आधुनिक भारत का इतिहास (GS Paper 1)
Updated 2026 Edition
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन (1885–1919) आधुनिक भारत के इतिहास का वह आधारभूत कालखंड है, जिसने औपनिवेशिक दासता के विरुद्ध एक आधुनिक, संगठित और अखिल भारतीय राष्ट्रीय चेतना को जन्म दिया। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के सैन्य दमन और 19वीं सदी के सामाजिक-धार्मिक पुनर्जागरण के पश्चात भारत के शिक्षित मध्यम वर्ग ने अनुभव किया कि ब्रिटिश औपनिवेशिक शोषण केवल स्थानीय शिकायतों का परिणाम नहीं है, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद और संपूर्ण भारतीय जनता के हितों के मध्य एक मूलभूत व अपरिहार्य अंतर्विरोध (Fundamental Contradiction) विद्यमान है।
दिसंबर 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Indian National Congress) की स्थापना से प्रारंभ होकर यह आंदोलन दो परस्पर भिन्न किंतु एक-दूसरे के पूरक चरणों से होकर गुजरा:
(1) उदारवादी युग (Moderate Phase: 1885–1905)—जिसमें दादाभाई नौरोजी, फिरोजशाह मेहता और गोपाल कृष्ण गोखले जैसे नेताओं ने संवैधानिक सुधारों, प्रार्थना-पत्रों और ‘धन की निकासी’ (Drain of Wealth) के आर्थिक विश्लेषण द्वारा ब्रिटिश शोषण के बौद्धिक मुखौटे को नोच फेंका; तथा
(2) उग्रवादी युग (Extremist Phase: 1905–1919)—जिसमें बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, विपिन चंद्र पाल (लाल-बाल-पाल) और अरविन्द घोष ने 1905 के बंगाल विभाजन के प्रत्युत्तर में ‘स्वदेशी’, ‘बहिष्कार’ और ‘स्वराज’ का सिंहनाद कर आंदोलन को आम जनता की सड़कों तक पहुंचा दिया।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन (1885–1919) ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध भारत का प्रथम संगठित संवैधानिक एवं जन-राजनीतिक संघर्ष था। इसे मुख्य रूप से दो चरणों में विभाजित किया जाता है:
(1) उदारवादी चरण (1885–1905): इसका नेतृत्व पाश्चात्य-शिक्षित कुलीन वर्ग (दादाभाई नौरोजी, डब्ल्यू. सी. बनर्जी, जी. के. गोखले) के हाथ में था, जिन्होंने ब्रिटिश न्यायप्रियता में विश्वास रखते हुए 3P नीति (Prayer, Petition, Protest – प्रार्थना, याचिका व विरोध) के माध्यम से प्रशासनिक व विधायी सुधारों (1892 का परिषद अधिनियम) और ‘आर्थिक राष्ट्रवाद’ की मांग की;
(2) उग्रवादी चरण (1905–1919): 1905 में लॉर्ड कर्जन द्वारा बंगाल विभाजन के बाद उभरा, जिसका नेतृत्व लाल-बाल-पाल और अरविन्द घोष ने किया। इन्होंने भिक्षावृत्ति की राजनीति को त्यागकर ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’ का नारा दिया तथा स्वदेशी, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा और निष्क्रिय प्रतिरोध (Passive Resistance) को मुख्य अस्त्र बनाया। इसके परिणामस्वरूप 1907 में कांग्रेस का सूरत विभाजन हुआ, 1909 में मॉर्ले-मिंटो सुधार आए, और 1916 में होमरूल लीग तथा लखनऊ समझौते के माध्यम से राष्ट्रीय आंदोलन पुनः संगठित हुआ।
1. भारतीय राष्ट्रवाद के उदय के प्रमुख कारक
19वीं सदी के उत्तरार्ध में आधुनिक भारतीय राष्ट्रवाद का उदय किसी आकस्मिक घटना का परिणाम नहीं था, बल्कि यह औपनिवेशिक शासन के आंतरिक अंतर्विरोधों और उससे उत्पन्न सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों की स्वाभाविक परिणति था:
- देश का प्रशासनिक एवं आर्थिक एकीकरण: ब्रिटिश शासन ने अपने औपनिवेशिक हितों (कच्चा माल ले जाना और सेना भेजना) के लिए रेलवे (1853), टेलीग्राफ, आधुनिक डाक व्यवस्था और एक एकीकृत न्यायिक व प्रशासनिक प्रणाली की स्थापना की। इस संपर्क तंत्र ने भारत के सुदूर प्रांतों (बंगाल, पंजाब, मद्रास, बॉम्बे) के नेताओं और जनता को एक-दूसरे के निकट लाकर साझा राष्ट्रीय पहचान का बोध कराया।
- पाश्चात्य शिक्षा एवं आधुनिक लोकतांत्रिक विचार: 1835 के मैकाले मिनट और 1854 के वुड्स डिस्पैच के बाद अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त भारतीयों ने जॉन मिल्टन, जे.एस. मिल, रूसो, वोल्टेयर और थॉमस पेन के स्वतंत्रता, लोकतंत्र, समानता और संप्रभुता के सिद्धांतों का अध्ययन किया। अंग्रेजी भाषा ने देश भर के बहुभाषी बुद्धिजीवियों के मध्य एक सर्वमान्य संपर्क भाषा (Lingua Franca) का कार्य किया।
- भारतीय प्रेस एवं देशी भाषाओं के साहित्य की भूमिका: अमृत बाजार पत्रिका, द हिंदू, बंगाली, केसरी, मराठा और सोमप्रकाश जैसे समाचार पत्रों ने ब्रिटिश शोषणकारी नीतियों को उजागर किया। बंकिम चंद्र का ‘आनंदमठ’ (वंदे मातरम्), भारतेंदु हरिश्चंद्र का नाटक ‘भारत दुर्दशा’ और अल्ताफ हुसैन हाली के मुसद्दस ने देशवासियों में राष्ट्रीय गौरव की ज्वाला प्रज्वलित की।
- सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों का योगदान: राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती (‘भारत भारतीयों के लिए है’), और स्वामी विवेकानंद (‘उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक मत रुको’) ने भारतीयों में अपनी प्राचीन संस्कृति के प्रति हीनभावना को समाप्त कर आत्मसम्मान और निडरता का संचार किया।
- अंग्रेजों की प्रजातीय विभेदकारी एवं अपमानजनक नीतियां: भारतीयों को यूरोपीय क्लबों, रेल के प्रथम श्रेणी डिब्बों और उच्च प्रशासनिक पदों से बाहर रखा जाता था। अंग्रेजों का यह नस्लीय दंभ (Racial Arrogance) भारतीयों के स्वाभिमान पर सीधा कुठाराघात था।
- लॉर्ड लिटन की प्रतिक्रियावादी नीतियां (तात्कालिक उत्प्रेरक: 1876–1880):
