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भारत के प्रमुख जनजातीय एवं कृषक विद्रोह - बिरसा मुंडा, सिदो कान्हू, अल्लूरी सीताराम राजू, बक्शी जगबंधु व नील विद्रोह

1757 से 1947 के प्रमुख जनजातीय, कृषक एवं नागरिक जन-विद्रोह (Peasant, Tribal & Civil Uprisings in India) – संपूर्ण विश्लेषणात्मक अध्ययन एवं नोट्स

UPSC CSE & State PCS Master Notes
आधुनिक भारत का इतिहास (GS Paper 1)
Updated 2026 Edition

1757 से 1947 के मध्य हुए जनजातीय, कृषक एवं नागरिक जन-विद्रोह (Peasant, Tribal and Civil Uprisings of Modern India) ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध भारत के जनसामान्य का सबसे लंबा, अनवरत और जुझारू प्रतिरोध था। 1757 में प्लासी के युद्ध के पश्चात ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में जिस शोषणकारी, लालची और निरंकुश प्रशासनिक व्यवस्था की स्थापना की, उसने सदियों से स्थापित पारंपरिक ग्रामीण आत्मनिर्भरता, जनजातीय स्वायत्तता और कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़ दी।

प्रायः इतिहास की मुख्यधारा में 1857 की क्रांति को ही प्रथम स्वतंत्रता संग्राम मान लिया जाता है, किंतु वास्तविकता यह है कि 1857 से पूर्व और उसके पश्चात भी भारत के सुदूर जंगलों, पहाड़ियों, कछारों और देहातों में किसानों और वनवासियों ने अपनी जमीन, अस्मिता और अधिकारों की रक्षा के लिए अनगिनत बार ब्रिटिश संगीनों और तोपों का सामना तीर-कमानों, भालों और पारंपरिक हथियारों से किया। सन्यासी-फकीर विद्रोह, पाइक विद्रोह और पोलीगर संघर्ष से लेकर संथाल हूल, मुंडा उलगुलान, नील विद्रोह, पाबना, मोपला, बारदोली, अखिल भारतीय किसान सभा, तेभागा और तेलंगाना तक फैले इन जन-संघर्षों ने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिलाकर रख दी।

⚡ AEO Quick Answer: भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध नागरिक, जनजातीय और कृषक विद्रोह क्या थे और उनके मुख्य कारण क्या थे?

औपनिवेशिक काल के जन-विद्रोह तीन प्रमुख श्रेणियों में विभाजित थे:
(1) नागरिक विद्रोह (Civil Uprisings): अपदस्थ राजाओं, नवाबों, विस्थापित जमींदारों और भंग की गई सेनाओं के सैनिकों द्वारा अपने लुप्त हुए विशेषाधिकारों और राजस्व शोषण के विरुद्ध लड़े गए (उदा. सन्यासी-फकीर, पाइक, पोलीगर विद्रोह);
(2) जनजातीय विद्रोह (Tribal Uprisings): ब्रिटिश वन कानूनों (Forest Laws), वनोपज पर प्रतिबंध, बाहरी शोषकों—साहूकारों, ठेकेदारों और पुलिस—जिन्हें ‘दिकू’ (Diku) कहा गया, तथा ईसाई मिशनरियों के हस्तक्षेप के विरुद्ध पारंपरिक खूंटकट्टी/सामूहिक भूमि व्यवस्था की रक्षा हेतु लड़े गए (उदा. संथाल हूल, मुंडा उलगुलान, कोल, भील, रंपा विद्रोह);
(3) कृषक आंदोलन (Peasant Movements): अत्यधिक भू-राजस्व, बेगार (बंधुआ मजदूरी), बिचौलियों के शोषण और जबरन नकदी फसलों (नील) की खेती के विरुद्ध काश्तकारों द्वारा लड़े गए (उदा. नील विद्रोह, पाबना, दक्कन दंगे, बारदोली, तेभागा)। इन सभी आंदोलनों का मुख्य उद्देश्य औपनिवेशिक शोषणकारी ढांचे को ध्वस्त कर अपनी स्वायत्तता और आजीविका की रक्षा करना था।

💡 विशेष संदर्भ अध्ययन (Recommended Study): 1757 से 1947 के दौरान भारत में हुए कृषक एवं जनजातीय विद्रोहों (जैसे नील विद्रोह, पावना, दक्कन दंगे 1875) का मूल कारण अंग्रेजों की शोषणकारी भू-राजस्व व्यवस्थाएं (स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी, महालवाड़ी) तथा कृषि का जबरन वाणिज्यीकरण था। इस पूरे आर्थिक तंत्र के गहन विश्लेषणात्मक अध्ययन हेतु अवश्य पढ़ें: 👉 ब्रिटिश शासन की आर्थिक नीतियां, भू-राजस्व व्यवस्था, धन की निकासी (Drain of Wealth) एवं अकाल (अध्याय 12 नोट्स)

Table of Contents

1. औपनिवेशिक जन-विद्रोहों का वर्गीकरण एवं मूल कारण

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत में विस्तार के साथ ही समाज के विभिन्न वर्गों का पारंपरिक जीवन तहस-नहस हो गया। प्रसिद्ध इतिहासकार बिपिन चंद्र के अनुसार, औपनिवेशिक भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जनता का आक्रोश कभी शांत नहीं बैठा। आधुनिक इतिहासकारों ने इन आरंभिक एवं उत्तरवर्ती प्रतिरोधों को तीन स्पष्ट श्रेणियों में वर्गीकृत किया है:

विद्रोह की श्रेणीप्रमुख सहभागी वर्गमूल प्रेरक कारणमुख्य उदाहरण
नागरिक विद्रोह (Civil Uprisings)अपदस्थ राजा, विस्थापित नवाब, जमींदार, बेरोजगार सैनिक, दरबारी पंडित व मौलवी।देसी रियासतों की जब्ती, सहायक संधि व हड़प नीति, अत्यधिक भू-राजस्व वसूली, पारंपरिक न्यायिक व्यवस्था का विनाश।सन्यासी-फकीर (बंगाल), पाइक (ओडिशा), पोलीगर (तमिलनाडु), वेल्लु थम्पी (त्रावणकोर), कित्तूर चेन्नम्मा (कर्नाटक)।
जनजातीय विद्रोह (Tribal Uprisings)आदिवासी समुदाय (संथाल, मुंडा, कोल, भील, गोंड, खासी, कोया)।ब्रिटिश वन कानून, संयुक्त भूमि व्यवस्था (खूंटकट्टी) का विनाश, बाहरी बिचौलियों (दिकू) द्वारा बंधुआ मजदूरी (बेगार) व शोषण, ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्मांतरण।संथाल हूल (1855), मुंडा उलगुलान (1899), कोल विद्रोह (1831), मानगढ़ हत्याकांड (1913), रंपा विद्रोह (1922)।
कृषक आंदोलन (Peasant Movements)रैयत, काश्तकार, बटाईदार (Bargadars), खेतिहर मजदूर।अत्यधिक लगान, बेदखली का भय, सूदखोरों का ऋण-जाल, नकदी फसलों (नील, अफीम) की जबरन खेती, अकाल के समय राहत का अभाव।नील विद्रोह (1859), पाबना (1873), दक्कन दंगे (1875), मोपला (1921), बारदोली (1928), तेभागा (1946), तेलंगाना (1946)।
जन-विद्रोहों के उद्भव के 5 सर्वव्यापी औपनिवेशिक कारक:

  1. अत्यधिक भू-राजस्व मांग (High Land Revenue Demand): स्थायी बंदोबस्त (Permanent Settlement), रैयतवाड़ी (Ryotwari) और महालवाड़ी (Mahalwari) व्यवस्थाओं ने भूमि को क्रय-विक्रय योग्य वस्तु बना दिया और लगान न चुकाने पर सदियों पुरानी पुश्तैनी जमीनों की नीलामी शुरू कर दी।
  2. हस्तशिल्प और ग्रामीण उद्योगों का विनाश (De-industrialization): ब्रिटेन के मैनचेस्टर और लंकाशायर के मशीनी वस्त्रों ने भारत के पारंपरिक बुनकरों और दस्तकारों को बेरोजगार कर दिया, जिससे ये सभी लोग भूमि पर अतिरिक्त भार बनकर टूट पड़े।
  3. ग्रामीण ऋणग्रस्तता और साहूकारों का उदय: लगान का भुगतान नकद रूप में करने की अनिवार्यता ने किसानों को महाजनों और साहूकारों के चंगुल में धकेल दिया, जो 50% से 100% तक चक्रवृद्धि ब्याज वसूलते थे और जाली दस्तावेजों के आधार पर किसानों की जमीनें हड़प लेते थे।
  4. औपनिवेशिक न्याय व्यवस्था का पक्षपाती स्वरूप: नए ब्रिटिश न्यायालय दूरस्थ शहरों में स्थित थे, जिनकी भाषा अंग्रेजी थी और प्रक्रियाएं अत्यंत जटिल एवं खर्चीली थीं। पुलिस, वकील और न्यायाधीश सदैव धनवान जमींदारों और साहूकारों के पक्ष में कार्य करते थे।
  5. पारंपरिक सामाजिक एवं धार्मिक मान्यताओं पर प्रहार: वनों पर आदिवासियों के पैतृक अधिकारों को छीनकर राज्य की संपत्ति घोषित कर दिया गया तथा तीर्थयात्राओं पर कर लगाए गए।

