प्राचीन भारतीय इतिहास (अध्याय 3): सिंधु घाटी सभ्यता एवं हड़प्पा संस्कृति (Indus Valley Civilization)
यह विश्लेषणात्मक अध्ययन सामग्री UPSC Civil Services, BPSC 71st/72nd, UPPSC PCS, MPPSC, HPSC HCS, RAS एवं अन्य राज्य लोक सेवा आयोगों की प्रारंभिक व मुख्य परीक्षा के नवीनतम पाठ्यक्रम पर आधारित है। इसमें नगर नियोजन (ग्रिड पद्धति, जल निकासी), विशाल स्नानागार, हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, लोथल, धोलावीरा, कालीबंगा, राखीगढ़ी, सामाजिक-धार्मिक जीवन, विदेशी व्यापार (मेसोपोटामिया/मेलुहा) एवं पतन के सिद्धांतों का वैज्ञानिक व प्रमाणिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
📑 विषय-सूची (Quick Table of Contents)
- 🔹 1. खोज का इतिहास, नामकरण एवं काल-निर्धारण (Discovery, Nomenclature & Chronology)
- 🔹 2. भौगोलिक विस्तार एवं चतुर्दिक सीमाएं (Geographical Extent & Boundaries)
- 🔹 3. अद्वितीय नगर नियोजन एवं वास्तुकला (Town Planning & Architecture)
- 🔹 4. प्रमुख हड़प्पा पुरास्थल एवं विशिष्ट पुरातात्विक साक्ष्य (Major Sites & Findings)
- 🔹 5. सामाजिक जीवन एवं धार्मिक मान्यताएं (Social Structure & Religious Beliefs)
- 🔹 6. आर्थिक जीवन, शिल्प, बाट-माप एवं विदेशी व्यापार (Economy, Craft & Foreign Trade)
- 🔹 7. हड़प्पाई मुहरें, कलाकृतियां एवं लिपि (Seals, Art & Boustrophedon Script)
- 🔹 8. हड़प्पा सभ्यता के पतन के कारण एवं सिद्धांत (Theories of Decline)
- 🔹 9. सिंधु घाटी सभ्यता मास्टर तुलनात्मक संदर्भ तालिका (High-Yield Master Table)
- 🔹 10. 20 उच्च-स्तरीय परीक्षा उपयोगी बहुविकल्पीय प्रश्न (Practice MCQs with Explanations)
- 🔹 11. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQ)
1. खोज का इतिहास, नामकरण एवं काल-निर्धारण (Discovery, Nomenclature & Chronology)
सिंधु घाटी सभ्यता भारतीय उपमहाद्वीप की प्रथम नगरीय क्रांति (First Urbanization) थी। 1921 से पूर्व इतिहासकारों का मानना था कि भारतीय सभ्यता का प्रारंभ वैदिक काल (~1500 ई.पू.) से हुआ था। किंतु हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो के उत्खनन ने भारत के इतिहास को सीधे 2500 ई.पू. तक पीछे धकेल दिया और इसे प्राचीन मिस्र (Nile Valley) तथा मेसोपोटामिया (Tigris-Euphrates Valley) की सभ्यताओं के समकालीन स्थापित किया।
📜 खोज के प्रमुख ऐतिहासिक मील के पत्थर:
- 1826 — चार्ल्स मैसन (Charles Masson): हड़प्पा के प्राचीन टीलों का सर्वप्रथम उल्लेख अपनी पत्रिका ‘Narrative of Various Journeys in Balochistan, Afghanistan, and the Panjab’ में किया।
- 1853–1856 — अलेक्जेंडर कनिंघम: कराची से लाहौर रेलवे लाइन निर्माण के दौरान (ब्रंटन बंधुओं द्वारा गिट्टी के स्थान पर हड़प्पाई ईंटों का उपयोग करने पर) कनिंघम ने स्थल का दौरा किया और एक वृषभ-मुहर प्राप्त की, किंतु वे इसके ऐतिहासिक महत्व को पूरी तरह नहीं समझ सके।
- 1921 — रायबहादुर दयाराम साहनी: तत्कालीन ASI महानिदेशक सर जॉन मार्शल के निर्देशन में पंजाब (पाकिस्तान) के मोंटगोमरी जिले में रावी नदी तट पर हड़प्पा का विधिवत वैज्ञानिक उत्खनन प्रारंभ किया।