- 1876-78 के भीषण अकाल के समय जब लाखों लोग भूख से मर रहे थे, तब 1877 में भव्य प्रथम दिल्ली दरबार आयोजित कर करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाए गए।
- भारतीय सिविल सेवा (ICS) में प्रवेश की अधिकतम आयु 21 वर्ष से घटाकर 19 वर्ष कर दी गई ताकि भारतीय युवा परीक्षा न दे सकें।
- वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट (1878) और आर्म्स एक्ट (1878) द्वारा भारतीय भाषाओं के अखबारों का गला घोंटा गया और भारतीयों के हथियार रखने पर रोक लगाई गई।
- इल्बर्ट बिल विवाद (1883): लॉर्ड रिपन के विधि सदस्य सी.पी. इल्बर्ट ने एक विधेयक प्रस्तुत किया जिसमें भारतीय जिला मजिस्ट्रेटों को यूरोपीय अपराधियों के मुकदमों की सुनवाई का अधिकार दिया गया था। अंग्रेजों के उग्र और संगठित श्वेत-विद्रोह (White Mutiny) के आगे सरकार को झुकना पड़ा। इस घटना ने भारतीयों को यह स्पष्ट सिखा दिया कि बिना एक संगठित अखिल भारतीय राजनीतिक दल के अपनी मांगें मनवाना असंभव है।
2. कांग्रेस-पूर्व प्रमुख राजनीतिक संस्थाएं (Pre-Congress Associations: 1838–1884)
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1885) की स्थापना शून्य में नहीं हुई थी। उससे पूर्व भारत के तीनों प्रमुख प्रेसीडेंसी नगरों—बंगाल, बॉम्बे और मद्रास—में कई क्षेत्रीय राजनीतिक संगठनों ने जनता के अधिकारों के लिए संघर्ष की आधारशिला रखी थी:
| संस्था का नाम | स्थापना वर्ष | संस्थापक / प्रमुख नेता | उद्देश्य एवं ऐतिहासिक महत्व |
|---|---|---|---|
| बंगभाषा प्रकाशिका सभा | 1836 | राजा राममोहन राय के सहयोगी (गौरीशंकर भट्टाचार्य) | भारत की प्रथम राजनीतिक संस्था जिसने सरकारी नीतियों की समीक्षा और प्रशासनिक सुधारों की मांग की। |
| लैंडहोल्डर्स सोसाइटी (जमींदारी एसोसिएशन) | 1838 | द्वारकानाथ टैगोर, प्रसन्न कुमार टैगोर, राधाकांत देव | भारत का पहला संगठित राजनीतिक संगठन जिसने अपनी मांगों हेतु संवैधानिक साधनों (याचिका व ज्ञापन) का प्रयोग किया; मुख्य रूप से जमींदारों के अधिकारों की रक्षा हेतु गठित। |
| ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन (कलकत्ता) | 1851 | राधाकांत देव (अध्यक्ष), देवेंद्रनाथ टैगोर (सचिव) | लैंडहोल्डर्स सोसाइटी व बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी का विलय। 1853 के चार्टर एक्ट के समय ब्रिटिश संसद को याचिका भेजकर पृथक विधान परिषद व उच्च पदों में भारतीयों की नियुक्ति की मांग की। |
| ईस्ट इंडिया एसोसिएशन (लंदन) | 1866 | दादाभाई नौरोजी | लंदन में स्थापित। उद्देश्य: ब्रिटिश जनता और संसद को भारत की वास्तविक दुर्दशा से अवगत कराना तथा भारत के कल्याण हेतु ब्रिटिश जनमत तैयार करना। |
| पूना सार्वजनिक सभा (महाराष्ट्र) | 1870 | एम. जी. रानडे, जी. वी. जोशी (‘सार्वजनिक काका’), एस. एच. चिपलूनकर | सरकार और जनता के मध्य मध्यस्थ (सेतु) का कार्य किया। 1875 के दक्कन दंगों के समय किसानों के अधिकारों हेतु व्यापक जांच व राहत कार्य किया। |
| इंडियन एसोसिएशन (भारत सभा, कलकत्ता) | 1876 | सुरेंद्रनाथ बनर्जी एवं आनंद मोहन बोस | कांग्रेस की सबसे महत्वपूर्ण पूर्वगामी (Precursor) संस्था। मध्यम वर्ग और आम जनता का प्रथम राष्ट्रीय संगठन। इसने सिविल सेवा आंदोलन (उम्र सीमा घटाने के विरुद्ध), वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट और इल्बर्ट बिल के विरुद्ध देशव्यापी आंदोलन चलाया। 1883 व 1885 में ‘अखिल भारतीय राष्ट्रीय सम्मेलन’ (National Conference) आयोजित किया। |
| मद्रास महाजन सभा | 1884 | एम. वीरराघवाचारी, बी. सुब्रह्मण्यम अय्यर, पी. आनंद चार्लू | मद्रास प्रेसीडेंसी में स्थानीय समस्याओं को राष्ट्रीय पटल पर रखने और विधायी सुधारों की मांग हेतु स्थापित। |
| बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन | 1885 | फिरोजशाह मेहता, के. टी. तैलंग, बदरुद्दीन तैयबजी (‘बॉम्बे की त्रिमूर्ति’) | लिटन की प्रतिक्रियावादी नीतियों और इल्बर्ट बिल विवाद के विरोध में बॉम्बे में गठित एक अत्यंत प्रभावशाली राजनीतिक संस्था। |
3. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना (1885) एवं ‘सेफ्टी वाल्व’ सिद्धांत
28 दिसंबर 1885 को बॉम्बे के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज में 72 प्रबुद्ध प्रतिनिधियों की उपस्थिति में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) की स्थापना आधुनिक भारतीय इतिहास की सबसे युगांतरकारी घटना थी।
- संस्थापक: एक अवकाशप्राप्त स्कॉटिश सिविल सेवक एलन ऑक्टेवियन ह्यूम (A. O. Hume), जिन्होंने 1883 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के स्नातकों के नाम एक खुला पत्र लिखकर देश के पुनरुत्थान हेतु संगठित होने का आह्वान किया था।
- प्रथम अध्यक्ष: व्योमेश चंद्र बनर्जी (W. C. Bonnerjee)।
- प्रारंभिक नाम: मूल रूप से इसका नाम ‘इंडियन नेशनल यूनियन’ (Indian National Union) रखा गया था, किंतु दादाभाई नौरोजी के सुझाव पर इसे बदलकर ‘इंडियन नेशनल कांग्रेस’ किया गया (अमेरिकी संविधान से प्रेरित ‘कांग्रेस’ शब्द, जिसका अर्थ ‘लोगों की सभा’ है)।
- स्थान परिवर्तन: इसका प्रथम अधिवेशन मूल रूप से पूना में आयोजित होना था, किंतु वहां हैजा/प्लेग फैल जाने के कारण इसे अंतिम समय में बॉम्बे स्थानांतरित किया गया।
- भागीदारी: कुल 72 प्रतिनिधियों में अधिकांश वकील, पत्रकार और व्यापारी थे। इसमें सुरेंद्रनाथ बनर्जी शामिल नहीं हो सके क्योंकि वे उसी समय कलकत्ता में अपने संगठन के ‘द्वितीय नेशनल कॉन्फ्रेंस’ की अध्यक्षता कर रहे थे (1886 में दोनों संगठनों का विलय हो गया)।