2. 1857 से पूर्व के प्रमुख नागरिक जन-विद्रोह (Civil Uprisings 1757–1857)

नागरिक विद्रोहों का नेतृत्व प्रायः उन पारंपरिक शासक वर्गों और जमींदारों ने किया जिन्हें ईस्ट इंडिया कंपनी ने सत्ताच्युत कर दिया था। इन विद्रोहों में जनता ने अपने पुराने शासकों का इसलिए साथ दिया क्योंकि वे कंपनी के कठोर और अमानवीय प्रशासन से त्रस्त थे।

सन्यासी और फकीर विद्रोह (Sanyasi-Fakir Rebellion: 1763–1800)

1764 में बक्सर के युद्ध और 1765 की इलाहाबाद की संधि के पश्चात कंपनी को बंगाल, बिहार और ओडिशा की दीवानी मिली। कंपनी ने लगान वसूली को अप्रत्याशित रूप से बढ़ा दिया। इसी बीच 1770 के भीषण बंगाल अकाल (जिसमें बंगाल की एक-तिहाई आबादी काल-कवलित हो गई) ने स्थिति को विस्फोटक बना दिया।

सन्यासी-फकीर विद्रोह के प्रमुख आयाम:

  • विद्रोह का स्वरूप: यह हिंदू नागा सन्यासियों (गिरी संप्रदाय) और मुस्लिम मदारिया फकीरों का संयुक्त संघर्ष था। ये साधु-संत पारंपरिक रूप से तीर्थयात्राओं के दौरान जमींदारों और किसानों से स्वैच्छिक दान व भिक्षा लेते थे, किंतु कंपनी ने उनके तीर्थाटन पर कड़े प्रतिबंध और तीर्थयात्रा कर (Pilgrim Tax) लगा दिए।
  • प्रमुख नेतृत्वकर्ता: फकीर मजनू शाह (विद्रोह के मुख्य रणनीतिकार), चिराग अली, मूसा शाह, सोभन शाह, तथा सन्यासी नेताओं में भवानी पाठक और महिला नेत्री देवी चौधरानी प्रमुख थीं।
  • छापामार युद्ध रणनीति: विद्रोहियों ने कंपनी की कोठियों, खजानों और जमींदारों के अन्न-भंडारों को लूटा और गरीबों में अनाज बांटा।
  • साहित्यिक महत्व: भारत के राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ के रचयिता बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ (1882) और ‘देवी चौधरानी’ (1884) की पृष्ठभूमि इसी सन्यासी विद्रोह पर आधारित की थी।
  • दमन: गवर्नर-जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स ने एक लंबे और क्रूर सैन्य अभियान के पश्चात 1800 ईस्वी तक इस विद्रोह को दबाया।

पाइक विद्रोह (Paika Rebellion: 1817, ओडिशा)

ओडिशा के खुर्दा (Khurda) राज्य में हुआ पाइक विद्रोह भारत के इतिहास में अत्यंत गौरवशाली स्थान रखता है। 2017 में इसके द्विशताब्दी वर्ष पर भारत सरकार ने इसे स्वतंत्रता के प्रथम संग्राम के समकक्ष ऐतिहासिक मान्यता देने पर विचार किया था।

पाइक विद्रोह के मुख्य तथ्य एवं विश्लेषण:

  • पाइक कौन थे? पाइक खुर्दा के गजपति राजाओं की पारंपरिक पैदल सैन्य टुकड़ी (Hereditary Landed Militia) थे, जिन्हें सैन्य सेवा के बदले सदियों से कर-मुक्त लगानहीन भूमि (पाइकन जागीर) प्राप्त थी।
  • विद्रोह का कारण: 1803 में कंपनी ने ओडिशा पर अधिकार कर लिया। 1804 में खुर्दा के राजा मुकुंद देव द्वितीय को बंदी बना लिया गया और पाइकों की कर-मुक्त जागीरें जब्त कर ली गईं। इसके अलावा, कंपनी ने पारंपरिक कौड़ी (Cowrie) मुद्रा को समाप्त कर चांदी के सिक्कों में लगान अनिवार्य कर दिया तथा नमक पर सरकारी एकाधिकार स्थापित कर नमक के दाम कई गुना बढ़ा दिए।
  • सर्वोच्च नेतृत्व: पाइकों के वंशानुगत सेनापति बक्शी जगबंधु बिद्याधर महापात्र ने विद्रोह का झंडा बुलंद किया। दीवान कृष्णचंद्र भ्रमरबर राय ने उनका सक्रिय सहयोग किया।
  • विद्रोह का फैलाव: मार्च 1817 में घुमसुर के 400 कंध (Kondh) आदिवासियों के सहयोग से पाइकों ने बानपुर और खुर्दा पर आक्रमण किया, सरकारी खजाने लूटे और कंपनी के अधिकारियों को मार भगाया। पुरी के राजा ने भी विद्रोहियों का समर्थन किया।
  • दमन एवं परिणाम: जनरल मार्टिंडेल ने कड़े सैन्य दमन के बाद 1818 तक विद्रोह को नियंत्रित किया। बक्शी जगबंधु वर्षों तक जंगलों में संघर्ष करते रहे और अंततः 1825 में सम्मानजनक समझौते के तहत आत्मसमर्पण किया। 1829 में कटक में उनका देहांत हुआ।

3. दक्षिण एवं पश्चिम भारत के नागरिक प्रतिरोध

उत्तर और पूर्व भारत की भांति प्रायद्वीपीय भारत में भी औपनिवेशिक विस्तार का कड़ा विरोध हुआ।

पोलीगर विद्रोह (Poligar Uprising: 1799–1805, तमिलनाडु)

पोलीगर (पालेयक्कारर): विजयनगर साम्राज्य के समय से दक्षिण भारत में स्थापित सामंती सैन्य प्रमुख थे जो कर संग्रह और कानून-व्यवस्था के प्रभारी थे। 1792 में जब कर्नाटक के नवाब ने कंपनी को कर वसूली का अधिकार सौंपा, तो कंपनी ने पोलीगरों के संप्रभु अधिकारों को छीनने का प्रयास किया।

  • प्रथम चरण (1799): पांजालमकुरिची के वीरपांड्य कट्टाबोम्मन ने कंपनी को कर देने से मना कर दिया। मेजर बैनरमैन के नेतृत्व में कंपनी की सेना ने पांजालमकुरिची पर हमला किया और कट्टाबोम्मन को अक्टूबर 1799 में कायथार में सरेआम फांसी दे दी गई।
  • द्वितीय चरण (1800–1805): इसे ‘द्वितीय पालेयक्कारर युद्ध’ या ‘दक्षिण भारतीय विद्रोह’ भी कहा जाता है। कट्टाबोम्मन के भाई उमाईथुरै (Oomaithurai) और शिवगंगा के मरुदु पांड्यार बंधुओं (वेल्लु मरुदु व चिन्न मरुदु) ने कोयंबटूर, डिंडीगुल और मालाबार तक एक विशाल संघ बनाया। मरुदु पांड्यार ने जून 1801 में ‘तिरुचिरापल्ली उद्घोषणा’ (Tiruchirappalli Proclamation) जारी कर सभी जातियों और धर्मों के लोगों से अंग्रेजों के विरुद्ध हथियार उठाने का आह्वान किया। अंग्रेजों ने कड़े संघर्ष के बाद विद्रोह का दमन किया।

दीवान वेल्लु थम्पी का विद्रोह (Velu Thampi Dalawa Uprising: 1808–1809, त्रावणकोर)

1805 में वेलेजली की सहायक संधि (Subsidiary Alliance) के तहत त्रावणकोर राज्य पर भारी आर्थिक सब्सिडी का बोझ लाद दिया गया। ब्रिटिश रेजिडेंट कर्नल मैकाले ने त्रावणकोर के आंतरिक मामलों में दखल देना शुरू किया।

  • त्रावणकोर के दीवान (प्रधानमंत्री) वेल्लु थम्पी ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया।
  • 11 जनवरी 1809 को उन्होंने प्रसिद्ध ‘कुंद्रा उद्घोषणा’ (Kundara Proclamation) जारी की, जिसमें जनता से विदेशी शासन और ईसाईकरण के विरुद्ध अपनी स्वतंत्रता की रक्षा का आह्वान किया गया।
  • ब्रिटिश सेना के घेर लिए जाने पर वेल्लु थम्पी ने अंग्रेजों के हाथों जीवित पकड़े जाने के बजाय मंदिर में आत्महत्या कर ली। क्रूर अंग्रेजों ने उनकी मृत देह को भी फांसी पर लटकाया।

