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प्रागैतिहासिक काल एवं पाषाण संस्कृति: पुरा, मध्य एवं नवपाषाण काल तथा भीमबेटका शैलचित्र (Prehistoric India & Stone Age in Hindi)

UPSC & State PSC स्पेशल नोट्स

Table of Contents

प्राचीन भारतीय इतिहास (अध्याय 2): प्रागैतिहासिक काल एवं पाषाण युगीन संस्कृतियां

यह विश्लेषणात्मक अध्ययन सामग्री UPSC Civil Services, BPSC 71st/72nd, UPPSC PCS, MPPSC, HPSC HCS, RAS एवं अन्य राज्य लोक सेवा आयोगों की प्रारंभिक व मुख्य परीक्षा के नवीनतम पाठ्यक्रम पर आधारित है। इसमें पुरापाषाण, मध्यपाषाण (माइक्रोलिथ्स), नवपाषाण (मेहरगढ़, लहुरादेवा, बुर्जहोम, चिरंद), भीमबेटका शैलचित्र एवं ताम्रपाषाण संस्कृतियों का वैज्ञानिक व कालानुक्रमिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।

📑 विषय-सूची (Quick Table of Contents)


1. काल विभाजन एवं वर्गीकरण (Classification of Indian Prehistory)

इतिहासकारों एवं पुरातत्वविदों ने मानव सभ्यता के क्रमिक विकास, लिपि के ज्ञान तथा उपलब्ध साक्ष्यों के स्वरूप के आधार पर भारतीय इतिहास को तीन मुख्य कालों में विभाजित किया है:

काल विभाजनपरिभाषा एवं साक्ष्य स्वरूपप्रमुख उदाहरण / संस्कृति
1. प्रागैतिहासिक काल (Prehistoric Period)वह काल जिसके मानव को लिपि या लेखन कला का कोई ज्ञान नहीं था। इसका इतिहास पूर्णतः पुरातात्विक प्रस्तर उपकरणों, अस्थियों, मृदभांडों व शैलचित्रों पर निर्भर है।पुरापाषाण, मध्यपाषाण एवं नवपाषाण काल।
2. आद्य-ऐतिहासिक काल (Protohistoric Period)वह काल जिसकी लिपि के साक्ष्य तो उपलब्ध हैं, किंतु उन्हें अभी तक सफलतापूर्वक पढ़ा नहीं जा सका है, अथवा उनके साहित्यिक साक्ष्य अप्रमाणिक हैं।सिंधु घाटी (हड़प्पा) सभ्यता एवं ताम्रपाषाणिक संस्कृतियां।
3. ऐतिहासिक काल (Historical Period)वह काल जिसके संबंध में स्पष्ट एवं पठित लिखित साक्ष्य (अभिलेख, साहित्य, सिक्के) उपलब्ध हैं और वे पुरातात्विक साक्ष्यों से पुष्ट होते हैं।छठी शताब्दी ई.पू. (महाजनपद काल, बुद्ध काल) से वर्तमान तक।
📌 परीक्षा दृष्टि से महत्वपूर्ण मील के पत्थर:

  • त्रि-युगीन वर्गीकरण (Three-Age System): 1818–1820 में डेनमार्क के कोपेनहेगन संग्रहालय की पुरातात्विक सामग्री के आधार पर क्रिश्चियन जर्गेन्सन थॉमसन (C.J. Thomsen) ने मानव अतीत को पाषाण काल, कांस्य काल और लौह काल में वर्गीकृत किया।
  • भारतीय पुरातत्व के जनक: 1861 में ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की स्थापना हुई और सर अलेक्जेंडर कनिंघम इसके प्रथम महानिदेशक बने।
  • भारतीय प्रागैतिहास के जनक: ब्रिटिश भूवैज्ञानिक रॉबर्ट ब्रूस फूट (Robert Bruce Foote) ने 13 मई 1863 को मद्रास के निकट पल्लवरम से भारत का प्रथम पूर्व-पाषाणकालीन हस्तकुठार (क्वाटर्जाइट हैंड-एक्स) खोजा था।


2. पुरापाषाण काल (Paleolithic Period – ~25 लाख ई.पू. से 10,000 ई.पू.)

पुरापाषाण काल हिमयुग (Pleistocene Epoch) के दौरान विकसित हुआ। इस काल का मानव पूर्णतः प्रकृति पर निर्भर था—वह ‘खाद्य-संग्राहक’ (Food Gatherer) एवं ‘शिकारी’ (Hunter) था। उसे कृषि, पशुपालन अथवा गृह-निर्माण का ज्ञान नहीं था। अग्नि का ज्ञान तो था, किंतु उसके नियमित उपयोग का ज्ञान नहीं था।

उपकरण निर्माण की तकनीकों एवं जलवायु परिवर्तनों के आधार पर पुरापाषाण काल को 3 चरणों में विभाजित किया गया है:

(A) निम्न पुरापाषाण काल (Lower Paleolithic Age – ~25 लाख से 1 लाख ई.पू.)