- तत्कालीन वायसराय: लॉर्ड डफरिन (Lord Dufferin: 1884–1888)। डफरिन ने प्रारंभ में ह्यूम के प्रयास का स्वागत किया, किंतु बाद में जब कांग्रेस ने राजनीतिक सुधार मांगे, तो उसने इसे “अल्पसंख्यक शिक्षित अभिजात वर्ग” (Microscopic Minority) कहकर इसका उपहास उड़ाया।
कांग्रेस की स्थापना से जुड़े दो प्रमुख ऐतिहासिक सिद्धांत:
1. सुरक्षा कपाट का सिद्धांत (Safety Valve Theory):
इस सिद्धांत के अनुसार, ए.ओ. ह्यूम ने तत्कालीन वायसराय लॉर्ड डफरिन की गुप्त सहमति से कांग्रेस की स्थापना इसलिए करवाई ताकि 1857 जैसी किसी दूसरी खूनी सशस्त्र क्रांति को रोका जा सके। ह्यूम को सीआईडी की 7 गोपनीय रिपोर्टों से ज्ञात हुआ था कि भारतीय जनता में औपनिवेशिक शोषण के विरुद्ध भयानक असंतोष सुलग रहा है। अतः जनता के बढ़ते आक्रोश को अहिंसक और संवैधानिक तरीके से बाहर निकालने के लिए कांग्रेस को एक ‘सेफ्टी वाल्व’ (सुरक्षा कपाट) के रूप में खड़ा किया गया।
प्रमुख समर्थक: लाला लाजपत राय ने 1916 में ‘यंग इंडिया’ में लिखा कि “कांग्रेस लॉर्ड डफरिन के दिमाग की उपज थी।” वामपंथी इतिहासकार रजनी पाम दत्त (R. P. Dutt – ‘इंडिया टुडे’) ने इसे पूंजीवादी-साम्राज्यवादी मिलीभगत का परिणाम बताया।
2. तड़ित चालक का सिद्धांत (Lightning Conductor Theory):
आधुनिक राष्ट्रवादी इतिहासकार (जैसे बिपिन चंद्र) और स्वयं गोपाल कृष्ण गोखले ने इस सिद्धांत को पुष्ट किया। गोखले ने 1913 में कहा कि “यदि कांग्रेस का कोई भी भारतीय संस्थापक होता, तो ब्रिटिश सरकार इस आंदोलन को अपनी शैशवावस्था में ही कुचल देती। भारतीयों ने ए.ओ. ह्यूम को एक ‘तड़ित चालक’ (Lightning Conductor) के रूप में इस्तेमाल किया ताकि ब्रिटिश सरकार के दमनकारी प्रहारों से नवजात राष्ट्रीय आंदोलन को बचाया जा सके।”
4. उदारवादी युग (The Moderate Phase: 1885–1905)
कांग्रेस के प्रथम बीस वर्षों को इतिहास में ‘उदारवादी युग’ (Moderate Era) कहा जाता है। इस काल में कांग्रेस का नेतृत्व उच्च-मध्यम वर्गीय, पश्चिमी शिक्षा प्राप्त, कानूनविद् और संभ्रांत बुद्धिजीवियों के हाथों में था।
दादाभाई नौरोजी (‘भारत के वयोवृद्ध नेता’ – Grand Old Man of India), गोपाल कृष्ण गोखले (गांधीजी के राजनीतिक गुरु), फिरोजशाह मेहता, बदरुद्दीन तैयबजी, व्योमेश चंद्र बनर्जी, आनंद मोहन बोस, सुरेंद्रनाथ बनर्जी, रासबिहारी घोष, और पी. आनंद चार्लू।
- ब्रिटिश न्यायप्रियता में अटूट आस्था: उदारवादियों का मानना था कि अंग्रेज मूलतः न्यायप्रिय और लोकतांत्रिक मूल्यों के समर्थक हैं। उनका विश्वास था कि यदि ब्रिटिश संसद और ब्रिटिश जनता को भारत की वास्तविक समस्याओं से निष्पक्षतापूर्वक अवगत कराया जाए, तो वे स्वयं भारत में संवैधानिक सुधार करेंगे।
- संवैधानिक आंदोलन (Constitutional Agitation): उदारवादी किसी भी प्रकार की हिंसा, गैर-कानूनी गतिविधि या जन-विद्रोह के सख्त विरोधी थे। उन्होंने अपनी मांगों को मनवाने के लिए 3P नीति (Prayers, Petitions, and Protests – प्रार्थना, याचिकाएं और स्मरण-पत्र) का सहारा लिया।
- क्रमिक सुधार (Gradualism): वे एक झटके में पूर्ण स्वतंत्रता या अंग्रेजों को बाहर निकालने की मांग नहीं कर रहे थे; वे ब्रिटिश साम्राज्य की छत्रछाया में ही स्वशासन (Self-Government on Colonial Lines) और विधायिकाओं में भारतीयों के प्रतिनिधित्व का क्रमिक विस्तार चाहते थे।
- लंदन में राजनीतिक प्रचार: दादाभाई नौरोजी के प्रयासों से 1889 में लंदन में कांग्रेस की ब्रिटिश कमेटी (British Committee of INC) स्थापित की गई और 1890 में ‘इंडिया’ (India) नामक एक प्रभावशाली पत्रिका निकाली गई। दादाभाई 1892 में लिबरल पार्टी के टिकट पर सेंट्रल फिन्सबरी से ब्रिटिश संसद (हाउस ऑफ कॉमन्स) के सदस्य चुने जाने वाले प्रथम एशियाई बने।
- अखिल भारतीय राष्ट्रीय चेतना का निर्माण: विभिन्न धर्मों, जातियों, भाषाओं और क्षेत्रों में बंटे भारत को एक साझा राजनीतिक मंच प्रदान किया और ‘भारतीय राष्ट्र’ (Nation in the Making) की अवधारणा को ठोस रूप दिया।
- आर्थिक राष्ट्रवाद का विकास: अंग्रेजों द्वारा भारत के शोषण और धन की निकासी के तंत्र को अकाट्य साक्ष्यों के साथ बेनकाब किया।
- भारतीय परिषद अधिनियम (1892): उदारवादियों के अनवरत दबाव का ही परिणाम था कि 1892 के अधिनियम द्वारा केंद्रीय एवं प्रांतीय विधान परिषदों में गैर-सरकारी भारतीय सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई तथा बजट पर बहस करने और प्रश्न पूछने का सीमित अधिकार दिया गया।
- प्रशासनिक सुधारों की मांग: न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करने, सिविल सेवा परीक्षा को भारत और इंग्लैंड में एक साथ आयोजित कराने (1893 में ब्रिटिश संसद में प्रस्ताव पारित), और सैन्य व्यय में कटौती की मांग की।
5. आर्थिक राष्ट्रवाद एवं ‘धन की निकासी’ का सिद्धांत (Economic Nationalism & Drain of Wealth)
उदारवादियों का सर्वाधिक युगांतरकारी और चिरस्थायी योगदान औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था की निर्मम चीरफाड़ था, जिसे ‘आर्थिक राष्ट्रवाद’ (Economic Nationalism) कहा जाता है।
दादाभाई नौरोजी एवं ‘धन की निकासी’ का सिद्धांत:
2 मई 1867 को लंदन में ईस्ट इंडिया एसोसिएशन की बैठक में पढ़े गए अपने ऐतिहासिक शोध-पत्र ‘इंग्लैंड्स डेट टू इंडिया’ (England’s Debt to India) में दादाभाई नौरोजी ने पहली बार ‘धन की निकासी’ (Drain of Wealth) का सिद्धांत प्रस्तुत किया।