कित्तूर चेन्नम्मा विद्रोह (Kittur Chennamma: 1824, कर्नाटक)

लॉर्ड डलहौजी की हड़प नीति (Doctrine of Lapse) से बहुत पहले ब्रिटिश कंपनी ने कित्तूर के राजा मल्लासर्ज की मृत्यु के बाद उनकी रानी चेन्नम्मा द्वारा गोद लिए गए पुत्र (शिवलिंगप्पा) को उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया।

  • रानी चेन्नम्मा ने ब्रिटिश कलेक्टर थैकरे को युद्ध में मार गिराया। अंततः 1824 में उन्हें बंदी बना लिया गया और 1829 में बैलहोंगल किले में उनकी मृत्यु हुई।
  • चेन्नम्मा के पश्चात उनके निष्ठावान सेनानी संगोली रायन्ना (Sangolli Rayanna) ने 1829–30 में छापामार युद्ध जारी रखा, जिन्हें बाद में फांसी दी गई।

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4. जनजातीय विद्रोहों की प्रकृति एवं ‘दिकू’ की अवधारणा

भारत के आदिवासी समुदाय सदियों से जंगलों, पहाड़ों और प्राकृतिक संसाधनों के साथ सामंजस्य बिठाकर स्वायत्त जीवन जी रहे थे। उनकी अपनी पारंपरिक ग्राम पंचायतें, सामूहिक भूमि-स्वामित्व प्रणाली (जैसे मुंडाओं की खूंटकट्टी या उरांव की भुइंहरी) और सांस्कृतिक परंपराएं थीं।

ब्रिटिश शासन के आगमन ने आदिवासियों के इस पारिस्थितिकीय और सांस्कृतिक संतुलन को पूरी तरह नष्ट कर दिया। अंग्रेजों ने जंगलों की लकड़ी (विशेष रूप से रेलवे स्लीपरों और नौसेना जहाजों के लिए साल और सागौन) पर नियंत्रण हेतु भारतीय वन अधिनियम (1865, 1878) लागू किए, जिससे आदिवासियों का सदियों पुराना वनोपज संकलन, शिकार और झूम कृषि (Shifting Cultivation) अवैध घोषित कर दिया गया।

‘दिकू’ (Diku) कौन थे और आदिवासियों का आक्रोश उन पर क्यों था?

आदिवासी भाषा में ‘दिकू’ का अर्थ था—’बाहरी व्यक्ति’ या ‘शोषक घुसपैठिया’। इसमें ब्रिटिश अधिकारी, पुलिसकर्मी, गैर-आदिवासी साहूकार (महाजन), व्यापारी और जमींदार शामिल थे। दिकू आदिवासियों को मदिरा या अल्प ऋण देकर उनकी जमीनें गिरवी रखवा लेते थे और 75% से 150% तक ब्याज वसूलते थे। पीढ़ी-दर-पीढ़ी आदिवासी परिवार इन दिकुओं के यहां ‘कमिया’ या ‘बेगार’ (बंधुआ मजदूर) बनकर रह जाते थे। इसलिए प्रत्येक जनजातीय विद्रोह का प्राथमिक निशाना ये ‘दिकू’ और उनका संरक्षण करने वाले ब्रिटिश थाने होते थे।

पूर्वी एवं पूर्वोत्तर भारत के प्रमुख जनजातीय विद्रोह

संथाल हूल (Santhal Hul: 1855–56, बिहार/झारखंड/बंगाल)

संथाल विद्रोह आधुनिक भारत का सबसे विशाल, संगठित और हिंसक आदिवासी जन-आंदोलन था, जिसने 1857 की क्रांति से ठीक पूर्व ब्रिटिश सत्ता की नींव हिला दी थी।

  • दामिन-ए-कोह (Damin-i-Koh): अंग्रेजों ने 1832-33 में राजमहल की पहाड़ियों की तलहटी में जंगल साफ करवाकर संथालों को बसाया और इस क्षेत्र को ‘दामिन-ए-कोह’ नाम दिया। संथालों ने कड़ी मेहनत से जंगलों को कृषि योग्य भूमि में बदला। किंतु शीघ्र ही यहां बंगाली और मारवाड़ी महाजनों, शराब ठेकेदारों और भ्रष्ट दारोगाओं का जाल फैल गया।
  • विद्रोह का शंखनाद: 30 जून 1855 को भगनाडीह गांव में लगभग 10,000 संथाल एकत्र हुए। चार मुर्मू भाइयों—सिद्धू, कान्हू, चांद और भैरव—तथा उनकी बहनों फूलो और झानो ने विद्रोह का नेतृत्व किया। सिद्धू ने घोषणा की कि “ठाकुर जी (ईश्वर) ने मुझे स्वप्न में दर्शन देकर दिकुओं और अंग्रेजों के विरुद्ध हथियार उठाने का आदेश दिया है।”
  • विद्रोह का विस्तार: भागलपुर से लेकर राजमहल की पहाड़ियों तक संथालों ने समानांतर सरकार स्थापित कर ली। डाक सेवाएं ठप कर दी गईं, रेल पटरियां उखाड़ दी गईं और महाजनों व दारोगाओं को दंडित किया गया।
  • क्रूर दमन: मेजर जनरल लॉयड और मेजर बरो के नेतृत्व में मार्शल लॉ लगाया गया। हाथियों द्वारा संथाल गांवों को रौंद दिया गया। 15,000 से अधिक संथाल वीरगति को प्राप्त हुए। सिद्धू और कान्हू को फांसी दे दी गई।
  • प्रशासनिक परिणाम (UPSC अति-महत्वपूर्ण):
    विद्रोह के पश्चात ब्रिटिश सरकार ने अधिनियम XXXVII (1855) पारित कर एक पृथक गैर-विनियमित जिला ‘संथाल परगना’ (Santhal Pargana) बनाया तथा गैर-आदिवासियों को आदिवासियों की भूमि के हस्तांतरण पर कानूनी रोक लगाई गई।

चुआड़ विद्रोह एवं हो विद्रोह (Chuar & Ho Uprisings)

  • चुआड़ विद्रोह (1766–1805, बंगाल-बिहार): मिदनापुर, बांकुरा और मानभूम के जंगल महल क्षेत्र में हुआ। अंग्रेजों द्वारा भूमि कर वृद्धि और पाइक जागीरों की जब्ती के विरोध में दुर्जन सिंह और गंगा नारायण ने नेतृत्व किया।
  • हो विद्रोह (1820–21 एवं 1831, सिंहभूम): छोटानागपुर के हो आदिवासियों ने पोरहाट के राजा और कंपनी सेना के विरुद्ध आत्मसम्मान की रक्षा हेतु युद्ध लड़ा।

पूर्वोत्तर के विद्रोह: खासी, अहोम एवं रानी गाइदिनल्यू

  • खासी विद्रोह (1829–33, मेघालय): प्रथम आंग्ल-बर्मा युद्ध (1824-26) के बाद अंग्रेजों ने ब्रह्मपुत्र घाटी और सिलहट को जोड़ने वाली सड़क निर्माण के लिए खासी क्षेत्र पर कब्जा किया और बेगार करवाई। खासी सरदार तीरत सिंह (U Tirot Sing) और बार मानिक ने ब्रिटिश चौकियों पर भीषण हमले किए। तीरत सिंह को ‘मेघालय का वीर नायक’ कहा जाता है।
  • अहोम विद्रोह (1828, असम): बर्मा युद्ध के बाद असम से वापस लौटने के वादे से मुकरने पर अहोम कुलीन गोमधर कोंवर (Gomdhar Konwar) ने विद्रोह किया।
  • जेलियांग्रोंग आंदोलन एवं रानी गाइदिनल्यू (1930s, मणिपुर/नागालैंड): हाइपो जादोनांग द्वारा प्रारंभ किए गए ‘हेराका’ धार्मिक-सांस्कृतिक आंदोलन को उनकी 13 वर्षीय चचेरी बहन रानी गाइदिनल्यू (Rani Gaidinliu) ने सविनय अवज्ञा आंदोलन से जोड़ा। पंडित नेहरू ने उन्हें ‘पहाड़ों की बेटी’ और ‘रानी’ की उपाधि दी थी।

मध्य एवं पश्चिमी भारत के जनजातीय विद्रोह

कोल विद्रोह (Kol Uprising: 1831–32, छोटानागपुर)

रांची, सिंहभूम, हजारीबाग और पलामू क्षेत्र में कोल (मुंडा, उरांव, हो) आदिवासियों द्वारा किया गया उग्र विद्रोह।