• उपकरण सामग्री: मुख्य रूप से बड़े व भारी क्वार्टजाइट (Quartzite – स्फटिक) पत्थर। इसलिए तत्कालीन मानव को ‘क्वार्टजाइट मानव’ भी कहा गया।
• दो प्रमुख उपकरण परंपराएं:

  1. चापर-चोपिंग पेबुल संस्कृति (Soan Valley Culture): पाकिस्तान के पंजाब स्थित सोहन नदी घाटी से डी. टेरा एवं पीटरसन (1935) द्वारा पहचानी गई। पेबुल (नदी द्वारा बहाकर चिकने किए गए गोल पत्थर) से बने एकतरफा धारदार चापर और दोतरफा धारदार चोपिंग औजार।

  2. हैंड-एक्स संस्कृति (Madrasian Culture): दक्षिण भारत में अतिरमपक्कम, पल्लवरम और वददुरई से प्राप्त द्विपक्षीय रूप से तराशे गए हस्तकुठार (Handaxes) व विदारणी (Cleavers)।

• प्रमुख स्थल: सोहन घाटी (पाकिस्तान), बेलन घाटी (UP), डिडवाना (राजस्थान), हुंसगी (कर्नाटक), भीमबेटका (MP) एवं बोरी (महाराष्ट्र – लगभग 14 लाख वर्ष पुराना)।

⭐ हथनोरा का नर्मदा मानव (Narmada Man): 5 दिसंबर 1982 को भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) के पुरातत्वविद डॉ. अरुण सोनकिया ने मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में नर्मदा घाटी स्थित हथनोरा से एक प्रागैतिहासिक मानव खोपड़ी (Cranium) का जीवाश्म प्राप्त किया। इसे ‘होमो इरेक्टस नर्मदाएन्सिस’ नाम दिया गया। यह भारतीय उपमहाद्वीप में मानव जीवाश्म का प्रथम और एकमात्र पुरापाषाण कालीन प्रमाण है।

(B) मध्य पुरापाषाण काल (Middle Paleolithic Age – 1 लाख से 40,000 ई.पू.)

• फलक संस्कृति (Flake Culture): पत्थरों के मूल कोर (Core) के बजाय उनसे तोड़े गए शल्कों/फलकों (Flakes) से औजार बनाए गए। मुख्य औजार: खुरचनी (Scrapers), बेधक (Borers) और बेधनी (Points)।
• कच्चा माल: चर्ट (Chert), जैस्पर (Jasper), फ्लिंट और अकीक (Agate) जैसे सूक्ष्म दानेदार पत्थर।
• नेवासा उद्योग (Nevasan Industry): प्रख्यात पुरातत्वविद प्रो. एच.डी. सांकलिया ने महाराष्ट्र के प्रवरा नदी तट पर स्थित नेवासा में विस्तृत उत्खनन कर इसे ‘नेवासा उद्योग’ या ‘मध्य पुरापाषाण कालीन फलक संस्कृति’ के रूप में स्थापित किया।

(C) उच्च पुरापाषाण काल (Upper Paleolithic Age – 40,000 से 10,000 ई.पू.)

• ब्लेड एवं ब्यूरिन संस्कृति: समानांतर धारदार किनारों वाले लंबे ब्लेड (Blades) और उत्कीर्णन कार्य हेतु तीक्ष्ण तक्षिणी (Burins) का निर्माण।
• आधुनिक मानव (Homo Sapiens) का उदय: इसी काल में आधुनिक प्रज्ञ मानव (होमो सेपियन्स) का प्रादुर्भाव हुआ।
• अस्थि निर्मित मातृदेवी प्रतिमा: इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रो. जी.आर. शर्मा द्वारा उत्तर प्रदेश की बेलन घाटी में लोहंदा नाला से उच्च पुरापाषाण कालीन हड्डी से बनी मातृदेवी (Mother Goddess) की मूर्ति खोजी गई।
• शुतुरमुर्ग के अंडे के छिलके: महाराष्ट्र के पटणे (Patne) से शुतुरमुर्ग के अंडों के छिलकों पर ज्यामितीय नक्काशी और मनके (Beads) बनाने के प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।


3. मध्यपाषाण काल (Mesolithic Period – 10,000 ई.पू. से 4,000 ई.पू.)