- पुस्तक: 1901 में उन्होंने अपनी अमर कृति ‘पॉवर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया’ (Poverty and Un-British Rule in India) प्रकाशित की। ‘अन-ब्रिटिश’ शब्द का प्रयोग उन्होंने इसलिए किया क्योंकि वे बताना चाहते थे कि अंग्रेजों का भारत में आचरण स्वयं ब्रिटेन के उच्च लोकतांत्रिक और मानवीय मूल्यों के सर्वथा विपरीत है।
- धन की निकासी की परिभाषा: भारतीय राजस्व का वह विशाल हिस्सा जो प्रतिवर्ष बिना किसी भौतिक, वित्तीय या व्यापारिक प्रतिफल (Without any Economic Return) के सीधे ब्रिटेन भेज दिया जाता था, जिससे भारत में पूंजी निर्माण (Capital Formation) अवरुद्ध हो गया और देश दरिद्र होता चला गया।
- गृह प्रभार (Home Charges): धन निकासी का सबसे बड़ा माध्यम ‘गृह प्रभार’ था, जिसमें शामिल थे—ईस्ट इंडिया कंपनी के शेयरधारकों का लाभांश, लंदन स्थित भारत सचिव के इंडिया ऑफिस का खर्च, भारत में कार्यरत ब्रिटिश असैनिक व सैन्य अधिकारियों के वेतन, भत्ते और पेंशन, तथा ब्रिटिश पूंजीपतियों द्वारा रेलवे निर्माण पर गारंटीशुदा 5% लाभांश।
अन्य प्रमुख आर्थिक राष्ट्रवादी विचारक:
- रोमेश चंद्र दत्त (R. C. Dutt): पूर्व आईसीएस अधिकारी आर.सी. दत्त ने 1901 में ‘द इकोनॉमिक हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ (The Economic History of India – 2 खंड) लिखी, जो ब्रिटिश भारत का प्रथम संपूर्ण आर्थिक इतिहास है। उन्होंने लिखा कि “यदि भारत में करों का पानी इसी तरह वाष्प बनकर लंदन में बरसता रहा, तो भारत कभी अकाल और भुखमरी से मुक्त नहीं हो सकता।”
- जस्टिस महादेव गोविंद रानडे (M. G. Ranade): उन्होंने ‘एसेज इन इंडियन इकोनॉमिक्स’ (1898) में तर्क दिया कि शास्त्रीय ब्रिटिश अर्थशास्त्र (लेसेज-फेयर / अहस्तक्षेप) भारत जैसे औपनिवेशिक देश के लिए अनुपयुक्त है और भारत को राज्य-संरक्षित औद्योगीकरण की आवश्यकता है।
- जी. वी. जोशी एवं जी. सुब्रह्मण्यम अय्यर: अय्यर ने अपने अखबार ‘द हिंदू’ और तमिल पत्रिका ‘स्वदेशमित्रन’ में लगातार आर्थिक उपनिवेशवाद पर चोट की।
6. उग्र राष्ट्रवाद का उदय (The Extremist Phase: 1905–1919)
20वीं सदी के प्रारंभ में कांग्रेस के भीतर एक युवा, आक्रामक और स्वाभिमानी गुट का उभार हुआ जिसे ‘उग्रवादी’ या ‘गरम दल’ (Extremists / Militant Nationalists) कहा गया।
- उदारवादी नीतियों की विफलता: बीस वर्षों के प्रार्थना-पत्रों के बाद भी अंग्रेजों ने भारतीयों को कोई वास्तविक राजनीतिक अधिकार नहीं दिए। 1892 का परिषद अधिनियम अत्यंत निराशाजनक था। उग्रवादियों ने उदारवादियों की कार्यप्रणाली को ‘राजनीतिक भिक्षावृत्ति’ (Political Mendicancy) कहकर खारिज किया।
- अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का प्रेरणादायक प्रभाव: 1896 में अबीसीनिया (इथियोपिया) द्वारा यूरोपीय शक्ति इटली को पराजित करना, और विशेष रूप से 1905 में छोटे से एशियाई देश जापान द्वारा विशाल यूरोपीय साम्राज्य रूस को धूल चटाना (Russo-Japanese War 1904-05)—इन घटनाओं ने यूरोपीय अजेयता (Myth of European Invincibility) के भ्रम को हमेशा के लिए तोड़ दिया।
- 1896-1900 के भीषण अकाल एवं प्लेग: सरकार की संवेदनहीनता ने जनता में रोष भर दिया। 1897 में पूना के प्लेग कमिश्नर रैंड के अत्याचारों से क्षुब्ध होकर चापेकर बंधुओं (दामोदर व बालकृष्ण) ने रैंड की हत्या कर दी। तिलक ने अपने पत्र ‘केसरी’ में इसका समर्थन किया जिसके कारण उन्हें 18 माह के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई और वे राष्ट्रीय स्तर पर ‘लोकमान्य’ बने।
- लॉर्ड कर्जन की प्रतिक्रियावादी और दमनकारी नीतियां (1899–1905):
कर्जन ने 1899 का कलकत्ता कॉर्पोरेशन एक्ट, 1904 का भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम (विश्वविद्यालयों पर सरकारी नियंत्रण), और 1904 का ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट लागू किया। अंततः 1905 में बंगाल का विभाजन कर उसने आग में घी डालने का काम किया।
- बाल गंगाधर तिलक (लोकमान्य): उग्र राष्ट्रवाद के निर्विवाद प्रणेता। उन्होंने 1893 में गणपति उत्सव और 1895 में शिवाजी उत्सव प्रारंभ कर राष्ट्रीय आंदोलन को जन-संस्कृति से जोड़ा। उन्होंने नारा दिया: “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा!” उन्होंने ‘केसरी’ (मराठी) और ‘द मराठा’ (अंग्रेजी) पत्रों का संपादन किया। वैलेंटाइन शिरोल ने अपनी पुस्तक ‘इंडियन अनरेस्ट’ में तिलक को ‘भारतीय अशांति का जनक’ (Father of Indian Unrest) कहा था।
- लाला लाजपत राय (‘पंजाब केसरी’): उन्होंने ‘द पंजाबी’ समाचार पत्र निकाला और आर्य समाज के सिद्धांतों के आधार पर राष्ट्रवाद का प्रचार किया।
- विपिन चंद्र पाल: बंगाल में उग्र विचारधारा के प्रमुख प्रवक्ता। उन्होंने ‘न्यू इंडिया’ और ‘वंदे मातरम्’ पत्रों का संपादन किया।
- अरविन्द घोष: उन्होंने ‘इंदु प्रकाश’ में ‘न्यू लैंप्स फॉर ओल्ड’ (New Lamps for Old: 1893-94) नामक प्रसिद्ध लेख श्रृंखला लिखकर कांग्रेस की उदारवादी नीतियों की पहली बौद्धिक धज्जियां उड़ाईं। उन्होंने 1907 में ‘निष्क्रिय प्रतिरोध का सिद्धांत’ (Doctrine of Passive Resistance) प्रस्तुत किया, जो आगे चलकर गांधीवादी सत्याग्रह का सैद्धांतिक आधार बना।
उदारवादी (नरम दल) बनाम उग्रवादी (गरम दल): संपूर्ण तुलनात्मक सारणी
| तुलना का आधार | उदारवादी युग (नरम दल: 1885–1905) | उग्रवादी युग (गरम दल: 1905–1919) |
|---|---|---|
| सामाजिक आधार | शहरी संभ्रांत वर्ग, उच्च-मध्यम वर्गीय वकील, डॉक्टर, उद्योगपति और बड़े जमींदार। | शहरी निम्न-मध्यम वर्ग, छात्र, युवा, शिक्षक, छोटे व्यापारी और ग्रामीण जनता। |