  • तात्कालिक कारण: छोटानागपुर के राजा द्वारा आदिवासियों की पुश्तैनी गांव-भूमियों को छीनकर बाहरी सिख और मुस्लिम ठेकेदारों (जमींदारों) को पट्टे पर देना। इन ठेकेदारों ने आदिवासियों की महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया और अत्यधिक कर लगाए।
  • प्रमुख नेता: बुद्धू भगत (Buddho Bhagat), जोया भगत और मदारा महतो। बुद्धू भगत अंग्रेजों से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
  • परिणाम: इस विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने 1834 में इस क्षेत्र में ‘दक्षिण-पश्चिम सीमांत एजेंसी’ (South-Western Frontier Agency – SWFA) का गठन किया।

भील विद्रोह एवं मानगढ़ धाम हत्याकांड (Bhil Uprisings & Mangarh Massacre)

भील पश्चिमी घाट (खानदेश), राजस्थान और गुजरात के जंगलों में निवास करते थे। 1818 में खानदेश पर ब्रिटिश कब्जे के बाद सेवाराम के नेतृत्व में भीलों ने 1818 से 1831 तक लगातार संघर्ष किया।

  • गोविंद गुरु का भगत आंदोलन: 20वीं सदी के प्रारंभ में राजस्थान-गुजरात सीमा (बांसवाड़ा/डूंगरपुर) पर गोविंद गुरु ने भीलों में मद्यपान निषेध, शिक्षा, नैतिक आचरण और आत्मसम्मान जगाने हेतु ‘भगत पंथ’ की स्थापना की।
  • मानगढ़ नरसंहार (17 नवंबर 1913 – राजस्थान का जलियांवाला बाग): गोविंद गुरु के आह्वान पर मानगढ़ की पहाड़ी पर हजारों भील अपनी मांगों के समर्थन में शांतिपूर्ण रूप से एकत्रित हुए थे। ब्रिटिश मेवाड़ भील कोर (MBC) ने पहाड़ी को घेरकर मशीनगनों से गोलियां चलाईं, जिसमें 1,500 से अधिक निर्दोष भील शहीद हो गए। गोविंद गुरु को बंदी बना लिया गया।

रमोसी विद्रोह (Ramosi Uprising: 1822–1829, पश्चिमी घाट)

रमोसी मराठा काल में दुर्गों और पुलिस पहरेदारी का कार्य करने वाली पहाड़ी जनजाति थी। पेशवा बाजीराव द्वितीय के पतन के बाद कंपनी ने उनकी सेवाएं समाप्त कर दीं। चित्तूर सिंह (1822) तथा उमाजी नाइक (1825–29) के नेतृत्व में रमोसियों ने पूना और सतारा क्षेत्र में ब्रिटिश चौकियों को तबाह किया।

बिरसा मुंडा एवं महान उलगुलान (The Great Munda Ulgulan: 1899–1900)

भारतीय जनजातीय इतिहास में ‘धरती आबा’ (जगत पिता) भगवान बिरसा मुंडा का स्थान सर्वोच्च शिखर पर है। उनके नेतृत्व में हुआ ‘उलगुलान’ (महान हलचल/महा-विद्रोह) केवल एक आर्थिक या सैन्य संघर्ष नहीं था, बल्कि वह एक सर्वांगीण धार्मिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और सामाजिक क्रांति थी।

बिरसा मुंडा और उलगुलान के प्रमुख ऐतिहासिक पहलू:

  • खूंटकट्टी व्यवस्था का विनाश: मुंडा जनजाति में भूमि का स्वामित्व किसी व्यक्ति का नहीं बल्कि पूरे कुल (खूंट) का सामूहिक होता था, जिसे ‘खूंटकट्टी’ (Khuntkatti System) कहा जाता था। औपनिवेशिक जमींदारी व्यवस्था ने खूंटकट्टी को समाप्त कर व्यक्तिगत लगान और बेगार (Beth-begari) थोप दी।
  • धार्मिक एवं आंतरिक सुधार (बिरसाइत पंथ): 1895 में बिरसा मुंडा ने स्वयं को ईश्वर का दूत घोषित किया। उन्होंने मुंडाओं से भूत-प्रेतों और बलि प्रथा की पूजा छोड़ने, एक ईश्वर (सिंहबोंगा) की आराधना करने, मद्यपान त्यागने तथा जनेऊ धारण कर पवित्र जीवन जीने का आह्वान किया। उनके अनुयायी ‘बिरसाइत’ कहलाए।
  • राजनीतिक लक्ष्य – ‘मुंडा राज’: बिरसा ने स्पष्ट नारा दिया—“दिकुओं से अब हमारी लड़ाई होगी और उनके खून से जमीन इस तरह लाल होगी जैसे लाल झंडा!” उन्होंने महारानी विक्टोरिया के शासन के अंत और ‘अबुआ दिशुम रे अबुआ राज’ (हमारे देश में हमारा राज) की स्थापना का ऐलान किया।
  • डोंबारी बुरु का ऐतिहासिक संघर्ष: 9 जनवरी 1900 को डोंबारी पहाड़ी (Dombari Buru) पर ब्रिटिश सेना ने पारंपरिक तीर-कमान लिए मुंडा सत्याग्रहियों पर अंधाधुंध गोलियां बरसाईं, जिसमें सैकड़ों बच्चे, महिलाएं और पुरुष शहीद हुए।
  • बलिदान: 3 मार्च 1900 को चक्रधरपुर के जमकोपाई जंगल से बिरसा मुंडा को सोते हुए गिरफ्तार किया गया। 9 जून 1900 को मात्र 25 वर्ष की आयु में रांची जेल में रहस्यमय परिस्थितियों (कथित हैजा) में उनका देहांत हो गया।
  • छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 (CNT Act 1908 – ऐतिहासिक उपलब्धि):
    बिरसा के बलिदान ने ब्रिटिश हुकूमत को झुकने पर विवश कर दिया। 11 नवंबर 1908 को लागू किए गए Chota Nagpur Tenancy Act (CNT Act) ने मुंडाओं के पारंपरिक खूंटकट्टी अधिकारों को कानूनी मान्यता दी, बेगार प्रथा पर प्रतिबंध लगाया और गैर-आदिवासियों द्वारा आदिवासियों की जमीन खरीदने पर पूर्ण वैधानिक रोक लगा दी।

दक्षिण भारत के जनजातीय संघर्ष: रंपा विद्रोह एवं अल्लूरी सीताराम राजू

आंध्र प्रदेश के गोदावरी नदी के उत्तरी पहाड़ी क्षेत्र (मन्यम क्षेत्र) में कोया और कोंडा डोरा जनजातियों ने शोषण के विरुद्ध कई बार हथियार उठाए।

मान्यम विद्रोह / रंपा विद्रोह (1922–24) एवं अल्लूरी सीताराम राजू:

  • पृष्ठभूमि: 1882 का मद्रास वन अधिनियम आदिवासियों के लिए अभिशाप बन गया। अंग्रेजों ने आदिवासियों की पारंपरिक ‘पोडू’ (Podu – झूम/स्थानांतरित कृषि) पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया तथा वनोपज बीनने पर जेल का प्रावधान कर दिया। मुत्तादारों (कर संग्राहकों) द्वारा अत्यधिक शोषण और सड़क निर्माण हेतु बेगार करवाई जा रही थी।
  • अल्लूरी सीताराम राजू का करिश्माई नेतृत्व: यद्यपि अल्लूरी स्वयं आदिवासी नहीं थे, किंतु उन्होंने आदिवासियों के कष्टों को देखकर अपना जीवन उनके अधिकारों के लिए समर्पित कर दिया। वे महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से गहरे प्रभावित थे। उन्होंने आदिवासियों को शराब छोड़ने और पंचायतों द्वारा विवाद सुलझाने की प्रेरणा दी, किंतु वे गांधीजी के अहिंसा के सिद्धांत से असहमत थे और उनका मानना था कि ब्रिटिश सत्ता को केवल सशस्त्र बल से ही उखाड़ा जा सकता है।
  • गुरिल्ला युद्ध एवं पुलिस थानों पर छापे: अगस्त 1922 से अल्लूरी और उनके साथियों (गाम मल्लू डोरा और गाम गंटम डोरा) ने चिंतापल्ली, कृष्णदेवीपेटा और रामपुर के पुलिस स्टेशनों पर दुस्साहसिक छापे मारे, हथियार लूटे और रजिस्टर में बकायदा नोट छोड़ा।
  • शहादत: ब्रिटिश असम राइफल्स की विशेष टुकड़ियों ने मन्यम क्षेत्र को घेर लिया। 7 मई 1924 को अल्लूरी सीताराम राजू को कोय्यूर के जंगलों में धोखे से पकड़कर एक पेड़ से बांधकर गोली मार दी गई। वे लोक-गाथाओं में ‘मन्यम वीरुडु’ (जंगलों का नायक) के रूप में अमर हो गए।

5. 19वीं सदी के प्रमुख कृषक आंदोलन (Post-1857 Peasant Movements)