हिमयुग की समाप्ति और होलोसीन (Holocene) युग के प्रारंभ के साथ जलवायु गर्म एवं आर्द्र हुई, जिससे वनस्पति और छोटे-तेज जानवरों (हिरण, खरगोश, पक्षी) की संख्या बढ़ी। इसके परिणामस्वरूप मानव ने बड़े भारी पत्थरों के स्थान पर छोटे एवं तीव्र प्रहार करने वाले औजार विकसित किए।

🎯 मध्यपाषाण काल की प्रमुख विशेषताएं:

  • सूक्ष्मपाषाण उपकरण (Microliths): लंबाई मात्र 1 से 5 सेमी। ये ज्यामितीय आकारों (त्रिभुज, नवचंद्राकार, ट्रेपेजियम) में बनाए जाते थे और लकड़ी या हड्डी के दस्ते में चिपकाकर आरी, हंसिया या बाणाग्र बनाए जाते थे। 1867 में सी.एल. कार्लाइल (C.L. Carlyle) ने विंध्य क्षेत्र से सर्वप्रथम माइक्रोलिथ्स खोजे।
  • प्रक्षेपास्त्र तकनीक (Bow & Arrow): तीर-कमान का आविष्कार मध्यपाषाण काल की सबसे क्रांतिकारी तकनीकी उपलब्धि थी, जिससे दूर से तेज भागते शिकार को मारना संभव हुआ।
  • पशुपालन की शुरुआत (~5000 ई.पू.):

    • बागोर (भीलवाड़ा, राजस्थान): कोठारी नदी के तट पर स्थित भारत का सबसे बड़ा मध्यपाषाणिक आवासीय स्थल, जिसका उत्खनन वी.एन. मिश्र ने कराया।

    • आदमगढ़ (नर्मदापुरम/होशंगाबाद, MP): आर.वी. जोशी द्वारा उत्खनित, जहाँ से पालतू भेड़, बकरी व मवेशियों की हड्डियां प्राप्त हुईं।

गंगा घाटी के प्रमुख मध्यपाषाणिक स्थल (प्रतापगढ़, UP):

इलाहाबाद विश्वविद्यालय द्वारा प्रतापगढ़ (UP) में किए गए उत्खननों ने मध्यपाषाण कालीन सामाजिक व धार्मिक जीवन पर अभूतपूर्व प्रकाश डाला:

पुरास्थलप्रमुख पुरातात्विक साक्ष्य एवं विशेषताएं
सराय नाहर राय (Sarai Nahar Rai)11 मानव शवाधान व 8 गर्त-चूल्हे (Hearth)। सिर पश्चिम और पैर पूर्व दिशा में। एक कंकाल की खोपड़ी में सूक्ष्मपाषाण धंसा हुआ मिला, जो भारत में मानवीय युद्ध/हिंसा का प्राचीनतम साक्ष्य है।
महदहा (Mahadaha)हड्डी एवं सींग से बने आभूषण (मृगश्रृंग की मालाएं, कुंडल, बाणाग्र), 35 गर्त-चूल्हे तथा स्त्री-पुरुष का युगल शवाधान (Joint Burial)।
दमदमा (Damdama)कुल 41 मानव शवाधान प्राप्त हुए, जिनमें 5 युगल शवाधान तथा एक ही कब्र में 3 मानव कंकाल एक साथ दफनाए गए मिले हैं।
लेखहिया (Lekhahia, मिर्जापुर)विंध्य क्षेत्र के शिलाश्रय संख्या 1 से कुल 17 मानव कंकाल प्राप्त हुए।


4. भीमबेटका के शैलचित्र (Bhimbetka Rock Shelters)

भीमबेटका भारत में प्रागैतिहासिक कला का सबसे भव्य एवं समृद्ध भंडार है। यह मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में रातापानी वन्यजीव अभयारण्य के निकट विंध्य पर्वतमाला की तलहटी में स्थित है।

🏛️ भीमबेटका से संबंधित प्रमुख परीक्षा तथ्य:

  • खोज: 1957–1958 में विक्रम विश्वविद्यालय (उज्जैन) के पुरातत्वविद डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर (V.S. Wakankar) ने इसकी खोज की थी।
  • यूनेस्को मान्यता: वर्ष 2003 में यूनेस्को (UNESCO) ने भीमबेटका को विश्व सांस्कृतिक धरोहर स्थल घोषित किया।
  • विस्तार: 10 किमी क्षेत्र में 750 से अधिक प्राकृतिक शैलश्रय (Rock Shelters) हैं, जिनमें से 500 से अधिक में शैलचित्र विद्यमान हैं।
  • कला की निरंतरता: यहाँ उच्च पुरापाषाण काल से प्रारंभ होकर मध्यपाषाण, नवपाषाण, ताम्रपाषाण से लेकर ऐतिहासिक काल तक की कलात्मक निरंतरता मिलती है। सर्वाधिक चित्र मध्यपाषाण काल से संबंधित हैं।
  • रंग एवं रसायन: मुख्य रूप से गेरुआ (लाल/हेमाटाइट) और सफेद (चूना) रंग का उपयोग हुआ है। कुछ स्थानों पर हरे और पीले रंगों की रेखाएं भी मिलती हैं। रंगों को टिकाऊ बनाने हेतु पशु चर्बी व पेड़ के गोंद/दूध का प्रयोग किया गया था।
  • चित्रित विषय: शिकार के दृश्य (भालों, तीरों से घिरे जानवर), सामूहिक नृत्य, ढोल-मंजीरे बजाते वादक, महिलाओं द्वारा बच्चे को जन्म देने का दृश्य, शव संस्कार, हाथी, बारहसिंगा, गैंडा, चीता, सूअर और भैंस आदि।


5. नवपाषाण काल (Neolithic Period – ‘नवपाषाणिक क्रांति’)

प्रख्यात ब्रिटिश-ऑस्ट्रेलियाई पुरातत्वविद वी. गॉर्डन चाइल्ड (V. Gordon Childe) ने अपनी पुस्तक ‘Man Makes Himself’ (1936) में नवपाषाण काल के परिवर्तनों को ‘नवपाषाणिक क्रांति’ (Neolithic Revolution) की संज्ञा दी। इस काल में मानव खाद्य-संग्राहक से ‘खाद्य-उत्पादक’ (Food Producer) बन गया, जिससे स्थाई सामाजिक बस्तियों का निर्माण संभव हुआ।

⚡ नवपाषाण काल के चार प्रमुख क्रांतिकारी तत्व:

1. कृषि एवं अन्न उत्पादन: गेहूं, जौ, चावल, रागी की व्यवस्थित खेती तथा अधिशेष उत्पादन।
2. पहिए का आविष्कार: चाक पर परिष्कृत मिट्टी के बर्तन (मृदभांड) तथा भारी माल ढुलाई हेतु पहिएदार गाड़ियां।
3. पॉलिशदार प्रस्तर सेल्ट: कठोर बेसाल्ट व डोलेराइट पत्थरों को घिसकर चिकनी व अत्यधिक धारदार कुल्हाड़ियां।
4. स्थाई ग्राम्य जीवन: कच्ची ईंटों व गारे के आयताकार या गोलाकार घर एवं पशु बाड़े।

प्रमुख नवपाषाणिक पुरास्थल एवं उनके विशिष्ट पुरातात्विक साक्ष्य:

भारतीय उपमहाद्वीप के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों से नवपाषाण काल के अत्यंत महत्वपूर्ण प्रमाण मिले हैं:

📍 1. मेहरगढ़ (Mehrgarh, बलूचिस्तान, पाकिस्तान)

बोलन नदी के किनारे काछी मैदान में स्थित। 1974 में ज्यां-फ्रांस्वा जारिज ने उत्खनन किया। यहाँ से ~7000 ई.पू. के गेहूं (3 किस्में) और जौ (2 किस्में) की खेती के साक्ष्य, कच्ची ईंटों के बहुकक्षीय आयताकार मकान, अन्नागार तथा पाषाण काल से हड़प्पा सभ्यता तक की अविच्छिन्न सांस्कृतिक निरंतरता मिलती है।

📍 2. लहुरादेवा (Lahuradewa, संत कबीर नगर, UP) — नवीन शोध

नवीनतम पुरातात्विक उत्खननों के अनुसार, भारतीय उपमहाद्वीप में कृषि (चावल) का प्राचीनतम साक्ष्य लहुरादेवा से प्राप्त हुआ है (~9000 ई.पू. से 8000 ई.पू.)। इस खोज से पूर्व मेहरगढ़ को कृषि का तथा कोलडिहवा को चावल का सबसे प्राचीन स्थल माना जाता था।

📍 3. कोलडिहवा एवं महाfamily (Koldihwa, बेलन घाटी, प्रयागराज, UP)

बेलन नदी घाटी में स्थित कोलडिहवा से मिट्टी के बर्तनों (मृदभांडों) पर चिपकी हुई धान की भूसी व चावल के दाने (~6500 ई.पू.) प्राप्त हुए थे।

📍 4. बुर्जहोम एवं गुफकराल (Burzahom & Gufkral, कश्मीर)