| वैचारिक प्रेरणा | पश्चिमी उदारवाद, यूरोपीय ज्ञानोदय, ब्रिटिश इतिहास और अंग्रेजी साहित्य। | भारतीय इतिहास, वैदिक परंपरा, गौरवशाली सांस्कृतिक अतीत, गीता और उपनिषद। |
| ब्रिटिश शासन के प्रति दृष्टिकोण | ब्रिटिश न्यायप्रियता में विश्वास; मानते थे कि ब्रिटिश शासन भारत के लिए एक वरदान (Pax Britannica) है। | ब्रिटिश शासन को शोषणकारी और भारत के विनाश का कारण माना; औपनिवेशिक सत्ता से कोई नैतिक उम्मीद नहीं। |
| राजनीतिक लक्ष्य | ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत संवैधानिक सुधार, विधान परिषदों में अधिक सीटें और स्वशासन (Dominion Status)। | ‘स्वराज’ (Swaraj): प्रत्यक्ष स्वशासन और विदेशी शासन से पूर्ण स्वाधीनता। |
| कार्यप्रणाली एवं साधन | 3P नीति: संवैधानिक प्रार्थना-पत्र (Prayers), याचिकाएं (Petitions) और शिष्टमंडल (Deputations)। | सक्रिय व निष्क्रिय प्रतिरोध: स्वदेशी अपनाना, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा, और सरकारी संस्थाओं का असहयोग। |
| जनता की शक्ति में विश्वास | जनता की राजनीतिक परिपक्वता में अविश्वास; मानते थे कि जनता अभी अशिक्षित और असंगठित है। | आम जनता की असीम बलिदान क्षमता और आत्मबल में अटूट विश्वास। |
7. बंगाल विभाजन (1905) एवं स्वदेशी तथा बहिष्कार आंदोलन
20 जुलाई 1905 को भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन (Lord Curzon) ने बंगाल के विभाजन की औपचारिक घोषणा की, जो 16 अक्टूबर 1905 को प्रभावी हुआ।
- ब्रिटिश सरकार का तर्क: बंगाल प्रांत (जिसमें वर्तमान पश्चिम बंगाल, बांग्लादेश, बिहार और ओडिशा शामिल थे) की कुल आबादी लगभग 7 करोड़ 85 लाख थी। सरकार ने दावा किया कि इतना विशाल प्रांत प्रशासनिक रूप से एक लेफ्टिनेंट गवर्नर द्वारा संचालित नहीं हो सकता, अतः प्रशासनिक दक्षता हेतु विभाजन अनिवार्य है।
- विभाजन का वास्तविक साम्राज्यवादी षड्यंत्र: गृह सचिव एच. एच. रिजले (Risley) ने स्पष्ट लिखा था: “अविभाजित बंगाल एक महाशक्ति है; विभाजित होने पर यह कमजोर हो जाएगा। हमारा मुख्य उद्देश्य उस संगठित बंगाली राष्ट्रवादी चेतना को तोड़ना है जो कांग्रेस का केंद्र बिंदु बन चुकी है।”
कर्जन ने धार्मिक आधार पर विभाजन की रेखा खींची:- पश्चिमी बंगाल: हिंदू बहुल क्षेत्र (हिंदू: 4.2 करोड़, मुस्लिम: 90 लाख – कुल 5.4 करोड़), जहां बंगालियों को ही भाषाई अल्पसंख्यक (हिंदी और उड़िया भाषी अधिक) बना दिया गया।
- पूर्वी बंगाल और असम: मुस्लिम बहुल क्षेत्र (मुस्लिम: 1.8 करोड़, हिंदू: 1.2 करोड़ – कुल 3.1 करोड़, राजधानी: ढाका)। कर्जन ने ढाका जाकर मुसलमानों से कहा कि यह नया प्रांत उन्हें एक नया मुस्लिम बहुल केंद्र देगा जहां वे पुराने नवाबों जैसा गौरव पाएंगे।
स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन (Swadeshi & Boycott Movement: 1905–1908)
विभाजन के विरोध में 7 अगस्त 1905 को कलकत्ता के ऐतिहासिक टाउन हॉल (Town Hall) में एक विशाल सभा में प्रसिद्ध ‘बहिष्कार प्रस्ताव’ (Boycott Resolution) पारित हुआ और स्वदेशी आंदोलन का औपचारिक शंखनाद हुआ।
- 16 अक्टूबर 1905 (विभाजन प्रभावी होने का दिन): पूरे बंगाल में ‘शोक दिवस’ के रूप में मनाया गया। लोगों ने उपवास रखे, दुकानें बंद रहीं, नंगे पांव गंगा स्नान किया और ‘वंदे मातरम्’ गाते हुए सड़कों पर जुलूस निकाले।
रवींद्रनाथ टैगोर के सुझाव पर हिंदू-मुस्लिम एकता और अखंडता को प्रदर्शित करने के लिए इस दिन को ‘राखी दिवस’ (Raksha Bandhan) के रूप में मनाया गया जहां एक-दूसरे की कलाइयों पर राखियां बांधी गईं। - रवींद्रनाथ टैगोर का अमर गीत: इस आंदोलन के दौरान टैगोर ने ‘आमार शोनार बांला’ (Amar Sonar Bangla) की रचना की, जो आगे चलकर 1971 में स्वतंत्र बांग्लादेश का राष्ट्रगान बना।
- बहिष्कार का प्रसार: विदेशी वस्त्रों, मैनचेस्टर के कपड़ों और लिवरपूल के नमक का व्यापक बहिष्कार किया गया। विदेशी कपड़ों की सार्वजनिक होलियां जलाई गईं। धोबियों ने विदेशी कपड़े धोने से और पुजारियों ने विदेशी चीनी से बने प्रसाद का भोग लगाने से मना कर दिया।
- स्वदेशी उद्योग एवं आत्मनिर्भरता (आत्मशक्ति): आचार्य पी. सी. रे ने ‘बंगाल केमिकल्स एंड फार्मास्युटिकल वर्क्स’ की स्थापना की। जमशेदजी टाटा ने 1907 में जमशेदपुर में टिस्को (TISCO) की स्थापना की। वी. ओ. चिदंबरम पिल्लई ने तूतीकोरिन में अंग्रेजों के विरुद्ध ‘स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी’ चलाई।
- राष्ट्रीय शिक्षा परिषद (National Council of Education): 15 अगस्त 1906 को राष्ट्रीय शिक्षा परिषद की स्थापना हुई और बंगाल नेशनल कॉलेज खोला गया, जिसके प्रथम प्रधानाचार्य अरविन्द घोष बने। सतीश चंद्र मुखर्जी की ‘डॉन सोसाइटी’ (Dawn Society) ने राष्ट्रीय शिक्षा के प्रसार में अग्रणी भूमिका निभाई।
- स्वदेशी बांधव समिति: बारीसाल के शिक्षक अश्विनी कुमार दत्त द्वारा स्थापित ‘स्वदेशी बांधव समिति’ ने 289 ग्रामीण शाखाओं के माध्यम से जन-आंदोलन को गांव-गांव तक पहुंचाया।
8. मुस्लिम लीग की स्थापना (1906) एवं सूरत विभाजन (1907)
मुस्लिम लीग की स्थापना (30 दिसंबर 1906, ढाका):
कर्जन और ब्रिटिश सरकार की ‘फूट डालो और राज करो’ (Divide and Rule) नीति का परिणाम 1906 में प्रत्यक्ष सामने आया। 1 अक्टूबर 1906 को आगा खान के नेतृत्व में 35 कुलीन मुसलमानों का एक प्रतिनिधिमंडल (शिमला प्रतिनिधिमंडल) शिमला में वायसराय लॉर्ड मिंटो से मिला और मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की मांग की।
- 30 दिसंबर 1906 को ढाका के नवाब सलीमुल्लाह के निमंत्रण पर आयोजित ‘अखिल भारतीय मुस्लिम शैक्षिक सम्मेलन’ में ‘अखिल भारतीय मुस्लिम लीग’ (All India Muslim League) की स्थापना हुई।