1857 के महाविद्रोह के पश्चात भारतीय कृषक आंदोलनों के स्वरूप में एक युगांतरकारी परिवर्तन आया। 1857 से पूर्व के विद्रोह जहां प्रायः स्थानीय, पुराने सामंती राजाओं द्वारा निर्देशित और पारंपरिक व्यवस्था को पुनः स्थापित करने वाले थे, वहीं 1857 के बाद के किसान आंदोलन विशिष्ट आर्थिक मांगों, कानूनी अधिकारों और काश्तकारी सुरक्षा पर केंद्रित थे।

नील विद्रोह (Indigo Revolt: 1859–60, बंगाल) – भारत का प्रथम सफल अहिंसक किसान आंदोलन

यूरोपीय बागान मालिकों (Planters) ने 19वीं सदी के पूर्वार्ध में बंगाल और बिहार में नील की खेती पर एकाधिकार कर लिया था।

  • दादनी प्रथा (Dadon System): बागान मालिक किसानों को बहुत मामूली अग्रिम राशि (दादनी) देकर एक अत्यंत कठोर अनुबंध पर हस्ताक्षर करवा लेते थे। किसान अपनी सर्वाधिक उपजाऊ भूमि पर खाद्यान्न (चावल) उगाने के बजाय नील बोने को बाध्य थे, और नील का मूल्य बाजार भाव से 2.5% से भी कम दिया जाता था। यदि कोई किसान इनकार करता तो लठैतों द्वारा उसके घर जला दिए जाते थे।
  • विद्रोह की शुरुआत: सितंबर 1859 में नदिया जिले के गोविंदपुर गांव में दिगंबर विश्वास और विष्णुचरण विश्वास के नेतृत्व में किसानों ने दादनी लेने और नील बोने से साफ मना कर दिया। यह हड़ताल देखते ही देखते जेसोर, पाबना, खुलना, ढाका और मालदा तक फैल गई।
  • सामाजिक एकजुटता एवं बुद्धिजीवियों का समर्थन: नील विद्रोह की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें हिंदू-मुस्लिम किसान पूरी तरह एकजुट थे और कलकत्ता के शिक्षित मध्यम वर्ग ने खुलकर किसानों का समर्थन किया।
    • हरिश्चंद्र मुखर्जी ने अपने समाचार-पत्र ‘द हिंदू पैट्रियट’ (The Hindu Patriot) में ब्रिटिश बागान मालिकों के अत्याचारों को निर्भीकता से उजागर किया।
    • दीनबंधु मित्र ने 1860 में अपने प्रसिद्ध नाटक ‘नील दर्पण’ (Nil Darpan) में किसानों के क्रूर उत्पीड़न का सजीव चित्रण किया। रेवरेंड जेम्स लॉन्ग ने इसका अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित किया (जिसके लिए ब्रिटिश अदालत ने लॉन्ग को एक माह की जेल की सजा दी)।
  • सफलता एवं नील आयोग (Indigo Commission 1860): किसानों के अभूतपूर्व प्रतिरोध को देखकर ब्रिटिश सरकार ने नवंबर 1860 में डब्ल्यू. एस. सीटोन-कार की अध्यक्षता में चार सदस्यीय नील आयोग गठित किया। आयोग ने बागान मालिकों को दोषी पाया और अधिसूचना जारी की कि रैयतों को नील बोने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। 1860 के अंत तक बंगाल से नील की खेती पूरी तरह समाप्त हो गई।

पाबना कृषक उपद्रव (Pabna Agrarian Leagues: 1873–76, पूर्वी बंगाल)

1859 के रेंट एक्ट एक्स (Act X of 1859) के तहत जिन काश्तकारों के पास 12 वर्षों तक भूमि का निरंतर कब्जा था, उन्हें दखलकारी अधिकार (Occupancy Rights) मिलने थे। जमींदार इन अधिकारों को रोकने हेतु बार-बार किसानों को बेदखल कर रहे थे और अवैध उपकर (अबवाब – Abwabs) वसूल रहे थे।

  • कृषक संघ (Agrarian League): मई 1873 में पाबना के यूसुफशाही परगने में ईशान चंद्र राय, शंभू पाल और खुदी मुल्ला के नेतृत्व में कृषक संघ का गठन हुआ।
  • विद्रोह का कानूनी स्वरूप: किसानों ने कोई हिंसा नहीं की; उन्होंने लगान देने से इनकार कर दिया और अदालतों में जमींदारों के विरुद्ध कानूनी मुकदमे लड़े। किसानों का प्रसिद्ध नारा था—“हम महारानी विक्टोरिया की रैयत बनना चाहते हैं, जमींदारों की नहीं।”
  • परिणाम: बंकिम चंद्र, आनंद मोहन बोस और सुरेंद्रनाथ बनर्जी (इंडियन एसोसिएशन) ने किसानों का समर्थन किया। अंततः सरकार ने किसानों की सुरक्षा हेतु बंगाल काश्तकारी अधिनियम 1885 (Bengal Tenancy Act 1885) पारित किया।

दक्कन दंगे (Deccan Riots: 1875, महाराष्ट्र)

बॉम्बे प्रेसीडेंसी के पूना, अहमदनगर, शोलापुर और सतारा जिलों में रैयतवाड़ी व्यवस्था लागू थी, जहां भू-राजस्व की दर 50% से अधिक थी।

  • कारण: 1860 के दशक में अमेरिकी गृहयुद्ध के कारण भारतीय कपास के निर्यात में भारी उछाल आया। युद्ध समाप्त होते ही 1865 में कपास के दाम धड़ाम से गिर गए, किंतु सरकार ने लगान में 50% तक की वृद्धि कर दी। किसान मारवाड़ी और गुजराती साहूकारों के भयंकर ऋण-जाल में फंस गए।
  • विद्रोह का स्वरूप: मई 1875 में सिरूर तालुक के करडाह गांव से विद्रोह प्रारंभ हुआ। किसानों ने साहूकारों का सामाजिक बहिष्कार (Social Boycott) किया—नाई, धोबी और मोचियों ने साहूकारों के यहां काम करना बंद कर दिया। इसके बाद किसानों ने साहूकारों के घरों और दुकानों पर धावा बोलकर ऋण-पत्र (Debt Bonds), बही-खाते और गिरवीनामे छीनकर चौराहों पर जला दिए। हत्या या शारीरिक हिंसा न के बराबर हुई।
  • सरकारी कदम: सरकार ने दक्कन दंगा आयोग (Deccan Riots Commission) नियुक्त किया और 1879 में ‘दक्कन कृषक राहत अधिनियम’ (Deccan Agriculturists’ Relief Act 1879) पारित कर किसानों को ऋण न चुकाने पर कारावास से मुक्ति दी और उनकी जमीन की नीलामी पर कानूनी सीमाएं लगाईं।

6. 20वीं सदी के राष्ट्रीय कृषक सत्याग्रह (गांधीवादी युग)

20वीं सदी में महात्मा गांधी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रवेश के साथ ही कृषक आंदोलन राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम की मुख्यधारा से सीधे जुड़ गए।

सत्याग्रह एवं वर्षप्रमुख नेतृत्वमूल मुद्दा / कारणऐतिहासिक उपलब्धि
चंपारण सत्याग्रह (1917, बिहार)महात्मा गांधी, राजकुमार शुक्ल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, जे.बी. कृपलानी, नरहरि पारिख।तिनकठिया प्रणाली (Tinkathia System): कुल भूमि के 3/20 भाग पर नील की अनिवार्य खेती, रासायनिक रंगों के आगमन पर मुक्ति हेतु अवैध हर्जाने (तावान/शरहबेशी)।भारत में गांधीजी का प्रथम सविनय अवज्ञा प्रयोग सफल। चंपारण कृषक अधिनियम 1918 पारित, तिनकठिया समाप्त, 25% अवैध वसूली की वापसी। रवींद्रनाथ टैगोर ने गांधीजी को ‘महात्मा’ की उपाधि दी।
खेड़ा सत्याग्रह (1918, गुजरात)महात्मा गांधी, वल्लभभाई पटेल, इंदुलाल याज्ञिक, मोहनलाल पंड्या।भीषण अकाल और फसल नष्ट होने (उत्पादन 25% से कम) के बावजूद राजस्व संहिता के नियमों की अवहेलना कर कंपनी द्वारा पूरा लगान वसूलना।गांधीजी का प्रथम वास्तविक किसान सत्याग्रह। सरकार ने गोपनीय आदेश जारी कर केवल समर्थ किसानों से ही लगान लेने और निर्धनों का लगान स्थगित करने का समझौता किया।
बारदोली सत्याग्रह (1928, गुजरात)सरदार वल्लभभाई पटेल, कुंवरजी मेहता, कल्याणजी मेहता।बॉम्बे सरकार द्वारा 1926 में भू-राजस्व की दरों में अचानक 22% (शुरुआत में 30%) की अन्यायपूर्ण वृद्धि।किसानों ने ‘ना-लगान’ (No-Tax) आंदोलन चलाया। महिलाओं ने अभूतपूर्व भागीदारी की। मैक्सवेल-ब्रूमफील्ड जांच समिति ने कर वृद्धि को घटाकर मात्र 6.03% कर दिया। बारदोली की महिलाओं की ओर से गांधीजी ने वल्लभभाई को ‘सरदार’ की उपाधि दी।