• बुर्जहोम: अत्यधिक ठंड से बचने हेतु जमीन में खोदे गए ‘गर्त-आवास’ (Pit Dwellings) मिले। कब्रों में मालिक के शव के साथ पालतू कुत्ते को दफनाने का अनूठा साक्ष्य भारत में केवल बुर्जहोम से मिला है।

• गुफकराल: इसका शाब्दिक अर्थ है ‘कुम्हार की गुफा’। यहाँ से भी गर्त-आवास, सिलबट्टा और हड्डी की बारीक सुइयां मिली हैं।

📍 5. चिरंद (Chirand, सारण/छपरा, बिहार)

गंगा, घाघरा, गंडक और सोन नदियों के संगम के निकट स्थित। यहाँ से बुर्जहोम के बाद सर्वाधिक संख्या में हड्डी और विशेषकर हिरण के सींगों (Antlers) से निर्मित परिष्कृत औजार व हथियार प्राप्त हुए हैं।

📍 6. दक्षिण भारत के राख के टीले (Ash Mounds – कर्नाटक व आंध्र प्रदेश)

पिकलीहल, उतनूर, कुपगल, हल्लूर, कोडेकल और संगनकल्लू से विशाल राख के टीले मिले हैं। एफ.आर. ऑलचिन (Allchin) के शोध के अनुसार, नवपाषाणिक चरवाहा समुदाय मौसमी शिविरों के दौरान पशु-बाड़ों (Cattle Pens) में एकत्रित गोबर के विशाल ढेरों को उत्सवों के अवसर पर जला देते थे, जिससे ये टीले बने।

📍 7. पूर्वोत्तर भारत — दाओजली हाडिंग (Daojali Hading, असम)

असम की दीमा हसाओ पहाड़ियों में स्थित। यहाँ से जेडाइट (Jadeite) नामक दुर्लभ हरा पत्थर मिला है जो संभवतः चीन से लाया गया था। इसके अतिरिक्त जीवाश्म-काष्ठ के औजार तथा खरल व मूसल (Mortars and Pestles) मिले हैं।


6. ताम्रपाषाण कालीन संस्कृतियां (Chalcolithic Cultures)

मानव द्वारा उपयोग में लाई गई प्रथम धातु तांबा (Copper) थी। जिस काल में पत्थर के सूक्ष्म औजारों के साथ-साथ तांबे के उपकरणों का प्रयोग किया गया, उसे ताम्रपाषाण काल (Chalcolithic Age) कहा जाता है। यद्यपि ये संस्कृतियां हड़प्पा सभ्यता के समकालीन व उसके बाद तक विकसित रहीं, किंतु ये पूर्णतः ग्रामीण (Rural) थीं।

1. आहाड़-बनास संस्कृति (राजस्थान)

• स्थल: आहाड़, गिलुंद, बालाथल।
• प्राचीन नाम ‘ताम्रवती’ (तांबे वाली जगह)। यहाँ पत्थर के स्थान पर तांबे की कुल्हाड़ियां व चूड़ियां मिलीं। गिलुंद से पक्की ईंटों के साक्ष्य मिले हैं।

2. मालवा संस्कृति (मध्य प्रदेश)

• स्थल: नवदाटोली, कायथा, एरण।
• मालवा के मृदभांड ताम्रपाषाण काल में सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं।
• नवदाटोली (Navdatoli): नर्मदा नदी तट पर प्रो. एच.डी. सांकलिया द्वारा उत्खनित, जहाँ से सर्वाधिक प्रकार के अनाज (गेहूं, चावल, उड़द, मूंग, मसूर, मटर) प्राप्त हुए हैं।

3. जोर्वे संस्कृति (महाराष्ट्र)

• स्थल: इनामगांव, दायमाबाद, चंदोली, निवासा।
• इनामगांव: किलेबंदी, 5 कमरों वाला मुखिया का मकान, तथा शवों के पैरों के पंजों को काटकर घर के फर्श के नीचे उत्तर-दक्षिण दफनाने की प्रथा।
• दायमाबाद: तांबे का रथ चलाते मनुष्य की कांस्य मूर्ति प्राप्त हुई।


7. प्रागैतिहासिक पुरास्थलों की मास्टर तुलनात्मक तालिका (High-Yield Comparison Matrix)

प्रारंभिक परीक्षाओं (UPSC, BPSC, UPPSC, MPPSC) में सीधे पूछे जाने वाले प्रमुख स्थलों, राज्यों, नदियों एवं महत्वपूर्ण खोजों का त्वरित सारणीबद्ध संकलन:

पुरास्थल (Site)राज्य / अवस्थितिकाल (Period)नदी घाटीविशिष्ट पुरातात्विक साक्ष्यखोजकर्ता / उत्खननकर्ता
पल्लवरमतमिलनाडुनिम्न पुरापाषाणकोर्तल्लयारभारत का प्रथम प्रस्तर हैंड-एक्स (1863)रॉबर्ट ब्रूस फूट
हथनोरामध्य प्रदेश (सीहोर)निम्न/मध्य पुरापाषाणनर्मदा घाटी‘नर्मदा मानव’ खोपड़ी (प्रथम मानव जीवाश्म)डॉ. अरुण सोनकिया (1982)
लोहंदा नालाउत्तर प्रदेश (मिर्जापुर)उच्च पुरापाषाणबेलन घाटीअस्थि निर्मित मातृदेवी प्रतिमाप्रो. जी.आर. शर्मा
पटणे (Patne)महाराष्ट्र (जलगांव)उच्च पुरापाषाणताप्ती घाटीशुतुरमुर्ग के अंडों पर नक्काशी व मनकेएस.ए. साले
भीमबेटकामध्य प्रदेश (रायसेन)पुरा से मध्यपाषाणविंध्य पर्वतमाला500+ शैलचित्र गुफाएं (UNESCO धरोहर 2003)डॉ. वी.एस. वाकणकर
बागोरराजस्थान (भीलवाड़ा)मध्यपाषाणकोठारी नदीपशुपालन का प्राचीनतम साक्ष्य, सबसे बड़ा आवासडॉ. वी.एन. मिश्र
सराय नाहर रायउत्तर प्रदेश (प्रतापगढ़)मध्यपाषाणगंगा घाटीमानवीय हिंसा/युद्ध का साक्ष्य, 8 गर्त-चूल्हेके.सी. ओझा / जी.आर. शर्मा
दमदमाउत्तर प्रदेश (प्रतापगढ़)मध्यपाषाणगंगा घाटी41 शवाधान (1 कब्र में 3 कंकाल एक साथ)इलाहाबाद विश्वविद्यालय
मेहरगढ़पाकिस्तान (बलूचिस्तान)नवपाषाण से हड़प्पाबोलन नदीप्राचीनतम कृषि (गेहूं/जौ), ईंटों के घरज्यां-फ्रांस्वा जारिज
लहुरादेवाउत्तर प्रदेश (संत कबीर नगर)नवपाषाणसरयू-घाघरा क्षेत्रचावल की खेती का प्राचीनतम साक्ष्य (~8000 ई.पू.)राकेश तिवारी
बुर्जहोमजम्मू एवं कश्मीरनवपाषाणझेलम घाटीगर्त-आवास (Pit Dwelling), कुत्ते को दफनाने का साक्ष्यडी. टेरा एवं पीटरसन
चिरंदबिहार (सारण)नवपाषाणगंगा-घाघरा संगमहिरण के सींगों (Antlers) के प्रचुर उपकरणडॉ. बी.एस. वर्मा
नवदाटोलीमध्य प्रदेश (खरगोन)ताम्रपाषाण (मालवा)नर्मदा घाटीसर्वाधिक प्रकार के अनाजों के साक्ष्यप्रो. एच.डी. सांकलिया


8. 20 उच्च-स्तरीय बहुविकल्पीय प्रश्न (Practice MCQs Set)

नीचे दिए गए 20 बहुविकल्पीय प्रश्न UPSC सिविल सेवा एवं राज्य PCS (BPSC, UPPSC, MPPSC) की प्रारंभिक परीक्षा के पैटर्न पर आधारित हैं। आप प्रत्येक प्रश्न के नीचे दिए गए “उत्तर एवं विस्तृत व्याख्या देखें” बटन पर क्लिक कर सही उत्तर देख सकते हैं।

(अपनी ऑल इंडिया रैंक एवं नेगेटिव मार्किंग (-0.66) के साथ रीयल-टाइम टेस्ट देने हेतु मॉक टेस्ट 2 ऑनलाइन लिंक पर जाएं।)

प्रश्न 1:

प्रागैतिहासिक काल के वर्गीकरण एवं अनुसंधान के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. कोपेनहेगन संग्रहालय की सामग्री के आधार पर पाषाण, कांस्य और लौह युग का त्रि-युगीन वर्गीकरण क्रिश्चियन जर्गेन्सन थॉमसन ने 1820 में किया था।
2. भारत में प्रागैतिहासिक बस्तियों के अध्ययन का प्रारंभ 1863 ई. में रॉबर्ट ब्रूस फूट द्वारा पल्लवरम (मद्रास) से पूर्व-पाषाणकालीन हस्तकुठार (Handaxe) प्राप्त करने से माना जाता है।
3. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के प्रथम महानिदेशक सर अलेक्जेंडर कनिंघम को ‘भारतीय पुरातत्व का जनक’ कहा जाता है।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