- 1922 — राखालदास बनर्जी (R.D. Banerjee): सिंध के लरकाना जिले में सिंधु नदी के तट पर एक बौद्ध स्तूप के उत्खनन के दौरान मोहनजोदड़ो (‘मृतकों का टीला’) की खोज की।
- 24 सितंबर 1924: सर जॉन मार्शल ने ‘द इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूज’ (The Illustrated London News) में आधिकारिक रूप से विश्व के समक्ष सिंधु घाटी में एक प्राचीन अज्ञात सभ्यता के अस्तित्व की ऐतिहासिक घोषणा की।
• हड़प्पा सभ्यता: पुरातत्व विज्ञान के अंतरराष्ट्रीय नियम (International Code of Archaeological Nomenclature) के अनुसार किसी अज्ञात प्राचीन संस्कृति का नामकरण सर्वप्रथम उत्खनित स्थल के नाम पर किया जाता है। अतः ‘हड़प्पा सभ्यता’ इसका सर्वाधिक वैज्ञानिक व तटस्थ नाम है।
• सिंधु घाटी सभ्यता: प्रारंभिक खोजे गए अधिकांश स्थल (हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, चन्हूदड़ो आदि) सिंधु और उसकी सहायक नदियों की घाटी में केंद्रित थे।
• सिंधु-सरस्वती सभ्यता: स्वतंत्रता के बाद लगभग 80% बस्तियां प्राचीन सरस्वती (घग्घर-हाकरा) नदी घाटी के सूखे कछार में पाई गईं, इसलिए इतिहासकार इसे सिंधु-सरस्वती सभ्यता भी कहते हैं।
• कांस्य युगीन सभ्यता (Bronze Age Civilization): तांबे में टिन (लगभग 9:1 अनुपात) मिलाकर ‘कांसा’ बनाने की तकनीक में निपुण होने के कारण यह कांस्य युग की सभ्यता कहलाई।
काल-निर्धारण (Chronology) के विभिन्न मत:
2. भौगोलिक विस्तार एवं चतुर्दिक सीमाएं (Geographical Extent & Boundaries)
हड़प्पा सभ्यता का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल लगभग 12,99,600 वर्ग किलोमीटर (लगभग 13 लाख वर्ग किमी) था, जो तत्कालीन मिस्र और मेसोपोटामिया की सभ्यताओं के सम्मिलित क्षेत्रफल से भी कहीं अधिक विशाल था। इसका समग्र भौगोलिक आकार त्रिभुजाकार (Triangular) था।
🧭 हड़प्पा सभ्यता की चतुर्दिक सीमाएं (Four Extreme Boundaries):
• अवस्थिति: अखनूर, जम्मू-कश्मीर
• नदी: चिनाब नदी का दायां तट
• उत्खनन: जे.पी. जोशी व मधुबाला (1982)
• अवस्थिति: अहमदनगर, महाराष्ट्र
• नदी: गोदावरी की सहायक प्रवरा नदी
• विशेषता: कांस्य का भारी रथ व 4 धातु प्रतिमाएं
• अवस्थिति: मेरठ, उत्तर प्रदेश
• नदी: यमुना की सहायक हिंडन नदी
• उत्खनन: यज्ञदत्त शर्मा (1958)
• अवस्थिति: मकरान तट, बलूचिस्तान (पाक-ईरान सीमा)
• नदी: दासक (दाश्त) नदी तट
• उत्खनन: ऑरेल स्टीन (1927) व जॉर्ज डेल्स
📌 दूरी एवं विस्तार: उत्तर से दक्षिण की कुल दूरी लगभग 1400 किमी तथा पूर्व से पश्चिम का विस्तार लगभग 1600 किमी था। समुद्री तटीय सीमा लगभग 1300 किमी लंबी थी।
📌 अफगानिस्तान में हड़प्पा चौकियां: भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर अफगानिस्तान में दो हड़प्पा व्यापारिक स्थल स्थित थे—शोर्टुघई (Shortughai – बदख्शां, लाजवर्द मणि हेतु प्रसिद्ध) तथा मुंडीगाक (Mundigak)।
3. अद्वितीय नगर नियोजन एवं वास्तुकला (Town Planning & Architecture)
सिंधु घाटी सभ्यता की सबसे उत्कृष्ट और विश्व-प्रसिद्ध उपलब्धि उसका वैज्ञानिक नगर नियोजन (Town Planning) था। यह व्यवस्था तत्कालीन विश्व में किसी भी अन्य सभ्यता में उपलब्ध नहीं थी।
🏗️ नगर नियोजन के मूलभूत सिद्धांत:
