश्न 2. नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) और दूसरे को कारण (R) कहा गया है:
अभिकथन (A) : स्वामी दयानंद सरस्वती ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में घोषित किया कि विदेशी शासन चाहे कितना भी सुखद क्यों न हो, वह स्वदेशी राज्य की बराबरी कभी नहीं कर सकता।
कारण (R) : आर्य समाज का मानना था कि वेद ही समस्त ज्ञान के स्रोत हैं और भारत के राजनीतिक उत्थान के लिए वैदिक मूल्यों की पुनर्स्थापना आवश्यक है।
उपर्युक्त कथनों के संदर्भ में सही विकल्प चुनिए:

(A) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है।
(B) A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
(C) A सही है, लेकिन R गलत है।
(D) A गलत है, लेकिन R सही है।

👉 उत्तर एवं व्याख्या देखें

सही उत्तर: (A) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है।
व्याख्या: स्वामी दयानंद सरस्वती प्रथम विचारक थे जिन्होंने ‘स्वराज’ शब्द का प्रयोग किया और स्वदेशी पर बल दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि वेदों में स्वतंत्रता और आत्मगौरव का संदेश है।

प्रश्न 3. 1891 के ‘संमति आयु अधिनियम’ (Age of Consent Act) का बाल गंगाधर तिलक द्वारा विरोध किए जाने का मुख्य कारण क्या था?
(A) तिलक बाल विवाह के कट्टर समर्थक थे।
(B) उनका मत था कि विदेशी और गैर-हिंदू ब्रिटिश सरकार को भारतीयों के आंतरिक सामाजिक-धार्मिक मामलों में कानून बनाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।
(C) वे लड़कियों की विवाह आयु 12 वर्ष से बढ़ाकर 16 वर्ष करना चाहते थे।
(D) वे सुधारक बी.एम. मालाबारी के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी थे।

👉 उत्तर एवं व्याख्या देखें

सही उत्तर: (B)
व्याख्या: लोकमान्य तिलक स्वयं बाल विवाह के विरोधी थे (उन्होंने अपनी पुत्रियों का विवाह 15-16 वर्ष की आयु में किया था), किंतु वे सुधार थोपने के लिए विदेशी औपनिवेशिक राज्य की पुलिस और अदालतों को अपने घरों में प्रवेश देने के घोर विरोधी थे। उनका कहना था कि सुधार भारतीयों को स्वयं भीतर से करना चाहिए।

प्रश्न 4. निम्नलिखित सामाजिक-सुधार संगठनों और उनके संस्थापकों के युग्मों पर विचार कीजिए:
1. सत्यशोधक समाज – ज्योतिराव फुले
2. प्रार्थना समाज – डॉ. आत्माराम पांडुरंग
3. रहनुमाई मजदायसन सभा – नौरोजी फुरदोनजी व दादाभाई नौरोजी
4. साधारण ब्रह्म समाज – आनंदमोहन बोस व शिवनाथ शास्त्री
उपर्युक्त युग्मों में से कितने सही सुमेलित हैं?

(A) केवल एक
(B) केवल दो
(C) केवल तीन
(D) सभी चारों

👉 उत्तर एवं व्याख्या देखें

सही उत्तर: (D) सभी चारों युग्म सही सुमेलित हैं।

प्रश्न 5. दक्षिण भारत के ‘वायकोम सत्याग्रह’ (1924–1925) का प्राथमिक उद्देश्य क्या था?
(A) मंदिर के गर्भगृह में निम्न जातियों को पूजा का अधिकार दिलाना।
(B) मंदिर के चारों ओर स्थित सार्वजनिक सड़कों पर अवर्णों (अछूतों) के चलने का अधिकार प्राप्त करना।
(C) त्रावणकोर रियासत में देवदासी प्रथा का उन्मूलन।
(D) गैर-ब्राह्मणों को पुजारी नियुक्त करवाना।

👉 उत्तर एवं व्याख्या देखें

सही उत्तर: (B)
व्याख्या: त्रावणकोर के वायकोम शिव मंदिर के चारों ओर की सार्वजनिक सड़कों पर एझावा और पुलाया जैसी निम्न जातियों का चलना वर्जित था। यह सत्याग्रह मंदिर प्रवेश के लिए नहीं, बल्कि मंदिर से लगी सार्वजनिक सड़क पर चलने के बुनियादी नागरिक अधिकार के लिए था।

14. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ Accordion)

प्र. भारतीय पुनर्जागरण का जनक किसे कहा जाता है और क्यों?
राजा राममोहन राय (1772–1833) को ‘भारतीय पुनर्जागरण का जनक’ (Father of Indian Renaissance) कहा जाता है। उन्होंने ही सबसे पहले भारतीय समाज में व्याप्त सती प्रथा, मूर्तिपूजा, छुआछूत जैसी कुरीतियों पर पाश्चात्य वैज्ञानिक तर्क और वेदों के आधार पर सशक्त प्रहार किया, 1828 में ब्रह्म समाज की नींव रखी तथा 1829 में सती प्रथा निषेध कानून बनवाया।
प्र. सुधारवादी और पुनरुत्थानवादी आंदोलनों में मूल अंतर क्या है?
सुधारवादी आंदोलन (जैसे ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज, अलीगढ़ आंदोलन): पश्चिमी तार्किकता और मानवीय ज्ञान-विज्ञान के आधार पर समाज में सुधार चाहते थे और ग्रंथों को अचूक नहीं मानते थे।
पुनरुत्थानवादी आंदोलन (जैसे आर्य समाज, देवबंद आंदोलन): अपने प्राचीन मूल ग्रंथों (वेदों या कुरान) की अचूकता और सर्वोच्चता में विश्वास रखते हुए समाज को उसके मूल शुद्ध रूप में लौटाना चाहते थे।
प्र. ब्रह्म समाज में 1866 और 1878 में विभाजन क्यों हुआ था?
पहला विभाजन (1866): केशवचंद्र सेन के अति-उदारवादी रुख (ईसाई-मुस्लिम ग्रंथों को जोड़ना व अंतरजातीय विवाह) के कारण हुआ, जिससे देवेंद्रनाथ का गुट ‘आदि ब्रह्म समाज’ और केशवचंद्र का गुट ‘भारतवर्षीय ब्रह्म समाज’ बना।
दूसरा विभाजन (1878): केशवचंद्र सेन द्वारा अपनी 13 वर्षीय अल्पवयस्क बेटी का विवाह कूचबिहार के राजा से करने पर हुआ, जिसके विरोध में आनंदमोहन बोस और शिवनाथ शास्त्री ने ‘साधारण ब्रह्म समाज’ बनाया।
प्र. हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम 1856 किस समाज सुधारक के प्रयासों से पारित हुआ था?
यह अधिनियम पंडित ईश्वरचंद्र विद्यासागर के अथक प्रयासों से पारित हुआ था। उन्होंने पराशर स्मृति के प्रमाण देकर साबित किया कि शास्त्रों में विधवा विवाह मान्य है। इसका प्रारूप लॉर्ड डलहौजी के समय बना और 26 जुलाई 1856 को लॉर्ड कैनिंग ने इसे अधिनियम XV (Act XV of 1856) के रूप में पारित किया।
प्र. सत्यशोधक समाज की स्थापना किसने की और इसका मुख्य उद्देश्य क्या था?
सत्यशोधक समाज की स्थापना 24 सितंबर 1873 को महाराष्ट्र में महात्मा ज्योतिराव फुले ने की थी। इसका मुख्य उद्देश्य शूद्रों और अति-शूद्रों (दलितों) को पुरोहितवाद, ब्राह्मणवादी धार्मिक शोषण और सामाजिक गुलामी से मुक्त कर शिक्षा और मानवीय आत्मसम्मान दिलाना था।
प्र. स्वामी दयानंद सरस्वती के आर्य समाज के दो प्रमुख नारे कौन-से थे?
स्वामी दयानंद सरस्वती के दो सर्वाधिक प्रसिद्ध ऐतिहासिक नारे थे:
1. “वेदों की ओर लौटो” (Go Back to the Vedas): समस्त झूठे पुराणों व पाखंडों को त्यागकर मूल वैदिक सत्य को अपनाना।
2. “भारत भारतीयों के लिए है” (India for Indians): विदेशी हुकूमत को नकारते हुए स्वदेशी और स्वराज का प्रथम उद्घोष।


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