मोपला विद्रोह (Moplah / Mappila Rebellion: 1921, केरल)

मालाबार तट पर मुस्लिम काश्तकारों (मोपला) का उच्च-जातीय हिंदू नंबूदरी व नायर भू-स्वामियों (जेन्मी – Jenmis) तथा ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध संघर्ष।

  • पृष्ठभूमि: मोपला किसान असुरक्षित पट्टों, अत्यधिक लगान और बेदखली से वर्षों से पीड़ित थे। 1920 में जब खिलाफत और असहयोग आंदोलन प्रारंभ हुआ, तो मोपलाओं ने इसे अपनी मुक्ति का साधन माना। गांधीजी, शौकत अली और मौलाना आजाद ने मोपला सम्मेलनों को संबोधित किया।
  • विद्रोह का भड़कना: अगस्त 1921 में जब ब्रिटिश पुलिस ने तिरुरंगड़ी मस्जिद में छापा मारा, तो हिंसा भड़क उठी। अली मुसलियार और वरियानकन्नाथ कुंजाहम्मद हाजी ने विद्रोह का नेतृत्व किया और एक स्वतंत्र खिलाफत राज्य की घोषणा की।
  • सांप्रदायिक मोड़ एवं त्रासदी: आंदोलन ने आगे चलकर हिंदू भूस्वामियों के विरुद्ध हिंसक सांप्रदायिक रूप धारण कर लिया, जिससे राष्ट्रीय नेताओं का समर्थन समाप्त हो गया। ब्रिटिश सेना ने क्रूरता से विद्रोह को कुचला।

    ‘वैगन त्रासदी’ (Wagon Tragedy, नवंबर 1921): 67 मोपला कैदियों को एक बंद मालगाड़ी के डिब्बे में तिरूर से पोदनूर ले जाते समय दम घुटने से मृत्यु हो गई।

7. किसान सभा आंदोलन एवं स्वामी सहजानंद सरस्वती (AIKS 1936)

1920 और 1930 के दशकों में किसानों के स्वतंत्र वर्ग संगठनों (Class Organizations) का प्रादुर्भाव हुआ, जो कांग्रेस के भीतर जमींदारों के प्रति नरम रवैये से असंतुष्ट थे।

संयुक्त प्रांत (UP) के किसान आंदोलन एवं एका आंदोलन

  • यूपी किसान सभा (फरवरी 1918): गौरीशंकर मिश्र, इंद्र नारायण द्विवेदी और मदन मोहन मालवीय के प्रयासों से स्थापित।
  • अवध किसान सभा (अक्टूबर 1920, प्रतापगढ़): बाबा रामचंद्र (जिन्होंने फिजी में गिरमिटिया मजदूर के रूप में कष्ट झेले थे) के प्रयासों से स्थापित। बाबा रामचंद्र रामचरितमानस की चौपाइयों का पाठ कर किसानों को एकजुट करते थे। जवाहरलाल नेहरू ने अवध के गांवों का दौरा कर किसानों को संगठित किया।
  • एका आंदोलन (1921–22, अवध): हरदोई, बहराइच और सीतापुर जिलों में मदारी पासी के नेतृत्व में उभरा। यह निम्न जाति के किसानों का आंदोलन था। किसान गंगाजल या पवित्र ग्रंथ हाथ में लेकर शपथ लेते थे कि वे निर्धारित लगान से 50% अधिक लगान नहीं देंगे, बेगार नहीं करेंगे और बेदखल की गई जमीनों को नहीं छोड़ेंगे।

अखिल भारतीय किसान सभा (All India Kisan Sabha – AIKS, 1936: लखनऊ)

अप्रैल 1936 में लखनऊ में कांग्रेस अधिवेशन के साथ ही अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS) की स्थापना हुई, जो भारत के किसान आंदोलन का ऐतिहासिक चरमोत्कर्ष था।

  • प्रथम अध्यक्ष: स्वामी सहजानंद सरस्वती (जिन्होंने 1929 में बिहार प्रांतीय किसान सभा बनाई थी)। उनका प्रसिद्ध सिद्धांत था—“कैसे लोगे मालगुजारी, लट्ठ हमारा जिंदाबाद!”
  • महासचिव: प्रोफेसर एन. जी. रंगा (N.G. Ranga) (आंध्र प्रदेश में किसान आंदोलन के प्रणेता)।
  • प्रमुख सहयोगी नेता: इंदुलाल याज्ञिक (जिन्होंने ‘किसान बुलेटिन’ का संपादन किया), आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, बंकिम मुखर्जी और पी. सी. जोशी।
  • किसान घोषणा-पत्र (Kisan Manifesto): 50% लगान में कमी, जमींदारी प्रथा का पूर्ण उन्मूलन, ऋणों की पूर्ण माफी, काश्तकारों को बेदखली से सुरक्षा और खेतिहर मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी की मांग की गई।

स्वतंत्रता पूर्व के क्रांतिकारी कृषक संघर्ष (1945–1951)

तेभागा आंदोलन (Tebhaga Movement: 1946–47, बंगाल)

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) की किसान सभा के नेतृत्व में बंगाल के बटाईदारों (वर्गदार – Bargadars) का ऐतिहासिक संघर्ष।

  • मांग: बंगाल भू-राजस्व आयोग (फ्लॉड कमीशन – Floud Commission) की सिफारिश के आधार पर बटाईदारों ने मांग की कि उपज का दो-तिहाई (2/3) हिस्सा बटाईदार को मिलना चाहिए और जमींदार/जोतदार को केवल एक-तिहाई (1/3) हिस्सा दिया जाए।
  • नारा: “आधि नय, तेभागा चाइ” (आधी उपज नहीं, दो-तिहाई हिस्सा चाहिए) और “निज खमारे धान तोलो” (धान जमींदार के खलिहान के बजाय बटाईदार के अपने खलिहान में काटा जाएगा)।
  • प्रमुख नेता: कंपाराम सिंह, भवन सेन, और चारु मजूमदार। राजबंशी और संथाली किसानों तथा महिलाओं की अभूतपूर्व भागीदारी रही।

तेलंगाना किसान सशस्त्र संघर्ष (Telangana Peasant Armed Struggle: 1946–51, हैदराबाद रियासत)

हैदराबाद के निजाम, जागीरदारों और देशमुखों के क्रूर सामंती शोषण के विरुद्ध इतिहास का सबसे बड़ा गुरिल्ला किसान युद्ध।

  • कारण: ‘वेट्ठी’ प्रणाली (Vetti System)—जिसके तहत निम्न जातियों और किसानों से बिना भुगतान के बेगार करवाई जाती थी; तथा ‘बागेला’ (ऋण-दासता)।
  • शुरुआत: जुलाई 1946 में जागीरदार विसनूर देशमुख के गुंडों द्वारा एक युवा किसान कार्यकर्ता डोड्डी कोमराया की हत्या के बाद पूरा नलगोंडा, वारंगल और खम्मम सुलग उठा।
  • गुरिल्ला संघर्ष: आंध्र महासभा और कम्युनिस्टों ने 3,000 से अधिक गांवों को ‘मुक्त क्षेत्र’ घोषित कर दिया। 10 लाख एकड़ से अधिक जमीन किसानों में बांटी गई, वेट्ठी प्रथा समाप्त कर दी गई। निजाम की कुख्यात सांप्रदायिक मिलिशिया ‘रजाकारों’ के हमलों का किसानों ने राइफलों से मुकाबला किया। सितंबर 1948 में भारतीय सेना के ‘ऑपरेशन पोलो’ द्वारा हैदराबाद के भारत में विलय के पश्चात 1951 में यह संघर्ष समाप्त हुआ।

वरली विद्रोह (Warli Uprising: 1945–47, महाराष्ट्र)

ठाणे जिले के वरली आदिवासियों ने जमींदारों और ठेकेदारों की बंधुआ मजदूरी के विरुद्ध संघर्ष किया। इसका नेतृत्व किसान सभा की अग्रणी महिला नेत्री गोदावरी परुलेकर ने किया।

8. संपूर्ण तुलनात्मक मास्टर कालानुक्रम सारणी (1757–1947 Master Timeline)

UPSC एवं State PCS प्रारंभिक परीक्षा के मिलान (Matching) एवं कालानुक्रम (Chronology) के प्रश्नों हेतु सभी प्रमुख विद्रोहों की त्वरित संदर्भ सारणी:

विद्रोह का नामसमयकालभौगोलिक क्षेत्रप्रमुख नेतृत्वकर्तामुख्य कारण एवं विशेष ऐतिहासिक परीक्षा बिंदु
सन्यासी-फकीर विद्रोह1763–1800बंगाल, बिहारमजनू शाह, चिराग अली, भवानी पाठक, देवी चौधरानीतीर्थयात्रा कर, 1770 का अकाल। बंकिम चंद्र के उपन्यास ‘आनंदमठ’ व ‘देवी चौधरानी’ का कथानक।
पाइक विद्रोह1817खुर्दा (ओडिशा)बक्शी जगबंधु, राजा मुकुंद देव II, दीवान कृष्णचंद्रपाइकन जागीरों की जब्ती, नमक कर, चांदी के सिक्कों में लगान की अनिवार्यता।
पोलीगर विद्रोह1799–1805तिरुनेलवेली, तमिलनाडुवीरपांड्य कट्टाबोम्मन, मरुदु पांड्यार बंधु1801 की ‘तिरुचिरापल्ली उद्घोषणा’। स्वतंत्र पालेयक्कारर संप्रभुता की रक्षा।
वेल्लु थम्पी विद्रोह1808–1809त्रावणकोर (केरल)दीवान वेल्लु थम्पी दलवासहायक संधि की कठोर शर्तें, रेजीडेंट मैकाले का हस्तक्षेप। 1809 की ‘कुंद्रा उद्घोषणा’।
कित्तूर विद्रोह1824–1829कित्तूर (कर्नाटक)रानी चेन्नम्मा, संगोली रायन्नागोद लिए पुत्र को मान्यता न देना, कलेक्टर थैकरे की हत्या।
कोल विद्रोह1831–1832छोटा नागपुरबुद्धू भगत, जोया भगत, मदारा महतोआदिवासी भूमि बाहरी सिख व मुस्लिम जमींदारों को सौंपना। 1834 में SWFA का गठन।
खासी विद्रोह1829–1833मेघालय (खासी हिल्स)तीरत सिंह (U Tirot Sing)सिलहट-असम सड़क निर्माण हेतु आदिवासी भूमि अधिग्रहण व बेगार।
संथाल हूल1855–1856दामिन-ए-कोह (राजमहल)सिद्धू, कान्हू, चांद, भैरव, फूलो-झानोमहाजनों व पुलिस का शोषण। परिणाम: 1855 का अधिनियम XXXVII, ‘संथाल परगना’ का गठन।
नील विद्रोह1859–1860नदिया, बंगालदिगंबर विश्वास, विष्णुचरण विश्वासदादनी प्रथा। हरिश्चंद्र मुखर्जी का ‘हिंदू पैट्रियट’, दीनबंधु मित्र का नाटक ‘नील दर्पण’, नील आयोग 1860।
पाबना विद्रोह1873–1876पाबना, पूर्वी बंगालईशान चंद्र राय, शंभू पाल, खुदी मुल्लाअवैध अबवाब व बेदखली। नारा: ‘महारानी विक्टोरिया की रैयत’। 1885 का बंगाल काश्तकारी कानून।
दक्कन दंगे1875पूना, अहमदनगरस्थानीय रैयत एवं किसानमारवाड़ी/गुजराती साहूकारों के ऋण-पत्र जलाना। दक्कन कृषक राहत अधिनियम 1879।
मुंडा उलगुलान1899–1900छोटा नागपुर (रांची)बिरसा मुंडा (‘धरती आबा’)खूंटकट्टी का विनाश, दिकू शोषण। डोंबारी बुरु युद्ध। परिणाम: छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 (CNT Act)।
मानगढ़ भील नरसंहार1913बांसवाड़ा (राजस्थान)गोविंद गुरु (भगत आंदोलन)17 नवंबर 1913 को मानगढ़ पहाड़ी पर 1,500 भीलों का नरसंहार। ‘राजस्थान का जलियांवाला बाग’।
चंपारण सत्याग्रह1917चंपारण (बिहार)महात्मा गांधी, राजकुमार शुक्लतिनकठिया प्रथा (3/20 नील)। भारत में गांधीजी का पहला सफल सत्याग्रह।
अवध / एका आंदोलन1920–1922प्रतापगढ़, हरदोई (UP)बाबा रामचंद्र, मदारी पासीअत्यधिक लगान, नजराना व बेगार। गंगाजल हाथ में लेकर एकता की शपथ।
मोपला विद्रोह1921मालाबार (केरल)अली मुसलियार, कुंजाहम्मद हाजीजेन्मी भूस्वामियों व अंग्रेजों के विरुद्ध। खिलाफत आंदोलन से जुड़ाव; वैगन त्रासदी।
रंपा विद्रोह1922–1924गोदावरी (आंध्र प्रदेश)अल्लूरी सीताराम राजू (‘मन्यम वीरुडु’)मद्रास वन कानून 1882, पोडू (झूम खेती) पर प्रतिबंध। छापामार पुलिस थाना हमले।
बारदोली सत्याग्रह1928सूरत (गुजरात)वल्लभभाई पटेल22% लगान वृद्धि। कर वृद्धि घटकर 6.03% हुई। वल्लभभाई को ‘सरदार’ की उपाधि।
अखिल भारतीय किसान सभा1936लखनऊस्वामी सहजानंद सरस्वती, एन. जी. रंगाजमींदारी उन्मूलन व 50% लगान कटौती हेतु राष्ट्रीय मंच। किसान घोषणा-पत्र जारी।
तेभागा आंदोलन1946–1947बंगालकम्पाराम सिंह, चारु मजूमदारबटाईदारों को 2/3 उपज देने की मांग (फ्लॉड कमीशन)। “आधि नय, तेभागा चाइ”।
तेलंगाना सशस्त्र संघर्ष1946–1951हैदराबाद रियासतडोड्डी कोमराया, कम्युनिस्ट पार्टीवेट्ठी (बेगार) व निजाम के रजाकारों के विरुद्ध 3,000 गांवों में भूमि पुनर्वितरण।

9. UPSC मुख्य परीक्षा हेतु विश्लेषणात्मक निष्कर्ष

सिविल सेवा मुख्य परीक्षा के दृष्टिकोण से इन जन-आंदोलनों का मूल्यांकन करते समय निम्नलिखित 4 आयामों को समझना अनिवार्य है:

1. विद्रोहों की सीमाएं (Limitations):

ये आंदोलन प्रायः स्थानीय और पृथक (Localized and Isolated) थे। इनमें संपूर्ण देश के स्तर पर कोई साझा केंद्रीय संगठन, आधुनिक विचारधारा या अखिल भारतीय समन्वय नहीं था। आदिवासियों और किसानों के हथियार (तीर, कुल्हाड़ी, भाले) ब्रिटिश सेना की आधुनिक राइफलों और तोपों के सामने टिक नहीं सके।

2. जन-विद्रोहों का ऐतिहासिक योगदान (Significance):

इन्होंने इस औपनिवेशिक मिथक को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया कि भारतीय जनता ब्रिटिश शासन को एक ‘वरदान’ (Pax Britannica) मानती थी। इन विद्रोहों ने आम जनमानस में विदेशी शोषण के विरुद्ध जुझारूपन, आत्म-बलिदान और निर्भीकता की एक अखंड परंपरा स्थापित की, जिसने आगे चलकर 1857 की क्रांति और 20वीं सदी के राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम को व्यापक जन-आधार प्रदान किया।

3. संवैधानिक एवं विधायी प्रभाव (Legislative Legacy):

ब्रिटिश सरकार को इन विद्रोहों के दबाव में कई ऐतिहासिक कानून बनाने पड़े, जैसे—संथाल परगना अधिनियम (1855), बंगाल काश्तकारी अधिनियम (1885), दक्कन कृषक राहत अधिनियम (1879) और छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम (1908)। स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय संविधान की 5वीं एवं 6वीं अनुसूची में जनजातीय क्षेत्रों को जो विशेषाधिकार व स्वायत्तता दी गई, उसकी जड़ें इन्हीं ऐतिहासिक संघर्षों में थीं।

10. UPSC स्तर के 5 विश्लेषणात्मक अभ्यास प्रश्न (व्याख्या सहित)

प्रश्न 1. औपनिवेशिक भारत में हुए ‘संथाल हूल’ (1855-56) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. विद्रोह का तात्कालिक केंद्र भागलपुर और राजमहल के मध्य स्थित ‘दामिन-ए-कोह’ क्षेत्र था।
  2. विद्रोह का नेतृत्व चार मुर्मू भाइयों—सिद्धू, कान्हू, चांद और भैरव ने किया था।
  3. विद्रोह के दमन के पश्चात ब्रिटिश सरकार ने अधिनियम XXXVII (1855) के तहत गैर-विनियमित ‘संथाल परगना’ जिले का सृजन किया।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर एवं विस्तृत व्याख्या देखें
सही उत्तर: (d) 1, 2 और 3
व्याख्या: तीनों कथन शत-प्रतिशत सत्य हैं। 1832-33 में दामिन-ए-कोह का सीमांकन हुआ था जहां संथाल बसे थे। सिद्धू, कान्हू, चांद और भैरव के नेतृत्व में 30 जून 1855 को भगनाडीह से विद्रोह प्रारंभ हुआ। विद्रोह के पश्चात 1855 के अधिनियम 37 द्वारा संथाल परगना जिले की स्थापना की गई ताकि आदिवासियों की भूमि के गैर-आदिवासियों को हस्तांतरण को रोका जा सके।

प्रश्न 2. बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हुए ‘उलगुलान’ (1899–1900) के परिणामों के संदर्भ में ‘छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908’ (CNT Act 1908) का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान क्या था?