1. ग्रिड पद्धति (Grid System / Chessboard Pattern): नगरों की सड़कें सीधी और समानांतर थीं जो एक-दूसरे को समकोण (90° का कोण) पर काटती थीं, जिससे नगर कई आयताकार या वर्गाकार मोहल्लों (Blocks) में विभाजित हो जाता था। मुख्य सड़कें 9 से 10 मीटर तक चौड़ी थीं, जिन्हें कुछ इतिहासकारों ने ‘राजपथ’ (Highway) कहा।
2. दोहरा नगर विन्यास (Twin Mound Division): सामान्यतः प्रत्येक हड़प्पा नगर दो स्पष्ट भागों में बंटा था:
• पश्चिमी टीला (दुर्ग / Citadel / गढ़ी): यह अपेक्षाकृत ऊंचा, कृत्रिम मिट्टी के चबूतरे पर बना तथा सुदृढ़ रक्षा प्राचीरों से घिरा होता था। यहाँ शासक वर्ग, प्रशासनिक अधिकारी या पुरोहित निवास करते थे तथा सार्वजनिक इमारतें (अन्नागार, सभा भवन, स्नानागार) स्थित थीं।
• पूर्वी टीला (निचला नगर / Lower Town): यह क्षेत्रफल में बड़ा किंतु नीचे धरातल पर स्थित था, जहाँ सामान्य नागरिक, व्यापारी, कारीगर एवं श्रमिक निवास करते थे।
- धोलावीरा (Dholavira): यह एकमात्र ऐसा नगर है जो तीन भागों में विभाजित था—दुर्ग (Citadel), मध्यम नगर (Middle Town) और निचला नगर (Lower Town)।
- चन्हूदड़ो (Chanhudaro): पूरी सभ्यता का एकमात्र ऐसा नगर जहाँ किसी दुर्ग या रक्षा प्राचीर का कोई अस्तित्व नहीं मिला।
- लोथल एवं सुरकोटदा: यहाँ दुर्ग और निचला नगर अलग-अलग न होकर एक ही साझी रक्षा प्राचीर के भीतर स्थित थे।
3. अद्वितीय जल निकासी प्रणाली (Underground Drainage System):
प्रत्येक घर का गंदा पानी एक छोटी ढकी नाली के माध्यम से गली की मध्यम नाली में गिरता था, और गली की नाली मुख्य सड़क के नीचे बने बड़े नाले में मिलती थी।
• नालियों के निर्माण में पक्की ईंटों और जिप्सम-चूने के गारे का प्रयोग किया गया था ताकि रिसाव न हो।
• नालियों को ढकने हेतु तराशे गए पत्थरों और बड़ी ईंटों का उपयोग होता था जिन्हें सफाई के समय हटाया जा सके।
• ठोस कचरे को छानने हेतु नियमित दूरी पर नरमोखे (Manholes / सोख्ता गड्ढे) बनाए गए थे।
4. आवासीय भवन एवं गोपनीयता:
मकानों में एक केंद्रीय खुला आंगन (Courtyard) होता था जिसके चारों ओर 4 से 6 कमरे, एक रसोईघर और एक पक्का स्नानागार (Bathroom) होता था। कई मकान दो-मंजिला थे जिनकी सीढ़ियों के अवशेष मिले हैं।
• गोपनीयता नियम: मकान का मुख्य दरवाजा मुख्य सड़क पर न खुलकर पीछे की संकरी गली में खुलता था। मुख्य द्वार से आंगन सीधे दिखाई नहीं देता था।
• अपवाद: लोथल एकमात्र स्थल था जहाँ मकानों के दरवाजे मुख्य सड़क की ओर खुलते थे।
5. ईंटों का मानकीकरण (Standardized Bricks):
हड़प्पा सभ्यता में ईंटों का एक निश्चित मानकीकृत अनुपात मिलता है: लंबाई : चौड़ाई : मोटाई = 4 : 2 : 1 (प्रायः 28 सेमी × 14 सेमी × 7 सेमी)। नगरों के निर्माण में पक्की (भट्ठे में पकी) ईंटों का प्रचुर प्रयोग हुआ, जबकि समकालीन मेसोपोटामिया में अधिकांशतः धूप में सुखाई गई कच्ची ईंटों का प्रयोग होता था।
4. प्रमुख हड़प्पा पुरास्थल एवं विशिष्ट पुरातात्विक साक्ष्य (Major Sites & Findings)
प्रारंभिक एवं मुख्य परीक्षाओं में विभिन्न हड़प्पा पुरास्थलों की भौगोलिक अवस्थिति, उत्खननकर्ता और वहां से प्राप्त विशिष्ट साक्ष्यों से सर्वाधिक प्रश्न पूछे जाते हैं:
📍 1. हड़प्पा (Harappa – पंजाब, पाकिस्तान)
• अवस्थिति: मोंटगोमरी (साहीवाल) जिला, रावी नदी का बायां तट।
• उत्खनन: दयाराम साहनी (1921), माधव स्वरूप वत्स (1926), मार्टिमर व्हीलर (1946)।