- प्रथम स्थायी अध्यक्ष: आगा खान।
- प्रथम अधिवेशन के अध्यक्ष: नवाब विकार-उल-मुल्क मुश्ताक हुसैन।
- मूल उद्देश्य: ब्रिटिश सरकार के प्रति मुसलमानों में वफादारी बढ़ाना, मुसलमानों के राजनीतिक अधिकारों की रक्षा करना और कांग्रेस के प्रभाव को रोकना।
सूरत विभाजन (Surat Split: दिसंबर 1907)
स्वदेशी आंदोलन के फैलाव और कार्यप्रणाली को लेकर नरम दल (उदारवादी) और गरम दल (उग्रवादी) के मध्य मतभेद 1905 के बनारस अधिवेशन (अध्यक्ष: गोखले) और 1906 के कलकत्ता अधिवेशन (अध्यक्ष: दादाभाई नौरोजी) से ही गहरा रहे थे। 1906 में दादाभाई ने पहली बार कांग्रेस के मंच से ‘स्वराज’ (Swaraj) का प्रस्ताव पारित कराकर विभाजन को कुछ समय के लिए टाल दिया था।
- विवाद का मूल बिंदु:
1. आंदोलन का दायरा: उग्रवादी (तिलक) चाहते थे कि स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन को केवल बंगाल तक सीमित न रखकर पूरे भारत में फैलाया जाए और इसका विस्तार सरकारी सेवाओं व अदालतों के बहिष्कार तक किया जाए। उदारवादी इसे केवल बंगाल और विदेशी वस्त्रों तक सीमित रखना चाहते थे।
2. अध्यक्ष पद का विवाद: 1907 का अधिवेशन मूलतः नागपुर में होना था (जो उग्रवादियों का गढ़ था), किंतु फिरोजशाह मेहता ने चालाकी से स्थान बदलकर अपने प्रभाव वाले शहर सूरत (ताप्ती नदी के तट पर) में करवा दिया। उग्रवादी लाला लाजपत राय या तिलक को अध्यक्ष बनाना चाहते थे, जबकि उदारवादियों ने डॉ. रासबिहारी घोष को अध्यक्ष चुना। - घटनाक्रम: 26 दिसंबर 1907 को सूरत अधिवेशन में भारी हंगामा हुआ, मंच पर जूते और कुर्सियां चलीं। अधिवेशन अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया। उदारवादियों ने उग्रवादियों को कांग्रेस से निष्कासित कर दिया।
- परिणाम: सूरत विभाजन ब्रिटिश हुकूमत की कूटनीतिक जीत साबित हुआ। अंग्रेजों ने तुरंत उग्रवादियों पर बर्बर दमन शुरू किया—1908 में तिलक को 6 वर्ष के लिए मांडले जेल (बर्मा) भेज दिया गया, अरविन्द घोष संन्यास लेकर पांडिचेरी चले गए, लाला लाजपत राय अमेरिका चले गए और विपिन चंद्र पाल ने सक्रिय राजनीति से अवकाश ले लिया। आगामी एक दशक (1907–1916) तक राष्ट्रीय आंदोलन नेतृत्वहीनता और जड़ता का शिकार रहा।
9. मॉर्ले-मिंटो सुधार (1909) एवं दिल्ली दरबार (1911)
मॉर्ले-मिंटो सुधार / भारतीय परिषद अधिनियम 1909 (Indian Councils Act 1909):
भारत सचिव जॉन मॉर्ले और वायसराय लॉर्ड मिंटो द्वारा तैयार किए गए इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य उदारवादियों को खुश करना और मुसलमानों को राष्ट्रवाद की मुख्यधारा से अलग कर कांग्रेस को कमजोर करना था।
- सांप्रदायिक निर्वाचन प्रणाली (Separate Electorates – सबसे घातक प्रावधान): मुसलमानों के लिए पहली बार धर्म के आधार पर पृथक निर्वाचन मंडल की स्थापना की गई। इसमें मुस्लिम उम्मीदवारों को केवल मुस्लिम मतदाता ही वोट दे सकते थे।
लॉर्ड मिंटो ने भारत सचिव मॉर्ले को पत्र में लिखा: “हम नाग के दांत (Dragon’s Teeth) बो रहे हैं, और इसकी फसल अत्यंत कड़वी होगी।” लॉर्ड मिंटो को भारत में ‘सांप्रदायिक निर्वाचन का जनक’ (Father of Communal Electorates) कहा जाता है। - वायसराय की कार्यकारिणी में प्रथम भारतीय: सत्येंद्र प्रसन्न सिन्हा (S. P. Sinha) वायसराय की एग्जीक्यूटिव काउंसिल में विधि सदस्य (Law Member) के रूप में नियुक्त होने वाले प्रथम भारतीय बने।
तृतीय दिल्ली दरबार (दिसंबर 1911) एवं ऐतिहासिक निर्णय:
ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम (King George V) और महारानी मैरी के भारत आगमन पर वायसराय लॉर्ड हार्डिंग द्वितीय ने दिल्ली में भव्य राज्याभिषेक दरबार आयोजित किया।
- 1. बंगाल विभाजन को रद्द करना (Annulment of Partition of Bengal): क्रांतिकारियों और स्वदेशी आंदोलन के अनवरत दबाव के कारण 12 दिसंबर 1911 को बंगाल विभाजन को औपचारिक रूप से निरस्त कर दिया गया। भाषाई आधार पर बंगाल को एक किया गया तथा बिहार और ओडिशा को बंगाल से अलग कर एक नया प्रांत बनाया गया, और असम को पुनः एक पृथक चीफ कमिश्नर प्रांत बनाया गया।
- 2. राजधानी का स्थानांतरण: ब्रिटिश भारत की राजधानी को कलकत्ता से स्थानांतरित कर दिल्ली बनाने की ऐतिहासिक घोषणा की गई (1912 में औपचारिक स्थानांतरण हुआ)।
- हार्डिंग बम कांड (23 दिसंबर 1912): जब लॉर्ड हार्डिंग दिल्ली के चांदनी चौक से जुलूस निकाल रहा था, तब रासबिहारी बोस और सचिन सान्याल के नेतृत्व में क्रांतिकारी बसंत कुमार विश्वास ने हाथी पर सवार हार्डिंग पर बम फेंका, जिसमें हार्डिंग घायल हुआ किंतु बच गया।
10. गदर आंदोलन (1913) एवं कोमागाटा मारू कांड (1914)
गदर पार्टी (Ghadar Party: 1913, सैन फ्रांसिस्को, अमेरिका):
उत्तरी अमेरिका (अमेरिका और कनाडा) में बसे भारतीय प्रवासियों (विशेषकर पंजाबी सिख पूर्व सैनिकों और किसानों) ने विदेशी धरती से भारत को आजाद कराने हेतु एक क्रांतिकारी दल का गठन किया।
- संस्थापक: 1 नवंबर 1913 को सैन फ्रांसिस्को में लाला हरदयाल, सोहन सिंह भकना (प्रथम अध्यक्ष), करतार सिंह सराभा, पंडित कांशी राम और तारकनाथ दास ने ‘पैसिफिक कोस्ट हिंदुस्तान एसोसिएशन’ बनाई, जिसे ‘गदर पार्टी’ कहा गया।
- मुख्यालय एवं मुखपत्र: सैन फ्रांसिस्को में स्थापित मुख्यालय का नाम ‘युगांतर आश्रम’ रखा गया। साप्ताहिक पत्रिका ‘गदर’ (उर्दू, गुरुमुखी व अन्य भाषाओं में) निकाली गई जिसके मुखपृष्ठ पर छपता था: “अंग्रेजी राज का दुश्मन” और विज्ञापन में लिखा होता था: “आवश्यकता है—वीर सैनिकों की; वेतन—शहादत; पेंशन—आजादी; कार्यक्षेत्र—भारत!”