(A) केवल 1 और 2
(B) केवल 2 और 3
(C) केवल 1 और 3
(D) 1, 2 और 3 सभी
👉 उत्तर एवं विस्तृत व्याख्या देखें
सही उत्तर: (D) 1, 2 और 3 सभी
• सी.जे. थॉमसन ने 1818-20 में पाषाण, कांस्य और लौह युग का त्रि-युगीन वर्गीकरण किया था।
• रॉबर्ट ब्रूस फूट ने 13 मई 1863 को पल्लवरम से प्रथम हैंड-एक्स खोजा।
• 1861 में स्थापित ASI के प्रथम महानिदेशक अलेक्जेंडर कनिंघम को ‘भारतीय पुरातत्व का जनक’ कहा जाता है।

प्रश्न 2:

भारतीय उपमहाद्वीप में मानव जीवाश्म (Human Fossil) के प्रथम प्रामाणिक साक्ष्य के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सत्य है?

(A) यह राजस्थान के डिडवाना नामक पुरास्थल से प्राप्त हुआ था।
(B) यह मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में नर्मदा घाटी स्थित हथनोरा स्थल से डॉ. अरुण सोनकिया द्वारा खोजा गया था।
(C) यह कश्मीर की झेलम घाटी स्थित बुर्जहोम से प्राप्त हुआ था।
(D) यह उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में सराय नाहर राय से खोजा गया था।
👉 उत्तर एवं विस्तृत व्याख्या देखें
सही उत्तर: (B)
• 5 दिसंबर 1982 को डॉ. अरुण सोनकिया (GSI) ने हथनोरा (नर्मदा घाटी) से ‘होमो इरेक्टस नर्मदाएन्सिस’ (नर्मदा मानव) का कपाल खोजा। यह भारत में एकमात्र पुरापाषाण कालीन मानव जीवाश्म है।

प्रश्न 3:

पुरापाषाण काल के तीन चरणों एवं उनकी प्रमुख उपकरण-शिल्प परंपराओं के संदर्भ में निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
1. निम्न पुरापाषाण काल — चापर-चोपिंग (पेबुल) एवं हस्तकुठार संस्कृति
2. मध्य पुरापाषाण काल — शल्क/फलक संस्कृति (खुरचनी, बेधक, बेधनी)
3. उच्च पुरापाषाण काल — तीक्ष्ण ब्लेड एवं तक्षिणी (Burin) संस्कृति
उपर्युक्त युग्मों में से कौन-से सही सुमेलित हैं?

(A) केवल 1 और 2
(B) केवल 2 और 3
(C) केवल 1 और 3
(D) 1, 2 और 3 सभी
👉 उत्तर एवं विस्तृत व्याख्या देखें
सही उत्तर: (D) 1, 2 और 3 सभी
तीनों युग्म सही सुमेलित हैं। मध्य पुरापाषाण काल को फलक संस्कृति (सांकलिया द्वारा नेवासा उद्योग) तथा उच्च पुरापाषाण काल को ब्लेड-ब्यूरिन उद्योग कहा जाता है।

प्रश्न 4:

प्रागैतिहासिक काल की कला और मातृदेवी की प्राचीनतम प्रतिमा के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा सही है?

(A) अस्थि (हड्डी) से निर्मित मातृदेवी की प्राचीनतम मूर्ति उत्तर प्रदेश की बेलन घाटी स्थित लोहंदा नाला (उच्च पुरापाषाण काल) से प्राप्त हुई है।
(B) मातृदेवी की प्रथम प्रस्तर मूर्ति मेहरगढ़ के नवपाषाणिक स्तर से प्राप्त हुई है।
(C) भीमबेटका की गुफाओं में केवल नवपाषाण काल के शैलचित्र ही सुरक्षित हैं।
(D) शुतुरमुर्ग के अंडे के छिलकों पर नक्काशी के साक्ष्य बिहार के चिरंद से प्राप्त हुए हैं।
👉 उत्तर एवं विस्तृत व्याख्या देखें
सही उत्तर: (A)
लोहंदा नाला (बेलन घाटी, प्रयागराज/मिर्जापुर) से उच्च पुरापाषाण कालीन हड्डी की मातृदेवी की मूर्ति मिली। शुतुरमुर्ग के अंडे के छिलके पटणे (महाराष्ट्र) से मिले हैं।

प्रश्न 5:

मध्यपाषाण काल (Mesolithic Period) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इस काल के विशिष्ट पाषाण औजारों को ‘सूक्ष्मपाषाण’ (Microliths) कहा जाता है, जिनकी लंबाई प्रायः 1 से 5 सेमी होती थी।
2. भारत में पशुपालन के प्राचीनतम साक्ष्य मध्यपाषाण काल के आदमगढ़ (मध्य प्रदेश) और बागोर (राजस्थान) से प्राप्त होते हैं।
3. बागोर कोठारी नदी के तट पर स्थित भारत का सबसे बड़ा मध्यपाषाणिक आवासीय स्थल है, जिसका उत्खनन वी.एन. मिश्र द्वारा कराया गया था।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सत्य है/हैं?