• प्रमुख पुरातात्विक साक्ष्य:
1. गढ़ी के उत्तर में 6-6 की दो पंक्तियों में बने कुल 12 अन्नागार (Granaries), जिनका कुल क्षेत्रफल लगभग 838 वर्ग मीटर है।
2. अनाज कूटने हेतु पक्की ईंटों के 18 वृत्ताकार चबूतरे (जिनमें गेहूं व जौ की भूसी के अवशेष मिले)।
3. चबूतरों के निकट श्रमिकों के रहने हेतु 15 श्रमिक आवास बैरक।
4. कब्रिस्तान R-37 (परिपक्व हड़प्पा काल) तथा कब्रिस्तान H (उत्तर हड़प्पा संस्कृति)।
5. स्त्री के गर्भ से निकलता पौधा (पृथ्वी देवी / उर्वरा देवी) चित्रित मुहर।
6. लाल बलुआ पत्थर से बना पुरुष धड़ (Torso) तथा शंख का बना बैल।
7. कांसे की इक्का गाड़ी (Toy Cart) तथा तांबे का दर्पण।
📍 2. मोहनजोदड़ो (Mohenjo-daro – सिंध, पाकिस्तान)
• अवस्थिति: लरकाना जिला, सिंधु नदी का दायां तट। शाब्दिक अर्थ: ‘मृतकों का टीला’ (Mound of the Dead) तथा ‘सिंध का नखलिस्तान’ (Garden of Sindh)।
• उत्खनन: राखालदास बनर्जी (1922), अर्नेस्ट मैके (1927), सर जॉन मार्शल (1930)।
• प्रमुख पुरातात्विक साक्ष्य:
1. विशाल स्नानागार (The Great Bath): 11.88 × 7.01 × 2.43 मीटर। जिप्सम और 3 सेमी बिटुमेन (डामर) का वॉटरप्रूफिंग लेप। उत्तर व दक्षिण में सीढ़ियां। सर जॉन मार्शल ने इसे ‘विश्व का आश्चर्य’ कहा।
2. विशाल अन्नागार (Great Granary): 45.71 × 15.23 मीटर। यह मोहनजोदड़ो की सबसे बड़ी इमारत (Largest Building) थी।
3. कांस्य नर्तकी प्रतिमा (Dancing Girl): लुप्त मोम तकनीक (Lost-Wax) से बनी 10.5 सेमी ऊंची नग्न मूर्ति (बायां हाथ कंधे तक चूड़ियों से भरा हुआ, वर्तमान में राष्ट्रीय संग्रहालय नई दिल्ली में)।
4. दाढ़ी वाले पुजारी/योगी की आवक्ष प्रतिमा (Priest-King): सेलखड़ी प्रस्तर से निर्मित, जिसने तिपतिया (Trefoil) अलंकरण वाली शॉल ओढ़ रखी है।
5. पशुपति शिव मुहर (Proto-Shiva): पद्मासन में त्रिमुखी देव जिसके चारों ओर हाथी, बाघ, गैंडा, भैंसा तथा नीचे 2 हिरण हैं।
6. सूती कपड़े का टुकड़ा (चांदी के फूलदान में लिपटा हुआ) तथा कुएं के पास 7 बार बाढ़ आने के स्तर।
7. महाविद्यालय भवन (Collegiate Building) तथा 20 खंभों वाला सभा भवन (Assembly Hall)।
📍 3. लोथल (Lothal – गुजरात, भारत)
• अवस्थिति: अहमदाबाद जिला, साबरमती की सहायक भोगवा नदी के तट पर।
• उत्खनन: डॉ. एस.आर. राव (1955–1962)। इसे ‘लघु हड़प्पा’ (Micro-Harappa) भी कहा जाता है।
• प्रमुख पुरातात्विक साक्ष्य:
1. जहाजों की गोदी (Dockyard): पक्की ईंटों से बना 214 × 36 मीटर का बेसिन, जो प्राचीनतम मानव-निर्मित बंदरगाह है।
2. फारस की खाड़ी की मुहर: अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार (बटन सील) का अकाट्य साक्ष्य।
3. चावल/धान की भूसी (Rice Husk): 1800 ई.पू. के चावल की खेती का प्रमाण।
4. 3 युगल शवाधान (Joint Burials): एक ही कब्र में स्त्री व पुरुष के एक साथ दफन होने का प्रमाण।
5. हाथी दांत का पैमाना (Ivory Scale): सटीक मापन का उपकरण।
6. मनके बनाने का कारखाना (Bead Factory), अग्नि वेदिकाएं (Fire Altars) तथा तांबे का कुत्ता।
7. मृदभांड पर चालाक लोमड़ी और कौवे का चित्र (पंचतंत्र जैसी कथा का प्राचीनतम रूप)।
📍 4. धोलावीरा (Dholavira – कच्छ, गुजरात) — UNESCO World Heritage