- उद्देश्य: प्रथम विश्व युद्ध (1914) के अवसर का लाभ उठाकर भारतीय सैनिकों में विद्रोह कराना और अंग्रेजों को उखाड़ फेंकना।
कोमागाटा मारू कांड (Komagata Maru Incident: 1914):
- कोमागाटा मारू क्या था? यह एक जापानी समुद्री जहाज था जिसे सिंगापुर में रह रहे एक संपन्न भारतीय व्यापारी बाबा गुरदित्त सिंह ने किराए पर लिया था। वे 376 भारतीयों (340 सिख, 24 मुस्लिम, 12 हिंदू) को लेकर हांगकांग से कनाडा के वैंकूवर (Vancouver) बंदरगाह ले जा रहे थे।
- कनाडा की श्वेत नीति: कनाडा सरकार ने कड़े नस्लीय आव्रजन कानून बना रखे थे। मई 1914 में वैंकूवर पहुंचने पर कनाडाई अधिकारियों ने यात्रियों को उतरने नहीं दिया। दो माह तक जहाज पानी में खड़ा रहा और अंततः कनाडाई नौसेना ने उसे वापस लौटने पर मजबूर कर दिया।
- बजबज घाट गोलीबारी (सितंबर 1914): जब जहाज कलकत्ता के बजबज बंदरगाह पर पहुंचा, तो ब्रिटिश पुलिस ने यात्रियों को जबरन पंजाब की ट्रेन में बिठाने का प्रयास किया। झड़प होने पर पुलिस ने गोलियां चलाईं जिसमें 18 से अधिक यात्री मारे गए और सैकड़ों को जेल में डाल दिया गया। इस अमानवीय घटना ने गदर पार्टी के क्रांतिकारियों को आगबबूला कर दिया और हजारों प्रवासी भारत की ओर कूच कर गए।
11. होमरूल लीग आंदोलन (1916) एवं लखनऊ समझौता (1916)
होमरूल लीग आंदोलन (Home Rule League Movement: 1916):
आयरलैंड के होम रूल आंदोलन की तर्ज पर प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत संवैधानिक स्वशासन (Home Rule) प्राप्त करने हेतु दो समानांतर लीगें स्थापित की गईं:
| तुलनात्मक बिंदु | बाल गंगाधर तिलक की लीग (अप्रैल 1916) | एनी बेसेंट की लीग (सितंबर 1916) |
|---|---|---|
| स्थापना समय व स्थान | अप्रैल 1916 (बेलगाम प्रांतीय सम्मेलन) | सितंबर 1916 (मद्रास / अड्यार) |
| भौगोलिक कार्यक्षेत्र | सीमित एवं सुस्पष्ट: महाराष्ट्र (बॉम्बे नगर को छोड़कर), कर्नाटक, मध्य प्रांत (CP) एवं बरार। (कुल 6 शाखाएं) | विशाल: शेष संपूर्ण भारत (बॉम्बे नगर सहित)। (कुल 200 से अधिक शाखाएं) |
| प्रमुख सहयोगी / नेता | जोसेफ बैपटिस्टा (प्रथम अध्यक्ष), एन. सी. केलकर (सचिव)। | जॉर्ज अरुंडेल (संगठनात्मक सचिव), सी. पी. रामास्वामी अय्यर, बी. पी. वाडिया। |
| प्रचार के मुख्य साधन | ‘केसरी’ (मराठी) और ‘द मराठा’ (अंग्रेजी)। | ‘न्यू इंडिया’ (New India) और ‘कॉमनवील’ (Commonweal)। |
| मुख्य मांगें | स्वराज्य, भाषाई आधार पर राज्यों का गठन और मातृभाषा में शिक्षा। | ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत स्वशासन एवं राजनीतिक जन-जागरण। |
महत्व: जून 1917 में जब एनी बेसेंट, बी.पी. वाडिया और जॉर्ज अरुंडेल को गिरफ्तार कर नजरबंद किया गया, तो देश भर में विरोध की लहर दौड़ गई। सर एस. सुब्रह्मण्यम अय्यर ने अपनी ब्रिटिश ‘नाइटहुड’ (Knighthood) की उपाधि त्याग दी। मोहम्मद अली जिन्ना, जवाहरलाल नेहरू और तेज बहादुर सप्रू जैसे शीर्ष नेता आंदोलन में कूद पड़े।
लखनऊ समझौता (Lucknow Pact: दिसंबर 1916):
दिसंबर 1916 में अंबिका चरण मजूमदार की अध्यक्षता में आयोजित लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन भारतीय इतिहास का एक ऐतिहासिक मील का पत्थर था:
- 1. नरम दल और गरम दल का ऐतिहासिक पुनर्मिलन: 1907 के सूरत विभाजन के 9 वर्ष बाद तिलक और एनी बेसेंट के अथक प्रयासों से उग्रवादियों को पुनः कांग्रेस में ससम्मान शामिल किया गया।
- 2. कांग्रेस-लीग समझौता (Lucknow Pact): कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने एक साझा मंच पर आकर अंग्रेजों के समक्ष संयुक्त राजनीतिक मांगें रखने का ऐतिहासिक समझौता किया। मोहम्मद अली जिन्ना ने इस समझौते में मुख्य मध्यस्थ की भूमिका निभाई, जिसके लिए सरोजिनी नायडू ने उन्हें ‘हिंदू-मुस्लिम एकता का राजदूत’ (Ambassador of Hindu-Muslim Unity) कहा था।
- कांग्रेस की ऐतिहासिक भूल (दूरगामी प्रभाव):
कांग्रेस ने पहली बार मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल (Separate Electorates) की मुस्लिम लीग की मांग को औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया। इतिहासकार इसे कांग्रेस की एक भारी रणनीतिक भूल मानते हैं, जिसने आगे चलकर मुस्लिम लीग की सांप्रदायिक राजनीति को वैधानिकता दी और अंततः 1947 के भारत विभाजन की नींव मजबूत की।
12. 1885 से 1919 की संपूर्ण कालानुक्रमिक मास्टर समयरेखा (Master Timeline)
UPSC एवं State PCS प्रारंभिक परीक्षा के त्वरित रिवीजन हेतु सभी प्रमुख घटनाओं का कालानुक्रम:
| वर्ष एवं तिथि | प्रमुख ऐतिहासिक घटना | प्रमुख व्यक्तित्व | महत्वपूर्ण परीक्षा बिंदु |
|---|---|---|---|
| 1876 | इंडियन एसोसिएशन की स्थापना | सुरेंद्रनाथ बनर्जी, आनंद मोहन बोस | कांग्रेस की मुख्य पूर्वगामी संस्था; सिविल सेवा आंदोलन। |
| 1883 | इल्बर्ट बिल विवाद | लॉर्ड रिपन, सी. पी. इल्बर्ट | भारतीय जजों द्वारा अंग्रेजों के मुकदमों की सुनवाई पर श्वेत-विद्रोह। |
| 28 दिसंबर 1885 | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना | ए. ओ. ह्यूम, डब्ल्यू. सी. बनर्जी (अध्यक्ष) | गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज, बॉम्बे; 72 प्रतिनिधि; सेफ्टी वाल्व सिद्धांत। |
| 1892 | भारतीय परिषद अधिनियम 1892 | लॉर्ड लैंसडाउन, दादाभाई नौरोजी | बजट पर बहस का सीमित अधिकार; नौरोजी ब्रिटिश संसद में निर्वाचित। |
| 1897 | रैंड हत्याकांड एवं तिलक का कारावास | चापेकर बंधु, बाल गंगाधर तिलक | तिलक को ‘केसरी’ में लेख हेतु 18 माह जेल; ‘लोकमान्य’ की उपाधि। |
| 1901 | ‘पॉवर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया’ | दादाभाई नौरोजी | ‘धन की निकासी’ (Drain of Wealth) सिद्धांत का प्रमाणिक ग्रंथ। |
| 20 जुलाई 1905 | बंगाल विभाजन की घोषणा | लॉर्ड कर्जन | धार्मिक आधार पर बंगाल का विभाजन (पूर्वी व पश्चिमी बंगाल)। |
| 7 अगस्त 1905 | स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन प्रारंभ | सुरेंद्रनाथ बनर्जी, अश्विनी कुमार दत्त | कलकत्ता टाउन हॉल में बहिष्कार प्रस्ताव पारित। |
| 16 अक्टूबर 1905 | बंगाल विभाजन प्रभावी हुआ | रवींद्रनाथ टैगोर, बंगाल की जनता | ‘शोक दिवस’ व ‘राखी दिवस’; ‘आमार शोनार बांला’ की रचना। |
| 1906 (दिसंबर) | कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन | दादाभाई नौरोजी (अध्यक्ष) | कांग्रेस के मंच से पहली बार ‘स्वराज’ का प्रस्ताव पारित। |