(a) आदिवासियों को ईसाई धर्म अपनाने पर लगान में पूर्ण छूट दी गई।
(b) पारंपरिक ‘खूंटकट्टी’ अधिकारों को पुनः मान्यता दी गई तथा गैर-आदिवासियों को आदिवासी भूमि के अंतरण पर प्रतिबंध लगाया गया।
(c) छोटा नागपुर में ब्रिटिश सेना की स्थाई छावनी स्थापित की गई।
(d) सभी मुंडा किसानों को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के नियमित वेतनभोगी सैनिक बना दिया गया।

उत्तर एवं विस्तृत व्याख्या देखें
सही उत्तर: (b)
व्याख्या: बिरसा मुंडा के शहादत के पश्चात 11 नवंबर 1908 को पारित छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act 1908) ने मुंडाओं की संयुक्त पैतृक भूमि व्यवस्था ‘खूंटकट्टी’ को कानूनी संरक्षण प्रदान किया, बंधुआ मजदूरी (बेगार) को गैर-कानूनी घोषित किया तथा गैर-आदिवासियों (दिकुओं) द्वारा आदिवासी जमीन की खरीद-फरोख्त पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया।

प्रश्न 3. 19वीं सदी के बंगाल के ‘नील विद्रोह’ (1859-60) के संदर्भ में निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:

व्यक्तित्व / संस्थाभूमिका / कृति
1. दिगंबर व विष्णुचरण विश्वासनील विद्रोह के आरंभिक नेतृत्वकर्ता (गोविंदपुर)
2. दीनबंधु मित्रनाटक ‘नील दर्पण’ के रचयिता
3. हरिश्चंद्र मुखर्जी‘द हिंदू पैट्रियट’ के संपादक

उपर्युक्त युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर एवं विस्तृत व्याख्या देखें
सही उत्तर: (d) 1, 2 और 3
व्याख्या: तीनों युग्म सही हैं। नदिया जिले के गोविंदपुर में दिगंबर और विष्णु विश्वास ने नील बोने से इनकार कर आंदोलन प्रारंभ किया। दीनबंधु मित्र ने 1860 में ‘नील दर्पण’ नाटक लिखा जिसका जेम्स लॉन्ग ने अंग्रेजी अनुवाद किया। हरिश्चंद्र मुखर्जी ने ‘द हिंदू पैट्रियट’ में लगातार किसानों के समर्थन में लेख लिखे।

प्रश्न 4. निम्नलिखित घटनाओं को उनके कालानुक्रमिक क्रम (Chronological Order) में व्यवस्थित कीजिए:

  1. ओडिशा का पाइक विद्रोह
  2. पाबना कृषक संघ आंदोलन
  3. दक्कन दंगे (महाराष्ट्र)
  4. अखिल भारतीय किसान सभा (लखनऊ) की स्थापना

नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
(a) 1 – 2 – 3 – 4
(b) 1 – 3 – 2 – 4
(c) 2 – 1 – 3 – 4
(d) 1 – 2 – 4 – 3

उत्तर एवं विस्तृत व्याख्या देखें
सही उत्तर: (a) 1 – 2 – 3 – 4
व्याख्या:
1. पाइक विद्रोह: 1817 (बक्शी जगबंधु)
2. पाबना कृषक आंदोलन: 1873–76 (ईशान चंद्र राय)
3. दक्कन दंगे: 1875 (पूना व अहमदनगर)
4. अखिल भारतीय किसान सभा: अप्रैल 1936 (स्वामी सहजानंद सरस्वती, लखनऊ)।
अतः सही कालानुक्रम 1 – 2 – 3 – 4 है।

प्रश्न 5. 1922-24 के रंपा विद्रोह के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. इस विद्रोह का नेतृत्व अल्लूरी सीताराम राजू ने किया था, जिन्हें ‘मन्यम वीरुडु’ कहा जाता था।
  2. विद्रोह का एक प्रमुख कारण मद्रास वन अधिनियम 1882 द्वारा पारंपरिक पोडू (झूम खेती) पर प्रतिबंध था।
  3. अल्लूरी सीताराम राजू ने पुलिस थानों पर छापामार हमलों के लिए पारंपरिक तीर-कमानों के साथ-साथ लूटी गई बंदूकों का प्रयोग किया।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर एवं विस्तृत व्याख्या देखें
सही उत्तर: (d) 1, 2 और 3
व्याख्या: तीनों कथन सही हैं। अल्लूरी सीताराम राजू ने गोदावरी के पहाड़ी मन्यम क्षेत्र में कोया और कोंडा डोरा आदिवासियों का नेतृत्व किया। मद्रास वन कानून 1882 द्वारा आदिवासियों के वनाधिकार और पोडू खेती छीनी गई थी। उन्होंने चिंतापल्ली और कृष्णदेवीपेटा पुलिस थानों पर छापे मारकर हथियार जुटाए थे।

11. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQ)

संथाल हूल (1855) और मुंडा उलगुलान (1899) में क्या मौलिक अंतर था?
संथाल हूल (1855) मुख्य रूप से बाहरी महाजनों (साहूकारों), भ्रष्ट दारोगाओं और दामिन-ए-कोह में शोषण के विरुद्ध एक विशाल सशस्त्र जन-आक्रोश था, जिसका नेतृत्व चार मुर्मू भाइयों ने किया। इसके विपरीत, बिरसा मुंडा का उलगुलान (1899–1900) न केवल औपनिवेशिक व दिकू शोषण के विरुद्ध था, बल्कि वह एक व्यापक धार्मिक-सांस्कृतिक पुनरुत्थान आंदोलन (बिरसाइत पंथ) भी था, जिसने एकेश्वरवाद, आंतरिक शुद्धि और राजनीतिक रूप से संप्रभु ‘मुंडा राज’ की स्थापना का स्पष्ट लक्ष्य रखा था।
पाइक विद्रोह (1817) को स्वतंत्रता का प्रथम संग्राम क्यों कहा जाता है?
पाइक विद्रोह 1857 की क्रांति से 40 वर्ष पूर्व 1817 में ओडिशा के खुर्दा में लड़ा गया था। बक्शी जगबंधु के नेतृत्व में यह किसी एक स्थानीय सामंत का नहीं, बल्कि सैनिक पाइकों, किसानों, कंध आदिवासियों और आम जनता का अंग्रेजों के क्रूर राजस्व, नमक एकाधिकार व मुद्रा नीतियों के विरुद्ध संगठित सामूहिक युद्ध था, जिसने ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंका था।
नील विद्रोह (1859-60) को भारत का सबसे सफल किसान आंदोलन क्यों माना जाता है?
नील विद्रोह इसलिए ऐतिहासिक रूप से सबसे सफल माना जाता है क्योंकि इसमें किसानों ने पूर्ण एकता का प्रदर्शन करते हुए अहिंसक असहयोग का सहारा लिया। कलकत्ता के शिक्षित बुद्धिजीवियों और समाचार पत्रों (विशेषकर हरिश्चंद्र मुखर्जी का हिंदू पैट्रियट) ने इसका व्यापक प्रचार किया, जिसके दबाव में सरकार को नील आयोग (1860) गठित करना पड़ा और किसानों को नील की जबरन खेती से पूर्ण कानूनी मुक्ति मिली।
अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS 1936) के प्रथम अध्यक्ष कौन थे और इसकी क्या मांगें थीं?
अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना अप्रैल 1936 में लखनऊ में हुई थी। इसके प्रथम अध्यक्ष स्वामी सहजानंद सरस्वती और महासचिव प्रो. एन. जी. रंगा थे। इसकी मुख्य मांगें थीं—जमींदारी और सामंती प्रथाओं का पूर्ण उन्मूलन, भू-राजस्व और लगान में 50% की कटौती, काश्तकारों को बेदखली से सुरक्षा, कृषि ऋणों की माफी तथा खेतिहर मजदूरों के लिए उचित मजदूरी।
मानगढ़ धाम हत्याकांड (1913) क्या था और इसे ‘राजस्थान का जलियांवाला बाग’ क्यों कहा जाता है?
17 नवंबर 1913 को राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में स्थित मानगढ़ की पहाड़ी पर गोविंद गुरु के नेतृत्व में हजारों भील शांतिपूर्ण सभा कर रहे थे। ब्रिटिश सेना (मेवाड़ भील कोर) ने पहाड़ी को घेरकर अंधाधुंध गोलियां चलाईं, जिसमें 1,500 से अधिक निर्दोष भील मारे गए। जलियांवाला बाग (1919) से भी 6 वर्ष पूर्व हुए इस जघन्य नरसंहार को इतिहास में ‘राजस्थान का जलियांवाला बाग’ कहा जाता है।

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