• अवस्थिति: कच्छ के रण में खादिर बेट द्वीप पर मनहर और मानसर नदियों के संगम पर।
• उत्खनन: जे.पी. जोशी (1967-68 खोज) तथा आर.एस. बिष्ट (1990-91 उत्खनन)।
• प्रमुख पुरातात्विक साक्ष्य:
1. त्रि-स्तरीय नगर विन्यास: दुर्ग (Citadel), मध्यम नगर (Middle Town / Stadium युक्त) तथा निचला नगर।
2. 16 विशाल शैल-कर्तित जलाशय: वर्षा जल संचयन (Water Harvesting System) का विश्व में सर्वश्रेष्ठ प्राचीन नमूना।
3. 10 बड़े अक्षरों वाला साइनबोर्ड: उत्तरी द्वार पर लकड़ी के तख्ते पर सफेद जिप्सम से जड़े अक्षर।
4. प्रस्तर स्थापत्य (पॉलिशदार सफेद पत्थरों के स्तंभ व प्राचीर) का प्रचुर उपयोग।
5. जुलाई 2021 में यूनेस्को द्वारा भारत का 40वां विश्व धरोहर स्थल घोषित।
📍 5. कालीबंगा (Kalibangan – हनुमानगढ़, राजस्थान)
• अवस्थिति: प्राचीन घग्घर (सरस्वती) नदी तट पर। शाब्दिक अर्थ: ‘काले रंग की चूड़ियां’।
• उत्खनन: अमलेन्दु घोष (1951 खोज), बी.बी. लाल एवं बी.के. थापर (1961–69)।
• प्रमुख पुरातात्विक साक्ष्य:
1. विश्व में जुते हुए खेत (Ploughed Field) का प्राचीनतम साक्ष्य: प्राक-हड़प्पा स्तर से ग्रिड पद्धति में आड़ी-तिरछी रेखाओं पर दोहरी फसल (चना और सरसों) उगाने का प्रमाण।
2. 7 पंक्तिबद्ध अग्नि वेदिकाएं (Fire Altars): चबूतरे पर हवन कुंड व पशु बलि के साक्ष्य।
3. भवनों के निर्माण में कच्ची ईंटों का प्रयोग (इसलिए इसे ‘दीन-हीन बस्ती’ कहा गया), जबकि फर्श में अलंकृत (Carved) ईंटों का प्रयोग।
4. लकड़ी को कुरेदकर बनाई गई नाली (Wooden Drainage Pipe)।
5. एक बालक की खोपड़ी जिसमें 6 छिद्र मिले (शल्य चिकित्सा / Hydrocephalus का प्राचीनतम साक्ष्य)।
6. भूकंप (Earthquake) के प्राचीनतम पुरातात्विक साक्ष्य।
📍 6. चन्हूदड़ो (Chanhudaro – सिंध, पाकिस्तान)
• अवस्थिति: सिंधु नदी के बाएं तट पर (मोहनजोदड़ो से 130 किमी दक्षिण)।
• उत्खनन: एन.जी. मजूमदार (1931), अर्नेस्ट मैके (1935-36)।
• प्रमुख पुरातात्विक साक्ष्य:
1. पूरी सभ्यता का एकमात्र ऐसा नगर जो बिना किसी दुर्ग (Citadel-less) के था।
2. हड़प्पा सभ्यता का सबसे बड़ा औद्योगिक केंद्र: मनके बनाने का कारखाना (Bead-making Workshop) एवं सीप शिल्प।
3. महिलाओं के सौंदर्य प्रसाधन: लिपस्टिक, काजल/अंजन शलाका, कंघी और शीशा।
4. वक्राकार ईंटें (Curved Bricks) तथा एक ईंट पर बिल्ली का पीछा करते कुत्ते के पंजों के निशान।
5. उत्तर हड़प्पा काल की ‘झूकर एवं झांगर संस्कृति’ के अवशेष।
📍 7. अन्य प्रमुख स्थल एवं उनकी विशिष्टताएं:
• राखीगढ़ी (हिसार, हरियाणा): अमरेंद्र नाथ व प्रो. वसंत शिंदे द्वारा उत्खनित। 350+ हेक्टेयर में विस्तृत, भारत में स्थित सबसे बड़ा हड़प्पा पुरास्थल। यहाँ से DNA विश्लेषण हेतु मानव कंकाल, अन्नागार व प्राचीर मिले हैं।
• बनावली (फतेहाबाद, हरियाणा): आर.एस. बिष्ट द्वारा उत्खनित। यहाँ से मिट्टी का बना हल (खिलौना), उत्तम किस्म का जौ, तथा जल-निकासी प्रणाली का अभाव देखा गया।
• सुरकोटदा (कच्छ, गुजरात): जे.पी. जोशी द्वारा उत्खनित। यहाँ से घोड़े की अस्थियों (Horse Bones) के संभावित प्रमाण, अंडाकार कब्रें तथा तराजू का पलड़ा मिला।
• रंगपुर (अहमदाबाद, गुजरात): एम.एस. वत्स व एस.आर. राव द्वारा उत्खनित। यहाँ से धान/चावल की भूसी के ढेर मिले।