| 30 दिसंबर 1906 | अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना | नवाब सलीमुल्लाह, आगा खान | ढाका में स्थापना; प्रथम अध्यक्ष आगा खान। |
| दिसंबर 1907 | सूरत विभाजन (Surat Split) | रासबिहारी घोष (अध्यक्ष), तिलक | कांग्रेस का नरम दल व गरम दल में विभाजन; उग्रवादी निष्कासित। |
| 1908 | तिलक को 6 वर्ष का मांडले कारावास | बाल गंगाधर तिलक | मुजफ्फरपुर बम कांड के समर्थन में लेख पर राजद्रोह की सजा; मांडले जेल में ‘गीता रहस्य’ लिखी। |
| 1909 | मॉर्ले-मिंटो सुधार (परिषद अधिनियम) | जॉन मॉर्ले, लॉर्ड मिंटो | मुसलमानों के लिए पृथक सांप्रदायिक निर्वाचन मंडल; एसपी सिन्हा विधि सदस्य बने। |
| 12 दिसंबर 1911 | तृतीय दिल्ली दरबार | जॉर्ज पंचम, लॉर्ड हार्डिंग द्वितीय | बंगाल विभाजन रद्द; भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित। |
| 1 नवंबर 1913 | गदर पार्टी की स्थापना | लाला हरदयाल, सोहन सिंह भकना | सैन फ्रांसिस्को (USA); ‘युगांतर आश्रम’; साप्ताहिक पत्रिका ‘गदर’। |
| मई-सितंबर 1914 | कोमागाटा मारू कांड | बाबा गुरदित्त सिंह | वैंकूवर से भारतीयों की वापसी; बजबज घाट पर पुलिस गोलीबारी। |
| अप्रैल 1916 | तिलक की होमरूल लीग की स्थापना | बाल गंगाधर तिलक, जोसेफ बैपटिस्टा | बेलगाम; कार्यक्षेत्र: महाराष्ट्र, कर्नाटक, सीपी व बरार। |
| सितंबर 1916 | एनी बेसेंट की होमरूल लीग | एनी बेसेंट, जॉर्ज अरुंडेल | मद्रास (अड्यार); ‘न्यू इंडिया’ व ‘कॉमनवील’। |
| दिसंबर 1916 | लखनऊ समझौता (Lucknow Pact) | ए. सी. मजूमदार, तिलक, जिन्ना | नरम-गरम दल का विलय; कांग्रेस-लीग समझौता; पृथक निर्वाचन स्वीकार। |
| 20 अगस्त 1917 | मोंटेग्यू घोषणा (अगस्त घोषणा) | एडविन मोंटेग्यू (भारत सचिव) | ब्रिटिश साम्राज्य के अंग के रूप में भारत में क्रमिक रूप से ‘उत्तरदायी सरकार’ की स्थापना का वादा। |
| 1919 | भारत शासन अधिनियम 1919 (मोंटफोर्ड सुधार) | मोंटेग्यू एवं चेम्सफोर्ड | प्रांतों में द्वैध शासन (Dyarchy) लागू; केंद्रीय स्तर पर द्विसदनीय विधायिका। |
13. UPSC स्तर के 5 विश्लेषणात्मक अभ्यास प्रश्न (व्याख्या सहित)
प्रश्न 1. 1905 के ‘स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन’ के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- आंदोलन का औपचारिक प्रारंभ 7 अगस्त 1905 को कलकत्ता के टाउन हॉल में बहिष्कार प्रस्ताव पारित होने के साथ हुआ था।
- रवींद्रनाथ टैगोर के सुझाव पर बंगाल विभाजन के दिन (16 अक्टूबर 1905) को ‘राखी दिवस’ के रूप में मनाया गया।
- राष्ट्रीय शिक्षा परिषद (National Council of Education) की स्थापना 1906 में स्वदेशी आंदोलन के दौरान हुई थी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3 सभी
उत्तर एवं विस्तृत व्याख्या देखें
व्याख्या: तीनों कथन सही हैं। 7 अगस्त 1905 को टाउन हॉल में बहिष्कार प्रस्ताव पारित हुआ। 16 अक्टूबर 1905 को पूरे बंगाल में शोक दिवस और राखी दिवस मनाया गया। 15 अगस्त 1906 को राष्ट्रीय शिक्षा परिषद की स्थापना हुई और बंगाल नेशनल कॉलेज के पहले प्रिंसिपल अरविन्द घोष बने।
प्रश्न 2. 1916 के ‘लखनऊ समझौते’ (Lucknow Pact) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा कथन सत्य है?
(a) इसने कांग्रेस और मुस्लिम लीग के मध्य पूर्ण एकता स्थापित कर दी और मुस्लिम लीग हमेशा के लिए कांग्रेस में विलीन हो गई।
(b) इसके तहत कांग्रेस ने मुसलमानों के लिए ‘पृथक निर्वाचन मंडल’ (Separate Electorates) की मांग को औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया।
(c) इस अधिवेशन की अध्यक्षता पंडित जवाहरलाल नेहरू ने की थी।
(d) बाल गंगाधर तिलक ने इस समझौते का कड़ा विरोध किया था और कांग्रेस छोड़ दी थी।
उत्तर एवं विस्तृत व्याख्या देखें
व्याख्या: लखनऊ समझौते (दिसंबर 1916, अध्यक्ष: अंबिका चरण मजूमदार) का सबसे महत्वपूर्ण और विवादास्पद पहलू यह था कि कांग्रेस ने मुस्लिम लीग की पृथक निर्वाचन मंडल की मांग को स्वीकार कर लिया। यह समझौता तिलक और जिन्ना के प्रयासों से संभव हुआ था।
प्रश्न 3. दादाभाई नौरोजी के ‘धन की निकासी के सिद्धांत’ (Drain of Wealth Theory) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- उन्होंने इस सिद्धांत को सर्वप्रथम 1867 में ‘इंग्लैंड्स डेट टू इंडिया’ नामक शोध-पत्र में प्रस्तुत किया था।
- उनकी पुस्तक ‘पॉवर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया’ 1901 में प्रकाशित हुई थी।
- ‘गृह प्रभार’ (Home Charges) के अंतर्गत लंदन में भारत सचिव के कार्यालय का खर्च और ब्रिटिश अधिकारियों की पेंशन शामिल थी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3 सभी
उत्तर एवं विस्तृत व्याख्या देखें
व्याख्या: तीनों कथन शत-प्रतिशत सही हैं। दादाभाई नौरोजी ने 1867 में ईस्ट इंडिया एसोसिएशन की बैठक में यह सिद्धांत दिया। 1901 में उनकी पुस्तक प्रकाशित हुई। गृह प्रभार में भारत सचिव के इंडिया ऑफिस का खर्च, सेना और अधिकारियों की पेंशन व लाभांश शामिल थे जो बिना किसी प्रतिफल के ब्रिटेन भेजे जाते थे।
प्रश्न 4. निम्नलिखित घटनाओं को उनके सही कालानुक्रम में व्यवस्थित कीजिए:
- कांग्रेस का सूरत विभाजन
- अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना (ढाका)
- मॉर्ले-मिंटो सुधार (भारतीय परिषद अधिनियम)
- तृतीय दिल्ली दरबार में बंगाल विभाजन का रद्दीकरण
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
(a) 2 – 1 – 3 – 4
(b) 1 – 2 – 3 – 4
(c) 2 – 3 – 1 – 4
(d) 1 – 3 – 2 – 4
उत्तर एवं विस्तृत व्याख्या देखें
व्याख्या:
2. मुस्लिम लीग की स्थापना: 30 दिसंबर 1906
1. सूरत विभाजन: दिसंबर 1907
3. मॉर्ले-मिंटो सुधार: 1909
4. दिल्ली दरबार व विभाजन रद्द: 12 दिसंबर 1911।
अतः सही कालानुक्रम 2 – 1 – 3 – 4 है।
प्रश्न 5. 1916 के ‘होमरूल लीग आंदोलन’ के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा युग्म सही सुमेलित नहीं है?
(a) बाल गंगाधर तिलक की लीग का मुख्यालय – पुणे
(b) एनी बेसेंट की लीग का मुख्यालय – अड्यार (मद्रास)
(c) तिलक की लीग का कार्यक्षेत्र – संपूर्ण भारत (महाराष्ट्र को छोड़कर)
(d) एनी बेसेंट के समाचार पत्र – ‘न्यू इंडिया’ एवं ‘कॉमनवील’
उत्तर एवं विस्तृत व्याख्या देखें
व्याख्या: तिलक की लीग का कार्यक्षेत्र सीमित था—महाराष्ट्र (बॉम्बे को छोड़कर), कर्नाटक, मध्य प्रांत (CP) और बरार। शेष संपूर्ण भारत (बॉम्बे नगर सहित) एनी बेसेंट की लीग के कार्यक्षेत्र में था।