(A) केवल 1 और 2
(B) केवल 2 और 3
(C) केवल 1 और 3
(D) 1, 2 और 3 सभी
👉 उत्तर एवं विस्तृत व्याख्या देखें
सही उत्तर: (D) 1, 2 और 3 सभी
तीनों कथन पूर्णतः सत्य हैं। बागोर (भीलवाड़ा, राजस्थान) और आदमगढ़ (MP) से लगभग 5000 ई.पू. के पशुपालन के पुरातात्विक साक्ष्य मिले हैं।

💡 शेष सभी 15 प्रश्नों (प्रश्न 6 से 20) की सूची: लहुरादेवा का नवीनतम चावल साक्ष्य, बुर्जहोम के गर्त-आवास व कुत्ता दफनाने का साक्ष्य, चिरंद के मृगश्रृंग औजार, दक्षिण भारत के राख के टीले (Ash Mounds), दाओजली हाडिंग का जेडाइट पत्थर, सराय नाहर राय का युद्ध साक्ष्य, दमदमा के 41 शवाधान, इनामगांव व नवदाटोली।

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9. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQ)

Q1. प्रागैतिहासिक काल (Prehistoric Period) किसे कहते हैं?

मानव इतिहास का वह कालखंड जिसके संबंध में कोई लिखित साक्ष्य या लिपि उपलब्ध नहीं है, प्रागैतिहासिक काल कहलाता है। इसका संपूर्ण अध्ययन पत्थरों के औजारों, गुफा शैलचित्रों, हड्डियों और मिट्टी के बर्तनों के आधार पर किया जाता है, जैसे पुरापाषाण, मध्यपाषाण और नवपाषाण काल।

Q2. भारत में प्रागैतिहासिक पुरातत्व का जनक किसे माना जाता है?

ब्रिटिश भूवैज्ञानिक रॉबर्ट ब्रूस फूट (Robert Bruce Foote) को भारतीय प्रागैतिहास का जनक माना जाता है। उन्होंने 13 मई 1863 को मद्रास के निकट पल्लवरम से भारत का प्रथम पुरापाषाण कालीन हस्तकुठार (Handaxe) खोजा था।

Q3. भारत में मानव जीवाश्म का पहला साक्ष्य कहाँ से मिला था?

5 दिसंबर 1982 को मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में नर्मदा घाटी स्थित ‘हथनोरा’ नामक स्थल से डॉ. अरुण सोनकिया ने होमो इरेक्टस (नर्मदा मानव) की खोपड़ी का जीवाश्म प्राप्त किया, जो भारतीय उपमहाद्वीप में मानव जीवाश्म का पहला और एकमात्र पुरापाषाण कालीन प्रमाण है।

Q4. भीमबेटका की गुफाएं कहाँ स्थित हैं और इनकी खोज किसने की थी?

भीमबेटका मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में विंध्य पर्वतमाला में स्थित है। इन प्रागैतिहासिक शैलचित्रों की खोज 1957-58 में डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर ने की थी। इसे वर्ष 2003 में यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया।

Q5. भारतीय उपमहाद्वीप में कृषि का प्राचीनतम साक्ष्य कहाँ से प्राप्त हुआ है?

नवीनतम पुरातात्विक शोधों के अनुसार उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर जिले में स्थित ‘लहुरादेवा’ से लगभग 9000-8000 ई.पू. के चावल की खेती के प्राचीनतम साक्ष्य मिले हैं। पूर्व शोधों में बलूचिस्तान के ‘मेहरगढ़’ (~7000 ई.पू., गेहूं व जौ) को प्राचीनतम माना जाता था।

Q6. कश्मीर के बुर्जहोम स्थल की सबसे प्रमुख पुरातात्विक विशेषता क्या है?

बुर्जहोम से अत्यधिक ठंड से बचाव हेतु भूमिगत ‘गर्त-आवास’ (Pit-dwellings), हड्डी के बारीक उपकरण तथा कब्रों में मालिक के शव के साथ पालतू कुत्ते को दफनाने का भारत में अनूठा पुरातात्विक साक्ष्य प्राप्त हुआ है।


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