• रोपड़ (रूपनगर, पंजाब): यज्ञदत्त शर्मा (1953-56)। स्वतंत्रता के बाद उत्खनित पहला भारतीय स्थल। यहाँ मालिक के शव के साथ पालतू कुत्ते को दफनाने का साक्ष्य मिला।
• दैमाबाद (अहमदनगर, महाराष्ट्र): प्रवरा नदी तट पर। यहाँ से तांबे का ठोस रथ (दो बैलों द्वारा खींचा जाने वाला रथ चालक) तथा गैंडा, हाथी व भैंसा की कांस्य मूर्तियां मिलीं।
5. सामाजिक जीवन एवं धार्मिक मान्यताएं (Social Structure & Religious Beliefs)
हड़प्पा समाज एक शांतिप्रिय, संगठित और बहु-स्तरीय नागरिक समाज था। विशाल हथियारों, सैन्य छावनियों या युद्ध-सामग्रियों का अभाव दर्शाता है कि यह समाज सैनिकवादी नहीं, बल्कि व्यापारिक व आर्थिक संतुलन पर आधारित था।
👥 सामाजिक वर्गीकरण एवं स्थिति
• समाज 4 प्रमुख वर्गों में विभक्त था: 1. पुरोहित/विद्वान, 2. योद्धा/प्रशासक, 3. व्यापारी/वाणिज्यिक वर्ग, 4. शिल्पकार व श्रमिक वर्ग।
• अत्यधिक संख्या में नारी मृण्मूर्तियां (Terracotta Mother Figurines) मिलने के आधार पर समाज को मातृसत्तात्मक (Matriarchal) माना जाता है।
• स्त्री और पुरुष दोनों सूती व ऊनी वस्त्र पहनते थे तथा आभूषण (हार, बाजूबंद, कुंडल, पायल) प्रिय थे।
🕉️ धार्मिक मान्यताएं एवं पूजा
• मातृदेवी की पूजा: उर्वरता एवं सृष्टि की अधिष्ठात्री देवी के रूप में।
• पशुपति शिव (आद्य-शिव): योग मुद्रा में बैठे तीन सींग वाले देवता की उपासना।
• प्रकृति पूजा: पीपल (अश्वत्थ) वृक्ष को पवित्र माना जाता था; नाग एवं जल पूजा (स्नानागार) का प्रचलन था।
• पशु पूजा: काल्पनिक एकश्रृंगी (Unicorn) तथा कूबड़दार बैल (Humped Bull) सर्वाधिक पूजनीय थे।
• स्वास्तिक चिह्न: सूर्य पूजा के प्रतीक के रूप में मुहरों पर प्राप्त हुआ।
हड़प्पा सभ्यता में पूरे क्षेत्र में कहीं से भी किसी ‘मंदिर’ (Temple) या विशेष पूजा भवन के पुरातात्विक साक्ष्य नहीं मिले हैं। उनका धर्म आडंबरहीन, प्रकृतिवादी और लौकिक (Secular) था जिसमें परलौकिक सत्ता के स्थान पर उर्वरता, जल और प्रकृति का आदर केंद्रीय था।
अंतिम संस्कार / शवाधान पद्धतियां (Burial Practices):
हड़प्पावासी पुनर्जन्म में विश्वास रखते थे, इसीलिए वे मृतकों के साथ भोजन के बर्तन, आभूषण, दर्पण व मनके दफनाते थे। शवाधान की तीन विधियां प्रचलित थीं:
- 1. पूर्ण समाधिकरण (Complete Burial): शव को उत्तर-दक्षिण दिशा में लिटाकर गड्ढे में दफनाना (सर्वाधिक प्रचलित)। सिर उत्तर में और पैर दक्षिण में होते थे।
- 2. आंशिक समाधिकरण (Fractional Burial): शव को जंगल में पशु-पक्षियों के खाने हेतु छोड़ देना और बाद में बची हड्डियों को मिट्टी के कलश में रखकर दफनाना।
- 3. दाह संस्कार (Cremation): शव को जलाकर उसकी राख को कलश में भरकर भूमि में गाड़ना (कलश शवाधान / Urn Burial)।
6. आर्थिक जीवन, शिल्प, बाट-माप एवं विदेशी व्यापार (Economy & Foreign Trade)
हड़प्पा सभ्यता की समृद्धि का मूल आधार उसकी उन्नत कृषि अधिशेष (Agricultural Surplus) और सुदृढ़ आंतरिक व सुदूर विदेशी व्यापारिक नेटवर्क था।
🌾 कृषि एवं पशुपालन:
• प्रमुख फसलें: कुल 9 फसलें ज्ञात थीं—गेहूं (3 किस्में), जौ (2 किस्में), रागी, तिल, सरसों, मटर, खजूर, तरबूज और कपास।
• कपास (Cotton): विश्व में सर्वप्रथम कपास का उत्पादन सिंधु घाटीवासियों ने किया। यूनानियों ने इसे ‘सिंडन’ (Sindon) नाम दिया (सिंधु से उत्पन्न)।
• पशुपालन: बैल, भैंस, भेड़, बकरी, सूअर, कुत्ता, बिल्ली, गधा, ऊंट और हाथी पाले जाते थे। घोड़े की उपस्थिति संदिग्ध एवं अपवाद स्वरूप थी (सुरकोटदा से अस्थियां)। शेर (Lion) का कोई साक्ष्य नहीं मिला है।
कच्चे माल के प्रमुख आयात स्रोत (Import Table):
अक्कड़ के शासक सारगोन (लगभग 2350 ई.पू.) के कीलाक्षर अभिलेखों में तीन विदेशी व्यापारिक केंद्रों का उल्लेख है:
1. दिलमुन (Dilmun): फारस की खाड़ी में स्थित बहरीन द्वीप, जिसे ‘हाथियों का देश’ व ‘सूर्योदय का देश’ कहा गया (मध्यवर्ती व्यापारिक पड़ाव)।
2. माकन (Makan): ओमान का तटीय क्षेत्र (जहाँ से तांबा आयात होता था)।
3. मेलुहा (Meluhha): सिंधु घाटी का क्षेत्र। इसे ‘नाविकों का देश’ कहा गया जहाँ से हाथी दांत, कार्नेलियन मनके, इमारती लकड़ी और मयूर (हाजा पक्षी) निर्यात होते थे।
7. हड़प्पाई मुहरें, कलाकृतियां एवं लिपि (Seals, Art & Boustrophedon Script)
🏷️ हड़प्पाई मुहरें (Harappan Seals):
• अब तक 2000 से अधिक मुहरें प्राप्त हो चुकी हैं, जिनमें सर्वाधिक मोहनजोदड़ो (लगभग 68%) और हड़प्पा से मिली हैं।
• मुहरें अधिकांशतः चौकोर या वर्गाकार आकार में सेलखड़ी (Steatite / सोपस्टोन) की बनी हैं।
• मुहरों पर सबसे अधिक अंकन एकश्रृंगी काल्पनिक पशु (Unicorn) का है, जिसके बाद कूबड़दार बैल का स्थान है।
• मुहरों का प्राथमिक उपयोग व्यापारिक गांठों (Packages) पर गीली मिट्टी लगाकर सील करने हेतु होता था ताकि रास्ते में छेड़छाड़ न हो।
🖋️ हड़प्पाई लिपि (Indus Script):
• यह लिपि मूलतः भावचित्रात्मक (Pictographic / Ideographic) है जिसमें विचारों को चित्रों के माध्यम से व्यक्त किया गया है।
• लिपि में लगभग 400 से अधिक मूल चिह्न (Signs) हैं, जिनमें अंग्रेजी के ‘U’ अक्षर तथा मछली (Fish) के चिह्न सर्वाधिक प्रचलित हैं।
• लेखन शैली: यह सामान्यतः दाएं से बाएं (Right to Left) लिखी जाती थी। यदि लेख एक से अधिक पंक्तियों का हो, तो पहली पंक्ति दाएं से बाएं और दूसरी बाएं से दाएं लिखी जाती थी—इस शैली को ‘बुस्ट्रोफेडन’ (Boustrophedon / गोमूत्रिका लिपि) कहा जाता है।
• यह लिपि आज तक अपठित (Undeciphered) है, इसीलिए हड़प्पा सभ्यता को ‘आद्य-ऐतिहासिक काल’ (Protohistoric) में रखा जाता है।
8. हड़प्पा सभ्यता के पतन के कारण एवं सिद्धांत (Theories of Decline)
लगभग 1900 ई.पू. के आसपास हड़प्पा सभ्यता के परिपक्व नगरीय स्वरूप में विघटन के लक्षण दिखाई देने लगे और लगभग 1750 ई.पू. तक इसका नगरीय ढांचा बिखरकर ग्रामीण संस्कृतियों में परिवर्तित हो गया। आधुनिक पुरातत्वविदों का सर्वमान्य निष्कर्ष है कि किसी एक आकस्मिक कारण से नहीं, अपितु विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग पारिस्थितिक व प्राकृतिक कारणों (Multi-causal Process) से इसका पतन हुआ:
9. सिंधु घाटी सभ्यता मास्टर त्वरित संदर्भ तालिका (High-Yield Master Table)
10. 20 उच्च-स्तरीय बहुविकल्पीय प्रश्न (Practice MCQs with Explanations)
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प्रश्न 1: हड़प्पा सभ्यता के काल-निर्धारण के संदर्भ में रेडियोकार्बन (C-14) के आधार पर धर्मपाल अग्रवाल (D.P. Agrawal) द्वारा निर्धारित सर्वमान्य तिथि क्या है?
(A) 3250 ई.पू. से 2750 ई.पू.
(B) 2300 ई.पू. से 1750 ई.पू.
(C) 2500 ई.पू. से 1500 ई.पू.
(D) 1900 ई.पू. से 1300 ई.पू.
उत्तर व व्याख्या देखें
उत्तर: (B)
प्रख्यात पुरातत्वविद प्रो. डी.पी. अग्रवाल ने कार्बन-14 तिथियों के आधार पर हड़प्पा सभ्यता की परिपक्व अवधि 2300 ई.पू. से 1750 ई.पू. निर्धारित की, जिसे सर्वाधिक वैज्ञानिक व प्रामाणिक माना जाता है।
प्रश्न 2: भारत में स्थित क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा हड़प्पा पुरास्थल कौन-सा है?
(A) धोलावीरा (गुजरात)
(B) लोथल (गुजरात)
(C) कालीबंगा (राजस्थान)
(D) राखीगढ़ी (हरियाणा)
उत्तर व व्याख्या देखें
उत्तर: (D)
हरियाणा के हिसार जिले में स्थित राखीगढ़ी 350 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फैला हुआ है। यह भारत में स्थित सिंधु सभ्यता का सबसे बड़ा पुरास्थल है।
प्रश्न 3: हड़प्पा सभ्यता का एकमात्र ऐसा नगर कौन-सा था जो तीन भागों (दुर्ग, मध्यम नगर एवं निचला नगर) में विभाजित था?
(A) सुरकोटदा
(B) धोलावीरा
(C) चन्हूदड़ो
(D) बनावली
उत्तर व व्याख्या देखें
उत्तर: (B)
गुजरात के कच्छ में स्थित धोलावीरा सामान्य दोहरे विभाजन के विपरीत तीन स्पष्ट भागों में विभाजित था। यहाँ से 16 विशाल प्रस्तर जलाशय तथा 10 अक्षरों का साइनबोर्ड भी मिला है।
प्रश्न 4: हड़प्पा सभ्यता के लोगों को निम्नलिखित में से किस धातु का ज्ञान नहीं था?
(A) तांबा
(B) कांसा
(C) सोना एवं चांदी
(D) लोहा
उत्तर व व्याख्या देखें
उत्तर: (D)
हड़प्पा सभ्यता एक कांस्य युगीन सभ्यता थी। उन्हें तांबा, कांसा, सोना, चांदी, टिन व सीसे का ज्ञान था, किंतु लोहे (Iron) का कोई ज्ञान नहीं था। भारत में लोहे का प्रचलन लगभग 1000 ई.पू. (उत्तर वैदिक काल) से हुआ।
11. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQ)
वर्ष 1921 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के तत्कालीन महानिदेशक सर जॉन मार्शल के निर्देशन में रायबहादुर दयाराम साहनी ने ‘हड़प्पा’ का उत्खनन किया। इसके अगले वर्ष 1922 में राखालदास बनर्जी ने ‘मोहनजोदड़ो’ की खोज की। 24 सितंबर 1924 को सर जॉन मार्शल ने आधिकारिक रूप से सिंधु सभ्यता की खोज की विश्व घोषणा की।
समग्र रूप से सिंधु घाटी सभ्यता का सबसे बड़ा नगर मोहनजोदड़ो (पाकिस्तान) था। जबकि स्वतंत्र भारत की सीमाओं के भीतर स्थित क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा हड़प्पा स्थल हरियाणा के हिसार जिले में स्थित ‘राखीगढ़ी’ (350 हेक्टेयर से अधिक) है।
हड़प्पा सभ्यता का नगर नियोजन समकोण पर काटती सड़कों वाली ‘ग्रिड पद्धति’ पर आधारित था। इसकी सबसे अद्वितीय विशेषता इसकी वैज्ञानिक, ढकी हुई भूमिगत जल-निकासी प्रणाली (Drainage System), पक्की ईंटों के मानकीकृत अनुपात (4:2:1) तथा सोख्ता गड्ढे/मैनहोल थे।
नहीं। पूरी सिंधु घाटी सभ्यता में किसी भी पुरास्थल से मंदिर या किसी भव्य पूजा भवन के अवशेष नहीं मिले हैं। यह समकालीन मिस्र और मेसोपोटामिया से भिन्न था। हड़प्पावासी प्रकृति, पशुपति शिव, मातृदेवी, पीपल वृक्ष व कूबड़दार बैल की व्यक्तिगत व आनुष्ठानिक रूप से पूजा करते थे।
मेसोपोटामिया (सुमेरिया) के सम्राट सारगोन के कीलाक्षर अभिलेखों में सिंधु क्षेत्र के लिए ‘मेलुहा’ (Meluhha) शब्द का प्रयोग किया गया है। इन ग्रंथों में मेलुहा को ‘नाविकों का देश’ कहा गया है।


